साहित्य चक्र

22 November 2022

कितनी शर्म की बात है ?




हमारे देश में जब भी कोई बलात्कार, रेप, उत्पीड़न और हत्या या अन्य मामले सामने आते हैं तो हम सबसे पहले आरोपी और पीड़ित/पीड़िता की जाति और धर्म देखते हैं या फिर खोजने लगते हैं। हद तो तब हो जाती है, जब हम किसी महिला के साथ हुए बलात्कार को भी धर्म और जाति के चश्मे से सही ठहराने लग जाते हैं। हाल ही में गुजरात सरकार ने रेप और हत्या के कई आरोपियों को रिहा किया। इतना ही नहीं बल्कि उन आरोपियों का फूल मालाओं के साथ स्वागत भी हुआ। तब हमारा पूरा समाज चुप था। कल और हत्या एक मामला सामने आया है, जिसमें आरोपी ने अपनी प्रेमिका की हत्या कर उसके शव को कई भागों में काटकर अलग-अलग जगह फेंक दिया। यह पूरी घटना बेहद ही शर्मसार और हृदय को डरा देने वाली है। इस पूरी घटना के सामने आने के बाद से कुछ सोशल मीडिया के नफरती चिंटू और किसी विशेष पार्टी के समर्थक इस पूरे मामले को धर्म का संप्रदायिक रंग चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। जिससे आरोपी के धर्म और समाज के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है। इस पूरे नफरत और घटना को लेकर सवाल उठता हैं- क्या इस तरह से किसी एक समाज के खिलाफ नफरत फैलाना सही है ?

एक भारतीय होने के नाते हमें शर्म आनी चाहिए कि हम हर घटनाओं में आरोपी और पीड़ित/पीड़िता का धर्म, जात और मजहब देखकर अपना मत या समर्थन सोशल मीडिया पर प्रकट करते हैं। क्या एक शिक्षित नागरिक होने के नाते हमें रेप, बलात्कार, हत्या और शोषण जैसे मामलों में आरोपी और पीड़ित / पीड़िता का धर्म और जात देखनी चाहिए ? इस तरह के व्यवहार से हम कैसे समाज का निर्माण करेंगे ? क्या हम भारतीयों में न्याय और दया का भाव भी धर्म के आधार पर तय हो रहा है ? आखिर हम हर मामले को धर्म, जात और मजहब से जोड़कर क्यों देखते हैं ?

भारत की आजादी में हर समाज, हर जाति और हर मजहब के लोगों का योगदान रहा है। इसलिए हम सभी को किसी भी प्रकार की घटना या मुद्दे को धार्मिक और जात के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जब हम किसी घटना को जात और धर्म से जोड़ कर देखना शुरू करते हैं, तब हम अपने समाज में नफरत और दूरियां पैदा करते हैं। एक समाज के लिए नफरत और दूरियां सही नहीं है। समाज तभी समाज है जब उसमें भाईचारा, एकता, अखंडता और देशभक्ति मौजूद हो। हर घटना और मुद्दे पर हमें आरोपियों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, मगर हमें आरोपी की जाति और धर्म देखकर उसका समर्थन और विरोध नहीं करना चाहिए। किसी भी आरोपी की कोई जात, कोई धर्म और कोई मजहब नहीं होता है क्योंकि आरोपी ना इंसान की श्रेणी में आता है और ना ही वह किसी मजहब और धर्म का सगा होता है।


- दीपक कोहली


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