साहित्य चक्र

22 November 2022

वर्तमान साहित्य किस दिशा में जा रहा है ?




आपने कभी मंथन किया है वर्तमान साहित्य किस दिशा में जा रहा है ? साहित्य के नाम पर वर्तमान में क्या रचा जा रहा है ?  पकी - अदपकी खिचड़ी जो हमको साहित्य के नाम पर परोसी जा रही है ...उसका समाज पर कितना असर पड़ रहा है ?  आज का साहित्य दो गुटों में बटा हुआ है । पहला गुट मंचीय कवियों द्वारा परोसे जाने वाला साहित्य , जिसमें साहित्य के नाम पर चुटकुले , अश्लील सवांदो से भरे लतीफे ओर गला फाड़कर जबरदस्ती हमारे कानों में साहित्य के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। मंच पर जो कवि जितना ज्यादा गला फाड़कर चिल्लाएगा लोग उतनी ही ताली बजाएंगे , और वही कवि सफल मंचीय कवि कहलाया जाएगा ।जिसका साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है ।  






जिसमे पब्लिक का मनोरंजन करना ....पब्लिक को हंसाना ही एकमात्र उद्देश्य रह गया है । और माल बटोर कर चले जाना।  रही सही कसर कवित्रियों को बुलाकर पूरी की जाती है।  लोग उनका साहित्य नहीं उनका सौंदर्य देखने और आंखें सेक कर खुश हो जाते हैं।  आम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या कह रही है या साहित्य के नाम पर क्या सुना रही है।  वह तो सिर्फ उस मन मोहिनी अप्सरा रूपक साहित्य कवित्री को देख कर ही खुश हो जाते हैं।  और तालियों की बरसात कर देते हैं। आज का साहित्य अपनी जमीन छोड़कर हवा हवाई हो गया है।  साहित्य के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है।  मंचो पर आजकल उन्हीं को मौका मिलता है जो एक दूसरे के तलवे चाटने को भी हर समय तैयार रहते हैं।  इसमें भी भाई भतीजा वाद अपने चरम पर पहुंच गया है।  कहीं पर भी कवि सम्मेलन हो तो लोग अपनी जान पहचान के कवियों को बुलाकर इतिश्री कर लेते हैं।  दूसरा गुट वह होता है जो मंच तक नहीं पहुंच पाता .... डायरियो में ही दबा रहता है। मगर यह गुट भी किसी से कम नहीं है।  वर्तमान में ऐसे कई पत्र पत्रिकाएं और अखबार निकल रहे हैं । जो एक विशेष शुल्क लेकर लोगों की रचनाएं प्रकाशित कर देते हैं।  अखबार वाले अपना धंधा चला रहे हैं और इधर इनका धंधा चल रहा है।  कुछ भी पका अद- पका अखबारों में प्रकाशित करवा कर.... यह अपने आप को राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कवि समझने लगते हैं । 


कोई भी छोटी सी घटना होने पर उस पर लिखने के लिए ऐसी बाढ़ आ जाती है।  की अखबारों के पन्ने इन नए साहित्यकारों से भर जाते हैं।  कई लोग तो किसी घटना को जीवनी की तरह उतार कर उसको साहित्य का चोला पहना देते हैं ।  और इन को प्रोत्साहन देने वाले वह कई ग्रुप , संगठन जो इनको ऑनलाइन प्रशंशीत पत्र , सम्मान पत्र सौंप देते हैं। फिर यह अपने आप को किस किसी जय शंकर प्रसाद , मुंशी प्रेमचंद , दुष्यंत से कम नहीं समझते। पत्र-पत्रिकाओं में शायद ही कोई अच्छी साहित्यिक रचना पढ़ने को मिले मगर इनमें से सब अपने आप को राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार समझकर गदगद होता रहता है। साहित्य का वर्तमान स्वरूप धीरे-धीरे बदलता जा रहा है।  कई संगठन सम्मान के नाम पर एक मोटी रकम वसूल करते हैं। और कहीं पर एक या दो दिन का सेमिनार करके लोगों को सम्मान पत्र बांट देते हैं। इनको कोई फर्क नहीं पड़ता ,  कौन कितने पानी में है।  इसके द्वारा क्या रचा जा रहा है। इनको तो सिर्फ अपने मोटी रकम से मतलब होता है।  इनके द्वारा जो यह धंधा साहित्य के नाम पर किया जा रहा है इससे भी समाज पर गलत प्रभाव पड़ रहा है।  वर्तमान साहित्य अब मंथन चिंतन का नहीं रह गया है। 


धीरे-धीरे साहित्य के नाम पर भी लोग धंधा करने लगे हैं । और अपनी जेब भरने लगे हैं।  वर्तमान में कई प्रकाशक एक निश्चित राशि लेकर लोगों की किताबें निकलवा रहे हैं । उनको कोई फर्क नहीं पड़ता जो साहित्य की किताब वह निकाल रहे हैं। उन्हें कितने लोग पढ़ते हैं।  उन्हें तो सिर्फ अपनी जेबों में माल बटोरने से मतलब है। ऐसा नहीं है कि सभी कवि और साहित्यकार कचरा ही लिख लिखकर अपनी डायरिया या लोगों के कान बजा रहे हैं।  कुछ अच्छे , गंभीर और मंथन वाले साहित्यकार आज भी हैं।  जो समाज को एक दिशा दे रहे हैं।  और समाज की रूढ़ियों ओर  पाखण्डों के ऊपर खुलकर लिख रहे हैं । और समाज को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं । मगर यह सिर्फ गिने-चुने कुछ ही साहित्यकार बचे हैं।  जिनके कारण साहित्य की आत्मा अभी तक जिंदा है।



                                                       - कमल राठौर साहिल

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