साहित्य चक्र

09 June 2019

परिंदों को भी घिन आती है इन तुच्छ दरिंदों पर...!

मानवता का नामो निशान इस निर्दयी जग में मुर्दा बन गया है । मानवता को शर्मसार करने में ये दो कोड़ी के इंसान नहीं जानवरों से भी कहीं अधिक गये-गुजरे राक्षस है। इस धरती पर इंसान यदि न्याय माँगे तो उल्टा अन्याय का शिकार हो ही जाता है।

अलीगढ़(उ.प्र.) में रहने वाली एक तीन साल की मासूम ट्विंकल शर्मा जो अभी बचपन की बूंदों के संग घर में खिलखिलाहट-सी खुशियाँ बिखेर रही थी कि धरती पर दो राक्षस काल बनकर उसका इंतजार कर रहे थे।

माँ-बाप की लाड़ली बिटियाँ रानी के संग में ऐसा घिनौना एवं तुच्छ कृत्य होगा, शायद ही किसी ने कल्पना की होगी, लेकिन कौन किसके मन को जान सकता है, उस तीन साल की मासूम के साथ जो बर्बरता पूर्ण बलात्कार करने एवं शरीर के टुकड़े कर कुत्तों को खिलाने का जो नृशंसतापूर्ण कृत्य जिन आवारा राक्षसों ने किया है, बेहद ही ह्रदयविदारक है।



आखिर हो भी क्यों न हर माँ-बाप को अपनी संतान अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी होती है, तो सोचिए, क्या गुजरी होगी उस परिवार पर, क्या हाल होगा उन माँ-बाप का, शायद भगवान भी सिर पिटता होगा और कहता होगा मैंने इन तुच्छ को इंसान बनाकर बड़ा ही पाप कर दिया।

आखिर रोता होगा भारत का संविधान जो बंद पन्नों के खुलने का इंतजार कर रहा होगा । यदि कोई व्यक्ति संविधान के साथ छेड़छाड़ करे तो उसे सजा हो जाती है, और कोई कसाई तीन साल की मासूम के साथ कुकृत्य करे, मारे ओर उसके टुकड़े करे, क्या ये संविधान से छोटी घटना है।

इसलिए अब भी समय है ऐसे नपुंसक,राक्षस रूपी जानवरों को सरेआम टुकड़े-टुकड़े कर चिल, कौओं को खिलाना चाहिए, ताकि देश में अभी और जो पापी पनप रहे हैं, उनको भी एहसास हो जाए कि आखिर कुकृत्य का परिणाम क्या होता है।

आशा है सरकार अपने निर्णय में, संविधान में संशोधन कर ऐसे राक्षसों को सबक सिखाएगी।

इस घटना पर प्रस्तुत पंक्तियां-

धर्म,जाति के नाम पर तो खूब बोलते हैं, 
ऐसे कुकृत्यों पर क्यों ना राजसिंहासन डोलते हैं।

                                                            ।। सुनील पोरवाल ।।






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