साहित्य चक्र

20 June 2019

श्रोतादि इन्द्रियों...!

श्रोतादि इन्द्रियों को रूप,रस, शब्दादि विषयों से समेटकर मन को प्रकृति से परे  परम तत्व परमात्मा की ओर प्रेरित करना प्राणायाम है। वृति का एकाकार होना ही ध्यान है। आज ध्यान सीखाने के नाम पर बड़ी राशि वसूली जा रही है। मेडिटेशन के नाम पर लोगों को लूटा जा रहा है। बड़े बडे ध्यान योग शिविर लग रहे हैं। जिनमे ध्यान सीखने के लिए पंजीयन कराना होता है। अच्छा बिजनेस चल निकला है।



भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में  प्राणायाम की विधि बताई है। इन्द्रियों और विषयों के संसर्ग को बाहर ही त्याग कर भृकुटि के मध्य मर दृष्टि को स्थिर कर मन की दृष्टि को स्थिर करो। आंखें नहीं देखती। देखते है आपके विचार देखती है मन की दृष्टि उस सूरत को प्रयत्न पूर्वक श्वांस में लगाएं कि कब श्वांस आई कब गई। केवल श्वांस को देखते रहे वह क्या कहती है।साधक की श्वांस ॐ या प्रणव के कुछ कहती ही नहीं। मन को दृष्टा के रूप में खड़ा कर श्वांस में उठने वाले शब्द पर ध्यान केंद्रित करें। व्यक्ति वायु ही ग्रहण नहीं करता अपितु उसके साथ साथ वह बाह्य वायुमंडल के संकल्प भी ग्रहण कर लेता है। शुभ अशुभ संकल्पों की तरंगें भो उसमे मिला देता है।प्राणायाम एक उच्च स्तर है जिसमें नाम अलग से श्वांस में ढालना नहीं पड़ता। केवल संकल्पों को रोकना है। तभी प्राणायाम करने की सार्थकता है। आज हम प्राणायाम भी करते जाते हैं और घर परिवार दुकान मकान की चिंता भी तो ये प्राणायाम नहीं हुआ। वास्तव में मन बुद्धि और इन्द्रियों को जिसने जीत लिया जो इच्छा भी क्रोध से ऊपर उठ गया वह मुनि सदा मुक्त है। भगवान ने कहा कि अर्जुन  मनुष्य यज्ञ तो नियम और संयम जिसमे विलय होते है वह मैं ही हूँ।
 

महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन को प्रतिपादित कर योग के आठ अंग बताए यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि। अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य ओर अपरिग्रह ये पांच यम बताए। आत्मा के उद्धार की प्रक्रिया अहिंसा है। क्योंकि शरीर एक वस्त्र है। सत्य पर साधक को आरूढ़ रहना है। ब्रह्मचर्य व्रत में स्थिर रहना है। संग्रह का त्याग भी अपरिहार्य है। संग्रह करो तो ह्रदय में एक ईश्वर का संग्रह करो। व्यर्थ धन दौलत के संग्रह से तो चिंता तनाव अवसाद रोग घेर लेंगे। जब ये सब होगा तभी शौच संतोष स्वाध्याय तप और ईश्वर प्रणिधान के नियमों का पालन होने लगेगा।

 इन सब के पालन सर आसान की क्षमता आती है। परमात्मा में मन लगाने से आसन सिद्ध हो जाता है। यदि केवल शरीर के बैठने का नाम आसन होता तो परमात्मा में मन लगाने की कहाँ आवश्यकता थी। वस्तुतः पतमात्मा में मन लगाने से तथा यम नियम के अभ्यासजन्य शिथिलता सहज एकाग्रता से आसन सध जाता है। आसन के सधते ही श्वांस प्रश्वांस की गति का स्थिर हो जाना प्राणायाम कहलाता है।  बाह्य ओर अभ्यन्तर वृति के विषय जब शांत हो जाये तब प्राणायाम का चौथा स्तर आता है। प्राणायाम से ईश्वरीय साक्षात्कार में सुगमता ओर मन मे धारण करने की क्षमता का विकास होता है। सूफी मत के अनुसार नफ्श संयमित करो। इन्द्रिय संयम करो उस मालिक के नाम के बिना एक भी श्वांस खाली गई तो श्वांस मुर्दा है यानि वह आपकी मृत्यु है।

बहुत से लोगों की ये भी धारणा है कि हमें  श्वांस खींचते समय ब्रह्मा का ध्यान रोकते समय विष्णु का ध्यान और छोड़ते समय शंकर का ध्यान करना चाहिए। कोई रोगों को दूर करने के लिए प्राणायाम कर रहे हैं। अनुलोम विलोम प्राणायाम से हाई व लो ब्लड प्रेशर सही हो जाता है। हार्ट संबधी ब्लॉकेज खुल जाते है। हार्ट  सम्बन्धी बीमारी दूर हो जाती है। यादाश्त बढ़ जाती है। 
कपालभांति प्राणायाम नित्य खाली पेट प्रातः काल करने से एकाग्रता बढ़ती है। पवित्रता प्रसन्नता पुरुषार्थ बढ़ता है। अनुलोम विलोम प्राणायाम या नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से फेफड़े शक्तिशाली बनते हैं।शरीर के वात पित्त कफ पित्त विकार आदि दूर हो जाते हैं। गठिया जोड़ों का दर्द सूजन आदि दूर हो जाते हैं। जिसमे दाएं  नासिक छिद्र से श्वांस लेना व बांये नासिका छिद्र से श्वांस छोड़ना होता है। दस मिनिट ये अभ्यास प्रतिदिन करने से लाभ होता है।
  बैठने के आसन है सुखासन पद्मासन वज्रासन आदि।

 कपालभांति करने से ग्लो आता है चेहरे की चमक बढ़ती है। दाँतों व बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं। शरीर की चर्बी कम होती है  कब्ज गेस एसिडिटी में लाभदायक हैं। नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं। नकारात्मक तत्व मिट जाते हैं। मस्तिष्क के अग्रभाग को कपाल कहते हैं। भांति का अर्थ है ज्योति। शरीर और मन के बीच की कड़ी है प्राण। प्राण अपान समान जब हो जाये तभी प्राणायाम होता है  तनाव से मुक्ति केवल योग से होती है। भ्रामरी प्राणायाम से मन को शांत करते हैं। भँवरे की तरह गुजन करना होता है इसमें।

पादहस्तासन करने से पतली कमर बनती है। वक्रासन करने से लीवर पेनक्रियाज ठीक होता है  पवनमुक्तासन से पेट गेस कब्ज दूर होता है। सेतु बँधासन से कमर मजबूत बनती है।पर्वतासन से तनाव दूर होता है। मण्डूकासन से मधुमेह दूर होता है। कपालभांति से वजन घटता है  
  वार्म अप टर्न मूवमेंट करने से मांसपेशियों को मजबूत बनाया जाता है। ताड़ासन से लंबाई बढ़ती है।  त्रिकोणासन से व्यक्ति भीतर से मजबूत बनता है।

वज्रासन में बैठने से पाचन जल्दी होता है।  संक्षेप में योग प्राणायाम आसन करने से शरीर व मन सुखी निरोगी प्रसन्न स्वस्थ चुस्त दुरुस्त रहता है  एक नई ताजगी व दीर्घायु जीवन का राज छुपा है योग क्रियाओं में। इसलिए सुबह जल्दी उठकर प्रतिदिन सूर्य नमस्कार के साथ ही योग प्राणायाम अवश्य करना लाभप्रद है। प्राकृतिक रूप से रोगों को स्वयं ही दूर करें आओ योग करें हम सभी निरोग रहें।

                                    -राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"


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