साहित्य चक्र
Showing posts with label गज़ल. Show all posts
Showing posts with label गज़ल. Show all posts

13 April 2025

धर्मेंद्र जी की सुंदर गज़ल





पहली गज़ल

हूँ यहाँ तक कि हूँ वहाँ तक मैं 
कोई कह दे कि हूँ कहाँ तक मैं 

उसने पहले ही कर दिया ख़ारिज़ 
दे नहीं पाया इम्तहाँ तक मैं

आ रहा है नज़र धुआँ ही धुआँ 
देखता हूँ जहाँ- जहाँ तक मैं 

दोस्तों को बहुत है हैरानी 
आ गया किस तरह यहाँ तक मैं 

ज़िद्दी बच्चे-से दिल की ज़िद 'साहिल' 
पूरी करता भला कहाँ तक मैं।

*****


दूसरी गज़ल


शाम तो क़हक़हों में डूब गई
और शब आँसुओं डूब गई
                     
एक मासूम- सी ग़ज़ल मेरी
वक़्त की हलचलों में डूब गई

दिल अभी चाँदनी में डूबा था  
चाँदनी बादलों में डूब गई
                     
ख़्वाहिशें थीं कि बढ़ती जाती थीं 
ज़िन्दगी ख़्वाहिशों में डूब गई

लब रहे थरथराते दोनों के
गुफ़्तगू धड़कनों में डूब गई

मेरे दिल में जो चाँदनी थी खिली 
दर्द की स्याहियों में डूब गई

*****

                                              - धर्मेन्द्र गुप्त साहिल 


03 March 2025

गज़ल- कोई नहीं



मुर्दों की बस्ती में यहाॅं ज़िंदा कोई नहीं।
आवाज़ हक़ की डर से उठाता कोई नहीं।।

हद पार हो गई है ज़ुल्मों सितम की अब। 
किस पर करें भरोसा की अपना कोई नहीं।।

अपने भी अपने अब यहाॅं अपने रहे कहाॅं।
नफ़रत की ऑंधी चल रही अच्छा कोई नहीं।।

मरना है सबको पैदा यहाॅं पर हुआ है जो।
ज़िंदा रहा जहाॅं में हमेशा कोई नहीं।।

ऑंखों में पट्टी बाॅंध के बे-अक़्ल जीते हैं।
ये चार दिन की ज़िंदगी समझा कोई नहीं।।

किसका शिकार हो रहा किसका विकास है। 
सब दिख रहा है मुल्क में अंधा कोई नहीं।।

बेख़ौफ़ है दरिंदे ये कैसा निज़ाम है।
इस बे-लगाम भीड़ में इंसाॅं कोई नहीं।।


                                                 - निज़ाम फतेहपुरी 



20 January 2025

ग़ज़ल- किस्मत मिली



पाक दिल था हमारा जो इनाम ए मुहब्बत मिली।
बदनाम होकर ही सही कुछ तो हमें शोहरत मिली

तुम जो ज़िंदगी में आए ज़िंदगी हमारी बदल गई,
करामात खुदा की ज़माने भर की नियामत मिली।

क्या कहें, कि तुम किस्मत बन के ज़िंदगी में आए,
शुक्रगुजार हम खुदा के जो हमें ऐसी किस्मत मिली।

हो साथ हमारे अब  तुम  हमकदम बनके क्या कहें,
दौर ए नफरत में हमारे तन मन को हिफाज़त मिली।

दिए ताने ज़माने ने 'कला' जो तुम्हें साथ पाया हमारे,
बतौर तोहफ़ा ज़माने से मुहब्बत की ये कीमत मिली।


                           - कला भारद्वाज



28 November 2022

सुंदर-10 गज़लें पढ़िए



पहली गज़ल


ज़िन्दगी में वो मुकद्दर का सिकंदर निकला
उसने पत्थर भी छुआ गर तो वो गौहर निकला

बर्ग-ए-गुल बिखरी हैं राहों में फ़ज़ा महकी है
कौन दिलदार मुहब्बत के सफ़र पर निकला

आज इस दिल में ख़लिश सी कोई महसूस हुई
आज महबूब मेरा घर से सँवर कर निकला

यूँ हर इक गहना मेरे यार पे फबता था मगर
जो बनाता था हसीं प्यार का ज़ेवर निकला

मैंने बस प्यार ही मांगा था वफ़ा के बदले
दे गया हिज्र वो उम्मीद से बढ़कर निकला

मैं जिसे ढूँढती रहती थी पराए दर पर
वो सुकूँ जिसमें समाया था मेरा घर निकला

वो नदी प्यास बुझाकर भी रही मीठी ही
आब पीता रहा जो खारा समंदर निकला

अब रुलाएगा नहीं तर्क-ए-मुहब्बत 'मीरा'
दर्द इस बार मेरे ज़ेहन से डरकर निकला

*****


दूसरी गज़ल

ये मुल्क़ तुम्हारा है ये मुल्क़ हमारा है
ये मुल्क़ रिआया के जीने का सहारा है

इस मुल्क़ की ख़ातिर ही दी जान है वीरों ने
इस मुल्क़ ने जब-जब भी अपनों को पुकारा है

पुरवाई चले जब भी तेरी ही महक आए
तेरा ही तसव्वुर है तेरा ही नज़ारा है

सागर में तेरे बहती दौलत है मुहब्बत की
जो डूब गया इसमें पा लेता कनारा है

हर सिम्त है हरियाली हर सिम्त बहारें हैं
मैं देखूं वतन मेरा खुशियों का पिटारा है

गंगा की यहाँ मौज़ें यमुना की वहाँ लहरें
पर्वत से गिरें झरने क्या खूब नज़ारा है

लगते हैं यहां लंगर हर रोज़ मुहब्बत के
सो जाए कोई भूखा हमको न गवारा है

हम प्यार के मरहम से हर जख़्म सँवारेंगे
इक दर्द हमारा है इक दर्द तुम्हारा है

इस मुल्क़ का हर बच्चा इस मुल्क़ का पहरेदार
दुश्मन तू सँभल जाना हर दिल में शरारा है

मोमिन है तो ग़ालिब भी 'मीरा' है तो तुलसी भी
ये मुल्क़ मेरा यारो हर आँख का तारा है

*****


तीसरी गज़ल

कभी साग़र कभी साक़ी कभी पर छीन लेता है
ये कैसा इश्क़ है जो देके अक्सर छीन लेता है 

वज़ूद उसका रहे है ज़ेहन पर कुछ इस तरह तारी
कि ख़्वाबों में भी आकर मेरा पैकर छीन लेता है

कहाँ से हौसला पाता है वो ये तो ख़ुदा जाने
उतरता है नदी में और समंदर छीन लेता है

अगर मैं आइना देखूँ वहाँ भी अक्स है उसका 
वो मेरी हर वजूद-ए-शय से जौहर छीन लेता है

भरूँ मैं आह कितनी वो नहीं सुनता सदा मेरी
मगर जब ख़ुद पे आता है तो हर डर छीन लेता है

मुकद्दर का सिकंदर ही लगे है तब मुझे मेरा
जबीं से जब वो मेरी दुख के तेवर छीन लेता है

न जाने भेद कैसे जान लेता है मेरे दिल के
छुपाकर लाख रख लूँ ग़म वो दिलबर छीन लेता है

भरा करता है मेरी मांग बस उल्फ़त के गौहर से
वो 'मीरा' का सनम है नकली जेवर छीन लेता है

*****


चौथी गज़ल

वो दिल देता है पहले फिर मेरी मत छीन लेता है
मुहब्बत के बहाने से नदामत छीन लेता है

वो मुझसे दूर होता है तो रंगत छीन लेता है
मगर जब पास आता है सबाहत छीन लेता है

न जाने क्या फ़ुसूँ  है उस फ़ुसूँगर की मुहब्बत में
पिघल जाती हूँ बाहों में तो क़ामत छीन लेता है

नहीं रहती हूँ मैं तन्हा कभी भी आ धमकता है
मेरी तन्हाइयों तक से वो ख़ल्वत छीन लेता है

कभी देखा नहीं उसको मगर रहता है ख़्यालों में
मैं महव-ए-ख़्वाब होती हूँ तो फ़ुर्क़त छीन लेता है

किसी के पास आ जाने से दूरी कम नहीं होती
वो ऐसा कहके तन की सारी दौलत छीन लेता है

वो दौर-ए-आशिक़ी आया कि ख़ुद को भूल ही बैठी
मैं देखूँ आइना भी गर तो सूरत छीन लेता है

रही 'मीरा' न अब 'मीरा' दिवाना कर दिया उसने
नज़र भर देखता है और बसीरत छीन लेता है


*****


पाँचवीं गज़ल

वो मेरे रू-ब-रू जब से हुआ है
लगा जैसे वही दिल का ख़ुदा है

हवाओं में है पहचानी सी खुश्बू
सुना है शह्र में ही दिलरुबा है

जरा दिल तक क़रीब आओ हमारे
तुम्हारी क़ुर्बतों में फ़ासला है

खुमार इसका नहीं उतरेगा अब तो
नहीं सहबा ये उल्फ़त का नशा है

हमें बहका नहीं सकता ज़माना
मुहब्बत ही हमारा फ़ैसला है

कहाँ तक साथ देते ग़म हमारा
खुशी मंज़िल खुशी जब रास्ता है

चुराता ही रहा नज़रें वो मुझसे
मेरे हाथों में जब से आइना है

ये दिल सुनता कहाँ है बात 'मीरा'
सदा ही ज़ेहन से रूठा रहा है


*****


छठीं गज़ल

ऐ दिल तुझे जहान में उर्यां न कर सके
पर राज़-ए-आशिक़ी भी तो पिन्हाँ न कर सके

हम दिल की हसरतों का भी सामाँ न कर सके
इतने ग़रीब थे उसे मेहमाँ न कर सके

बस दिल ही दिल में करते रहे प्यार यार से
मजबूरियाँ वो थीं कि कभी हाँ न कर सके

अरमाँ तो थे कि दूर फ़लक तक उड़ा करें
अफ़सोस रेत को कभी कोहाँ न कर सके

औरों के घर में शम्अ जलाते रहे मगर
इस दिल की ज़ुल्मतों को चरागाँ न कर सके

उस दिल-शिकन से क्या करें शिकवे वफ़ा के हम
जब ख़ुद ही अपना प्यार नुमायाँ न कर सके

तन्हा ही चाँद आया था उस रोज़ बाम पर
हम फिर भी दिल की शम्अ फिरोज़ाँ न कर सके। 

ऐसा नहीं कि इश्क़-ओ-मुहब्बत नहीं हमें 
ये और बात है उसे जानाँ न कर सके

बेशक़ नहीं नसीब में बज़्म-ए-चमन रही
पर आशिक़ी को ख़ार-ए-बयाबाँ न कर सके

फिर याद आ गया वो जुदाई का हादसा
फिर हम नशात-ए-रूह का अरमाँ न कर सके 

शाही-मिजाज़ का है वो 'मीरा' इसीलिए
हम अपने दिल के दर्द को अर्ज़ां न कर सके

*****


सातवीं गज़ल

आया हूँ तेरे दर पे तुझे ख़्वार देख कर 
इकरार कर ले अब तो मेरा प्यार देख कर 

तड़पा था रात-दिन तेरी दीवार देख कर
अब हो गया हूँ मुतमइन दीदार देख कर 

हमने सुना था राह-ए-मुहब्बत है पुर-ख़तर
घबराता कौन है उसे पुर-ख़ार देख कर 

कब तक डराएँगे मुझे राह-ए-वफ़ा के ख़ार
घबरा न जाएँ ख़ुद ही मेरा प्यार देख कर

आया जो यार दर पे मेरा हाल पूछने
दिल बाग-बाग था मुझे बीमार देख कर 

जो आशिक़ी में फूल खिलाता था रात-दिन
उठता है दर्द दिल में उसे  ख़्वार देख कर 


*****


आठवीं गज़ल

आया हूँ तेरे दर पे तुझे ख़्वार देख कर 
इकरार कर ले अब तो मेरा प्यार देख कर 

तड़पा था रात-दिन तेरी दीवार देख कर
अब हो गया हूँ मुतमइन दीदार देख कर 

हमने सुना था राह-ए-मुहब्बत है पुर-ख़तर
घबराता कौन है उसे पुर-ख़ार देख कर 

कब तक डराएँगे मुझे राह-ए-वफ़ा के ख़ार
घबरा न जाएँ ख़ुद ही मेरा प्यार देख कर

आया जो यार दर पे मेरा हाल पूछने
दिल बाग-बाग था मुझे बीमार देख कर 

जो आशिक़ी में फूल खिलाता था रात-दिन
उठता है दर्द दिल में उसे  ख़्वार देख कर 


*****


नौवीं गज़ल

मुझको हुई मुहब्बत उस शोख़ दिल-सिताँ से
रहता है बे-ख़बर जो मेरे हर इक फ़ुग़ाँ से

दिखता है सीधा-सादा पर पूरा जादूगर है
मुझको चुरा है लेता मेरे ही ज़िस्म-ओ-जाँ से

पहले जरा ये देखें उस बुत के मन में क्या है
तब बात वो कहेंगे हम उस मिज़ाज-दाँ से

कैसे कहेंगे उससे हमको भी है मुहब्बत 
गुफ़्तार जो न करता अब अपनी जान-ए-जाँ से

कब से खड़ा हूँ दर पे सुनने को हाँ तुम्हारी
ख़ामोशियाँ न ओढ़ो कुछ तो कहो ज़बाँ से

हर सिम्त बेरुख़ी है हर सिम्त है अदावत
मिलता न दिल हमारा इस बे-वफ़ा जहाँ से

ख़ैरात में मिले गर लेना नहीं मुहब्बत
तुम हाथ खींच लेना उल्फ़त की दास्ताँ से

चल आजमा ले पहले 'मीरा' को हर तरह से 
फिर करना आशिक़ी तू उस हुस्न-ए-बद-गुमाँ से


*****


दसवीं गज़ल

ज़िन्दगी में वो मुकद्दर का सिकंदर निकला
उसने पत्थर भी छुआ गर तो वो गौहर निकला

बर्ग-ए-गुल बिखरी हैं राहों में फिज़ा महकी है
कौन दिलदार मुहब्बत के सफ़र पर निकला

आज इस दिल में ख़लिश सी कोई महसूस हुई
आज महबूब मेरा घर से सँवर कर निकला

यूँ हर इक गहना मेरे यार पे फबता था मगर
जो बनाता था हसीं प्यार का ज़ेवर निकला

मैंने बस प्यार ही मांगा था वफ़ा के बदले
दे गया हिज्र वो उम्मीद से बढ़कर निकला

मैं जिसे ढूँढती रहती थी पराए दर पर
वो सुकूँ जिसमें समाया था मेरा घर निकला

वो नदी प्यास बुझाकर भी रही मीठी ही
आब पीता रहा जो खारा समंदर निकला

अब रुलाएगा नहीं तर्क-ए-मुहब्बत 'मीरा'
दर्द इस बार मेरे ज़ेहन से डरकर निकला

*****



                                           लेखिका- मनजीत शर्मा 'मीरा'



24 November 2022

पढ़िए मनजीत शर्मा जी की सुंदर और दिल छूने वाली 10 गज़लें



।। पहली गज़ल ।।

सिर्फ़ ज़ाहिर थी सादगी दिल की
जान पाई न साहिरी दिल की
क्यों दिखाता है सरकशी दिल की
बात सुन ले कभी दुखी दिल की
जब से तूने निगाह फेरी है
रास आई न सर-ख़ुशी दिल की
हर किसी को कहाँ मयस्सर है
हाय क्या चीज़ है ख़ुशी दिल की
कह न पाई मैं हाल-ए-दिल उनसे
बात दिल में ही रह गई दिल की
भेद मेरे सभी पता हैं उन्हें
कौन करता है मुख़बरी दिल की
कुछ तो रख आजिज़ी अदावत में
हम भी देखें कुशादगी दिल की
बज़्म है यार है समाँ भी है
आज तो छेड़ रागनी दिल की
दर्द-ए-दिल से मुझे बचाया है
याद रखूँगी मुख़्लिसी दिल की
दुश्मनों से भी दिल लगा बैठे
कितनी मासूम है लगी दिल की
उसकी महफ़िल में जाएंगे 'मीरा'
जो सुनाएगा शाइरी दिल की

*****


।। दूसरी गज़ल ।।

दर्द भरे जज़्बात न दे
रात के आगे रात न दे
दुनिया बैठी नमक लिए
इश्क़ के तू सदमात¹ न दे
जिनसे भड़के दर्द-ए-दिल
हाय वो नग़्मात² न दे
ज़िंदा रख उसकी हस्ती
सहरा³ को बरसात न दे
जिसके दिल में दर्द नहीं
उसको क़लम दवात न दे
कुछ बातें दिल में भी रख
काग़ज़ को हर बात न दे
कर्म का जज़्बा दे मौला
झोली में ख़ैरात⁴ न दे
जीत को जीने दे कुछ पल
इतनी जल्दी मात⁵ न दे
देनी हैं तो दे खुशियाँ
अश्कों की सौग़ात न दे
घुट-घुट मर जाए 'मीरा'
ऐसे तो हालात न दे

*****

।। तीसरी गज़ल ।।

तू मेरा है तो मुझे प्यार तो कर
मेरे दिल को कभी बीमार तो कर
ख़ार-ज़ारों¹ से घिरी रहती हूँ
मेरी हस्ती गुल-ओ-गुलज़ार तो कर
ख़ुद को परवान² समझ लूंगी सनम
इश्क़-ओ-उल्फ़त में मुझे ख़्वार³ तो कर
तेरी जानिब⁴ मैं बढ़ा दूंगी ये लब
तू मेरे सामने रुख़सार⁵ तो कर
इनके पेचों में उलझना है मुझे
ज़ुल्फ़ अपनी ज़रा ख़म-दार⁶ तो कर
मेरी उल्फ़त को समझने के लिए
पहले ख़ुद को तू समझदार तो कर
वार दूंगी मैं मुहब्बत तुझ पर
पर मुझे प्यार से ज़रदार⁷ तो कर
लाँघ आएगी समंदर 'मीरा'
पर नदी तू भी कभी पार तो कर

*****


।। चौथी गज़ल ।।

जो मेरे सुख़न¹ में नहीं रूह कोई
तो फिर इस चमन में नहीं रूह कोई
तग़ज़्ज़ुल² बिना हाल लफ़्ज़ों का वो है
कि जैसे बदन में नहीं रूह कोई
गए दौर में शम्अ जलती थी दिल की
है अब अंजुमन में नहीं रूह कोई
हुई जब से तुझको मुहब्बत से नफ़रत
रही तेरे फ़न³ में नहीं रूह कोई
अदाकारी लगती है तेरी मुहब्बत
नहीं बांकपन में नहीं रूह कोई
दिखावा किया क्यूँ तेरे पास दिल है
दिखी तेरे तन में नहीं रूह कोई
गिरा जब से बरसों पुराना शजर⁴ है
तभी से सहन में नहीं रूह कोई
वुज़ु⁵ दिल का तुमने नहीं गर किया है
तो फिर इस भजन में नहीं रूह कोई
अलग हो गई आज 'मीरा' बदन से
नहीं इस कफ़न में नहीं रूह कोई

*****


।। पांचवी गज़ल ।।

आपके साथ जो चला होगा
वो मुहब्बत का देवता होगा
इश्क़ यूँ ही नहीं हुआ होगा
देखकर हुस्न वो मिटा होगा
जो उतारे से भी न उतरे कभी
चश्म-ए-ख़ूबाँ में वो नशा होगा
तुम दिखोगी जहाँ पे सबसे हसीं
वो मेरे दिल का आइना होगा
खूबसूरत जो कहते हैं ख़ुद को
आइने ने उन्हें छला होगा
जो मेरी हर ख़ता मुआफ़ करे
वो यक़ीनन मेरा ख़ुदा होगा
नफ़रतों की सिरात क्यूँ जाएँ
प्यार का भी तो रास्ता होगा
ख़ुद की नज़रों में उठ नहीं सकता
मेरी नज़रों से जो गिरा होगा
क्यों डरेगा वो ख़ारों से 'मीरा'
इश्क़ की राह जो चला होगा

*****


।। छठी गज़ल ।।

प्यार की रिमझिम फुहारें और वफ़ाएँ हैं कहाँ
वो जो जिनसे दिल बहलता था अदाएँ हैं कहाँ
सादगी पर क्यूँ न उनकी हो रहूँ कुर्बान मैं
जो हमीं से पूछते हैं कि बलाएँ हैं कहाँ
तन-बदन तो कर दिया है ठीक ऐ चारागरो¹
मन को भी कर दें जो चंगा वो दवाएँ हैं कहाँ
छोटे से छोटे हुए जाते हैं अब तो पैरहन²
जो दुपट्टे में सिमटती थीं हयाएँ³ हैं कहाँ
ख़ाक हो पाया नहीं परवाना उसके इश्क़ में
शम्अ रखती थीं जलाकर वो हवाएँ हैं कहाँ
तेरे चेहरे पर जो आती थीं मेरा रुख़⁴ देखकर
ऐ सनम यह भी बता दे वो शुआएँ⁵ हैं कहाँ
हर बशर से यूँ ही मिल जाती थीं 'मीरा' मुफ़्त में
नफ़रतों के इस जहाँ में वो दुआएँ हैं कहाँ


*****

।। सातवीं गज़ल ।।

कभी तेरी ज़ुल्फ़ों के ख़म¹ देखते हैं
कभी तेरे रुख़सार² हम देखते हैं
नज़र को बचाकर सनम देखते हैं
अजी ये न समझो कि कम देखते हैं
कभी दुश्मनों के करम देखते हैं
कभी दोस्तों के सितम देखते हैं
कभी देखते हैं तुम्हारी ख़ुशी को
कभी अपने दिल के अलम³ देखते हैं
सुखा लेते हैं अपनी आँखों के आँसू
अगर तेरे दीदा-ए-नम⁴ देखते हैं
नहीं हमने देखा किसी मह-ज़बीं⁵ को
तुझे ही सनम दम-ब-दम⁶ देखते हैं
फ़क़त देखते हैं मुहब्बत भरे दिल
नहीं कोई दैर-ओ-हरम⁷ देखते हैं
इसी ने लिखे हैं मुहब्बत भरे ख़त
मेरे हाथ में जो क़लम देखते हैं
सभी देखते हैं मेरी शान-ओ-शौकत
नहीं मेरे दिल का अदम⁸ देखते हैं
अदावत⁹ का होने लगा बोलबाला
मुहब्बत को ज़ेर-ए-क़दम¹⁰ देखते हैं
बहुत होती है दिल को तक़लीफ यारो
किसी का निकलता जो दम देखते हैं
उन्हें अब नहीं देखना हमको 'मीरा'
जो हर बात में बस रक़म देखते हैं

*****


।। आठवीं गज़ल ।।

कहने को मुहब्बत के तरफ़-दार हज़ारों
बर्बाद हैं पर इश्क़ में घर-बार हज़ारों
तू प्रेम की राहों पे क़दम सोच के रखना
मिलते हैं ज़माने में अदाकार हज़ारों
जिस बुत को तराशे था हथौड़े का हर इक वार
उस बुत की निगाहों में थे आज़ार¹ हज़ारों
बचपन से निकलकर तू जवानी में क़दम रख
आने हैं तेरे सामने संसार हज़ारों
यारी में जिसे हमने थमाए थे कभी फूल
आया है मेरे दर पे लिए ख़ार² हज़ारों
सब अपना ही दुख-दर्द सुना कर गए मुझको
कहने के लिए आए थे ग़म-ख़्वार³ हज़ारों
बस मेरी मुहब्बत पे ही लोगों की नज़र थी
दुनिया में यूँ होते हैं ख़तावार हज़ारों
इक ज़हर का प्याला ही न 'मीरा' को दिया था
लोगों ने दिए थे उसे मुर्दार⁴ हज़ारों

*****


।। नौवीं गज़ल ।।

कार-ए-जहाँ¹ से हमको फ़राग़त² नहीं मिली
किस मुँह से अब कहें कि मुहब्बत नहीं मिली
कोई भी चीज़ वक़्त-ए-ज़रूरत नहीं मिली
जब तक रहे जहान में इज़्ज़त नहीं मिली
काग़ज़ के फूल से ही मुहब्बत रही जिन्हें
उनको भी ये गिला³ रहा निकहत⁴ नहीं मिली
थी वक़्त की कमी नहीं सिंगार के लिए
पर वस्ल⁵ के लिए उन्हें फ़ुर्सत नहीं मिली
जिस इश्क़ की तलाश में हम हो गए फ़क़ीर
उस इश्क़ की हमें कभी लज़्ज़त नहीं मिली
दिल ख़ाक हो गया है तेरे हिज्र⁶ में सनम
पर अब तलक ग़रीब को तुर्बत⁷ नहीं मिली
हमने तो बारहा⁸ ही दिखाया था आइना
पर उनको उसमें एक भी ग़फ़लत⁹ नहीं मिली
यूंँ ही हुआ है हर दफ़ा अपने नसीब में
दीवार तो उठी मिली पर छत नहीं मिली
फ़ुर्क़त में ही गुज़र गए 'मीरा' के माह-ओ-साल
फिर भी उन्हें इस इश्क़ में शिद्दत¹⁰ नहीं मिली

*****


।। दसवीं गज़ल ।।

आपकी आँखों में ख़ंजर¹ हो न हो
फिर भी चल जाएगा नश्तर² हो न हो
तेरी आँखों में ही डूबेंगे सनम
चाहे चाहत का समंदर हो न हो
चल चलें ऐ दिल विसाल-ए-यार को
कौन जाने फिर वो मंज़र³ हो न हो
मैं उसे अपने से ऊपर ही कहूँ
वो मेरे क़द के बराबर हो न हो
वो बताता है बढ़ाकर ही सदा
हाल उसका मुझ से बद-तर हो न हो
ख़ून का इल्ज़ाम होगा मुझ पे ही
मेरे हाथों में वो पत्थर हो न हो
चल चलें बज़्म-ए-सुख़न⁴ में आज फिर
फिर कोई ऐसा सुख़न-वर⁵ हो न हो
जो भी कहना आज ही कह लो उसे
कल कोई 'मीरा' से बेहतर हो न हो

*****

लेखिकाः मनजीत शर्मा 'मीरा'