साहित्य चक्र
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22 August 2026

लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



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वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

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सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


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हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


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आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


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इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


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07 August 2026

लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल





11 August 2025

लघुकथा: साल 3032 में शायद


साल 3032 के उस दिन विश्व स्नेह नियंत्रण केंद्र ने तात्कालिक घोषणा की कि 'नागरिकों ध्यान दो। सालों पहले कोई मानवता नाम का वायरस था, जो फिर से जाग्रत हो गया है। यह मानवता एक भयानक बग है, जो आपके शरीर के सिस्टम में अचानक प्रकट होता है और फिर मनुष्य अजीब हरकतें करने लगता है। अगर अचानक कोई व्यक्ति किसी के दुख में उसकी मदद के लिए भागता दिखाई दे तो समझ लीजिए कि वह इस वायरस का शिकार हो गया है।'





इस वायरस के लक्षण अनदेखा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लक्षण हैं किसी को रोते देख कर आपकी आंखों का नम होना, जरूरतमंद व्यक्ति को देख कर अपनेआप हाथ का जेब की ओर बढ़ जाना, किसी की तकलीफ सुन कर उसकी मदद के लिए तलब लगना, किसी की गलती के लिए उससे बदला लेने के बजाय उसे माफ कर देने की इच्छा होना और अगल-बगल से गुजर रही गाय और कुत्ते को डंडा या लात मारने का मन न होना।

इसमें किसी भी तरह का बदलाव आप खुद में या घर के किसी भी सदस्य में अनुभव करें तो तत्काल नजदीक के मानवता नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें। हमारे वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इस मानवता का एंटीडाॅट बनाने में लग गए हैं। प्रधानमंत्री की ओर से घोषणा की गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति में मानवता के गुण दिखाई दें, तुरंत उससे दूर हट जाएं, उसे अकेला छोड़ दें।


हमारी खुफिया एजेंसी का मानना है कि यह वायरस भारत नाम के देश से फैला है। सामान्य जनता से निवेदन है कि वह चिंता न करे। सोशल डिस्टेंस रखे। किसी की ओर देख कर भूल से भी न मुसकराएं, प्यार और सरलता का अनुभव होते ही तत्काल उसे नष्ट कर दें। दिन में तीन बार बिना वजह झगड़ा करते रहें या किसी निर्दोष को बिना वजह नुकसान पहुंचाते रहें।

जब तक एंटीडाॅट की खोज नहीं हो जाती, तब तक 'लुच्चईसीटामोल' और 'स्वार्थोमाइसीन' की खुराक बारबार लेते रहें। याद रखिए मानवता से जीवन सुधर सकता है। इसलिए इससे सतर्क रहें।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह




08 July 2025

कहानी- हँसी की कीमत

राजू वर्मा का जीवन उन हजारों करोड़ों भारतीयों की तरह था, जिनका नाम किसी सरकारी दस्तावेज़ में भले हो, पर जिनकी पहचान दुनिया में नहीं होती। वह एक निजी कंपनी में चपरासी था। काम छोटा था, पर मन में बड़ा आदरभाव लिए चलता। 



एक तरह से वह पूरे दफ्तर की धुरी था- सबसे पहले पहुँचता, चाय बनाता, फाइलें पहुँचाता, और बॉस की डाँट भी चुपचाप पी जाता। उसकी साइकिल की टोकरी में सब्जियों से ज़्यादा उसकी आशाएँ लटकती थीं- बच्चों की फीस, पत्नी की दवाई, और कभी-कभार एक मिठाई की पुड़िया।

जीवन सरल था, पर सधा हुआ था- जैसे पुराने समय की दोपहरी, जिसमें धूप तो होती है, पर झुलसती नहीं।

एक दिन, कंपनी से एक पत्र आया- सादी भाषा में एक भयानक निर्णय लिखा था- “हमें खेद है...” और बस। दफ्तर बंद हो गया था। ज़िंदगी की गाड़ी, जो अब तक कच्ची सड़कों से चलती हुई आ रही थी, एक गड्ढे में गिर पड़ी।

राजू कई दिनों तक अवाक रहा। नौकरी ढूँढने निकला, पर कहीं से जवाब न मिला। कहीं कहा गया- "काम नहीं है", कहीं- "आपकी उम्र अब ऐसी नहीं रही", और कहीं तो यह भी- "अब तुम्हारे जैसे लोगों की ज़रूरत नहीं।"

छह महीने बीत गए। बच्चों की हँसी कम होने लगी, और घर में चुप्पियाँ बढ़ गईं। राशन के डिब्बे खाली होते गए, और दिल में चिंता भरने लगी। 

मकान मालिक ने एक रात दरवाज़े पर दस्तक दी- वही दस्तक जो सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं, आत्मा पर होती है- "कल तक किराया नहीं दिया तो घर खाली कर दो।"

उस रात सीमा ने रोटी परोसी और एक सवाल भी- “हम बच्चों को क्या जवाब देंगे, उन्हें कल कहाँ लेकर जाएंगे?”

राजू ने जवाब नहीं दिया। उसने रोटी का एक टुकड़ा पानी में डुबोकर निगला- जैसे अपनी आत्मा को निगल रहा हो।

सुबह होते-होते, वह कुछ और हो गया था। न चेहरा बदला था, न शरीर, पर आँखों में अब एक औरत की तरह लाचारी थी- वह लाचारी, जो आँसू नहीं बहाती, पर दिल में समंदर रखती है।




उसने बाज़ार से एक जोकर की नकली नाक, सस्ता विग, और कुछ रंग खरीदे। पुराने कपड़ों को काट-पीटकर एक भड़कीला पहनावा बनाया। आईने में खुद को देखा, तो खुद पर हँस पड़ा। पर यह हँसी बाहर की थी, भीतर तो वह रो पड़ा।

अब वह पुरानी दिल्ली की गलियों में जोकर बनकर घूमता था- हाथ में तख़्ती- “जोकर के साथ सेल्फी- सिर्फ 10 रुपये।”

हँसी अब उसकी रोज़ी थी। हर मुस्कान के पीछे आँसुओं का समंदर छुपा था।

लोग उसकी ओर देखकर हँसते, बच्चे ताली बजाते, कोई वीडियो बनाता।

एक बच्चा बोला, “माँ! जोकर रो क्यों रहा है?”
माँ ने कहा, “बेटा, ये बस एक्टिंग कर रहा है।”

कौन समझे कि यह अभिनय नहीं था, यह एक पिता का आत्मबलिदान था।

राजू घर आने से पहले अपना रंग मिटा देता। बच्चे पूछते, “पापा, आज भी मीटिंग थी क्या?”
वह मुस्कुरा देता। सीमा कुछ नहीं कहती, पर उसकी आँखें बहुत कुछ पूछतीं।

एक दिन गुड़िया ने अपनी नोटबुक में जोकर की तस्वीर बनाई थी- हाथ में दिल था और नीचे लिखा था- “मेरा हीरो”

राजू ने वह पन्ना देखा और फूट-फूटकर रो पड़ा।

एक दिन उसका बेटा आरव बोला, “पापा, टीचर ने कहा कि जो सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है, वो सबसे बहादुर होता है। मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूँ।”

राजू ने कहा, “बनेगा बेटा, मुझसे बड़ा।”

आरव ने धीरे से कहा, “पापा, कल मैंने आपको देखा था। आप जोकर थे… लेकिन मेरे लिए, आप सबसे महान इंसान हो। आपने अपनी इज़्ज़त, अपनी खुशी, अपना स्वाभिमान सब कुछ हमारे लिए छोड़ दिया। लोग आपको 10 रुपये का जोकर समझते हैं, पर मेरे लिए आप सबसे कीमती इंसान हो।”

उस दिन राजू पहली बार रंगों के बिना मुस्कुराया—एक सच्ची, आत्मा से निकली मुस्कान। उसने बेटे को गले से लगाया और कहा, “तेरा पिता जोकर नहीं, एक योद्धा है- जो बच्चों के भविष्य की लड़ाई मैदान में उतरकर लड़ता है।”



                                                 - विकास बिश्नोई




19 April 2025

"भूल भुलैया में भटक गया मैं"

  भूल भुलैया में भटक गया मैं, कभी इधर गया कभी उधर गया मैं, मुआ तमंचा छुपाने के चक्कर में शर्ट भी उतार कर फेंक दिया था। फिर भी अपना कमरा ढूंढ नहीं पाया। मकान मालिक का नाम भी भूल गया था।

        हुआ यूं कि, इस बार काफी विलम्ब से साइड की ओर गया था। मैं क्या करूं उस गांव में उल्टा घुसा था। लेंड़े के कमरे में पहले रहता था, अब टेंम्भरे के कमरे में जाना था। वहां दो - चार दिन रुकने के बाद घर लौट आया था, मुआ काम ही ऐसा था।





            हां तो हम नीचे धोती का तहमक लगाया हुआ था। ऊपर बनियान, बनियान के ऊपर फुल शर्ट पहन रखा था। पता नहीं जिंदगी में कभी भी तमंचा का इस्तेमाल नहीं किया था मैंने! वैसे गांव मेरा तमंचा का शौकीन था, तमंचा वालों का सम्मान भी बहुत होता था।

            मेरे पास ट्रेन में बैठने के बाद मिला था तमंचा, पता नहीं कब, क्यों आया था यह मेरे पास, क्या पता बस में किसी ने दिया यह भी मालूम नहीं। मुझे रोना आ रहा था, फिर भी रो नहीं पा रहा था। तमंचा जो मेरे क्षेत्र का गुरूर, मेरे क्षेत्र की पहचान हुआ करता है; खुशी या गम के बीच मुझे झुला रहा था, मैं न हंस पा रहा था न रो पा रहा था। बड़ी अजीब स्थिति थी मेरी!

             नीचे तहमक की मुर्री ढीली पड़ गई थी। मुआ 'मरता क्या ना करता' तमंचा अब गिरा तब गिरा की स्थिति पैदा हो गई थी। मैंने मुर्री कसकर पकड़ ली थी। तमंचा मेरे लिए मुसीबत बन गया था। पता नहीं यह मेरे गांव की पहचान क्यों बना बैठा है? 

             भारी डर थी कि, यह जरा भी किसी की जानकारी में आया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह चलता है कि, नहीं चलता है, फिर चलता है तो कैसे चलाया जाता है यह भी मुझे पता नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह मेरे पास आया कैसे? 

             पसीना - पसीना हो गया था। तमंचा आफत गले पड़ी थी। किसी को पता चला तो मोबाइल का जमाना है मैं जान नहीं पाऊंगा पुलिस आकर मुझे ले जाएगी, यहां मेरी जमानत कौन लेगा? मैं भारी असहाय अपने-आपको मान रहा था। 

             मुर्री ढीली हो गई थी कसकर पकड़ रखा था, अब उसे कैसे कसूं! इस मुसीबत तमंचे को कैसे, कहां छुपाऊं! पसीना से तरबतर शर्ट की बटन जाने कैसे खोल दिया था मैंने! तुरकरे के घर से होकर बार बार निकलना मेरे लिए बहुत शर्मिंदगी की बात थी। 

            मुझे पूरब, पश्चिम लग रहा था, उत्तर, दक्षिण लग रहा था। क्या पता भुलना चारा लांघ गया था या मैं खुद क्या हो गया था। एक बुजुर्ग से पूछा, क्योंकि वर्तमान कमरा के मालिक का नाम एकदम से भूल गया था; बार बार दिमाग पर जोर लगा रहा था, दिमाग होता तो काम करता वह तो नोटों के साथ गैस लेने चला गया था। 

            मुआ तमंचा छुपाने के चक्कर में मेरी तो हालत खस्ता हो रही थी। मैं उसे कसकर पकड़ लिया था, कभी उसकी नाल, कभी उसकी मूठ बाहर निकलने के लिए जिद कर रहे थे। 

            मैंने उस बुजुर्ग से पूछा, बताना भूल गया आपसे, मैंने दिमाग को दबाकर, जोर लगाकर पूछा, 'दादा जी, मेरा कमरा कहां है बता दो मैं, मकान मालिक का नाम भूल गया हूं, पुराने मकान मालिक लेंडे जी थे, वहीं पहुंच जाऊं ऐसा कर दो!' 

            बुड्ढा भड़क गया शायद उसका लेंडे का छत्तीस का आंकड़ा था। उसने अपनी बुढ़िया को बुलाया कहा, "इनको कमरा दिखा दो!" 

           यह तमंचा अब बार बार निकलना चाहता था, कभी इधर कभी उधर झांकने लगा था। अब मैं तहमक को इकट्ठा करके तमंचा की नाल सहित कसकर पकड़ लिया था; ऐसा पकड़कर कर रखा था कि, मेरा हाथ भी दर्द करने लगा था। 

            इससे पहले कि, वह बुढ़िया मुझे कमरा दिखाती तब तक मैं भागने के जुगाड़ लगा रहा था। इधर यह तमंचा आड़े आ रहा था। 

            मैंने कहा, "मुझे मेरे कैंप का रास्ता बता दो! कैंप ही पहुंचा दो!"
             वह लोग तो कमरा देने के मूड में थे। एक शायद उनका विरोधी रहा होगा, उसने मुझे कैंप का रास्ता इशारा से बताया। मैं उधर चला कि, बुढ़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। अब तो तमंचा है मेरे पास पोल खुल जाएगी! इस एहसास से ही मैं रुआसा हो गया था; रो भी नहीं सकता था।

             मेरा शर्ट उतर चुका था। शाम हो गई थी यह गनीमत थी वरना तमंचा राम के कारण जेल निश्चित थी। जेल की कल्पना से ही मैं पसीने से लथपथ हो गया था। पसीने से भीगा मैं उस दिशा की ओर भागा, जिस दिशा में कैंप बताया गया था।

             वहां उस रास्ते में काली गिट्टी बिछी थी। कैंप के रास्ते में पहले तो गिट्टी बिछी नहीं थी। अब मरता क्या न करता लेंडे जी का मकान वहीं कहीं होगा। यह सोच रहा था कि, लेंडे जी की घरवाली वहां से निकली। मैंने पूछा, "मैं जिस कमरे में रहता था, वह कमरा किधर है!"

            उसने कहा, "यही तो है, आपका कमरा जहां तुम रहते थे; अब वहां, उधर रहते हो!" सारे कमरों का नक्शा ही बदल गया था। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। 

            मैं कैंप का रास्ता फिर से पूछा, शाम गहरा चुकी थी। किसी ने जोर से कहा, "यही तो है, कैंप का रास्ता!" 

            मेरा तमंचा गिरते - गिरते बचा था। मैं पकड़ मजबूत करने ही वाला था कि, मेरी नींद खुल गई! 

             मैं अपने बिस्तर पर हूं, बड़ी देर तक में विस्वास हुआ! वरना यह तमंचा तो मुसीबत बन गया था। शर्ट भी उतर गया था। तहमक भी ढीला हो गया था।
            बिना किसी से बताए मैं नित्य क्रिया करने चल दिया था। वह स्वप्न मैं भुला नहीं पा रहा था।

            इस भूल - भुलैया के चक्कर में पड़कर अपना सबकुछ भूलकर भटकता रहा। इस तमंचे के चक्कर में जिसे कभी याद भी नहीं किया था, कितना परेशान हुआ। बाप - पुरुषों की इज्जत जाते - जाते बची वरना जेल जाना होता तो, तो सबकुछ लुटा चुका होता।

            नींद नहीं टूटती तो अब तक की जो मेरी हालत होती उसका मैं वर्णन नहीं कर पाता! शुक्र है कि मैं जाग गया; बच गया वरना अब तक तो मेरा क्या हाल होता मैं भी नहीं जानता।


                                                -  डॉ. सतीश "बब्बा" 


30 January 2025

लघु कथा- कन्या भ्रूण हत्या


किसी शहर में सुरेश नाम का बहुत बड़ा व्यापारी रहता था। उसकी तीन बेटियां और एक बेटा था।  बेटा-  बेटी में  भेदभाव की भावना से ग्रसित था। बेटा-बेटी की शादी ब्याह कर चुका था। बहू को प्रसव पीड़ा प्रारंभ हुई तो सुरेश और उसका बेटा  नजदीक के अस्पताल में बहू को भर्ती कराया और खुशखबरी का बड़ी बेसब्री से इंतजार करने लगे। बार-बार निगाहें अस्पताल के दरवाजे तक जाती और रुक जाती और मन बार-बार अपने इष्ट का स्मरण करके यही प्रार्थना करता कि हे! प्रभु आज तो अच्छी खबर सुनने को मिल जाए। 





तभी अस्पताल का दरवाजा खुलता है और डॉक्टर बाहर आई और बोली बधाई हो नाती हुआ है। सबके चेहरे खुशी से खिल उठे सुरेश को खुशी के मारे कुछ समझ नहीं आया और उसने झट से अपने गले से एक सोने  की चेन निकाली और डॉक्टर को देते हुए बोला ये लो बधाई का इनाम डॉक्टर ने 2 मिनट तक सुरेश की तरफ देखा उसके बाद उसकी चेन उसको वापस कर दी। और विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़ कर बिना कुछ बोले अपने रूम में चली जाती है। 

सुरेश को उस डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया और बोला घमंडी डॉक्टर ने मेरा बहुत बड़ा अपमान कर दिया पर कारण क्या था यह बात उसकी समझ में नहीं आई। इधर डॉक्टर सोच रही थी कि तीन आजन्मी बेटियों का हत्यारा उसके हाथ से चेन ले कर मुझे उसके पाप में शामिल नहीं होना है। सुरेश ने तीन बार बहू का अबॉर्शन उसी डॉक्टर से कराया था। इसीलिए उस डॉक्टर को सुरेश जैसे व्यक्ति से सख्त नफरत थी। सुरेश जैसे कुत्सित विचारधारा के लोगों के कारण ही आज भी कोख में बेटियों को मार दिया जाता है।


                                                                - सीमा त्रिपाठी 

22 January 2025

कहानी- प्रेम मन

प्रेम एक ऐसी अद्भुत संजीवनी है जिसके लिए सृष्टि का हर प्राणी तरसता है फिर चाहे वह पशु हो, पक्षी हो या मनुष्य। प्रेम की सकारात्मक शक्ति पेड़-पौधों को भी नवजीवन देती है। वे अधिक हरे-भरे हो जाते हैं अगर प्रेम से उन्हें सींचा जाए। हर कोई चाहता है कि मैं किसी से प्रेम करूं और कोई मुझे प्रेम करें। यह प्राणों की गहरी प्यास है। सबके भीतर जलती है इसकी लौ लेकिन सभी लोग प्यासे के प्यासे रह जाते हैं।





प्रेम का पौधा अपने हृदय की भूमि में उगाना पड़ता है। न यह उधार मिलता है ना चोरी से। हर व्यक्ति में प्रेम सिर्फ एक बीज रूप होता है उसे बोना पड़ता है। उसकी देखभाल कर बढ़ने की बाट जोहनी पड़ती है। अगर यह सब नहीं किया तो प्रेम शुप्त अवस्था में छिपा रह जाएगा।आजकल फ़िल्में, कविताएं, उपन्यास प्रेम के चर्चो से भरे पड़े हैं मगर प्रेम की वह गहराई को गई है जो भावना के समुद्र को अपने सीने में समा ले।

प्रेम भगवान का दिया हुआ सबसे खूबसूरत तोहफा है। प्रेम एक विश्वास का नाम है। प्रेम एक विशाल समुद्र है जिसका कोई अंत नहीं है। प्रेम को परिभाषा के सीमित दायरे में नहीं बांधा जा सकता। प्यार सागर से गहरा है, पर्वत से ऊंचा है, तूफान से तेज चलने वाला है तो एक ठंडी हवा का झोंका भी है। आग से ज्यादा गर्म है तो हिम से भी ठंडा है। काजल के समान काला है तो दूध से ज्यादा सफेद भी। पूनम की रात का उजाला है तो अमावस की रात से ज्यादा अंधकारमय भी है। प्रेम फूलों की सेज है तो कांटों से भरा रास्ता भी है। कहने का अर्थ है कि प्रेम के दो पहलू है एक सकारात्मक और एक नकारात्मक। प्रेम को स्पर्श नहीं किया जा सकता केवल इसे महसूस किया जा सकता है। 


प्रेम मन की निर्मल भावना से किया जाने वाला वह भाव है जिसमें ऊंच-नीच, जाति बंधन, धर्म, रीति-रिवाज या परंपराओं का लेस मात्र भी स्थान नहीं होता है। प्रेम दिल की गहराई से किया जाने वाला वह एहसास है जिसमें एक दूजे के लिए सम्मान, विश्वास, आपसी समझ होती है। एक दूसरे के लिए फना होने का जज्बा होता है। प्रेम में सच्चाई और पवित्रता होनी चाहिए। अगर प्रेम में सच्चाई, विश्वास या सम्मान नहीं है तो यह प्रेम का नकारात्मक अर्थ होगा। फिर वह प्रेम, प्रेम नहीं रहेगा तब तो इस शब्द के मायने ही बदल जाएंगे।

 अगर हम किसी को बार-बार देखना चाहते हैं। उसके बारे में सोचते हैं। उसकी मदद करना चाहते हैं या ना चाहते हुए भी किसी का अक्स हमारी आंखों के सामने आ जाता है या कोई हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है तो समझ लीजिए यह प्यार ही है या कहीं ना कहीं इसमें प्रेम का भाव समाहित है। हमारे मन में किसी के प्रति अच्छे विचार हैं या उसे हम आदर्श समझते हैं तो वह भी प्रेम का ही एक रूप है। 

प्रेम के अनेक रूप होते हैं। एक मां का अपनी संतान से, बहिन का अपने भाई से, एक पत्नी का अपने पति से, एक दोस्त का दोस्त से या एक गुरु का शिष्य से प्रेम होता है। इतना जरूर है कि हर रिश्ते में प्रेम के अर्थ कुछ हद तक बदल जाते हैं पर इसका मूल भाव एक ही रहता है।





संसार का कोई भी जीव प्रेम के बिना नहीं रह सकता। यह शाश्वत सत्य है। व्यक्ति बचपन से लेकर अंत तक प्रेम के बंधन में बंधा रहता है। प्रेम आदि से अंत तक चलने वाला प्रवाह है।  प्रेम किसी से भी किया जा सकता है पर उसमे पवित्रता जरूरी है। उसमें सच्चाई होनी चाहिए। प्रेम पवित्रता और सच्चाई के पहियों से ही अपने रास्ते पर चल सकता है। इन्हीं पंखों के सहारे आसमान में विचरण कर सकता है। 

अगर प्रेम में ये दोनों तत्व मौजूद नहीं है तो फिर उस प्रेम का कोई वजूद नहीं होता। प्रेम के विषय में बहुत सी किताबों या फिल्मों में देखा जा सकता है। इस विषय पर बहुत किताबें लिखी गई है। पर कोई भी शिक्षा संस्थान प्रेम का विज्ञान और प्रेम की कला नहीं सिखाता। इसे तो जीवन की पाठशाला में खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजर कर ही सीखना पड़ता है।

प्रेम की शुरुआत हमेशा स्वयं से होती है। अगर आप स्वयं से प्रेम नहीं कर सकते तो दूसरों से भी प्रेम नहीं कर पाओगे। इसलिए प्रेम करने के लिए अपने आप से बेहतर कोई नहीं है। अपने आप से प्यार करोगे तभी प्रेम की शुरुआत होगी। इस जीवन यात्रा को पूर्ण करने के लिए प्रेम पहली और अनिवार्य शर्त है।


                                                     - मेवा राम गुर्जर, पीलवा (जयपुर)


15 January 2025

शहरी कुत्ते...


कल मैं किसी काम से बीवी और छोटे बेटे के साथ रांची आया था। मंझले मामा परिवार के साथ रांची में ही रहते हैं सो रात को उनके यहीं ठहर गया था। भोर को पौ फटते ही मैं बिस्तर छोड़ दिया। वॉशरूम से फ्रेश होकर वापस आया तब भी बाहर पूरी तरह से रोशनी नहीं आई थी। साढ़े पांच बज चुके थे लेकिन जैसा कि राजधानी रांची के लोगों की आदत है, बदस्तूर घर के सभी लोग अभी तक घोर निद्रा में सो ही रहे थे। मैंने मन बना लिया कि आज़ रांची की सड़कों पर जॉगिंग करूंगा। 




मैं तैयार होकर जल्दी से निकल गया। अबतक बाहर रोशनी साफ़ हो चुकी थी। मैं गलियों से निकल कर मुख्य सड़क की ओर जा रहा था। अचानक मेरी नज़र एक घर के दरवाजे के बाहर फेंकी हुई चार-पांच रोटियों पर गई। मैं एक नज़र देखकर आगे बढ़ गया। सरपट चाल से चलते हुए चांदनी चौक,हटिया मुख्य चौक होते हुए तुपुदाना रोड के पेट्रोल पंप तक गया। वापसी के वक्त चांदनी चौक में बिना चीनी की एक कुल्हड़ वाली चाय की चुस्की भी ली। 

हालांकि मुझे डायबिटीज की शिकायत नहीं है, फिर भी एक बार गांव के एक डॉक्टर द्वारा किट से चेकअप के बाद हल्की सी डायबिटीज की बात सुनने के बाद मैं परहेज़ करने लग गया था, इसलिए फीकी चाय भी अब अच्छी ही लगती है। हालांकि बाद में जमशेदपुर में जहां मैं रहता हूं वहां कई बार लैब में ब्लड सुगर चेक कराया जिसमें सबकुछ नॉर्मल निकला। खैर ! चाय पीकर वापस मैं मामा के डेरे की ओर गलियों में पहुंच गया। सहसा मेरी नज़र फिर से उन फेंकी हुई रोटियों पर पड़ी। 

मैं सोचने लगा कि आस-पास आवारा कुत्ते तो बहुत हैं गली में, लेकिन अबतक जितनी रोटियां जाते वक्त पड़ी हुई थीं,अब भी उतनी ही हैं। थोड़ी देर सोचने के बाद मैं इग्नोर कर आगे बढ़ गया कि हो सकता है उन रोटियों पर किसी भी कुत्ते की नज़र नहीं पड़ी हो अबतक। मामा के घर पहुंचने के बाद नहा-धोकर तैयार होकर हमलोग तकरीबन दस बजे घर के लिए निकल पड़े। अचानक उस गली में फिर मेरी नज़र फिर से जमीन पर पड़ी हुई चार-पांच रोटियों पर पड़ी। इस बार मैं अचंभित हो उठा। हालांकि इतनी बकवास और फ़ालतू सी बात मैंने बीवी के साथ भी शेयर नहीं किया। 

लेकिन मन ही मन कई सारे प्रश्न उमड़ रहे थे। सुबह छह बजे मैंने वो रोटियां देखीं थीं, अबतक कैसे किसी भी कुत्ते या अन्य जानवरों ने उसे नहीं देखा होगा। और देखा होगा तो खाया क्यों नहीं !! जबकि मैंने तो उन रोटियों को सुबह छह बजे देखा लेकिन संभव है कि उस घर के मालिक ने वो रोटियां रात को ही फेंकी थीं। गांव में तो एक रोटी मिलने पर पच्चीस कुत्तों में महासंग्राम छिड़ जाता है। लेकिन यहां तो साले आवारा कुत्ते भी एडवांस निकले। रोटियों में उन्हें कोई रुचि नहीं। फिर मेरा मन उन आवारा कुत्तों की दुनिया में खो चला।

मैं हास्यात्मक अंदाज में सोचने लगा कि क्या वाकई शहर के आवारा कुत्ते भी एडवांस और पढ़े-लिखे होते हैं ? शायद हां ! इसीलिए तो वो इतनी भीड़ भरी सड़कों पर भी आसानी से आर-पार होते रहते हैं और उनका एक्सीडेंट भी नहीं होता। जबकि मेरे गांव और आस-पास के देहाती और अनपढ़ कुत्ते हाइवे पार करते हुए अक्सर जान से हाथ धो बैठते हैं। 

गांव के कुत्ते एक रोटी या सादे भात की खातिर तृतीय विश्वयुद्ध छेड़ देते हैं लेकिन यहां देखो ! इतनी सारी रोटियां पड़ी हुई हैं मगर किसी भी कुत्ते ने पूछा तक नहीं उन रोटियों को ! संभवतः रांची के कुत्ते आपस में बात करते होंगे "चल रे मंगरा ! हुआं पांच गो रोटी गिरल हऊ।"

तब अगले कुत्ते उस पर हंसते होंगे और कोई एक कुत्ता उसका उपहास करते हुए ज़रूर बोलता होगा "इ सोमरा पगला गेलऊ लागत हय ! साला एकदमे भुखमरिया है का बे ! बिहाने-बिहान सूखल रोटी खाबे तोंय ?

फिर कोई और कुत्ता भी हंसते हुए बोलता होगा "अबे सोमरा ! तनी देर बाद एकदम ताजा-ताजा गर्मागर्म कचौड़ी, जलेबी,समोसा मिलतऊ ! आउत तनिक बाद चिकन लॉलीपॉप आर मोमोज भी ! साला एखनि सूखल रोटी खाबे तो अकेले खाबे जा तोंय"

ये सब सोच-सोच कर मैं मुस्कुरा उठा। तबतक हमलोग चांदनी चौक पहुंच कर ऑटो में बैठ चुके थे। रास्ते भर शहर के पढ़े-लिखे, समझदार और एडवांस कुत्तों की वो ख्याली वार्तालाप को बार-बार सोचकर ही हंसी छूट जाती रही।


                                                                           - कुणाल


21 December 2024

कहानी- मुख्य सेवादार


             मंदिर में हो रहे भागवत कथा आयोजन का आज अंतिम दिन था। कथा व्यास जी द्वारा कथा को समाप्त कर  दिया  गया था। अब केवल पूर्णाहुति और अंतिम आरती करना ही शेष था। इसी बीच आयोजक दल  के प्रधान माइक पर पहुँच गये। यहाँ पहुँचते ही उन्होंने कथा व्यास सहित पंडाल में उपस्थित हर व्यक्ति का स्वागत किया और फिर उन्होंने आयोजक दल  के तीन-चार लोगों के नाम पुकार कर उनसे आग्रह किया कि वे कथा व्यास को सम्मान स्वरूप शाल, टोपी और स्मृति स्वरूप ,स्मृति चिन्ह भेंट करें। इसके बाद दल के प्रत्येक  सदस्य को एक-एक करके मंच पर बुलाकर कथा व्यास जी के हाथों  और  फिर एक सदस्य से दूसरे  सदस्य को सम्मान स्वरूप शाल, टोपी या दूसरा कोई स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित करवाया गय। सभी स्वयं सेवी युवाओं को भी एक-एक करके सम्मानित किया गया। फिर प्रधान जी माइक  से  हट गये और इधर दल का एक अन्य  सदस्य आकर प्रधान  जी का नाम पुकारता है फिर कथा व्यास जी के हाथों उन को भी सम्मानित करवाया जाता है। यहाँ तक कि दूसरे राज्य से  भी पांच-छह लोग जो मेहमान रूप में आये थे, उन्हें भी एक-एक करके मंच पर बुलाकर सम्मान दिया गया।





                       लगभग आधा घंटा पहले यहाँ पर जो भक्तिमय वातावरण बना हुया था। देखते ही देखते वह  वातावरण जैसे लोप हो गया था। श्रोताओं के चेहरों पर एक अजीव सा भाव देखने को मिल रहा था। शायद वे  दिखावे भरे इस कार्यक्रम को पचा नहीं पा रहे थे और भ्रमित से  महसूस कर  रहे थे। क्यूंकि यह मंदिर एक मुख्य सड़क मार्ग के किनारे पर एक शांत और सुन्दर स्थान पर स्थित है। यहाँ पर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई है जिससे यहाँ का दैवीय वातावरण मन को आकर्षित कर लेता है। मैं भी  प्रतिदिन इसी मार्ग से अपने कर्म क्षेत्र की ओर जाता हूँ और शाम को वापिस आता हूँ। आज भी क्यूंकि कथा का समापन और भंडारे का आयोजन था। उस ईश्वर की ही अनुकम्पा होगी कि मेरा कार्य भी आज जल्दी ही पूरा हो गया था। मैं भी यहाँ आकर रुक गया था।

                                       जब तक कथा वाचन का कार्य चल रहा था ,मैं बहुत आनन्दित महसूस कर रहा था, लेकिन जैसे ही यह मान-सम्मान रुपी कार्यक्रम सामने चला, धीरे-धीरे मन उच्चाट सा होने लगा। इसलिए नहीं कि इस सम्मान समारोह से दिखावे की बू आ रही थी। शायद आजकल के आयोजनों में इस तरह के तथाकथित मान-सम्मान देना एक परंपरा बनता जा रहा है, क्यूंकि मैं हर दिन यहाँ से गुजरता हूँ और अक्सर मंदिर में माथा टेकता हूँ। कभी अगर मंदिर के अंदर न भी जा सकूं तो बाहर से ही शीश नवाता हूँ।

हर दिन देखता हूँ एक व्यक्ति सुबह-शाम वहीं मंदिर में सेवा करते हुए दिखाई देता है। आज भी कथा  पंडाल में जाने से पहले जब मंदिर गया तो वह व्यक्ति मुझे वहीं पर उसी सेवाभाव से सेवारत दिखाई दिया था। मैं जब भी इस मंदिर में शीश नवाता हूँ  तो न जाने क्यूँ मन ही मन उस व्यक्ति के सेवा और समर्पण भाव को देखकर उनके आदर में सिर स्वतः ही झुक जाता है। सम्मान और यशोगान का यह समारोह खत्म हो चुका था। माइक से  अभी तक मंदिर से और उस भागवत कथा आयोजन से  जुड़े हर व्यक्ति को मंच से सम्मानित किया जा चुका था, लेकिन उस निष्काम सेवक की  जैसे किसी को याद ही नहीं रह गई थी।

 मैं बहुत व्यथित हो रहा था। इंतजार लम्बा खींचता चला जा रहा था और मेरे अंतर्मन में  एक विद्रोही भाव जाग गया था। मुझे लग रहा था कि मैं मंच तक चला जाऊं और प्रधान जी से  चुपके से कह दूँ कि आपने सभी को सम्मानित करवा दिया ,अपना भी यशोगान करवा लिया, इसमें मुझे कोई आपति नहीं लेकिन जो व्यक्ति अपना घर छोड़ कर चौबीस घंटे मंदिर में रहकर निष्काम भाव से सेवाएं दे रहा है, क्या वह किसी सम्मान का अधिकारी नहीं है ?  पता नहीं मैं तीन-चार बार उठता-उठता बैठ गया। मन में आ जाता कि पता नी इन लोगों को बुरा लगेगा। वैसे भी मैं न तो उस भागवत कमेटी से  जुड़ा था और न ही मंदिर में माथा टेकने और प्रसाद ग्रहण करने के अलावा मेरा कोई और योगदान था। इसी बीच मेरा ध्यान भगवान् शिव की ओर गया जिनके चरणों में यह भला मानुष हर पल रहता है, मैंने मन ही मन भगवान से प्रश्न किया कि  हे ईश्वर।

क्या इस भरी सभा में इस नेक व्यक्ति की अनदेखी की अनुभूति जैसी मुझे हो रही है, किसी और को भी हो रही है क्या ? और अगर किसी और को न भी हो  रही है तो क्या मैं गलत तो नहीं सोच रहा हूँ। और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो कृपा करके मेरी प्रार्थना को सुन लो। मेरी आस्था को आज मरने से बचा लो। हे भगवान! इन आयोजकों का ध्यान इस व्यक्ति की ओर आकृष्ट करवा दो। अगर इस सेवा भाव को आज सम्मान नहीं मिला तो फिर मेरा इश्वर की भक्ति और शक्ति से शायद विश्वास उठ जाए। मैं  मानसिक प्रार्थना करते-करते ही बीच-बीच में उस व्यक्ति को देख रहा था जो मंदिर के बाहर हर दिन की भांति आज भी अपने सेवा कार्य में व्यस्त था, उसके चेहरे पर अब भी व्ही संतुष्टि और स्नेह का भाव व्याप्त था जो हर दिन मैं सुबह-शाम देखता था। मैंने आँखें बंद कर ली थी और भगवन से मूक प्रार्थना करने लग गया था। मैं उस भीड़ से  जैसे  बेखबर हो गया था। कुछ समय बाद मुझे चेतना आई जब साथ बैठे व्यक्ति की बाजू ने मुझे स्पर्श किया। मेरी आँखे खुली तो देखा वह भला मानुष धीरे-धीरे मंच की ओर जा रहा था और मंच से प्रधान जी उनका नाम पुकार रहे थे और क्षमा याचना कर रहे थे कि उनकी भूल को माफ़ कर दें, और साथ ही कह रहे थे कि मंदिर के मुख्य सेवादार जी को कथा व्यास अपने हाथों सम्मानित करेंगे।

                       पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था। मुझे नहीं पता ये उस व्यक्ति की निष्काम सेवा का परिणाम था या मेरी उस मूक प्रार्थना का, लेकिन जो भी हो माईक सि उस पुन्य आत्मा के नाम के साथ मुख्य सेवादार शब्द सुनते और उसे सम्मानित होते देख आज भगवन के अस्तित्व में मेरी आस्था और विश्वास और भी अटूट हो गया।


                                                                             - धरम चंद धीमान



15 December 2024

कहानी- मोहलत

बिरजू चारपाई पर बैठा गहन चिंता में डूबा था। तभी लालाजी का मुंशी ज़ोर से किवाड़ की कुंडी बजाता है- बिरजू ओ बिरजू दरवाज़ा खोल। बिरजू काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलकर- "राम-राम" मुंशी जी, आइए बैठिये।





मुंशी- बैठने का टाइम नहीं है, लालाजी ने पैसे के लिए बोला है।
बिरजू- हुज़ूर, थोड़े दिन की 'मोहलत' और दिला दीजिये! मैं जल्द ही कुछ ना कुछ इंतज़ाम कर लूंगा।

मुंशी- लालाजी अब और मोहलत नहीं दे सकते! तेरे पास सिर्फ़ कल तक का समय है, या तो लालाजी के पूरे पैसे लौटा दे; नहीं तो तेरे गिरवी रखे खेतों को बेचकर सूद सहित सारा पैसा वसूला जाएगा।

जब तुम्हारी पैसे चुकाने की औकात नहीं है तो उधार लेते क्यों हो? यह कहकर मुंशी बुदबुदाता हुआ चला गया। उसके जाते ही बिरजू वापस निराशा के सागर में खो गया।

कुछ देर बाद बिरजू की पत्नी अपने पुराने ज़ेवर बिरजू के हाथ में रखते हुए बोली- इन्हें बेचकर लालाजी का कर्ज़ा चुका दीजिये। मैं और ज़्यादा आपकी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर सकती। जब हमारे बच्चे किसी लायक बनेंगे तब फिर से बनवा लूँगी। अपनी पत्नी के त्याग और समर्पण को देखकर बिरजू की मायूस आँखें छलछला उठी।

- आनन्द कुमार


कहानी- अनजानी


इंटरमीडिएट(विज्ञान) की फाइनल परीक्षा चल रही थी। उस दिन मेरा फिजिक्स का पेपर था। परीक्षा दो बजे से थी लेकिन मैं सवा एक बजे ही पहुंच गया था। परीक्षा केंद्र के बाहर एक दुकान पर कोल्ड ड्रिंक पी रहा था। अचानक मेरी नज़र नीली सूट पहनी बला की खूबसूरत एक लड़की पर पड़ी।





अगले करीब पंद्रह-बीस मिनट तक एक-दूसरे से निगाहों में बातें होती रहीं। स्वभाव से मैं हमेशा शर्मीला रहा हूं इसलिए बात तो करना चाहा लेकिन हिम्मत नहीं हुई। मैं सोच में खोया हुआ ही था कि उसने अचानक से मेरे पास आकर पूछा-आपका भी एग्जाम है क्या ? मैं सकपका कर अपनी झेंप छिपाते हुए धीरे से हां कहा। उसके बाद फिर हल्की-फुल्की बातचीत और परिचय हुआ।

उसने बताया कि वो भी पीपीके कॉलेज बुंडू में ही पढ़ती है। इसके बाद दोनों एग्जाम लिखने चले गए।दो साल बुंडू कॉलेज में पढ़ा लेकिन पहली दफे किसी लड़की को देखकर दिल के सारे तार झनझना उठे थे। पूरे पेपर के दौरान मैं उसी के बारे सोचता रहा। बेताबी ऐसी थी कि कितनी जल्दी पेपर खत्म हो और बाहर निकल कर उसका नाम और पता पूछूंगा।

उन दिनों मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करते थे। मैं पेपर खत्म होते ही भागा-भागा सीधे गेट पर आकर खड़ा हो गया। आंखें भीड़ में बस उसी को ढूंढ रही थी। अचानक जब गेट से निकली तो मैं बदहवास हो गया। उसने मुझे नहीं देखा था। मैं पूछने के लिए आगे क़दम बढ़ाया ही था कि ठीक गेट के सामने बाइक लेकर एक लड़का खड़ा था। शाय़द उसका भाई ही था।

मैं सोचने लगा कम से कम नजरें तो एक बार मिल जाए।वो बाइक पर बैठी और इधर मेरा दिल बैठ गया कि अब आंखों में भी बात नहीं होगी। अगले ही पल मानो चमत्कार हो गया और एक बार फिर हमारी नजरें मिलीं। एक कातिलाना मुस्कुराहट के साथ बाय की और बाइक आगे बढ़ गई। मैं ख़ुमारी में खोया एकटक तबतक उसे निहारता रहा जबतक कि वो आंखों से ओझल नहीं हो गई।

यूं तो मैं कॉलेज नहीं के बराबर जाता था क्योंकि ट्यूशन सर मना किए थे कि सरकारी कॉलेज है, सुविधा अच्छी नहीं है। इसलिए मटरगश्ती करने कॉलेज नहीं जाना है। लेकिन एग्जाम खत्म होने के बाद करीब एक महीने तक लगातार प्रतिदिन कॉलेज गया।

जाकर नजरें बस उसी को ढूंढती। दोपहर तक छान मारने के बाद मायूस होकर लौट आता। धीरे-धीरे यह सिलसिला बंद कर दिया क्योंकि वो फ़िर कभी नहीं मिली। आज़ भी वो मुस्कुराहट याद कर अनायास ही मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाती है। सोचता हूं कि काश वो अनजानी फिर कभी मिल जाती दो पल ही सही।

- कुणाल



12 December 2024

कहानी- मित्र


राम एक बहुत अच्छा लड़का था, लेकिन शहर आकर कुसंग ने उसके जीवन को बर्बादी की तरफ धकेल दिया। ज़ब उसे इस बात का अहसास हुआ तब तक उसका सब कुछ लुट चुका था और वह जीवन में एकाकी हो गया था। परन्तु ऐसे समय में श्याम ने उसका हाथ थामा और राम से दोस्ती कर ली।



श्याम ने राम को हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और उसकी एक अच्छे मित्र की तरह सदैव सहायता की। परिणामस्वरूप राम ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुधार किया। वह पढ़ाई, खेल, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन करने लगा।

नियमित और कठोर परिश्रम के कारण, वह अंततः एक श्रेष्ठ चिकित्सक बना। आज राम अपने जीवन में सफलता का पूरा श्रेय श्याम और श्याम की दोस्ती को देता है। श्याम ने वास्तव में 'दोस्ती ' शब्द को पूर्ण रूप से सार्थक किया था।

- प्रवीण कुमार