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27 January 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 27 जनवरी 2026





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झूलते हुए झूलता हूॅं झूला

झूलते हुए झूलता हूॅं झूला
कुछ देर इधर,कुछ देर उधर हूॅं मैं
कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूॅं
बीच में रहते हैं जो भी,अभी या कभी भी
ज़रा-ज़रा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना
ठीक नहीं,दोनों तरफ़ वफ़ादारी ठीक नहीं
इस तरफ़ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक
युद्ध का वक़्त है यही और सही-सही
बदलना औज़ार और उपस्थिति ठीक नहीं
अपनों में रहने से ही होता हूॅं मुक्त
अपनों में मरने से ही मिलती है मुक्ति
मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी
जॅंगल-जॅंगल झरते हैं झरने झर-झर
खिलते हैं फूल भी ख़ुशबूदार


- राजकुमार कुम्भज


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आज हिज्र की सर्द शाम है
दो गिलास और एक जाम है

थी तलब मुलाक़ात की मुझे
पर जनाब को और काम है

भूल कर भी भूली नहीं मुझे
हाथ की महंदी पे नाम है

हो अगर भरी बज़्म तो मुझे
चश्म उसकी करती सलाम है

मैं मुरीद सूरत का ना हुआ
हुस्न सिर्फ इक ताम झाम है


- अंकुश


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अनकहा इश्क़

मैं जानती हूं
तुम सब जानते हो
फिर ये भ्रम की माया
क्यों नहीं पहचानते हो ?

जानते हो तुम मेरी
मुस्कुराहट की वजह
फिर मुस्कुरा औरो से
मेरे सीने को क्यों छली करते हो।

मैं जानती हूं
तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो
छू न जाए हवा भी मुझे
इस बात से भी डरते हो।

सुना है तुम जीत लेते हो
सब का हृदय
फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे
क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ?

लिखते हो तुम
अपनी गजलों में मेरे बारे में
फिर मेरा नाम
सरेआम लेने से क्यों डरते हो।


- डॉ. राजीव डोगरा


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मेरे अपने कुछ पल
मेरे जीवन के कुछ क्षण,
हो जाती हूँ तुझमें मगन,
खो जाती हूँ इस कदर
कि तू ही बन जाता है
मेरा अभिन्न अंग।
पँछियों का यूँ चहचहाना,
मेरी देहरी तक आ जाना,
जैसे मेरे मन की थकन
पहचान कर
चले आते हों।
मन की अनकही अवस्थाएँ,
मौन में सिमटी भावनाएँ,
वे जैसे सब समझ लेते हों
बिना प्रश्न किए
सिर्फ़ बोलते हों।
उनकी मीठी वाणी सुन
मन का बोझ
किसी अनदेखे स्पर्श सा
हल्का हो जाता है।
कुछ पल के लिए
मैं स्वयं से दूर,
उनकी ध्वनि में
पूरी तरह खो जाती हूँ।
तब लगता है कि
वे जीने का संदेश लेकर आए हैं,
कहते हैं धीमे स्वर में
“मत होना कभी उदास,
हम हैं न,
यहीं कहीं आसपास।”

सुन चिरैया,
तू यूँ ही चहचहाती रहना,
ताकि जीवित रहे संवेदना।
शायद तू
किसी अदृश्य शक्ति की
सशक्त चेतना हो।


- सविता सिंह मीरा


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तेरे भरोसे

ऐ खुदा तू,
इंतहान क्यों लेता है,
दुख देकर पराया,
मान क्यों लेता है।

बच्चे तुम्हारे हम हैं,
फिर क्यों खुशी कम,
ज़ख्म बहुत है जीवन में,
रहती ये आंखे नम है।

किस्मत के मारो को,
क्यों मारता है,
मेरी नैया तू ही, डुबोए फिर
कौन तैरता है।

तेरे ही भरोसे हम हैं,
तू ही सब कुछ,
तेरे ही हम पे करम है,
बाकी सब वहम है।

मालिक तू साथ नहीं,
तो सब कुछ कम है
जो मिलती है खुशी,
वो तेरा ही रहम है।

हमने सिर्फ तुमको,
ही जाना,
सब से पहले तुमको,
ही पहचाना।

तू दिखता नहीं ,फिर भी
देखता हूं तुझे हर रूप में।
तू ही बनता सहारा,
मेरे डगर की हर धूप में।

मेरे जीवन की नैया,
लगाओगे पार।
नहीं छोड़ोगे बीच,
मुझे इस मझधार।

अपनी लाज बनाए रखना,
चाह नहीं सरताज बनने की,
इतनी कृपा कर,
किसी का मोहताज नहीं,
बनाए रखना।


- रोशन कुमार झा


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संतुलन का झुकाव

मध्य में बने रहने के लिए
कभी दाएँ झुकना पड़ता है,
कभी बाएँ

जैसे वृक्ष आँधी में झुककर भी
जड़ें नहीं छोड़ता।

जो सदा सीधा रहने की ज़िद करे,
वह टूट जाता है;
और जो हर ओर बह जाए,
वह अपना केंद्र खो देता है।

मध्य मार्ग कोई जड़ता नहीं,
वह जीवंत लय है!
समय, परिस्थिति और करुणा के साथ
हल्का-सा झुक जाना।

और नदी भी तो
मोड़ लेकर ही सागर तक पहुँचती है।

झुकना हार नहीं,
झुकना बुद्धि है।

बस ध्यान रहे
झुकते हुए भी
आत्मा का केंद्र अडिग रहे।


- नरेंद्र मंघनानी


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जितनी अधिक सुविधाएं ,
उतना ही अवसादग्रस्त
जितना धन दौलत ,
उतना ही अधिक बेचैनी।
जितना बुद्धि विवेक,
उतना ही अधिक खड़यंत्र।
जितना प्यार मोहब्बत ,
उससे अधिक धोखा।
जितना अधिक लगाव ,
उससे अधिक तनाव।
जितना अधिक आविष्कार,
उतना अधिक खूनी अत्याचार।
जितना अधिक जनसंख्या,
उससे अधिक है भुखमरी।
जितना अधिक ईमानदारी ,
उससे अधिक बेइमानी,ठगी।
जितना कम ज्ञान,
उससे अधिक घमंड ।
जितना कम आमदनी
उससे अधिक दिखावा।
जितना अधिक सुंदरता,
उतना ही अंदर से खोखला।
जितना अधिक शांत स्वभाव ,
उतना ही अधिक शातिर अंदाज।
जितना अधिक मीठी जबान,
उतना ही अधिक जहरीला।


- सदानंद गाजीपुरी


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दिव्य स्वप्न होगा साकार
कहते हो जिस
तन को तुम अपना
वह तन तुम्हारा नहीं है
जिस सम्पति के लिए तुम
सबसे करते हो लड़ाई
वह सम्पति तो
यहीं रह जाती है
जिस धन के लिए सब
अनैतिक कार्य कर जाते हो
क्या वह धन
किसी के साथ जाता है ?
जिन परिजनों को तुम
अपना बताते हो
वास्तव में वो भी
तुम्हारे अपने नहीं हैं
क्या कोई किसी के साथ गया ?
ये जग झूठा है, यहाँ कोई
किसी का अपना नहीं है
अगर जीवन में तुम्हें
आगे बढ़ना है तो
खुद को जानो
अपने कर्तव्य का
करो सम्यक निर्वहन
सेवा, परोपकार में
सदैव रहो संलग्न
नित्य करो भजन- कीर्तन
एक दिन अवश्य होगा
आत्म साक्षात्कार रूपी
दिव्य स्वप्न साकार


- प्रवीण कुमार


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बस का सफ़र

आज बस में सफ़र करते हुए,
यह अहसास हुआ कि ये जिंदगी,
ना जाने किधर भाग रही है?
उस भीड़ से भरी गतिमान बस में,
माँ की गोद में सोए शिशु से लेकर,
वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर
पहुँच चुके हर जन के जीवनदर्शन
को समझने का अवसर मिला!
जहाँ सभी मूक दर्शक बनकर,
भूत से भविष्य की ओर सक्रिय थे!

एक बालक खिड़की से बाहर
अपने बचपन को निहार रहा था,
तो एक युवा सपनों की ख़ातिर
ढ़ेर सारी उम्मीदें लेकर निकला,
वहीं एक प्रौढ़ जिम्मेदारियों में
उलझा गहन चिंतित सा बैठा था,
तो एक वृद्ध शायद इसी आस में
सफर कर रहा था कि उसे अभी,
मंज़िल के और निकट जाना है!
कुछ महिलाएँ ढेरों ख्वाब लिये,
अपनों से मिलने की चाहत में,
जीवन सफर पर निकली होंगी!

उस कमरे जैसी बस में लगभग,
हर आयु वर्ग के यात्री मौजूद थे,
किसी को समय से नौकरी पर
जाने की चिंता तो कोई विभिन्न
मुद्दों पर चर्चा करते चल रहे थे,
सभी अपनी ही दुनिया में लीन,
आपस में एक झलक देखते
फिर खो जाते सोच के सागर में,
तो कुछ नींद की झपकी लेते हुए
कल्पनाओं की सड़क के पंथी थे!

किसी के चेहरे पर चिंता के भाव,
तो किसी पर खुशियों की चमक,
ये जिंदगी भी बस के जैसी है,
जिसमें सुख दुख चढ़ते उतरते हैं,
चलते चलते अब बस का अंतिम
ठहराव आ गया जहाँ से सब लोग
अपनी मंज़िल की ओर निकल गए,
वहाँ अकेली रह गई थी तो वो बस,
जिसे नए मुसाफिरों को लाने हेतु,
एक बार फिर से तैयार होना था।


- आनन्द कुमार


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चिट्टणु

दुर-फिटेम मुया चिट्टणुआ
ओ..ओ ओ ओ.. ओ
कैंह म्हाचले डेरे लाए
कैंह भोले लोक फसाए
कैंह बलदे दिउए बुझाए
नास-पिटणुआ..हाय
फिटेम चिट्टणुआ!
नित्या खड्डा जो..
ओओओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।
किती तू जम्या किती तू जाया
कम्म तेरे काले नांव चिट्टा पाया
कुड़िएं मुंडुएं मुंह लगाया
नास-पिटणुआ...हाय
फिटेम चिट्टणुआ
तू नित्या खड्डा जो
ओओ ओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।
कुण-कुण तेरे दुषट बप्वारी
तिन्हें जे पाई ये बुरी बमारी
टोल रही हुण पुलस सारी
नास-पिटणुआ..हाय फिटेम चिट्टणुआ
तू नित्या खड्डा जो ओओओ...
तू ल्वाया खड्डा जो !
मुंडु-कुड़ियो बहिनों-भाईयो
दिला ने अज कसम खाईयो
चिट्टे ने कदि हत्थ ना लाईयो
लाये कोई तां पुलस सदाईयो
तब फसेगा चिट्टणुआ
हाय...
नास-पिटणुआ
तू नित्या खड्डा जो
ओओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।

- डॉ. अनेक सांख्यान


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परीक्षा काल

विद्यार्थी की नज़र में परीक्षा
चिंता भी है, भय भी,
सुकून भी, सीख भी,
और साल भर किए गए
हर परिश्रम का एहसास भी।

विषयों की समझ के साथ
याद आते हैं वे अध्यापक,
जिनकी बातों ने शब्दों को अर्थ दिया,
और किताबों को जीने का साहस।

कभी मन कहता है
“सब आता है, पढ़ ही लेंगे ना यार,”
तो कभी खुद से किए वादे
और अपनों की उम्मीदें
आँखों में उतर आती हैं।

परिणाम की आहट सुनते ही
चेहरे पर अनायास ही
मुस्कान बिखर जाती है,
या फिर एक मौन प्रश्न खड़ा हो जाता है।

सच तो यह है
कि परीक्षा केवल काल नहीं,
जीवन का वह पल है
जहाँ विद्यार्थी खुद से मिलता है,
और वहीं एक गहरा सा सबक
हमेशा के लिए सीख लिया जाता है।


- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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सर्दी की पहली बारिश 

सर्दी की पहली बारिश जो हुई
 एक बार फिर सर्दी में जवानी आई।
खेतों में फसलें लहलहाने लगी
अब तक समझ रही थी जो खुद को ठगी ठगी।
पौधों में भी नई कोपलें आने लगी
उनमें भी नव जीवन की धारा बहने लगी।
नदी नाले सूखने को थे आए 
उनमें  भी जलधारा बहती जाए।
पहाड़ थे उदास बड़े
खुश हैं आज बर्फ के फाहे जो पड़े।
किसान को भी खुशी बहुत होती 
यही वर्षा अनाज के भंडार  है भरती ।
सुखे जलस्त्रोत चैन की सांस भरते
वो भी अब जल प्रदान करते।
बच्चे,बूढ़े, जवान  सब खुशी मनाते
संदाल में  मन भावन पकवान है खाते।
चारों ओर हरियाली नजर लगी आने
दृश्य देख हर कोई आनन्द लगा जताने।


- विनोद वर्मा


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यादों में तुम्हारी

यादों में तुम्हारी रहने लगी हूं,
ज़िन्दगी से समझौता करने लगी हूं।
हर लम्हा याद है मुझे जिंदगी का
हर आहट को महसूस करने लगी हूं।

न चांद को खबर न तारों को खबर है,
तुम्हारे प्यार में वफा अब दिखने लगी है।
झील और झरनों के किनारे कभी तो आनंद लिया है,
ख्बाव आंखों में सजाकर संवरने लगी है।

कब दिन ढला बता ना चला है, मुझे,
हर श्याम तुम्हारा इंतज़ार करने लगी है।
बाजार में हलचल मुझे भी बहुत दिखी है,
भीड़ में सिर्फ मुझे तुम नज़र आते दिखे हैं।


- रामदेवी करौठिया


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जीवन की शर्ते

वो ज्ञान ही क्या जो समय से न हो,
वो नर ही क्या जो कर्म से न हो।
वो ईश्वर ही क्या जो दया से न हो,
वो पक्षी ही क्या जो उड़ान से न हो।

वो जवाब ही क्या जो सत्य से न हो,
वो जीवन ही क्या जो प्रेम से न हो।
वो देश ही क्या जो जन से न हो,
वो जीत ही क्या जो प्रयास से न हो।

वो पथ ही क्या जो पग से न हो,
वो जल ही क्या जो प्यास से न हो।
वो प्रेम ही क्या जो दिल से न हो,
वो गुलाब ही क्या जो काँटों से न हो।

वो कल ही क्या जो आज से न हो,
वो दिन ही क्या जो रात से न हो।
वो हीरा ही क्या जो कोयले से न हो,
वो अलंकार ही क्या जो तन से न हो।

वो वन ही क्या जो वृक्ष से न हो,
वो कमल ही क्या जो पंक से न हो।
वो ताल ही क्या जो पय से न हो,
वो सिंह ही क्या जो नृप से न हो।


- साक्षी यादव


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23 February 2025

मातृभाषा पर विभिन्न रचनाकारों की टिप्पणी पढ़िए

मातृभाषा दुनिया के किसी भी हिस्से में रहने वाले मनुष्य के लिए न केवल उसकी भावनाओं और विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम है, बल्कि उसे अपने उस क्षेत्र विशेष की सभ्यता और संस्कृति को सहृदय महसूस कर गर्वान्वित होने का भी सरल अवसर प्रदान करता है। प्रत्येक मनुष्य का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह वार्तालाप के अलावा शिक्षा-दीक्षा भी अपनी मातृभाषा में प्राप्त करे और इस क्रम में कोई भी कारक उसे अपनी मातृभाषा के चलते हीन भावना का अहसास न कराए। 





परंतु आज़ के समय में जबरन मातृभाषा को कुचलकर कुछ विशेष भाषाओं को ज्यादा महत्वपूर्ण और अनिवार्य दर्शाकर भाषा थोपने की होड़-सी मची है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि किसी भी मनुष्य या क्षेत्र या देश की तरक्की या शिक्षा के लिए चुनिंदे भाषाओं को जबरदस्ती स्वीकार करना ही पड़े। अगर ऐसा होता तो जापान और चीन जैसे देश कभी इतनी तेजी से विकास नहीं करते। जापान और चीन जैसे देशों में ग्लोबल भाषा घोषित अंग्रेजी की हैसियत उतनी ही है जितना कि गली में घूमते कुत्ते की। 

आप देख सकते हैं कि वहां सामानों के रैपर या डिब्बों तक में अंग्रेजी में कुछ भी नहीं लिखा रहता है। फ़िर भी दोनों ही देश विश्वपटल पर तकनीक और तरक्की के मामले में कई अंग्रेजी भाषी देशों से मीलों आगे है। इसलिए इस बात को समझने की आवश्यकता है कि अगर कोई अनिच्छा जाहिर करे तो जबरन भाषा न थोपकर मातृभाषा पर ही उसे आगे बढ़ने दिया जाय। अन्य भाषाएं सीखना उसके निजी रुचि पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

                                                                              - कुणाल

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मां, मातृभूमि और मातृभाषा स्वर्ग से भी गरिमामयी है। प्रति वर्ष २१ फरवरी के दिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। परंतु मातृभाषा मात्र एक दिन के लिये गुरुत्वपूर्ण नहीं, अपितु जन्म से मृत्यु तक हमारा साथ निभाते हैं।

मातृभाषा तो मां से मिली भाषा है। हमारी पहली बोली, पहला शब्द, पहला उच्चारण, मातृभाषा में ही होता है। मातृभाषा वो भाषा है, जो हमारी कल्पनाओं को शब्दों में संवारती है। हमारे चिंतन की एक मात्र भाषा है। मातृभाषा ही है, जो सपनों की भाषा होती है। हम लाख कोशिश के बाद भी अपनी सोच, कल्पना, चिंतन और सपनो को दूसरी भाषा में नहीं देख सकते। अतः मातृभाषा हमारी अंतरात्मा की भाषा है। 

हम मनुष्य चाहे किसी भी धर्म, जाति, स्थान या भाषा से जुड़ें हों, हमें अपनी अपनी मातृभाषा के व्यवहारिक प्रयोग में लज्जा या संकोच नहीं करना चाहिए। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्वित होना चाहिए है। मातृभाषा हमें अपने जड़ों से जोड़ें रखतीं हैं। अतः मातृभाषा ही हमारा प्रथम परिचय है। मै स्वीकार करती हूं, मैं अपनी मातृभाषा को समर्पित मन से सम्मान करती हूं।


                                                                 - सुतपा घोष 


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मातृभाषा वह भाषा है जिसे व्यक्ति जीवन के प्रारम्भ से मृत्यु तक विचारों के आदान प्रदान में प्रयोग में लाता है। मातृभाषा में प्रत्येक व्यक्ति एक  सहज भाव से अपने विचारों को प्रकट करने में सफल होता है। मातृभाषा हमारे संस्कारों, जीवन मूल्यों के संचार में भी सहायता  करती है। मातृभाषा सदैव ह्रदय से जुडी होती है। 

परिणामस्वरूप एक व्यक्ति का विकास एवं उन्नति मातृभाषा में अधिक बेहतर तरीके से सम्भव है। हमारे देश में आधिकारिक मातृभाषा,राजभाषा हिंदी है। मातृभाषा पूरे देश में लोगों में परस्पर सम्पर्क की भाषा होती है। हमें मातृभाषा का महत्व समझते हुए हिंदी भाषा का सम्मान करना चाहिए एवं हिंदी के प्रयोग को  सदैव प्रोत्साहित करना चाहिए। 

जापान, जर्मनी एवं चीन जैसे शक्तिशाली देश अपनी मातृभाषा को अन्य भाषाओं से वरीयता देते हैं जो इन देशों में विकास की एक कड़ी के रूप में मुख्य रूप से कार्य करती है। मातृभाषा का यह सम्मान अनुकरणीय है। हमें भी अपनी मातृभाषा को सर्वोपरि मान कर उसका अधिकतम प्रयोग करना चाहिए। इससे देश को विकास पथ पर अग्रसर होने में और अधिक मदद मिलेगी।

                                                                - प्रवीण कुमार

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मातृभाषा शब्द से ही माँ की ममता का एहसास हो जाता है। माँ जैसे अपने बच्चों को लाड प्यार से पालती है ,वैसे ही मातृभाषा भी बच्चे की तोतली बोली को स्वीकार कर अपना प्यार जताती है। 

मातृभाषा में कही गई बात बच्चा स्वाभाविक रूप से ही सीख जाता है। मातृभाषा को सीखने के लिए किसी बच्चे को अलग से शिक्षक की आवश्यकता नहीं होती ।बच्चा जब बड़ा होकर किसी दूसरे राज्य में जाता है और वहाँ उसे जब अपनी मातृभाषा में बोलने वाला कोई मिलता है तब वह बहुत ही खुशी के साथ उससे अपनी मातृभाषा में बात करता है। उस व्यक्ति से बात करने पर उसे सगे भाई बंधु से मिलने का एहसास होता है।

                                                           - अनुरोध त्रिपाठी 


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संसार में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने विचारों को बोली के रूप में व्यक्त करता है। मानव जन्म के बाद जिस भाषा को सबसे पहले सीखता है, वही उसकी मातृभाषा कहलाती है। मातृभाषा को मानव की प्रथम भाषा या देसी भाषा भी कहा जाता है। अपनी मातृभाषा को बालक धाराप्रवाह बोल पाता है और इसी भाषा से ही उसका समग्र विकास सम्भव होता है। 

बालक की प्राथमिक शिक्षा में भी उसकी मातृभाषा पर ही बल दिया गया है। मातृभाषा में वह अपने विचारों या भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकता है। मेरे क्षेत्र की मातृभाषा हिंदी है और हिंदी के बोले गए शब्दों का प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क व हृदय पर बहुत अच्छे से पड़ता है। यह भारत की उत्तम भाषा में से एक है। मुझे अपनी मातृभाषा पर गर्व है। सभी देशवासियों को 21 फ़रवरी पर मातृभाषा दिवस की बहुत-बहुत बधाई।

                                                                         - आनन्द कुमार


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मातृभाषा हमारी पहली अभिव्यक्ति या भाषा होती है, जिससे हम अपनी भावनाओं को प्रकट करते है। मातृभाषा का नाता हमारे बचपन से ही प्रारंभ होता है, इसलिए हमारे दैनिक जीवन में मातृभाषा का अहम स्थान होता है।
मातृभाषा हम सभी की पहचान का स्मारक, संस्कृति की धरोहर और मूल्यों की जननी है। 

मातृभाषा हम सभी को एक दूसरे से जोड़ती है और एक सशक्त माध्यम की भूमिका निभाती है। मातृभाषा का संरक्षण करना हर एक नागरिक का कर्तव्य है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहें। मातृभाषा हमारे आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाती है।

                                                                           - अंशिता त्रिपाठी

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मेरी मातृभाषा बंगाली है, मातृभाषा का तात्पर्य ही यह है कि जो भाषा हम मां की गोद में रहकर सीखते हैं, मुझे गर्व है कि हमारी मातृभाषा को समृद्ध बनाने के लिए श्री ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने बंगला लिपि को सरल बनाया, जिस पर कार्य करते हुए कवि गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर का लिखा हुआ जन गण मन आज हमारी राष्ट्र गान है तथा वंदे मातरम् जो हमारा राष्ट्रीय गीत है उसकी रचना भी वंकिम चंन्द्र जी ने की थी।

यूनेस्को ने बंगला भाषा को सबसे मीठा भाषा की श्रेणी में रखा था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी मातृभाषा को प्रतिष्ठित करने के लिए कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

आज हम इसी पर कुछ प्रकाश डाल रहे हैं। बंगाली भाषा आंदोलन (बराक घाटी)1960 में असम सरकार के उस फैसले के खिलाफ शुरू हुआ था जिसमें असमिया को राज्य की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने का फैसला किया गया था, जबकि बराक घाटी के ज़्यादातर निवासी बंगाली बोलते थे।

घाटी के लगभग 80% निवासी जातीय बंगाली हैं और बराक घाटी क्षेत्र में बंगाली आबादी में हिंदू और मुस्लिम दोनों लगभग बराबर संख्या में हैं, जो आबादी का भारी बहुमत है। भारत के अन्य हिस्सों से आए मूल जनजातियों और अप्रवासियों की भी पर्याप्त अल्पसंख्यक आबादी है।

भाषा शहीदों की याद में बनाया गया स्मारक मुख्य घटना 19 मई 1961 को सिलचर रेलवे की हत्या कर दी थी। भाषा आन्दोलन में शहीद हुए लोगों की सूची- कमला भट्टाचार्या, हितेश विश्वास, शचींद्र मोहन पाल, चंडी चरण सूत्रधर, तरणी देवनाथ, कुमुद दास, सुनील सरकार, सुकोमल पुरकायस्थ, कानाइ लाल नियोगी, वीरेंद्र सूत्रधर आदि

भाषा आंदोलन से जुड़ी कुछ और बातें- बंगाली भाषा आंदोलन के बाद, 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यह दिवस भाषाई  विविधता और सांस्कृतिक विरासत के महत्व को दिखाता है।

                                                                       - रत्ना बापुली


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मातृभाषा हमारी हो या तुम्हारी सबको जान से प्यारी है।
मातृभाषा और हमारा नाता जन्मों जन्मांतर से है।

सींचा है मातृभाषा ने हमें बड़े ही प्रेम से अपने आंचल में जैसे इक मां छोटे बच्चे को अपने आंचल में रखती है। मां बिना किसी स्वार्थ के हम सभी को हमेशा बड़े ही प्रेम से संजो कर और जोड़ कर रखती है। मातृभाषा ने हमें जीना सिखाया और सिखाएं जीवन जीने के सभी उसूल। कैसे चुकाएंगे हम मातृभाषा आपका ऋण क्योंकि आपका धरती पर है ना कोई मूल।

                                                                         - रजनी उपाध्याय

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मातृभाषा दिवस की सभी सम्मानित साथियों को बधाई। आज विश्व मातृ भाषा दिवस है। मातृ का मतलब मां और भाषा मतलब बोली यानि कि मां की भाषा। मां ही हमें पहला शब्द सिखाती है जो हमारी मातृ भाषा होती है। मातृ भाषा हमें अपनों से जोड़े रखती है हमें प्यार सिखाती है। 

मातृ भाषा को हम देशी भाषा में दुध बोली भी कहते है। सभी को अपनी मातृ भाषा से बहुत ही प्यार होता है चाहे वह देश या विदेशी हों। जब भी जहां भी कभी किसी को अपनी भाषा का व्यक्ति अगर मिल जाए तो उनको लगता है कि ये हमारा अपना ही प्रिय है वह बहुत प्रेम से मिलते है और अपनी मातृ भाषा में बातें करते है, जिससे उन्हें बहुत सुकून मिलता है।

                                                                 - सुमन डोभाल काला


11 January 2025

हिंदी भाषा का विकास

इतिहास के पन्नों को पलटने से हमें हिंदी भाषा के विकास की एक स्पष्ट तस्वीर मिलती है। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए। मातृभाषा हमारी संस्कृति, हमारी पहचान, और हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ कुछ कारण हैं कि हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व क्यों होना चाहिए?
मातृभाषा हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमारे समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और मूल्यों को दर्शाती है।





मातृभाषा हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह हमें हमारे समाज और संस्कृति से जोड़ती है। मातृभाषा हमारे समाज को एकजुट करने में मदद करती है। यह हमें एक दूसरे से जोड़ती है और हमारे समाज को मजबूत बनाती है।  मातृभाषा हमारी भाषाई विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें अपनी भाषा और संस्कृति की विविधता को समझने और सम्मान करने में मदद करती है।

मातृभाषा हमारे राष्ट्रीय गौरव का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें हमारे देश और संस्कृति के प्रति गर्व और सम्मान की भावना को जगाती है। इसलिए, हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए और उसे सम्मान और प्यार के साथ संरक्षित करना चाहिए।हिंदी दिवस के अवसर पर हमें अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना को जगाना चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि हम अक्सर अपनी मातृभाषा को कम महत्व देते हैं और अंग्रेजी भाषा को अधिक महत्व देते हैं।

यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि हम अपनी मातृभाषा को अपने दैनिक जीवन में कम उपयोग करते हैं, यह हमारी संस्कृति और पहचान के लिए खतरनाक हो सकता है। सिर्फ एक दिन हिंदी दिवस मनाने से हम अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो जाते हैं। हमें अपनी मातृभाषा के प्रति नियमित रूप से प्रयास करना चाहिए और उसे अपने दैनिक जीवन में अधिक महत्व देना चाहिए। इसलिए, हमें अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना को जगाने के लिए नियमित रूप से प्रयास करना चाहिए।


हिंदी भाषा को बढ़ावा देने और उसके प्रति गर्व और सम्मान की भावना को जगाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, समाज, और शासन-प्रशासन की भागीदारी आवश्यक है।

व्यक्तिगत स्तर पर-

अपने दैनिक जीवन में हिंदी भाषा का उपयोग करना।
हिंदी साहित्य का अध्ययन करना और उसे बढ़ावा देना।
हिंदी भाषा का प्रचार करना और उसके प्रति जागरूकता बढ़ाना।

समाजिक स्तर पर-

हिंदी भाषा के कार्यक्रम आयोजित करना।
हिंदी साहित्य के सेमिनार आयोजित करना।
हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना।

शासन-प्रशासनिक स्तर पर-

हिंदी भाषा को आधिकारिक भाषा बनाना।
हिंदी भाषा के शिक्षण को बढ़ावा देना।
हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना।

इन तरीकों से, हम हिंदी भाषा को बढ़ावा दे सकते हैं और उसके प्रति गर्व और सम्मान की भावना को जगा सकते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटने से हमें हिंदी भाषा के विकास की एक स्पष्ट तस्वीर मिलती है। हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है, जो कि सामान्यतः,प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से शुरू होता है।

हिंदी भाषा के विकास को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है,आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल। आदिकाल में हिंदी भाषा अपने अपभ्रंश के निकट थी, लेकिन समय के साथ इसमें परिवर्तन आया और यह अपने स्वतंत्र और  सशक्त रूप में खड़ी हो गई।

मध्यकाल में हिंदी भाषा में फारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग बढ़ गया, जो कि मुगल शासन के दौरान हुआ। आधुनिक काल में हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बढ़ गया, जो कि अंग्रेजों के शासन के दौरान हुआ। इतिहास के पन्नों को पलटने से हमें यह भी पता चलता है कि हिंदी भाषा ने कैसे अपने आप को विकसित किया और कैसे यह भारत की राजभाषा बन गई।


                                    - डॉ. मुश्ताक अहमद शाह


21 December 2024

कहानी- मुख्य सेवादार


             मंदिर में हो रहे भागवत कथा आयोजन का आज अंतिम दिन था। कथा व्यास जी द्वारा कथा को समाप्त कर  दिया  गया था। अब केवल पूर्णाहुति और अंतिम आरती करना ही शेष था। इसी बीच आयोजक दल  के प्रधान माइक पर पहुँच गये। यहाँ पहुँचते ही उन्होंने कथा व्यास सहित पंडाल में उपस्थित हर व्यक्ति का स्वागत किया और फिर उन्होंने आयोजक दल  के तीन-चार लोगों के नाम पुकार कर उनसे आग्रह किया कि वे कथा व्यास को सम्मान स्वरूप शाल, टोपी और स्मृति स्वरूप ,स्मृति चिन्ह भेंट करें। इसके बाद दल के प्रत्येक  सदस्य को एक-एक करके मंच पर बुलाकर कथा व्यास जी के हाथों  और  फिर एक सदस्य से दूसरे  सदस्य को सम्मान स्वरूप शाल, टोपी या दूसरा कोई स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित करवाया गय। सभी स्वयं सेवी युवाओं को भी एक-एक करके सम्मानित किया गया। फिर प्रधान जी माइक  से  हट गये और इधर दल का एक अन्य  सदस्य आकर प्रधान  जी का नाम पुकारता है फिर कथा व्यास जी के हाथों उन को भी सम्मानित करवाया जाता है। यहाँ तक कि दूसरे राज्य से  भी पांच-छह लोग जो मेहमान रूप में आये थे, उन्हें भी एक-एक करके मंच पर बुलाकर सम्मान दिया गया।





                       लगभग आधा घंटा पहले यहाँ पर जो भक्तिमय वातावरण बना हुया था। देखते ही देखते वह  वातावरण जैसे लोप हो गया था। श्रोताओं के चेहरों पर एक अजीव सा भाव देखने को मिल रहा था। शायद वे  दिखावे भरे इस कार्यक्रम को पचा नहीं पा रहे थे और भ्रमित से  महसूस कर  रहे थे। क्यूंकि यह मंदिर एक मुख्य सड़क मार्ग के किनारे पर एक शांत और सुन्दर स्थान पर स्थित है। यहाँ पर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई है जिससे यहाँ का दैवीय वातावरण मन को आकर्षित कर लेता है। मैं भी  प्रतिदिन इसी मार्ग से अपने कर्म क्षेत्र की ओर जाता हूँ और शाम को वापिस आता हूँ। आज भी क्यूंकि कथा का समापन और भंडारे का आयोजन था। उस ईश्वर की ही अनुकम्पा होगी कि मेरा कार्य भी आज जल्दी ही पूरा हो गया था। मैं भी यहाँ आकर रुक गया था।

                                       जब तक कथा वाचन का कार्य चल रहा था ,मैं बहुत आनन्दित महसूस कर रहा था, लेकिन जैसे ही यह मान-सम्मान रुपी कार्यक्रम सामने चला, धीरे-धीरे मन उच्चाट सा होने लगा। इसलिए नहीं कि इस सम्मान समारोह से दिखावे की बू आ रही थी। शायद आजकल के आयोजनों में इस तरह के तथाकथित मान-सम्मान देना एक परंपरा बनता जा रहा है, क्यूंकि मैं हर दिन यहाँ से गुजरता हूँ और अक्सर मंदिर में माथा टेकता हूँ। कभी अगर मंदिर के अंदर न भी जा सकूं तो बाहर से ही शीश नवाता हूँ।

हर दिन देखता हूँ एक व्यक्ति सुबह-शाम वहीं मंदिर में सेवा करते हुए दिखाई देता है। आज भी कथा  पंडाल में जाने से पहले जब मंदिर गया तो वह व्यक्ति मुझे वहीं पर उसी सेवाभाव से सेवारत दिखाई दिया था। मैं जब भी इस मंदिर में शीश नवाता हूँ  तो न जाने क्यूँ मन ही मन उस व्यक्ति के सेवा और समर्पण भाव को देखकर उनके आदर में सिर स्वतः ही झुक जाता है। सम्मान और यशोगान का यह समारोह खत्म हो चुका था। माइक से  अभी तक मंदिर से और उस भागवत कथा आयोजन से  जुड़े हर व्यक्ति को मंच से सम्मानित किया जा चुका था, लेकिन उस निष्काम सेवक की  जैसे किसी को याद ही नहीं रह गई थी।

 मैं बहुत व्यथित हो रहा था। इंतजार लम्बा खींचता चला जा रहा था और मेरे अंतर्मन में  एक विद्रोही भाव जाग गया था। मुझे लग रहा था कि मैं मंच तक चला जाऊं और प्रधान जी से  चुपके से कह दूँ कि आपने सभी को सम्मानित करवा दिया ,अपना भी यशोगान करवा लिया, इसमें मुझे कोई आपति नहीं लेकिन जो व्यक्ति अपना घर छोड़ कर चौबीस घंटे मंदिर में रहकर निष्काम भाव से सेवाएं दे रहा है, क्या वह किसी सम्मान का अधिकारी नहीं है ?  पता नहीं मैं तीन-चार बार उठता-उठता बैठ गया। मन में आ जाता कि पता नी इन लोगों को बुरा लगेगा। वैसे भी मैं न तो उस भागवत कमेटी से  जुड़ा था और न ही मंदिर में माथा टेकने और प्रसाद ग्रहण करने के अलावा मेरा कोई और योगदान था। इसी बीच मेरा ध्यान भगवान् शिव की ओर गया जिनके चरणों में यह भला मानुष हर पल रहता है, मैंने मन ही मन भगवान से प्रश्न किया कि  हे ईश्वर।

क्या इस भरी सभा में इस नेक व्यक्ति की अनदेखी की अनुभूति जैसी मुझे हो रही है, किसी और को भी हो रही है क्या ? और अगर किसी और को न भी हो  रही है तो क्या मैं गलत तो नहीं सोच रहा हूँ। और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो कृपा करके मेरी प्रार्थना को सुन लो। मेरी आस्था को आज मरने से बचा लो। हे भगवान! इन आयोजकों का ध्यान इस व्यक्ति की ओर आकृष्ट करवा दो। अगर इस सेवा भाव को आज सम्मान नहीं मिला तो फिर मेरा इश्वर की भक्ति और शक्ति से शायद विश्वास उठ जाए। मैं  मानसिक प्रार्थना करते-करते ही बीच-बीच में उस व्यक्ति को देख रहा था जो मंदिर के बाहर हर दिन की भांति आज भी अपने सेवा कार्य में व्यस्त था, उसके चेहरे पर अब भी व्ही संतुष्टि और स्नेह का भाव व्याप्त था जो हर दिन मैं सुबह-शाम देखता था। मैंने आँखें बंद कर ली थी और भगवन से मूक प्रार्थना करने लग गया था। मैं उस भीड़ से  जैसे  बेखबर हो गया था। कुछ समय बाद मुझे चेतना आई जब साथ बैठे व्यक्ति की बाजू ने मुझे स्पर्श किया। मेरी आँखे खुली तो देखा वह भला मानुष धीरे-धीरे मंच की ओर जा रहा था और मंच से प्रधान जी उनका नाम पुकार रहे थे और क्षमा याचना कर रहे थे कि उनकी भूल को माफ़ कर दें, और साथ ही कह रहे थे कि मंदिर के मुख्य सेवादार जी को कथा व्यास अपने हाथों सम्मानित करेंगे।

                       पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था। मुझे नहीं पता ये उस व्यक्ति की निष्काम सेवा का परिणाम था या मेरी उस मूक प्रार्थना का, लेकिन जो भी हो माईक सि उस पुन्य आत्मा के नाम के साथ मुख्य सेवादार शब्द सुनते और उसे सम्मानित होते देख आज भगवन के अस्तित्व में मेरी आस्था और विश्वास और भी अटूट हो गया।


                                                                             - धरम चंद धीमान



15 December 2024

कविता- कोरे पन्ने किताब के




जिंदगी ने आज कोरे पन्नों को पढ़ा है,
 जिस पर ना कुछ लिखा था।
बस चारों तरफ सफेद ही सफेद नजर आता था।

जिंदगी में जब धीरे-धीरे से पढ़ना शुरू किया,
 तब बहुत कुछ समझ में आया।
जब कलम हाथ में पकड़ी ,
बहुत कुछ हकीकत लिख डाली।

कुछ सच्ची कुछ झूठी ,
न जाने कितना कुछ,
इसमें लिख डाला।
कुछ सच्ची जीवन की घटना है ,
इसमें लिख डाली हैं।

कुछ झूठी खबरों के इसमें आरोप लगा डाले,
 एक ओर कागज का पन्ना,
 हर एक की जिंदगी में कुछ ना कुछ मोड़ लेकर आता है।

कभी तो किसी को कुछ बनाकर छोड़ देता है,
 कभी उसको उसमें ही उलझा कर रखता है।
 यही तो जीवन की सच्चाई है ,
जो हर एक को समझ नहीं आती है।
 जिंदगी ऐसे ही कोरे पन्ने की तरह खाली है ।

जब जिंदगी की हकीकत ,
हर एक इंसान को समझ आती है।
तब वह जिंदगी में कुछ तो अच्छा कर पता है,
 कुछ मुसीबत से लड़ पता है।
उसका हल खोज पता है ,
तब वह धीरे-धीरे सफल हो पता है।


                                                   - रामदेवी करौठिया