साहित्य चक्र

22 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 22 अगस्त 2023





धन्य हैं वे माता पिता
जिन्होंने अपने बच्चों की दोस्ती
अक्षरों से कराई।
ज़ब बच्चे बड़े हुए
तो दोस्त भी बड़े होकर
शब्द बन गये।

बच्चे को बड़ा होते देख कर
आवश्यकताएं बड़ी होने लगीं
दोस्त की अब मजबूरी बन गयी
शब्द से वाक्य बनना पड़ा।

अब वाक्य अपने दोस्त के
साथ साथ मिलकर खेलने लगा.
फिर वाक्य पैराग्राफ,
पाठ,अध्याय की यात्रा
कराते हुये किताबों की दुनिया
उपहार में भेंट कर दी।

इस शर्त के साथ कि
तुम मुझसे दोस्ती मत तोड़ना।
दुनिया की कोई ताकत
तुम्हें तोड़ न पायेगी.
जो मेरा दोस्त बना
उसे दुनिया छोड़ न पायेगी।

ये अक्षर, शब्द, वाक्य
पाठ, अध्याय, की यात्रा
जब किताब तक आ जाती है।
दुनिया की हर मंजिल
अपने आप कदमों में आ जाती है...
फिर हर अक्षर हो जाते हैं चैतन्य
ऐसे बच्चों से माता पिता
भी सदा हो जाते हैं धन्य...


- राधेश विकास


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सहमति के सूत्र


“असहमति पर सहमत” होने के बजाय
अब समय है,“सहमति पर सहमत” होने का।
मत अलग हो सकते हैं,
पर मन अलग नहीं होने चाहिए।
हम सभी परिवर्तन लाने की क्षमता रखते हैं,
लेकिन वह तभी संभव है
जब हम सुनना सीखें,
एक-दूसरे से जुड़ें,
और साथ मिलकर चलने का विकल्प चुनें।
हमें यह नहीं खोजना कि
हम कहाँ और किन विषयों में अलग हैं,
बल्कि उस सूत्र को पकड़ना है
जहाँ हमारी सोच, संवेदनाएँ
और उद्देश्य एक-दूसरे से मिलते हों।
फिर देखिए,
संवाद का स्वर कितना बदल जाता है,
जब तर्क जीतने के लिए नहीं,
समझने के लिए किए जाते हैं।
क्योंकि अंततः,
विश्वास मानिए,
जब संवाद समानता के उस
छोटे से बिंदु से शुरू होता है,
तब समाधान स्वयं रास्ता बना लेते हैं।
क्योंकि “विचारों की एकता से पहले,
हृदयों का जुड़ना आवश्यक है।”


- नरेंद्र मंघनानी


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छद्म

जलेबी टेढ़ी है,
पर मीठी सबको लगती है।
ताड़ बहुत ऊँचा है,
फिर भी अकेला खड़ा है।

पिंजरे में पंछी को
दाना-पानी सब मिलता है,
छत मिलती है, सुकून मिलता है-
पर खुले आसमान को
देखकर वह रोता है।

बनारस में देव बसते हैं,
घाटों पर दीप जलते हैं,
मंदिरों में घंटियाँ बजती हैं-
फिर भी उन्हीं गलियों में
गंदगी है, कारागार भी है।

हर चमक रोशनी नहीं,
हर ऊँचाई कामयाबी नहीं,
हर सुख आज़ादी नहीं,
साधु के भेष में रावण आता है,
हर बार सीता को हर ले जाता है।


- रोशन कुमार झा


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ज़ब
सवालों का जवाब
सिर्फ लाठी हो जाए।
हिंसा,
दमन,चोरी,
सीनाजोरी परिपाटी हो जाए।
चारों
तरफ ठहाके हों
आततायी अठ्ठाहासों को,
तब
लोकतंत्र की रक्षा में
हर हाथ में लुकाठी हो जाये।


- राधेश विकास


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उम्र का आखिरी वसंत

वह जवानी में पीस लेती थी ,
मन भर अनाज...
लीप लेती थी आंगन,
पोत लेती थीं कच्ची दीवारें,
सांझ होने से पहले,
जला लेती थी आले में रखी डिबिया...
लेकिन उम्र के आखिरी वसंत में,
ढूँढती है लाठी का सहारा...
नंगे पैर खुद को व्यवस्थित करते हुए,
निहारती है गीले छप्पर पर उगती हुई बेल,
कुछ खरपतवार...
जैसे उसकी ममता,
राह निहारती है कि लौटकर आएंगे
वो परिंदे जो बरसों पहले,
उसे अकेला छोड़कर सीमा के पार उड़ गए थे।
काई लगे गलियारे...
उन पर फिसलते हुए आँसू
और उनके ना लौटकर आने वाली टीस...
झुर्रियों में पड़े हुए प्रतीक्षा के घाव
ये जर्जर हुआ शरीर
उम्र का आखिरी वसंत और आखिरी सांसे...


- मंजू सागर


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तस्वीरों से झाँकती जिंदगी,
अतीत की याद दिलाती है।
वर्तमान में मुस्कुराती वह,
भविष्य के लिए पथ बनाती है।

अंतर्मन की पीड़ा को छुपाकर
दुनिया को भरमाती है।
स्याह सफेद से भी इतर रंग
दुनिया को दिखाती है।

तस्वीरों से जो तौले जिंदगी,
उनपर ये हँसती जाती है,
लम्हों में जी ले जिंदगी को
यह हुनर आजमाती है।

काश की खींच सकूँ कुछ ऐसी तस्वीरें
जो मन का आईना बन जाए,
सिर्फ चेहरे की सुंदरता ही नहीं
मन के हर भावों से रूबरू हमें करवाए।

प्रेम रहे स्वयं से तो
तस्वीरें भी खिलखिल जाती है,
खींच लेती वह फूलों सी
मुस्कुराती जिंदगी
और स्वयं से आँख मिचौली कर जाती है।


- रूचिका राय


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तब बहुत याद आऊँगा

जाना तो है ही एक दिन,
मैं भी चला जाऊँगा...
जैसे सब चले गए।
हाँ इक रोज़,
सुबह, दोपहर या शाम,
चाहे करता रहूँ कोई भी काम,
या खटिया पर सोए,
करता रहूँ आराम।

तुम सजती-सँवरती रहना,
आईने में अपनी छवि
निहारते हुए इतराती रहना।
अपने यौवन का निखार देख,
मंद-मंद मुस्कुराती रहना।

कभी कानों पर जुल्फों को सँभालते,
कानों की बाली को देखते,
कभी नाक की फूल वाली कील देख,
धड़कनों को घटाती-बढ़ाती रहना।

नैन-नक़्श की उन तारीफ़ों को,
जो कभी तुमने सुनी थीं मुझसे,
उन्हें याद कर मुस्काती रहना।

तुम बैठी रहना यह ग़ुरूर लिए
कि तुम्हें चाहने वाले तो बहुत हैं,
मगर मुझ तक प्यार का एहसास
न पहुँचने देना... न पहुँचने देना।

मगर कोई बात नहीं,
जाना तो है ही एक दिन,
मैं भी चला जाऊँगा...
तब बहुत याद आऊँगा,
हाँ... तब बहुत याद आऊँगा।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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उम्मीद और हौसला

उम्मीद और हौसला दोनों का होना है जरूरी
जीवन जीने के वास्ते, ये दोनों बिना है अधूरी
उम्मीद यदि है किसी से तो, जीने की ललक बढती है
मन में हौसला रखकर, उम्मीद को पूरी करने होती है।

लेकिन एक बात का और है, हमें ख्याल रखना
उम्मीद किसी से उतना ही रखना, जितने सकोगे सहना
क्योंकि उम्मीद को तोड़ने में, लोगों के देर नहीं है लगती
हाँ, कहकर पलभर मे ही बाजी है पलट देती।

हौसला जिसने खुद को मजबूत है बनाये रखा
उसके वास्ते, कोई भी कार्य उसने आसानी ही देखा
फिर भी चुन्नू कवि कहते है ये बाते सदा
जीवन मे वहीं आगे बढा, जो उम्मीद और हौसला बनाये रखा।


- चुन्नू साहा


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गर्वित होकर जिंदगी

गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

जीवन की हर राह पर, सच्चाई का साथ।
मन में रखिए प्रेम को, हाथों में हो हाथ।
कर्मों से पहचान हो, निर्मल हो हर लेख-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

बीते कल की भूल से, सीखें नया प्रकाश।
मेहनत को आधार दें, मन में रखें विश्वास।
आँधी आए राह में, मुड़कर के मत देख-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

दीन-दुखी के दर्द को, अपना समझें पीर।
नेकी की राहों चले, बनकर सदा फकीर।
जिसके कारण मुस्कुरा, दुखता चेहरा एक-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

ज्ञान-दीप जलता रहे, मिटे जगत अंधकार।
वाणी में मधुरता रहे, कर्मों में संस्कार।
शब्द-शब्द में सत्य हो, भाव रहें आलेख-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

नाम नहीं बस काम से, जीवन हो पहचान।
अपने अच्छे कर्म से, बढ़े देश का मान।
जग में जब तक साँस हो, रखते रहें विवेक-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

माटी से उठकर सदा, माटी का रखिए मान।
अपनों के सुख-दुख में, बनिए सच्चे इंसान।
जीवन ऐसा छोड़िए, याद करे हर एक-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।


- डॉ. सत्यवान सौरभ


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आज रचे नव भोर में

आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

नई सुबह की रोशनी, लेकर आए आस।
मन में प्रेम जगाइए, हर चेहरे पर हास।
मिल-जुलकर हम गढ़ सकें, सुंदर जग की रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

बीती रातें छोड़कर, आगे बढ़ते मीत।
सत्य-धर्म की राह पर, चलो जलाएँ दीप।
नव सपनों को दे चलें, मेहनत की संगीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

जाति-धर्म की बात सब, मन से कर दें दूर।
मानवता के रंग में, मिल हो हम भरपूर।
प्रेम बने पहचान अब, मिटे भेद की रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

शब्दों में हो माधुर्य, कर्मों में हो नेह।
दुख में साथी हम बने, सुख में बाँटें स्नेह।
हर आँगन में गूँज हो, खुशियों की नव रीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

ज्ञान-विज्ञान के साथ में, संस्कारों का मान।
नई सोच के संग रहे, अपनी मिट्टी शान।
प्रगति करे संसार पर, बची रहे मन प्रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

नारी को सम्मान दें, बच्चों को दें ज्ञान।
श्रमिक के श्रम का करें, दिल से हम सम्मान।
समानता के दीप से, जगमग हो हर जीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

प्रकृति हमारी माँ सरी, इसका रखें खयाल।
नदियाँ, वन, पर्वतों से, पूछें उनका हाल।
हरियाली के साथ हो, जीवन की संगीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

मन में आशा, आँख में, सपनों की सौगात।
हाथों में विश्वास हो, किस्मत का हो साथ।
सौरभ प्रेम-सद्भाव से, महके जीवन-रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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आज सब भारतीय हैं...
कल से फिर धर्म, जाति,
संप्रदाय की बेड़ियों में जकड़े होंगे....
और मुल्ले, कटुए, जिहादी,
भंगी, और चमार कहलायेंगे....
आज अशफ़ाक़ और बिस्मिल की मिसालें दी जाएंगी...
कल फिर किसी अशफ़ाक़ और
अब्दुल की दाढ़ी नोच कर मॉब लिंचिंग की जाएगी,
आज भारत माता की वंदना की जाएगी,
कल फिर किसी महिला की इज़्ज़त तार तार की जाएगी....
आज हम सब भारतीय हैं गाया जाएगा,
कल फिर किसी को छोटी जात वाला बोल कर
एक ही गिलास से पानी पीने और
घोड़े पर बैठने को लेकर मार दिया जायेगा.....
आज सब स्कूलों में एकता और
अखंडता का पाठ पढ़ाया जाएगा,
कल फिर किसी टीचर द्वारा किसी बच्चे के धर्म और
जाति के आधार पर भेदभाव किया जायेगा...
आज सारे नेता उजले लिबास में देशप्रेम से ओत प्रोत होंगे,
कल फिर बेईमानी, चोरी और घोटाले में व्यस्त होंगे..
आज अधिकारी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की कसमें खाएंगे,
कल फिर चंद रुपयों के लिए किसी गरीब,
ज़िंदा को मुर्दा दिखा कर ज़मीन हड़प जाएंगे.....


- अज़ीम


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स्वतंत्रता के दस पर्यायवाची शब्दों का समायोजन

गुलामी के जंजीर को अब है तोड़ने,
आजाद है हम, हम आये है आजादी लेने।

पराधीनता हमें कभी स्वीकार नहीं करना,
स्वाधीनता का है,अब हमें अधिकार पाना।

बंधनों में कब तक बंधे रहेगे, बताओ भला,
मुक्ति का मार्ग को प्रशस्त तो ही मुसीबत टला।

स्वाययता, स्वतंत्रता के बराबर ही है बतलाता
मिले यदि स्वाययता तो ऐ अच्छी समझौता।

जीवन में जीने वास्ते, आवश्यक है स्वच्छंदता
बिना रोक टोक के काम आसानी से है होता।

रिहाई ही अपराध बोध को है कम करता
वर्ना सजा से तो जीवन नर्क है बन जाता।

जीव जगत में आना जाना, निरंतर है बंधा
मोक्ष मिली यदि तो, बात है एकदम जुदा।

स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है इसे मानो
लिये हो जन्म धरा पर तो, स्वराज को तू मानो।

मुक्तिलाभ सबको सरल भाव से नही मिलती
इसे पाने हेतु कठिन राह से गुजरना ह पड़ती।

मनमानी कर लेना आसान नहीं, और ठीक भी नहीं
परेशानियों का आमंत्रण है, और काम बिगाड़े भी कही कही।


- चुन्नू साहा


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गायेगें आज आजादी की तराणा

हँसने खेलने की है ये। अपनी जिन्दगानी
वन्दगी है सब भाई बहन जो है हिन्दुस्तानी
प्रेम भाव से करता हूँ देश को नमस्कार
पावन देवभूमि है जम्बू दीप ये हमार
अस्सी वर्ष की है ये हमारी जन्म की आजादी
अक्रान्ता के द्वारा हो गई इस धरती की बर्बादी
वीर शहीदों को करता हूँ नित्य ही प्रणाम
जिन्होंने शहादत देकर दी है अपनी आवाम
इस धरती की मिट्टी हेतु हाजिर है हमारी कुर्बानी
माँ भारती के लिये कर देगें शहीद अपनी जवानी
कसम खाते हैं स्वाधीनता के लिये हजारों बार
मिल कर करेगें अपने दुश्मन पे बार बार प्रहार
उन गद्दारों से बच कर रहना है मेरे देश के साथी
दिखला रहा है दो दाँत बन कर ये सब हाथी
दिल में छुपाये है बैरी दुश्मन से गहरा प्यार
राष्ट्र हित में करना है ऐसे जयचन्दों पे वार
माँ भारती के हैं हम सच्चे वीर राष्ट्रभक्त सपूत
मिटा देगें जो भी बनेगें माँ भारती के कपूत
हम पर बुरी नजर ना रख ओ नादान जमाना
सीने में भर देगें हम भारतीय गोली का नजराना


- उदय किशोर साह

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