अगर पुरुषों के पीरियड्स आते,
तो यक़ीनन दुनिया बड़ी संवेदनशील होती
हर महीने चार दिन
ऑफिस में “Menstrual Leave” होती,
और दर्द को “मूड स्विंग” कहकर
हँसी में नहीं उड़ाया जाता।
चाय की प्याली के साथ
दर्द की दवा भी मिलती,
और पत्नी बड़े प्यार से कहती यह बात
“आज आराम कर लो,
घर का काम मैं कर लूँगी।”
टीवी पर विज्ञापन आते
“हर पुरुष का हक़ है,
इन दिनों खुलकर जीना!”
और विज्ञापन के अंत में
कोई सुंदर-सी मॉडल नहीं,
एक डॉक्टर समझाती
“यह प्राकृतिक है।”
स्कूलों में लड़कों को पढ़ाया जाता
“इन दिनों शरीर का विशेष ख़याल रखें,”
और कोई अध्यापक
उन्हें शर्मिंदा करने के बजाय
सहानुभूति सिखाता।
मंदिर के बाहर कोई बोर्ड न होता
“इन दिनों प्रवेश वर्जित।”
बल्कि शायद पुजारी कहते
“ईश्वर ने ही शरीर दिया है,
उसके नियमों पर
मनुष्य की पाबंदी कैसी?”
औरत तब मुस्कुराकर पूछती
“अब समझे साहब,
हर महीने दर्द में भी
रोटी क्यों बनती है?”
शायद तब
उसकी “ना” को आलस नहीं,
उसकी थकान को बहाना नहीं,
और उसके दर्द को
नखरा नहीं कहा जाता।
और सबसे मज़ेदार बात
जिस समाज ने सदियों तक
स्त्री के दर्द पर
चुप्पी की चादर डाल रखी है,
वही समाज शायद
पुरुषों के लिए
“पीरियड्स सेल्फ-केयर किट”
सरकारी योजना में बाँटता।
काश, पुरुषों के भी पीरियड्स आते…
तो शायद ...स्त्री को बराबरी माँगनी नहीं पड़ती
दुनिया खुद समझ जाती
कि दर्द का कोई लिंग नहीं होता,
बस समाज ने उसकी भी जाति बना रखी है।
- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
*****
संस्कार की जननी है बहन!
मां के बाद
सबसे निश्चल प्यार
करने वाली होती है
बहन
सुख दुःख की
सच्ची साथी है
बहन
बहन वो एहसास है
जो कभी भुलाया
नहीं जा सकती
किसी से भी
संस्कार की
जननी है बहन
रक्षा का सूत्र
उसके होने का
प्रतीक है
भाई के सही
रास्ते पर चलने
का दृढ़ निश्चय
प्रतिज्ञा है
जीवन तो
बिना भाई के भी
जिया जा सकता है
बिना बहन के भी
जिया जा सकता है
जीवन
बहन वो एहसास है
जो कभी
विस्मृत नहीं हो सकती।
- मनोज कौशल
*****
मुंहबोले रिश्तों की नदी
जिन भाइयों की सूनी है कलाई,
जिन बहनों का नहीं कोई भाई,
आज बहुत होती होगी ललक उनमें,
मन में होती होगी कुछ अधूरेपन की कसक।
अगर होते भैया, या होती बहना,
तो मनाते हम भी ये दिन खास।
हम भी कसमें खाते,
बहनों को डोली में बिठाते,
हँसते-खेलते करते उन्हें विदा,
लड़ते-झगड़ते, पर होते नहीं कभी जुदा।
बहना भी सोचती होगी-
गर भैया होते,
तो फिर न होती कोई कमी।
होते पिता जैसे,
या फिर लाड़ले बेटे से,
मिलता उनसे संबल,
जीवन में हर पल।
राह नहीं तकना होता,
की कोई बढ़ाए हाथ,
बस करते मन मानी अपनी,
कह देते दिल की हर बात।
यही तो भाग्य का खेल है-
कोई अपने रिश्ते को खोजे,
किसी के लिए रिश्ते बस खेल हैं।
फिर भी हार कहाँ मानी हमने,
मुंहबोला भाई है,
मुंहबोली बहना है।
रिश्ते खून से ही नहीं,
दिल से भी बनते हैं।
अब रिश्तों की इस नदी को
यूँ ही बहते रहना है,
स्नेह की धारा में
हर मन को कहते रहना है।
- रोशन कुमार झा
*****
कौड़ियों के मोल
जिन्दगी के लम्हे पहले से ही बहुत कम हैं,
इन्हें लापरवाही से और ख़र्च न कीजिए।
सड़कें हैं जीवन आधार इनका फायदा लीजिए ,
रफ्तार से इन्हें मौत के कुएं में न तब्दील कीजिए।
माना कि रफ्तार के शौकीन हो आप,
इस शौक से जिंदगी को शोक में न बदल दीजिए।
फिर कहां मिलेगी ये हसीन दुनिया,
लापरवाही में जन्नत को दोज़ख न कीजिए।
कोई पलकें बिछाकर करता हैं इंतजार,
उस इंतजार को न लौटने वाला न कीजिए।
खुद तो भुगते हैं की अपनी गलतियों की सज़ा,
अपने कर्मों की सज़ा गैरों को न भुगतने दीजिए।
राह पैमाई के कायदे कानून हैं, अपनाइए उन्हें ,
यूँ जिंदगी को कौड़ियों के भाव में खो न दीजिए।
- राज कुमार कौंडल
*****
प्रकृति की लीला
नेपाल में बाढ़ आई,
अश्रुओं का सैलाब लिए,
प्रकृति इतनी रूठी हुई,
कि अपने ही प्यारों को
काल के गाल में समा गई।
वक्त था खौफ़ से भरा,
कोई मरा यहाँ,
कोई पड़ा अधमरा।
चारों ओर पसरा था
मौत का सन्नाटा,
हर आँख में दर्द था,
हर दिल में था मातम गहरा।
यही तो लीला है
सृजन और विध्वंस की,
नियति के आगे भला
किसका बस चले?
अब धीरज धरो,
न शोक में डूबो,
जीवन का नाम ही है-
चलते रहना,
गिरकर फिर संभलना
और आगे बढ़ते रहना।
पर कैसी विडंबना है इस जीवन की-
कहीं बेगुनाहों को मिलती सज़ा,
तो कहीं गुनाहगार
पाते हैं इनाम।
यही जीवन की सच्चाई है,
यही नियति का विधान-
कभी आँसू, कभी मुस्कान,
कभी सृजन, कभी विध्वंस,
और फिर भी चलता रहता है
जीवन का कारवाँ।
- रोशन कुमार झा
नेपाल में बाढ़ आई,
अश्रुओं का सैलाब लिए,
प्रकृति इतनी रूठी हुई,
कि अपने ही प्यारों को
काल के गाल में समा गई।
वक्त था खौफ़ से भरा,
कोई मरा यहाँ,
कोई पड़ा अधमरा।
चारों ओर पसरा था
मौत का सन्नाटा,
हर आँख में दर्द था,
हर दिल में था मातम गहरा।
यही तो लीला है
सृजन और विध्वंस की,
नियति के आगे भला
किसका बस चले?
अब धीरज धरो,
न शोक में डूबो,
जीवन का नाम ही है-
चलते रहना,
गिरकर फिर संभलना
और आगे बढ़ते रहना।
पर कैसी विडंबना है इस जीवन की-
कहीं बेगुनाहों को मिलती सज़ा,
तो कहीं गुनाहगार
पाते हैं इनाम।
यही जीवन की सच्चाई है,
यही नियति का विधान-
कभी आँसू, कभी मुस्कान,
कभी सृजन, कभी विध्वंस,
और फिर भी चलता रहता है
जीवन का कारवाँ।
- रोशन कुमार झा
*****
अंतिम मित्र
आखिरी दोस्त
आखिरी उम्मीद हो तुम।
जीवन के अंतिम अध्याय की
अंतिम कड़ी हो तुम।
मोह का पाश नहीं
स्नेह का अंतिम चरण हो तुम।
मेरे अंतिम जीवन की
अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम।
मेरे अधूरे जीवन की
अंतिम मुस्कुराहट हो तुम।
सब कुछ खो जाने के बाद भी
मेरे अंतिम जीवन का
मधुर एहसास हो तुम।
थक सा गया था मैं
युगों के इंतजार के बाद
मेरे अंतिम जीवन के
अंतिम समय का
मोक्ष का आधार हो तुम।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
फौजी की बहन
आ ना सकेगे बहना राखी में अभी घर
सरहद में तनाव है, गश्त है आठों पहर
तू उदास ना हो बहना, राखी भेज देना
एक नहीं अनेक राखी, भेजना तू बहना।
मेरे जैसा तेरे यहाँ बहना, है अनेक भाई
राखी त्यौहार में घर ना आने की उदासी है,
छाई कुछ भाईयों की तो, बहना नहीं है बहन
राखी में उन सबों का उदास रहता है मन।
तू सबके वास्ते बहना, राखी ढेर सारी भेजना
बाँध तेरे राखी को बहना, उमंग से है भरना
यहां सरहद किनारे तेरी जैसी है, अनेक बहना
उन्हीं सबों से ही हमसब को है, राखी बंधाना।
उन सबों में ही तेरी ही परछाई देख लेता हूं
बांधती है जब वो हमें राखी, भावुक होता हूं
और एक बात बहना कि राखी तू उसे बाँध देना
जो उदास बैठा है कोई भाई, जिसे ना है बहना।
- चुन्नू साहा
*****
प्रेम डोर
उपहार ही नहीं रक्षाबंधन प्यार की निशानी है,
राखी भाई बहन के प्रेम अमिट निशानी है।
निश्चल प्रेम तो परमात्मा की निशानी है,
राखी के कच्चे धागों में प्रेम प्रभु की निशानी है।
इस भाग दौड़ के वक्त में सुकून की निशानी है,
रक्षाबंधन तो भाई बहन के दिल की कहानी है।
दौलत की नहीं इसमें जज्बातों की खुश्बू लानी है,
हर तरफ इन कच्चे धागों की महक बिखरानी है।
दिखावा नहीं सादगी की थाल सजानी है,
भाई बहन की ये रस्म सदियों तक निभानी है।
बहनों की इस प्रेम डोर का कोई सानी नहीं है,
हर दुख दर्द जो बांट ले रक्षा बंधन वो कहानी है।
- राज कुमार कौंडल
*****
क्षणिका
गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी...।
- सविता सिंह मीरा
गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी...।
- सविता सिंह मीरा
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प्रेम की आँखें अलग होती हैं
प्रेम की आँखें
चेहरा नहीं देखतीं,
भाव पढ़ती हैं।
वे कमियाँ नहीं गिनतीं,
उनके पीछे छिपी मजबूरियाँ समझती हैं।
दुनिया जहाँ कहती है,
“इसमें क्या खास है?”
प्रेम वहाँ मुस्कुराकर कहता है,
“मेरे लिए तो यही सबसे खास है।”
जिसे प्रेम मिल जाता है,
उसे बदलने की नहीं,
समझे जाने की जरूरत होती है।
क्योंकि प्रेम की आँखें
व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों से नहीं,
उसकी पूरी कहानी के साथ देखती हैं।
यही प्रेम है।
- नरेंद्र मंघनानी
प्रेम की आँखें
चेहरा नहीं देखतीं,
भाव पढ़ती हैं।
वे कमियाँ नहीं गिनतीं,
उनके पीछे छिपी मजबूरियाँ समझती हैं।
दुनिया जहाँ कहती है,
“इसमें क्या खास है?”
प्रेम वहाँ मुस्कुराकर कहता है,
“मेरे लिए तो यही सबसे खास है।”
जिसे प्रेम मिल जाता है,
उसे बदलने की नहीं,
समझे जाने की जरूरत होती है।
क्योंकि प्रेम की आँखें
व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों से नहीं,
उसकी पूरी कहानी के साथ देखती हैं।
यही प्रेम है।
- नरेंद्र मंघनानी
*****

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