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04 January 2026

लघुकथाः तसल्ली


शाम के तकरीबन 7 बज रहे थे। आज़ की पांचवीं पार्सल डिलीवरी कर तेज़ी से वापस स्टोर की ओर लौट रहा था। आमतौर पर शाम के इस वक्त लाल बिल्डिंग चौक और भालोटिया रोड पर भीड़ अपने शबाब पर होती है। लेकिन रोजाना ऐसे माहौल से गुज़रकर बाइक को सलीके से पार करने की हममें दक्षता आ गई है। सभी राइडर्स इस जगह को जल्दी से पार कर जाने पर खुद को विजयी महसूस करते हैं।





मैं भी लाल बिल्डिंग चौक पार कर विजयी मुस्कान के साथ आदित्यपुर-कांड्रा एक्सप्रेस वे पर चढ़ते ही एक उत्तेजना के साथ एक्सीलेटर को कसता चला गया। अभी केडिया चौक पार करने ही वाला था कि अचानक से मेरी नज़र उस छोटे से मासूम पिल्ले पर पड़ी जो डिवाइडर के बीच में खड़ा कभी इस ओर की सड़क तो कभी उस ओर की सड़क पर आधा कूदकर जाता, फिर तेज़ रफ़्तार गाड़ियों का रेला देखकर डर से वापस डिवाइडर पर चढ़ जाता।

मैं अपनी तेज़ रफ़्तार के कारण थोड़ा-सा आगे बढ़ चुका था लेकिन महज़ तीन-चार सेकेंड के भीतर जो मेरे मानस पटल पर कौंधा उसने मुझे बाइक रोकने पर मजबूर कर दिया। मुझे अपने मार्ग गुरू का वो कथन याद आ गया जिसमें कहा गया है कि पातक यानि पाप के तीन स्तर होते हैं। ऐसा काम जो नहीं करना चाहिए वो कर दिया।

उदाहरणार्थ किसी की हत्या करना,हाथ काट देना या चोरी करना आदि पातक की श्रेणी में आते हैं। दूसरे स्तर का पाप है अतिपातक! मतलब ऐसा काम जो करना चाहिए था और नहीं किया वह अतिपातक है। जैसे किसी जरूरतमंद या बेबस इंसान की मदद करनी चाहिए थी और मौके पर मौजूद रहकर भी नहीं किया तो यह अतिपातक है।

तीसरे स्तर का पाप ऐसे कार्य को कहा जाता है जो एक उदाहरण छोड़ जाता है। आने वाले समय में भी उससे लोग प्रेरित होकर उसकी युगों-युगों तक पुनरावृत्ति करते हैं।इसे कहा जाता है महापातक! उदाहरणार्थ रावण ने साधु के वेश में आकर सीता का हरण किया। यदि वह अपने असली रूप में आकर सीता का हरण करता तो यह केवल पातक होता।

लेकिन चूंकि उसने साधु के वेश में सीता का हरण किया तो उसने समाज में एक नया तरीका ईजाद कर दिया अपहरण का कि इस प्रकार वेश बदलकर भी अपहरण किया जा सकता है। जिसकी पुनरावृत्ति अपराधी लोग युगों-युगों तक करते आ रहे हैं।





खैर बाइक रोकने से पहले के करीब तीन-चार सेकेंड में मेरे दिमाग ने अहसास कर लिया था कि मैं क्या कर रहा हूं। उस मासूम से पिल्ले के लिए मेरे कुछ मिनट देना कर्तव्य है जिससे उसकी जान बच सकती है। वरना हो सकता है रोड पर सरपट दौड़ती गाड़ियां क्या पता उतनी संजीदगी न दिखाएं और उसे रौंदते हुए चले जाएं। शाय़द उसे मेरी ज़रूरत है और ऐसे में मैं नहीं रुका तो यह द्वितीय श्रेणी का पाप यानि अतिपातक हो जाएगा। और यूं भी यह मेरी पार्ट टाइम जॉब है, थोड़ा वक्त बर्बाद भी हो गया तो क्या ही हो जाएगा।

मैं बाइक खड़ी कर सीधे डिवाइडर पर जा पहुंचा। एक बार लगा कि पकड़ कर सीधे उसे सर्विस लेन के बाहर छोड़ आऊं। लेकिन वह बिल्कुल भी छोटा नहीं था इसलिए थोड़ा सा डर भी था कि कहीं काट न ले मुझे। मुझे अपनी ओर बढ़ता देख वह फ़िर से कभी सड़क पर तो कभी डिवाइडर पर भागदौड़ करने लगा। क़रीब दस मिनट तक मैं उससे कबड्डी-कबड्डी खेलकर परेशान हो चुका था। इस बीच मुझे देखकर एक फल बेचकर लौट रहे ठेले वाले ने भी अपना ठेला किनारे लगाकर मेरी मदद करने में जुट गया।






अब हम दो लोग मिलकर उसे एक्सप्रेस वे से बाहर ले जाने की कोशिश करने लगे। लेकिन मजाल है कि वो पिल्ला हमारे इरादे को समझ पाए। इस फेर में यह भी डर था कि हमें देखकर भागते हुए सचमुच किसी गाड़ी की चपेट में आ गया तो "रक्षा में हत्या" हो जाएगी।

क़रीब बीस -पच्चीस मिनट की आपाधापी के बाद वह मुख्य सड़क पर ही खड़ी एक कार के नीचे जाकर दुबक गया। परेशान ठेलेवाले ने हताश होकर मुझसे कहा- "जाने दीजिए भैया! इसको इसका काल खींच रहा है, हमलोग बचा नहीं पाएंगे। मुसीबत ये थी कि दोनों ओर आसपास कोई कटिंग भी नहीं थी जिससे वह पिल्ला मुख्य सड़क से सर्विस लेन पर जा सके। यानि उसे मुख्य सड़क पर ही लगभग आधा किलोमीटर ले जाने के बाद ही कटिंग थी। मैं भी कहां हार मानने वाला था।

उसे किसी तरह कार के नीचे से डांटकर बाहर निकाला। फिर ठेलेवाले की मदद से मुख्य सड़क के ही बिल्कुल किनारे-किनारे कैरी करते हुए उसे गम्हारिया प्रखंड कार्यालय के गेट तक ले गया। वहां से उसे तेज़ी से भगाते हुए कार्यालय कैंपस के काफी भीतर तक खदेड़कर आया। पूरे घटनाक्रम में कड़ाके की ठंड के बावजूद पसीना छूट गया था। लेकिन जब उसे खदेड़कर पैदल अपनी बाइक की ओर लौटने लगा तो हवाओं के साथ ठंड पड़ते पसीने के साथ ही दिल को भी ठंडक पहुंच रही थी। मन में एक तसल्ली थी कि उस पिल्ले की रक्षा का जो अवसर ईश्वर ने प्रदान किया उसे मैंने पूरा किया।






हमारे साथ दैनिक जीवन में न जाने कितने ही ऐसे मौके रोज़ाना आते हैं। कई बार हम उसे हल्के में लेते हुए नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आग्रह है सभी से कि कभी भी ऐसे मौकों को नज़रंदाज़ न करें। जहां आप सक्षम हों और संभव हो तो थोड़ा सा वक्त निकालकर जरूरतमंदों की मदद ज़रूर करें चाहे वो इंसान हों या पशु-पक्षी। दावा करता हूं कि इससे कोई प्रत्यक्ष लाभ तो नहीं होगा लेकिन मन को एक अलौकिक तसल्ली मिलेगी।


- कुणाल


28 October 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 26 अक्टूबर 2025




प्रकृति मां
फूलों से सीखो मुस्कुराना
कांटो से सीखो लड़ना
व्योम से सीखो हृदय की विशालता
धरा से सीखो धैर्य तुम
आदित्य से सीखो निरंतरता
शशि से सीखो अंधेरों से लड़ना
यह प्रकृति मां है
मयूर से सीखो नृत्य
भंवरों से सीखो गायन तुम
नदियों से सीखो सदैव चलते जाना
लहरों से सीखो उमंग एवं उल्लास
झीलों से सीखो शांति
मैदानों से सीखो सहिष्णुता तुम
पहाड़ों से सीखो स्थिरता
पत्थरों से सीखो दृढ़ता तुम
यह प्रकृति मां है
पेड़ों से सीखो परोपकार तुम
वर्षा से सीखो दूसरों को
हर्षित करने का भाव तुम
हवा से अनुकूलन सीखो तुम
जल से एकता सीखो तुम
यह प्रकृति मां है,
मातृवत हमें समझाती है
जो प्रकृति मां के संकेतों को समझ
जीवन में लेता उतार
वह एक सम्मानित एवं
आनंदित जीवन है जीता


- प्रवीण कुमार


*****





बिन स्मार्टफोन ऐसा लगा 

जब से ये स्मार्टफोन हुआ है खराब
तब से हालात अच्छे नहीं हैं जनाब।
बार बार हाथ जेब में है जाता 
फिर क्या वहां बटन वाला पुराना फोन है पाता।
याद बहुत आती है फेसबुक व व्हट्सअप
दुनिया अधुरी सी लगती है क्योंकि
अब नहीं हो पा रही है इन पर कोई गपशप।
आफिस में भी साहब है पूछा करते 
आजकल आप आनलाईन हाजरी क्यों नहीं भरते।
मैं भी सीधा सा जवाब हाजिर कर देता 
स्मार्टफोन तो खराब है पर बटन वाले फोन से ही काम चला लेता।
साथी भी पूछते आप तो पुराने जमाने में चले गए 
दोस्तो ये शौक नहीं मजबूरी के बांध हम पर ढह गए।
शुभ चिंतक फोन करके जरूर पूछते 
आपके संदेश रोज थे आते, आजकल क्यों नहीं भेजते।
खैरियत तो है सब
मैं भी जवाब दे देता सब तो है
खैरियत पर मेरा स्मार्टफोन ठीक नहीं अब।
अब तो व्यक्तित्व भी प्रभावी नहीं लगता 
हर कोई बटन वाला फोन देख अनदेखा है करता।
कोई कंजूस बोलता तो कोई तंज है छोड़ता 
उन्हें क्या पता यारों हमारा स्मार्टफोन तो है
खराब वर्ना वो भी हमें दुनिया से जोड़ता।


- विनोद वर्मा


*****





क़ातिल निकला

वो सनम कैसा जो संगदिल निकला,
भूला सब वादे ऐसा बुज़दिल निकला!

इश्क़ का इम्तिहान कैसे पास करता मैं,
हर सवाल ही उसका मुश्किल निकला!

उम्मीद ए वफ़ा ग़लत लगा बैठे हम,
क्यों नहीं वो मेरे क़ाबिल निकला!

काग़ज़ की डिग्रियां तो बहुत लिये था,
पर दिल के मामले में ज़ाहिल निकला!

गुनाह उसके माफ़ी के लायक नहीं,
वो ख़ुद साज़िशों में शामिल निकला!

ऐतबार था जिसपर सबसे ज़्यादा मुझे,
हाय बेरहम वही मेरा क़ातिल निकला।


- आनन्द कुमार


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यादों की ख़ुशबू

यादों की ख़ुशबू कुछ ऐसी बस जाती है,
जैसे पुरा नी चा दर में महक रह जाती है।
कभी किसी मुस्का न से झाँ क उठती है,
कभी किसी आहट से दि ख जाती है।
वो बीते लम्हें, वो बातें, वो साये,
समय की तहों में जैसे छिप जाती है।

कभी चाँदनी में मुस्कुरा उठती हैं,
कभी बारिश में आँसू बन जाती है।
कभी किसी किताब के पन्ने पलटते हुए,
वो ख़ुशबू दिल को छू जाती है।

जैसे कोई अनकहा किस्सा फिर से,
रूह की गहरा इयों को सुना जाती है।
या दें ना बूढ़ी होतीं, ना मिटती हैं,
वो तो हवा ओं में घुल जा ती हैं।

कभी दर्द बनती, कभी सुकून देती ,
हर सांस के साथ मुस्कुराती हैं।
कभी किसी गीत की धुन में छिपी ,
कभी गुलाब की पंखुरियों सी नर्मी ।
यादों की ये ख़ुशबू की अमर कहानी ,
दिल से दिल तक जाती है।


- यासमीन तरन्नुम कंवल


*****




बस इंसान

ज़ेहनी ज़ंजीरों से आज़ाद हो पाता,
काश इंसान बस इंसान हो पाता।

जन्नत और जहन्नुम के पार हो पाता,
काश इंसान बस इंसान हो पाता।

महफ़िल-ए-ज़िन्दगी में आबाद हो पाता,
काश इंसान बस इंसान हो पाता।

ढूँढे बिन उसे ख़ुदा, भगवान मिल पाता,
काश इंसान बस इंसान हो पाता।


- रविन कुमार


*****




स्नेहपाश

आओ तुमको
अपनी कहानी का पात्र बनाऊ
करे लोग सजदा
तुमको भी मेरे नाम से
ऐसा मुकाम बनाऊ।

कहते हैं लोग
कि मोहब्बत में
बड़ी गहराई होती है
आओ तुम्हें दोस्ती के
समुद्र में डूबाकर भी
तैरना सिखाऊ।

सुना है तुमको
लोगों पर ऐतबार नहीं है
आओ तुमको
स्नेहपाश में बांधकर
अपनेपान का ज़रा
एहसास करवाऊ।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****





कुरूप आदमी भी सुंदर है!!

जब उसके पास धन है
जब उसके पास शोहरत है
जब उसके पास पवार है ।
जब उसके पास नौकरी है
जब उसके पास अच्छी बिजनेस है
जब उसके पास बौद्धिक उपलब्धि है
जब उसके पास सत्ता है।

आदमी सुंदर है,फिर भी कुरूप है।

जब गरीब है ,
जब मुसीबत के करीब है ,
जब झोपड़ी से टपकता पानी है ,
जब टूटे फूटे बर्तन है ,
टूटे फूटे पैरों में चप्पल है ।

बदन में कटे फटे वस्त्र है ,
जब भुखमरी से त्रस्त है ,
हर तरफ बेरोजगारी है ,
पग पग पर लाचारी है।

हर जगह दुत्कारे जाते हो,
हर जगह कुत्तों जैसे पुकारे जाते हो ,
छोटी छोटी बात पर मारे जाते हो,
जब गदहे जैसे खटाए जाते हो,
आवश्कता से अधिक भार उठाए जाते हो।


- सदानंद गाजीपुरी


*****





कसक

एक कसक सी उठती है,
पास बहुत कुछ,पर
कुछ रह सी गई है।

बसंत तो आया है,
परिंदों को साथ नहीं लाया है।

खाए पकवान, भोग छप्पन,
खूब देखे जलसे,
वही फिर घर के हलुआ,और
देशी घी के मलपुए,का स्वाद
रह सा गया है।

घर पर जुटाए ,लाखों के ऐशों आराम,
पर मन करे,मिले खाट जिसपे करूं
विश्राम।

मनाए सभी त्योहार,
बांटी खुशियां,और ढेरों उपहार।

पर रही कसक,उपवास और दान की,
मिल सका ना आशीर्वाद,अपने
माता ,पिता स्वरूप भगवान की।

गुल,गुलशन, बना रही ये नज़ारे खूब,
फिर भी ना जाने ,
वो खुशबू की महक,
फिर वो कसक
रह गई है।


- रोशन कुमार झा


*****



छठ पर्व

छठ पर्व पर प्रेम का अहसास है,
भक्ति, श्रद्धा और विश्वास है।
नदियों का संगम, प्रकृति का श्रृंगार,
हर घर में बजता है अब जय-जयकार।

सूरज देव का यह महा उत्सव है,
हर मन में उमंग, हर दिल में नव रस है।
कार्तिक मास में आता ये त्योहार,
घर-आँगन में होता उजियारा अपार।

मिट्टी के दीए जगमग जलते हैं,
हर दिल में छठ मइया बसते हैं।
भोर भये जब सूरज निकले लाल,
व्रती करें अर्घ्य, झुके हर भाल।

ठेकुआ, फल, फूल, गंगा का जल,
सब अर्पण होता सच्चे मन का फल।
छठ मइया सबकी झोली भर देती हैं,
मन की हर मुराद पूरी कर देती हैं।

सुख-शांति का संदेश ये लाती हैं,
भक्ति की राह दिखा जाती हैं।
हर जीवन में उजियारा भर दे,
छठ मइया सबका जीवन सुंदर कर दे।


- गरिमा लखनवी


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अरिहंत

वह टूटती सी
नेह की पतली लड़ी
स्वप्न के इस पार भी,उस पार भी
सागर किनारे रेत पर खींची हुई
पतली सी एक रेखा सयानी
सिद्धांत सी मुड़ती,लचकती
जब,जहाँ,जिस रूप की
छटपट जरूरत सी
दीवानी वह अभागिन
वह शुचिता स्नेह-तरु सी
नेह की मीता,अपरिणीता
विजय श्री
इस भटकते लाचार से
ब्रम्हांड में किस ओर
अपनी चाँदनी को है छिपाती
हलाहल सी वेदना के पार
एक अरिहंत सी
जीविका अपनी सजाती
वह टूटती सी,नेह की पतली लड़ी
बेचैन सी।


- अनिल कुमार मिश्र


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मेरी सबकुछ तुम...

मेरी गुड डे तुम
मेरी हैप्पी हैप्पी तुम
मेरी ब्रिटानिया तुम
मेरी पारले जी तुम
मेरी ओरियो तुम
मेरी बर्बन तुम
मेरी हाइड एंड सिक तुम
मेरी सनफीस्ट तुम
मेरी मेरीगोल्ड तुम
मेरी डेयरी मिल्क तुम
मेरी फाइव स्टार तुम
मेरी कीट कैट तुम
मेरी हॉर्लिक्स तुम
मेरी कॉम्प्लान तुम
मेरी हर प्लान तुम
मेरी सब कुछ तुम


- मनोज कौशल


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भीड़ और बदलाव

भीड़ से एक आवाज आई,
शहर के बंदर है बहुत खराब!
छीना- झपटी, चोरी-डकैती, लूट-घसूट;
इनका नहीं है कोई जवाब!
चश्मे के बदले चिप्स मांगते हैं,
आपका ही अधिकार देना है आपको;
पर ये रिश्वतखोर गिफ्ट मांगते हैंl

कभी कभी तो इन्होंने छोटे-छोटे
बच्चों तक को अगवा किया है,
अपने भविष्य को बचाने के डर से
हर बार आपने इनको इनका मन चाहा दिया हैl
भीड़ में से किसी ने फिर कहा,
बदल डालो इन बंदरों को,
कही दूर जंगल में छोड़ आओ।

हमें ऐसे मतलबी, बेरहम, स्वार्थी,
रिश्वतखोर बंदर नहीं चाहिए!
शोभा बढ़ाए जो हमारे शहर की;
कही से ऐसे संस्कारी बंदर लाइए।

सब गूंज उठे,
"हां हां इन्हें कही दूर छोड़ आते हैं,
इस बार गांवों से उठाकर नए बंदर लाते हैं।"
काफी सलाह मशवरा हुआ,
सभाएं हुई और फिर एक योजना बनी :
शहर के जो बंदर उत्पाति हैं
उन्हें बाहर निकलना है,
बदले में शरीफ बंदरों को
नगर की शोभा बढ़ाने के लिए,
कही से पकड़ कर लाना है।

कार्यक्रम चालू हुआ,
एक विशेष विभाग को ये कार्य सौंपा गया;
जहां आवश्यकता पड़ी
अध्यापकों, पटवारियों,
अभियंताओं, अन्य कर्मचारियों का
भी सहयोग लिया गया।

कुछ बंदर खुद भाग गए,
कुछ बंदरों को दूसरे बंदरों ने भगा दिया!
कुछ बंदरों को संभलने का मौका ही नहीं मिला,
कुछ को उनके लालच ने फंसा दियाl

बहुत पकड़े गए और दूर के जंगलों में छोड़े गए,
पर देखो समय की चाल
ओर बंदरों की बुद्धि का कमाल;
कुछ बंदरों ने स्वयं को नए वातावरण में ढाल लिया,
जो लुटा था वो वापिस करने लगे!
कई जगह तो ऐसे ही लोगों की जेब भरने लगेl
छीना- झपटी छोड़ दी,
राह चलते लोगों को नमस्ते करने लगे।
आखिरकार ये अभियान खत्म हुआ।

अच्छे अच्छे बंदरों को शहर पहुंचा कर,
आम आदमी फिर से अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त हुआ।
आखिरकार काम सरकारी था।
कुछ बंदर सच में बदले गए,
कुछ का भीड़ पर भी प्रभाव भारी था।
अगली गर्मियों में शहर सैलानियों से फिर खुशहाल हुआ,
धीरे धीरे बंदरों का फिर से वही हाल हुआ।

बंदर तो आखिर बंदर हैं;
लूट–पाट से कहा मानेंगे ?
आप बदलो कितना,
नए बंदर लूटने के नए विधान निकलेंगे।
कुछ बचे-पुराने बंदरों ने,
नए बंदरों को भी सीखा डाला,
नए बंदरों ने नई तकनीक को
बीच में घुसा डाला।

लूट को भी हाईटेक बनाकर,
पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ डाला।
भीड़ से फिर आवाजें आने लगी,
सरकार इन बंदरो को बदलने की
फिर योजना बनाने लगी।
ये सिलसिला, यूं ही चलता रहेगा,
भीड़ में से कोई न कोई लूटता रहेगा।
खैर! भीड़ भी कभी तो समझ पाएगी,
बंदरों को बदलने के साथ-साथ,
खुद को भी बदल पाएगी।


- अशोक कुमार


*****




समझदार हो तुम

फिर मेरे हिस्से में आया,
कोई समझौता नया।
किसी ने कहा-
“तुम तो बहुत समझदार हो…”

मैं मुस्करा दिया,
जैसे यह तारीफ़ नहीं,
एक निर्णय हो-
कि अब मुझे महसूस नहीं करना चाहिए।

समझदार लोग
रोते नहीं,
सिर्फ़ मुस्कराते हैं
और भीतर धीरे-धीरे
मरते रहते हैं।

वे तर्कों में ढूँढ़ते हैं सुकून,
जवाबों में छिपाते हैं आँसू,
और चुप रहना
उनकी आदत बन जाती है।

हर बार जब कोई कहता है-
“तुम समझदार हो,”
मुझे लगता है-
मैं थोड़ा और दूर हो गया हूँ
अपने ही दिल से।


- डॉ. सत्यवान सौरभ


*****






प्रकृति के हृदय की मौन यात्रा
एक दिन यूँ ही निकल जाना-
जब शहर की आवाज़ें थक जाएँ,
और मन किसी अनकही पुकार में भीग जाए।
न कोई योजना, न कोई मंज़िल...
बस एक जिज्ञासा-
दुनिया को महसूस करने की,
प्रकृति की गोद में लौट आने की।
चलना उन पगडंडियों पर
जहाँ मिट्टी अब भी सांस लेती है,
जहाँ ओस की बूँदें सूरज से पहले जागती हैं,
और हवा में पेड़ों की बातें घुली होती हैं।
कभी किसी नदी के पास बैठना-
देखना कैसे वह चट्टानों से टकरा कर
भी गुनगुनाती रहती है।
उसकी लहरों में एक संदेश छिपा होता है-
“रुकना नहीं... बस बहते रहना।”
कभी किसी जंगल के बीच ठहरना,
जहाँ हर पत्ता, हर फूल
अपनी भाषा में बात करता है।
जहाँ मौन भी संगीत है
और शांति भी कविता।
देखना कैसे तितलियाँ रंगों की कक्षा सजाती हैं,
कैसे चींटियाँ अपनी दुनिया रचती हैं-
बिना शिकायत, बिना रुकावट।
वहाँ समझ आएगा कि प्रकृति
सिर्फ़ दृश्य नहीं, एक संवेदना है,
जिसे महसूस किया जाता है-
आँखों से नहीं, आत्मा से।
कभी आसमान को देखना-
वह नीला विस्तार पूछेगा,
“तुम कितनी बार खुद को देखा है?”
और तब समझोगे,
दुनिया की खोज में निकलकर
तुम दरअसल खुद को तलाश रहे हो।
पहाड़ों से सीखो स्थिरता,
नदियों से प्रवाह,
पेड़ों से दान,
और धरती से सहनशीलता।
प्रकृति हर मोड़ पर एक गुरु है,
जो बिना शब्दों के सिखाती है-
कैसे जीना सरल और सच्चा हो सकता है।
एक दिन यूँ ही निकल जाना-
जब मन थक जाए कृत्रिम रोशनियों से,
और चाह ले उस चाँदनी को
जो बिना बिजली के भी उजली है।
जहाँ पक्षियों की बोली अलार्म से बेहतर है,
और सुबह की हवा किसी प्रार्थना-सी लगती है।
चलो... एक दिन यूँ ही निकल चलते हैं-
दुनिया खोजने नहीं,
प्रकृति के हृदय को सुनने,
उसकी नाड़ी को छूने,
उसकी मौन संवेदनाओं को समझने।
क्योंकि जब धरती के आँचल में सिर रखोगे,
तब महसूस होगा-
“दुनिया बाहर नहीं,
हमारे भीतर ही खिली है।”


- आरती कुशवाहा


*****





तबज्जों नहीं देते हैं लोग
अक्सर मेरी बातों को,
गौर नहीं फरमाते हैं
वे मेरी बातों पर,
मैं बोलता रहता हूँ
और सुनाता भी रहता हूँ
फ़िर भी तबज्जों नहीं मिलती
इस जहान में,
मेरी बातों पर,
मेरे जज्बातों पर
कभी-कभी सोचता हूं
और सोचता ही रहता हूं ,
आख़िर तबज्जो क्यों नहीं मिलती ?

मन कचोटता रहता है और
खड़ा करता है-
एक यक्ष प्रश्न मेरे समाने
और मैं भी उसकी तह तक
पहुंचने का प्रयास करता हूं
आख़िर तबज्जो क्यों नहीं मिलती ?

काश! मैं भी बड़ा व्यक्ति होता ,
धनाढ्य होता, अमीर होता
गाड़ी , बंगले, होटल,
रेस्तरां का मालिक होता,
इंडस्ट्रियलिट, सेलिब्रिटी होता
मंत्री, बजंतरी का बेटा होता,
लोग दौड़ते हुए आते,
मुझसे मिलते,
ऑटो ग्राफ लेते,
उसको संजो कर रखते
और प्यार से मेरी बातों को सुनते ,
पर हकीक़त यही है
तबज्जों नहीं देते हैं लोग,
गरीबों को।


- बाबू राम धीमान



*****




26 October 2025

छठ पूजा में घर


यह कहानी तीन भोजपुरी दोस्तों की है जो अलग-अलग शहरों से एक शहर में रहते हैं और काम करते हैं। कल्लू गोरखपुर से, भुअर छपरा से और रघु बक्सर से हैं जो दिल्ली एनसीआर की अलग-अलग कंपनियों में काम करते हैं। वे लगभग तीन साल से एक ही रूम में साथ रहते हैं और भोजपुरी बोलने वाले हैं, इसलिए उनकी दोस्ती और रूम पार्टनरशिप भी है। दिन भर ड्यूटी करने के बाद वे शाम को रूम पर आ जाते हैं। तीनों खुशमिजाज और मिलनसार हैं।




कंपनी से निकलने के बाद वे टेम्पो से अलग-अलग जगहों से एक चौराहे पर पहुंचते हैं और फिर तीनों लोग साथ होकर बस से अपने रहने वाले एरिया तक पहुंचते थे। यह उनकी रोज की दिनचर्या है। एक दिन चौराहे पर दो लोग पहुंच गए, लेकिन रघु को आने में देर हो गई।

कुछ देर बाद वह भी उदास दिखते हुए आता दिखाई दिया। कल्लू ने भुअर से कहा, "हरदम मुस्कराने वाले रघु को क्या हो गया है? वह उदास और धीरे-धीरे नीचे सर किए आ रहा है।"

भुअर ने पूछा, "क्या हुआ है, कुछ बात है तो बताओ हमें भी... कंपनी में कुछ हुआ है या घर में कुछ हो गया है, बोल... बोल ना भाई।"

रघु ने कहा, "कुछ नहीं हुआ है भाई... चलो रूम पर बताता हूं..."

बस में बैठने के बाद पूरे रास्ते किसी ने कुछ नहीं बोला। रूम पर पहुंचकर मुंह हाथ धोने के बाद तीनों बैठ गए। कल्लू ने कहा, "क्या हुआ है, कुछ बताओगे...हमें भी। क्यों उदास हो बताओगे भी कि हमें भी टेंशन में रखोगे... बताओ क्या हुआ है...।"





रघु ने बताया, "भाई, कंपनी से निकलने के बाद टेम्पो में बैठा था, तभी घर से फोन आ गया... सरदार जी जो टेम्पो चलाते थे, उन्होंने भी सुना... बात खत्म होते ही छठ के शारदा सिन्हा जी का गीत बजा दिया... छठ गीत सुनकर रोना आ गया, आंखें डबडबा गईं... सरदार जी ने कहा, 'छठ नजदीक है, घर जाने की छुट्टी कब लोगे हो बिहारी बाबू... मैं भी पटना साहिब का ही हूं...'

टेम्पो के सीसे में चेहरा का भाव देखकर उन्होंने हमसे पूछ लिया, 'बहुत जल्द जाएंगे सरदार जी...'

यह कहकर टेम्पो छोड़ दिया और घर जाने की बात छठ जैसे पर्व में सुनकर मन और दुःखी हो गया लगा अब जितना जल्द छठ पर घर पहुँचे, बिहारी है न भाई। आज छुट्टी का आवेदन ऑफिस में दिया भी है, देखो क्या होता है। छुट्टी मिलेगा तो छठ में जाऊंगा भाई... लगभग 10 महीने हो गए हैं घर से आए हुए ...।"

यह सुनकर भुअर ने भी उदासी भरे आवाज में कहा, "मुझे भी लगभग साल भर हो गया है घर गए हुए। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर बिहार में ही रोजगार होता तो मुझे दिल्ली एनसीआर में नहीं आना पड़ता... भले कम पैसे मिलते, लेकिन पर्व में घर पहुंच जाता आसानी से...।"

कल्लू ने भी अपने आँशुओं को चेहरे से हटाते हुए कहा, "मैं भी अगली छठ में नहीं गया था घर... क्या करें भाई, उत्तर प्रदेश और बिहार के एमपी, एमएलए सोते रहते हैं... अपने से मतलब है उन लोगों को... और जनता भी जातिवाद से ऊपर उठकर रोजगार के लिए वोट करे तो सरकार को भी समझ आए... लेकिन क्या करें, सोचने से क्या होता है, जब तक जनता जागेगी नहीं, तब तक पलायन जारी रहेगा भाई।"






रघु ने लम्बा सांस लेते हुए कहा, "अबकी छुट्टी मिले या न मिले, मैं छठ में घर जाऊंगा...तो जाऊंगा... बताओ, पूरा बिहार जो घर दिवाली में विभिन्न लाइट एवं फूलों से सजाता है, छठ के बाद ही उतारता है... उसकी खुशी... माँ के हाथ का छठ में बना ठेकुआ प्रसाद...जिसका कोई जवाब ही नहीँ, सब साथी, परिवार के सदस्यगण की उपस्थिति... और सबसे मिलने की खुशी... और साथ में मिलकर लिट्टी चोखा बनाना... छठ गीत से गुलजार पूरा बिहार... यह सब सोचकर इतना याद आया है कि अब पक्का घर छठ में पहुंचूंगा चाहे कुछ भी हो... तब जाकर दिल को शुकुन मिलेगा भाई...।"

तीनों दोस्त एक ही स्वर में बोले, "छठ जैसे महापर्व में घर किसी भी हाल में पहुंचेंगे... बोलो जय छठी मईया..."

यह कहकर हंसते हुए घर पहुंचने की तैयारी में तीनों दोस्त लग गए...


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु' / बक्सर, बिहार



06 October 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 6 अक्टूबर 2025




 चलो काम शुरू करते हैं

नए जोश और उत्साह के साथ,
खो जाएं, डूब जाएं, कल्पनाओं के दरिया में,
गहरी डुबकी लगाएं शब्दों के आगोश में,
क्या पता हाथ लग जाएं।

कोई काम का मुद्दा,
बहस शुरु हो जिस पर
चौपाल और चौहटे बाज़ार में
हर खामोश ज़ुबान पर,
शायद रौनक आ जाएं।

तैरने लग जाएं तर्क और वितर्क
मूक वधिर होंठ बोलने लग जाएं
नए उत्साह के साथ
जोश और होश चल पड़े ,
अच्छी शुरुआत से संपन्न होता है।

आधा काम,
कितना दम है इस कहावत में,
समय आ गया है इसको
निकष पर परखने का,
नए जोश और उत्साह के साथ,
आओ करते हैं शुरुआत
नए काम की।


- बाबू राम धीमान


*****


ज़िन्दगी का सफर

चंद लम्हों की ख़ुशी को संभाले कैसे रखे,
टूटे दिल की खामोशी को रज़ा कैसे करे।

सपनों की तामीर में बिखरे हैं हज़ारों शिकवे,
इन अधूरी तम्मनाओं को रिहा कैसे करे।

टूटे ख़्वाबों की चुभन पूछती है हर रात,
इन नमी भरी आँखों को रज़ा कैसे करे।

सपनों की तामीर में बिखरे हज़ारों शिकवे,
इन अधूरी तमन्नाओं को रिहा कैसे करे।

मंज़िलें तो दूर हैं और सफ़र भी तन्हा,
इस थके मुसाफ़िर को कोई आसरा कैसे करे।

दिल के सहरा में हवाएँ भी नहीं चलती अब,
इस सुकून के रेगिस्तान को हरा कैसे करे।

रात के दामन में छुपी सौ ग़म की कहानी,
इन अंधेरों से उजालों का सिलसिला कैसे करे।

हर तरफ़ शोर है दुनिया के बाज़ारों में,
अपने जज़्बात को दिल से सदा कैसे करे।

वक़्त की गर्दिश में बिखर जाती है हर याद,
इस उदासी को ख़ुशी की दुआ कैसे करे।

जिसने छोड़ा है हमें बेवफ़ाई के लिए,
उस निगाहों को फिर से वफ़ा कैसे करे।

ज़िंदगी की इस ग़ज़ल में है सदा दर्द-ओ-सुकून,
"शशि" दिल की ख़ामोशी को रवाँ कैसे करे।


- शशि धर कुमार



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तृप्त कर

आँखें नम, मायूस मन
उतरा चेहरा, लड़खड़ाता पाव
क्या हुआ, जा रहे हो।
तलाश में हो, जो जा रहे हो।
प्लीज़ बोलो ना
क्या चाह रहे हो ?
जिद्दी हो, पागल हो,
आवारा हो, नहीं नहीं
मासूम हो, व्याकुल हो,
दीवाना हो, अब खुश।
कुछ तो बोल, मुँह तो खोल!
ऐ मेरे यार, है तुझसे प्यार
रूठें हो, मनाऊ क्या ?
आगोश तेरे, समाऊ क्या ?
रे ख़ामोशी, चल भाग जा
रे गुमशुदा तू दिल में आ
ये दिल ही मेरा, घर बार है तेरा
ना सोच कुछ, ए नासमझ
जो दिख रहा है, सबकुछ तेरा
हाँ! सबकुछ तेरा
तू याद कर, तनिक प्यार कर
कर बंद आँखें, ले ले आगोश
होके खामोश, महसूस कर
कर शुरू आलिंगन
मुझे तृप्त कर, मुझे तृप्त कर।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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वो दिन कहाँ गए,
जब मिट्टी की सौंधी गंध
मन की थकान हर लेती थी।
आँगन में तुलसी चौरा,
गोबर से लिपी ज़मीन पर
संध्या की दीपशिखा झिलमिला उठती थी।

गाँव की कच्ची गलियों में
बच्चों की किलकारियाँ
जैसे किसी लोकगीत की धुन,
और बैलों की घंटियों की टुनकार
प्रकृति का मधुर वाद्य बन जाती थी।

नदी के किनारे की शीतल बयार,
पीपल तले बुजुर्गों की गोष्ठी,
धान की बाली संग झूमता मन
सब आत्मा को पावन कर जाता था।

अब कंक्रीट की दीवारों के बीच
न वो हरियाली, न वो अपनापन,
भीड़ के शोर में घुटती है आत्मा,
और कृत्रिम रोशनी में खो गया है
चाँदनी का सुकून।

गाँव की माटी में जो सहज पवित्रता थी,
वो शहरों की हवा में कहाँ मिलती है।
मन चाहता है-
फिर लौट चलें उन पगडंडियों पर,
जहाँ जीवन सरल था,
और हृदय हर पल निर्मल।


- मधु शुभम पाण्डे


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प्रेम की राह में

मैं तुम्हें ढूंढने प्रेम की राह में,
रोज़ आता रहा रोज़ जाता रहा
तुम टकटकी लगाए मुझको तकती रही,
मैं भी देख तुम को मुस्कुराता रहा।

मैं तुम्हें ढूंढने प्रेम की राह में...
तू सादगी की कोई पवित्र मूरत है
प्रेम की मुस्कुराती एक सूरत है
तेरे अधरों पे आई उस मुस्कान को
मैं शब्दों से अपने सजाता रहा।

मैं तुम्हें ढूंढने प्रेम की राह पर...
तू तारों में चमकता एक चांद है
मोहब्बत की प्यारी सी पहचान है
तेरी आंखों से झलकते इस प्रेम को
मैं आंखों में अपनी सजाता रहा।

मैं तुम्हें ढूंढने प्रेम की राह पर...


- आकाश आरसी शर्मा


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और क्या चाहिए

दिल दुआ ना दवा चाहिए,
बस सुकूँ भरी कुछ हवा चाहिए!

किससे मांगूँ जाकर मुरादें अपनी,
इबादत को भी तो खुदा चाहिए!

हुनरमंद हो तुम ये मान लूँ कैसे,
मन को जो भाए वो अदा चाहिए!

दास्तां सुनायूँ किसे दर्द ए दिल की,
लोगों को इसमें भी मज़ा चाहिए!

चैन छीनने का जुर्म कर बैठे हो तुम,
अब तुम्हीं बताओ क्या सज़ा चाहिए!

इश्क़ करना कोई गुनाह नहीं साहिब,
प्यार में फ़क़त एक वफ़ा चाहिए!

तुम जो मिले तो सब मिल गया जैसे,
मुझे इस ज़िंदगी से और क्या चाहिए।


- आनन्द कुमार


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याद आती है वो छुवन,
जब बादल ने धरा को चूमा था,
लहलहा उठी थी धरती,
सिहर सी गयी थी,
जब हवाओं ने उसे छुआ था।

कहने को तो तुम दूर बहुत हो,
पर तुम्हारी यादें
हर पल मुझे छूती जाती हैं,
जैसे कोई अनदेखा स्पर्श
मन के तारों को हिलाता हो।

अंकित हृदय पर आज भी
आंखों का स्पर्श,
जब तुमने देखा था।


- सविता सिंह मीरा


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हार जीत तो लगा रहेगा!

हार जीत तो लगा रहेगा
जीवन के इस भाग दौड़ में

उठो अश्रु पोछो अब तुम्हें
नया भारत बनाना होगा

सत्य अहिंसा और त्याग का
अब तो बिगुल बजाना होगा

प्रण लो अपने मन में
उन्नत भारत बनाना होगा।


- मनोज कौशल


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गरीबी यूँ मिट जायेगी

अरसा बीत गया,
गरीबी मिट न पायी,
अभियान बहुत चलाए,
बदनसीबी मिट न पायी,
भाषा बदली, परिभाषा बदली,
करीबी मिल न पाए,
तरीका ऐसा मिला नहीं,
गरीबी जो हर जाए,
चिंतन हुआ, मनन हुआ,
“गरीबी कैसे भगाएं
विचार तभी अमूल्य आया,
गरीब को मिटा दो,
गरीबी खुद मिट जाए,
खाना इतना महंगा कर दो,
वो खा ही न पाए,
तड़प-तड़प भूख से प्राण छोड़ जाए,
समस्या हल हो जायेगी,
गरीबी यूँ मिट जायेगी।


- धरम चंद धीमान


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सीर गंगा की महिमा

ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे
तू है सदा हमारे अंगे-संगे
घुमारवीं बसेया तेरे तीर पर
जन-जन टिकेया तेरे नीर पर
भरोसा करें तेरे ख्वाजे पीर पर
सबका हित है तेरे ही संगे।
ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे
तू है सदा हमारे अंगे-संगे
पूजा का कचरा तुझ में डाले
पापों की गठरी तू ही सम्भाले
तू ही पाले, तू ही जाले
तेरे तट पर मोक्ष पाएंगे
ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे
तू है सदा हमारे अंगे-संगे
तेरे धान के रोपे उजाड़ पाये
खेतों के हार शहर बनाये
किसान सारे डिपुए पुज्वाये
बैल नमाणे सड़कें भगाये
विनास के मॉडल कब तक घलेंगे
ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे
तू है सदा हमारे अंगे-संगे
नर्म महीन छैल-सा आटा
पिसता था सीर गंगा दे घराटा
बिजली-चक्की से अब सबका नाता
अट्टे में विटामिन नहीं अब पाएंगे
ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे।
तू है सदा हमारे अंगे-संगे
सीरगंगा के तट पर आदिम आया
पत्थर तराश कर संस्कृति रचाया
विकास का अर्थ हमको सिखाया।
पर उत्खनन ने ऐसा गदर मचाया
विरासत का हमारी किया सफाया
सीर-कृपा से मैं कुछ को बचाया।
पेलियो में उनका दर्शन करेंगे
ओ सीर गंगे, माए सीर गंगे
तू है सदा हमारे अंगे-संगे।

- डॉ. ए.आर. सांख्यान


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जरूरत और अंजाम

आज इंसान को इंसान से प्यार नहीं,
झूठी मुहब्बत के कई नकाब लगाए बैठे हैं।

चेहरे पर तो सजी है फरेबी हंसी ,
दिल में नफरत की दुकान सजाए बैठे हैं।

इक नूर से सब जग उपजा है कोई मंदा बड़ा नहीं
इस संदेश को भी हम सब मन से भुलाए बैठे हैं।

एक ही रंग सबके लहू का ये भी अलहदा नहीं,
इस सत्य को हम सब दिल से भुलाए बैठे हैं।

मुहब्बते उसूल सब भूल गए हैं खुदा के,
आज सब खुद ही साहिबे मसनद बने बैठे हैं।

गुरुओं पीरों पैगंबरों ने दी थी जो प्रेम की सीख,
उसको हम सब अब दिल से भुलाए बैठे हैं।

दो रोटी और दो गज जमीन के मोहताज हैं सब,
इस जरूरत और अंजाम को सब भुलाए बैठे हैं।


- राज कुमार कौंडल


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क्या चाहते हो जीना भूल जाऊँ।
मतलब जहर पीना भूल जाऊँ?

हाड़ तोड़ते रहे दिनभर तपती धूप में,
अब क्या चाहते हो पसीना भूल जाऊँ।।

लूटते रहें अस्मत जिसकी आड़ में,
बस वही परदा झीना भूल जाऊँ।।

कटे पर नमक छिड़क रहें हो क़्यूँ,
क्या ज़ख्मों को सीना भूल जाऊँ।।

लाके मझधार में पहले डुबोया वो,
फिर कह रहा सफीना भूल जाऊँ।।


- राधेश विकास


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जाड़े में रजाई की
घर में बड़े भाई की
व्यापार में कमाई की
बीमारी में दवाई की
बहुत जरूरी है।
जंग में लड़ाई की
कॉलेज में पढ़ाई की।
परीक्षा में कड़ाई की
आटे में मड़ाई की
बहुत जरूरी है।
सूखे में बरसात की
नीद में रात की
शादी में बारात की
खाने में दाल भात की
बहुत जरूरी है।
जूते चुराई में साली की
तिलक,विवाह में गाली की
रेस्टोरेंट में थाली की
महफ़िल में कव्वाली की
बहुत जरूरी है।
चुनाव में बैलेट पेपर की
साहित्य में लिटरेचर की
प्रापर्टी में सिग्नेचर की
गैस में रेगुलेटर की
बहुत जरूरी है।
गांव में 24 घंटे लाइट की
फौज में हाइट की
यात्रा में फ़्लाइट की
बसंत पंचमी में काईट की
बहुत जरूरी है।
जात पात से आजादी की
जनसंख्या नियंत्रित आबादी की
इन्टर कास्ट शादी की
कहानी सुनने के लिए दादी की
बहुत जरूरी है।


- सदानंद गाजीपुरी


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