हमारा राज्य उत्तराखण्ड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य बना। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वर्तमान में देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखण्ड एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है। इसकी सीमाएँ चीन और नेपाल से लगती हैं। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाएँ चीन-तिब्बत से लगी हुई हैं, जबकि पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर की सीमाएँ नेपाल से जुड़ी हैं। नीति और माना जैसे सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उत्तराखण्ड में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, बुक्सा, थारू, राजी और अन्य जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति है, जो उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। इन जनजातीय समुदायों की आजीविका लंबे समय से भेड़-बकरी पालन, ऊनी वस्त्र निर्माण, पशुपालन, कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा स्थानीय उत्पादों के व्यापार पर निर्भर रही है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। नवंबर से फरवरी तक इन क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण कई रास्ते बंद हो जाते हैं।
इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोग अपने जीवन और परंपराओं को आज भी मजबूती से सँजोए हुए हैं। कई परिवार सर्दियों के आने से पहले ही कई महीनों के लिए राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं। अपने पशुओं के लिए भी पर्याप्त चारा और घास-पत्ती पहले से एकत्र कर ली जाती है, ताकि बर्फबारी और रास्ते बंद होने के दौरान उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।
इन लोगों का जीवन प्रकृति के अनुकूल ढलने का एक अद्भुत उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इनके मन में जीवन के प्रति गहरा धैर्य, आत्मनिर्भरता और संतोष दिखाई देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, ये समुदाय अपनी मेहनत और परंपराओं के सहारे जीवन को आगे बढ़ाते रहे हैं।
परंपरागत रूप से कुछ जनजातीय समुदाय छह महीने ऊँचाई वाले अपने मूल क्षेत्रों में और सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने मैदानी क्षेत्रों में बिताते हैं। वे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करते हैं। यह मौसमी प्रवास उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल रही हैं। शिक्षा का प्रसार हुआ है और सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी जनजातीय समुदायों तक पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर रही है और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तलाश रही है। आज कई युवा पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार को भी अपना रहे हैं।
हालाँकि, आज भी अनेक परिवारों की जड़ें अपने पुश्तैनी गाँवों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। उनके पूर्वजों से मिली जमीन, घर, पशुपालन और स्थानीय कारोबार आज भी उनकी सामाजिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों की धरती भी है। यहाँ अनेक प्रकार के लोकपर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के लोग अपनी सरलता, मिलनसारिता, मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ इस सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।
इन समुदायों ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा है, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसलिए उत्तराखण्ड की जनजातियाँ हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- सुमन डोभाल काला

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