साहित्य चक्र
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11 August 2025

लघुकथा: साल 3032 में शायद


साल 3032 के उस दिन विश्व स्नेह नियंत्रण केंद्र ने तात्कालिक घोषणा की कि 'नागरिकों ध्यान दो। सालों पहले कोई मानवता नाम का वायरस था, जो फिर से जाग्रत हो गया है। यह मानवता एक भयानक बग है, जो आपके शरीर के सिस्टम में अचानक प्रकट होता है और फिर मनुष्य अजीब हरकतें करने लगता है। अगर अचानक कोई व्यक्ति किसी के दुख में उसकी मदद के लिए भागता दिखाई दे तो समझ लीजिए कि वह इस वायरस का शिकार हो गया है।'





इस वायरस के लक्षण अनदेखा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लक्षण हैं किसी को रोते देख कर आपकी आंखों का नम होना, जरूरतमंद व्यक्ति को देख कर अपनेआप हाथ का जेब की ओर बढ़ जाना, किसी की तकलीफ सुन कर उसकी मदद के लिए तलब लगना, किसी की गलती के लिए उससे बदला लेने के बजाय उसे माफ कर देने की इच्छा होना और अगल-बगल से गुजर रही गाय और कुत्ते को डंडा या लात मारने का मन न होना।

इसमें किसी भी तरह का बदलाव आप खुद में या घर के किसी भी सदस्य में अनुभव करें तो तत्काल नजदीक के मानवता नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें। हमारे वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इस मानवता का एंटीडाॅट बनाने में लग गए हैं। प्रधानमंत्री की ओर से घोषणा की गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति में मानवता के गुण दिखाई दें, तुरंत उससे दूर हट जाएं, उसे अकेला छोड़ दें।


हमारी खुफिया एजेंसी का मानना है कि यह वायरस भारत नाम के देश से फैला है। सामान्य जनता से निवेदन है कि वह चिंता न करे। सोशल डिस्टेंस रखे। किसी की ओर देख कर भूल से भी न मुसकराएं, प्यार और सरलता का अनुभव होते ही तत्काल उसे नष्ट कर दें। दिन में तीन बार बिना वजह झगड़ा करते रहें या किसी निर्दोष को बिना वजह नुकसान पहुंचाते रहें।

जब तक एंटीडाॅट की खोज नहीं हो जाती, तब तक 'लुच्चईसीटामोल' और 'स्वार्थोमाइसीन' की खुराक बारबार लेते रहें। याद रखिए मानवता से जीवन सुधर सकता है। इसलिए इससे सतर्क रहें।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह




08 August 2025

रक्षाबंधन: बचपन की रेशमी यादें

रक्षाबंधन का नाम लेते ही बचपन की वो सुनहरी तस्वीरें आँखों में तैरने लगती हैं। मैं घर की सबसे छोटी थी– दो बड़ी बहनों में। भाईयो के नाम पर चाचा,ताऊ के बेटे थे, जो दूर रहते थे। त्योहार आते ही मन में उत्साह की लहर दौड़ जाती।



प्रतिकात्मक छायाचित्र




राखी से पहले ही भाईयों के लिए सुंदर सी राखी अपने छोटे - छोटे हाथों से बनाती और टीके के समान के साथ चिट्ठी भेजती, और दूर  रहने वाले भाई हर साल समय पर मनीऑर्डर भेज देते। उस समय के 50 रुपए भी ख़ुशियों का सागर लगते थे। जो भाईयों ने भी अपने पिताजी से लेकर दिए होते थे।

हम बहनें उन पैसों से चूड़ियाँ, रिबन और मिठाइयाँ खरीदकर भाई की लंबी उम्र की कामना करती थीं। आज सब अपने परिवारों में व्यस्त हैं, फिर भी राखी आते ही दिल वही बचपन ढूंढ़ता है। अब भी सभी मुझे बच्चों की तरह दुलारते हैं, कुछ न कुछ देती हैं।

राखी सिर्फ़ एक धागा नहीं, बल्कि उस रिश्ते का प्रतीक है, जो जीवन भर बिना शर्त प्रेम से बंधा रहता है।


                                      -  डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति' 





रक्षाबंधनः मेरा बचपन

मेरा बचपन गांव में गुज़रा है, अतः वह मोहक यादें, वह निश्छलता, वह चंचलता,वह स्वतंत्रता, शहरों में कहां।

आज भी उन दिनों की सुनहरी यादें दिलो दिमाग को ताजा तरीन कर देती है।
उन दिनों न पढाई का भारी बोझ था न ही बस्तों का, हां बड़े बड़े तख्त नुमा स्लेट होते थे जिसमें कोयला लगाकर चमकदार करना भी कोई पर्व से कम न था, मेरे पिताजी स्टेशन मास्टर थे।


इसलिए उनका तबादला रुरल एरिया या यों कहिए गांव में होता रहता था जिसका नाम कौवापुर, पचपेड़वा, तुलसी पुर, भवानी पुर आदि होते थे, शुरूआत की पढ़ाई मेरा गांव के स्कूलों में ही हुआ था। 

दिन भर धमा चौकड़ी करना, बागों में घूमना, तालाबों से कमल के फूल तोड़ कर उसका माला बनाकर गले में पहनना, छुपा छुपी, गोटी, कबड्डी,आदि खेल थे उस समय के, साथ ही साथ गुड़िया खेलना, गुड़िया की शादी रचाना,घर से खटाई चुरा कर लाना सखियों एवं दोस्तों के साथ मिलकर खाना आदि बातें क्या भूलें से भूलती है ?


प्रतिकात्मक छायाचित्र



मैं मां-बाप की एकलौती लड़की थी, अतः रक्षा बंधन का त्योहार सब मेरे यहां आकर मनाते थे,हमलोग मिलकर रेशमी धागों से खुद ही राखी बनाते थे, मिठाई वगैरा की दुकान तो होती नहीं थी अतः घर पर ही मालपूए, शक्कर पारा आदि बनाया जाता था। मेरी ही मां क्यों सभी बच्चों की मां इस काम में हमलोगों की हाथ बंटाती थी।

मुझे यह अनुभव ही नहीं होता था कि मेरा कोई भाई नहीं है गांव के सभी लड़के भाई एवं गांव के सभी लड़कियां एक दूसरे की बहन भाई बन जाती थी। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने एक कविता लिखी थी जो आज साझा करना चाह रही हूं।

रक्त संबंध नहीं है फिर भी 
हार्दिक संबध पावन है।

इस संबंध में बंधा हुआ,
जग का सारा जन जीवन हैं।

मै कैसे कह दूं सखी,
कुछ लोग यहां अनजाने है।

मुझे तो लगते सभी यहां 
जैसे जाने पहचाने हैं।


केवल रक्षा बंधन ही क्यों हर त्यौहार सादगी से पर बड़े आत्मियता से मिलकर हम लोग मनाते थे।

गांव के पास थोड़ी दूरी पर जंगल भी था हम शैतान बच्चे कहां मानने वाले थे चल देते थे कभी कभी हम बच्चों की टोली,जंगल जलेबी खाने,केवांच तोड़ने, शहतूत खाने आदि क्या क्या शायद आज की पीढ़ी इन चीजों को जानती भी न होगी।

पांचवीं कक्षा तक मै गांव में ही रही फिर शहर आ गयी पढ़ने पर आज भी वह बचपन का दिन भुला नहीं हूं।

गर्मी की छुट्टियों में मै केवल गांव ही जाती थी। एमए करने के बाद मै गांव में अन्य बच्चों को पढाना, सिलाई कढ़ाई सिखाना, आदि का काम करती थी,मन को संतुष्टि मिलती थी।

लसोढे का अचार मुझे बहुत पसंद है अतः जब भी गांव जाती ले आती थी।अंत में मै यह कहना चाहुंगी कि यदि जीवन का वास्तविक आनंद लेना हो तो गांव से बेहतर कुछ नहीं।


                                          - रत्ना बापुली, लखनऊ, उत्तरप्रदेश



07 August 2025

राखी एहसासात और तहज़ीब का रेशमी धागा


राख़ी एक निहायत ही मुक़द्दस और जज़्बाती बंधन है, जो सदियों से भाई-बहन के रिश्ते की मज़बूती, मोहब्बत, ईसार और बे-ग़रज़ अपनाइयत का मज़हर रहा है। इस रेशमी धागे में सिर्फ़ धागों की मजबूती नहीं होती, बल्कि इसमें लिपटी होती है बहन के दिल की हर दुआ, हर फ़िक्र और हर महसूस किया गया जज़्बा। राख़ी वह महीन सा रिश्ता है, जो नज़र नहीं आता, लेकिन दिलों को ऐसे बाँधता है कि उम्र भर की दूरी और शिकवे भी इस धागे के सामने बेमानी हो जाते हैं।





यह पर्व हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राख़ी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र, सुख-शांति और हर बुरे वक़्त से हिफ़ाज़त के लिए दुआ करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन की हिफ़ाज़त, सम्मान और हर ख़ुशी को अपनी ज़िम्मेदारी समझकर निभाने का वादा करता है। यह रस्म केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय तहज़ीब का वो अनमोल हिस्सा है जिसमें रिश्तों की गर्माहट, अपनापन और इंसानी जज़्बात गहराई से समाए होते हैं।

राख़ी का दिन घरों में सिर्फ मिठाइयाँ और उपहारों तक सीमित नहीं होता। इस दिन हर कोना खुशियों से जगमगा उठता है। नन्हें बच्चे रंग-बिरंगे कपड़ों में सजते हैं, बड़े बुज़ुर्गों के चेहरों पर मुस्कान बिखरी होती है और घर में प्यार और अपनत्व का माहौल एक जश्न की सूरत इख़्तियार कर लेता है।

इस मौक़े पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि राख़ी सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि यह रिश्तों की उस बुनियाद का ज़िक्र है जो भावनाओं, विश्वास और ज़िम्मेदारियों पर टिकी होती है। जैसा कि कहा गया है- रिश्ते रस्मों से नहीं, बल्कि एहसासों से बनते हैं। यही एहसास राख़ी के दिन सबसे ज्यादा महसूस होता है।

यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि आधुनिकता के इस तेज़ दौर में भी पारिवारिक मूल्य, सांस्कृतिक विरासत और भावनाओं की अहमियत कभी कम नहीं होती। राख़ी का यह रेशमी धागा हमारे समाज को मुलायम लेकिन मजबूत डोर से जोड़ने का काम करता है।

 राख़ी सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि यह हमारे तहज़ीबी शऊर और रूहानी वाबस्तगियों का आइना है। यह वह दिन है जो हमें यह सिखाता है कि प्यार, फिक्र और क़ुर्बानी ही रिश्तों की असल ताक़त होते हैं।


                                                      - डॉ. मुश्ताक अहमद शाह


31 July 2025

प्रेमचंद का साहित्य कहानी या उपन्यास नहीं, बल्कि भारत की हकीकत है।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी (तत्कालीन बनारस) के समीप एक छोटे से गाँव लमही में हुआ था। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और समाज अनेक प्रकार की कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक विषमताओं से ग्रस्त था। उनके माता-पिता ने उनका नाम रखा ,धनपत राय श्रीवास्तव। बचपन में ही वे मातृ-पितृ स्नेह से वंचित हो गए। प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा,आर्थिक अभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और सामाजिक असंतुलन ने उनके व्यक्तित्व को ऐसे आकार में ढाला कि उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य या कल्पना नहीं, बल्कि पीड़ित समाज की वाणी बनाया।





प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा में 'नवाबराय' उपनाम से की। उनकी पहली प्रकाशित कृति 'सोज़े वतन' ब्रिटिश सरकार को इतनी नागवार गुज़री कि उस पर पाबंदी लगा दी गई। इसके बाद उन्होंने 'प्रेमचंद' नाम अपनाया और हिंदी लेखन की ओर अग्रसर हुए। उनके साहित्य में जो यथार्थ चित्रण है, वह उनके जीवनानुभवों का निष्कलंक प्रतिबिंब है। उनके पात्र सीधा पाठक से बात करते हैं, उसकी पीड़ा को उसका स्वयं का अनुभव बना देते हैं। चाहे वह 'धीरू' जैसा किसान हो, 'होरी' हो या 'निर्मला' हर पात्र आमजन से आता है और उसे सच के धरातल पर खड़ा करता है।

प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' यूं ही नहीं कहा गया। उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसी कालजयी रचनाएं दीं जिन्होंने साहित्य को केवल अभिजात वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि जनमानस की आवाज़ बना दिया। 'गोदान' में एक किसान की वेदना और साहूकारी शोषण की मार्मिक कथा है, तो 'गबन' मध्यमवर्गीय मानसिकता और नैतिक संघर्ष का अद्भुत चित्रण है। 'निर्मला' बाल विवाह की त्रासदी और नारी-जीवन की विडंबनाओं को परत-दर-परत खोलती है, तो ‘सेवासदन’ स्त्री मुक्ति की पुकार बन जाती है। 'रंगभूमि' में एक अंधे भिक्षुक सूरदास के माध्यम से पूंजीवाद और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई गई है।

उनकी कहानियाँ, 'कफन', 'दो बैलों की कथा', 'पूस की रात', 'पंच परमेश्वर', 'बड़े घर की बेटी'न केवल साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से अत्यंत सशक्त हैं। 'कफन' में हाशिये पर खड़े मानवों का कठोर यथार्थ है, तो 'पूस की रात' में निर्धन किसान की विवशता और संघर्ष। 'दो बैलों की कथा' में मनुष्यता की संवेदना और पशु-पात्रों के माध्यम से मानवीय पीड़ा का जो चित्र रचा गया है, वह अद्वितीय है।






प्रेमचंद का साहित्य बहुपरतीय है, वह महज़ कहानी या उपन्यास नहीं, एक विचारधारा है। उन्होंने साहित्य को 'सत्य के अन्वेषण' और 'समाज-सुधार' का साधन माना। उनके लिए लेखन धर्म था,और इसीलिए उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़कर स्वराज्य आंदोलन से सांस्कृतिक स्तर पर जुड़ाव किया।

उनकी भाषा में कहीं बनावट नहीं, कोई अलंकारिक बड़प्पन नहीं ,बल्कि सादगी, आत्मीयता और जीवन की सरल-सच्चाई है। उन्होंने खड़ी बोली को वह गरिमा और सरसता दी जिसकी भाषा में एक ओर संवेदना की नर्मी हो, दूसरी ओर विचार की शक्ति। लोकभाषा, भावप्रवाह और कथ्य की सहजता यही उनके लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता थी। उन्होंने साहित्य में आदर्श और यथार्थ का एक अद्भुत समन्वय स्थापित किया, जिसका असर हिंदी साहित्य की आगे की पीढ़ियों पर गहराई से पड़ा।

मुंशी प्रेमचंद ने जीवनभर वंचितों, उत्पीड़ितों, स्त्रियों, मजदूरों, किसानों और दलितों की आवाज़ को मंच दिया। उन्होंने उन कहानियों को लिखा जिन्हें समाज अक्सर अनसुना करता रहा। यह उनकी लेखनी का ही प्रताप था कि उन्होंने एक कालखंड को भाषा और कथ्य के माध्यम से जीवंत कर दिया और उनके पात्र कालजयी बन गए।





8 अक्टूबर 1936 को जब वे इस संसार से विदा हुए, उस समय वे आर्थिक रूप से असमर्थ, शारीरिक रूप से अस्वस्थ, लेकिन नैतिक रूप से इतने समृद्ध थे कि उनकी चिताभस्म से साहित्य की चेतना आज भी जल रही है। उनके साहित्य में एक युग की परछाइयाँ हैं और भविष्य के बदलाव की संभावनाएँ भी।

आज जब हम हर 31 जुलाई को ‘राष्ट्रीय लेखक दिवस’ के रूप में प्रेमचंद की जयंती मनाते हैं, तो यह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि भर नहीं होनी चाहिए, बल्कि लेखक, पाठक और समाज के रूप में यह संकल्प होना चाहिए कि प्रेमचंद के सिद्धांत , यथार्थवाद, संवेदना, समाजसापेक्षता और समानता , को हम अपने जीवन, लेखन और कर्म में आत्मसात करें। यही मुंशी प्रेमचंद के प्रति हमारी सच्ची नमन होगी।


- डॉ. मुश्ताक अहमद




21 July 2025

यात्रा वित्तांतः- आसमान से लाहौल की बर्फीली वादियों का दीदार


जिंदगी में कुछ यात्राएं केवल मात्र गंतव्य तक पहुंचने के लिए नहीं होती, बल्कि वे हमें खुद से मिलाने का जरिया भी होती हैं। उन सुकून भरे पलों में हमें खुद से मिलने का तथा खुद का अवलोकन करने का भी समय मिल पाता है। कुछ दिनों के लिए समस्त दुनियां को दरकिनार कर हमें आत्ममिलन की सुखद अनुभूति होती है। ऐसे ही एक यात्रा हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतों में लाहौल स्पीति की हसीन वादियों में बसे केलांग की तरोताजा हो गई। यह यात्रा मेरी जिंदगी की सबसे रोमांचक और अविस्मरणीय यात्राओं में से एक रही। यह यात्रा सिर्फ एक भौगोलिक सफर नहीं थी, बल्कि आत्मा को सुकून देने वाला एक अनोखा अनुभव भी था।





   अप्रैल का महीना था। बच्चों की छुट्टियों के चलते अचानक ही हमारा कार्यक्रम बना कि क्यों ना केलांग चलें? पतिदेव जी केलांग  में सरकारी कार्य क्षेत्र में कार्यरत थे। उन्हें घर से गए डेढ़ महीना हो गया था। लाहौल स्पीति में भारी बर्फबारी होने के कारण चार-पांच महीने यह क्षेत्र बाकी दुनिया से बिल्कुल कट सा जाता था। एक हफ्ते में दो दिन हेलीकॉप्टर की फ्लाइट होती थी जो मौसम पर ही निर्भर करती थी। 


बच्चों के बार-बार आग्रह करने पर हमारा यह कार्यक्रम बना लेकिन दिक्कत यह थी कि अभी भी रोहतांग दर्रा बंद था और हेलीकॉप्टर की उड़ान ही एकमात्र माध्यम था वहां पहुंचने के लिए। हेलीकॉप्टर की बुकिंग के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी हमें,,, तभी जाकर कुछ दिनों में बुकिंग हुई। बेटियों की भी जिद थी कि  इस बार हेलीकॉप्टर से जाएंगे, लेकिन अब इस बात पर असमंजस की स्थिति थी कि हम तीनों अकेली कैसे जाएंगी? बेटियां भी अभी छोटी ही उम्र की थी तो विषय थोड़ा विचारणीय था। सोच विचार कर यह तय हुआ कि क्यों ना मायके से भैया को कुल्लू भुंतर तक साथ ले लिया जाए।





भुंतर से सुबह 8:00 बजे की फ्लाइट बुक हो गई थी तो हमें बिलासपुर से रात को ही चलना पड़ना था ताकि हम सुबह 8:00 तक भुंतर हवाई अड्डे पर पहुंच सकें। रात की बस थी तो अकेले बच्चियों के साथ जाना मुमकिन भी नहीं था और ससुराल में दो हफ्तों के बाद भागवत कथा का आयोजन तय हुआ था तो घर में भी सभी बहुत व्यस्त थे, इसीलिए भैया को साथ ले जाना बेहतर समझा। भैया भी हंसी खुशी हमें भुंतर तक छोड़ने को तैयार हो गए।

मायके पहुंचकर अगले दिन जाने की योजना बनाई। बिलासपुर बस स्टैंड से रात को कल्लू के लिए 2:00 बजे की बस थी तो उसी के हिसाब से तैयारी में जुट गए। घर से काफी सब्जियां डाल दी गई थी जो अपने खेतों में उगी थी। केलांग में चार महीनों से रास्ते भी बंद थे तो सोचा कि कुछ दिनों के लिए ये ऑर्गेनिक हरी सब्जियां खाने के लिए हो जाएंगी।

     मेरी मासी जी के लड़के ने रात को 2:00 बजे हमें अपनी टैक्सी से बस स्टैंड छोड़ा। मेरी दो बेटियां, मैं और मेरा छोटा भैया खुशी खुशी बस में बैठ गए। बस में पंजाब हरियाणा से आए पर्यटक भी बैठे थे। पांच घंटे का सफर तय करते जब हम कल्लू की हसीन वादियों में पहुंचने लगे तो दूर-दूर से बर्फ के पहाड़ दिखाई देने लगे। बस में बैठी कुछ लड़कियां जो पंजाब हरियाणा से घूमने आई थी, उन बर्फ के पहाड़ों को देखकर एकदम से उछलने लगी।

उन्होंने शायद पहली बार ही बर्फ के पहाड़ देखें होंगे तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। दोनों हाथों से तालियां बजाकर वे अपनी खुशी जाहिर कर रही थी। इस रोमांच भरे सफर को  तय करते हुए हम सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर भुंतर हवाई अड्डे पर पहुंच गए, लेकिन जैसे ही हम हवाई अड्डे पर पहुंचे तो जिस हेलीकॉप्टर में हमारी बुकिंग हुई थी वह 5 मिनट पहले ही उड़ान भर चुका था, फ्लाइट का समय तो निश्चित था लेकिन हम ही 5 मिनट लेट हो गए थे।




हम सब बहुत उदास हो गए कि अब कैसे जाएंगे? मैंने इन्हें केलांग के लिए फोन किया कि हमारी फ्लाइट तो छूट गई अब अगला प्रबंध कैसे होगा? थोड़ी देर तो ये भी टेंशन में पड़ गए, लेकिन फिर इन्होंने हवाई अड्डे पर बात कर अगली फ्लाइट के लिए हमारी बुकिंग कर दी। उस समय प्रति व्यक्ति का किराया भुंतर से केलांग के लिए ₹700 लगता था। अगली फ्लाइट 1 घंटे के बाद होनी थी तो उस बीच हमने चाय पानी का बंदोबस्त किया और ढाबे  पर इंतजार में बैठ गये।

उस समय अटल टनल नहीं बनी थी इसलिए पांच छह महीनों के लिए लाहौल स्पीति बाकी दुनिया से कट जाता था। इन पांच  छह महीनों में वहां जाने का यही एक जरिया था। नाश्ता चाय लेने के बाद तब तक हेलीकॉप्टर भी आ गया और बेटियां देखते ही चहक उठीं। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि पहली बार उन दोनों ने इतने नज़दीक से हेलीकॉप्टर देखा था। एक तरफ हैलीकॉप्टर में जाने की खुशी थी तो दूसरी तरफ भैया को अकेले छोड़ कर जाने का दुख था। मन तो कर रहा था कि उन्हें भी साथ ले जाएं, लेकिन घर में मां भी अकेली थी तो उन्हें वापस जाना था। भैया से विदा लेकर हम हेलीकॉप्टर की ओर बढ़े।

सामान बहुत भारी था तो लोडिंग अफसर मजाक में कहने लगे--"कहीं स्मगलिंग का ही माल तो नहीं है" मैंने भी हंस कर जवाब दिया ,,"सर आप खुशी-खुशी चेक कर सकते हैं, इसमें घर की उगाई हुई सब्जियां ही हैं, बाकी कुछ नहीं है। हंसी मजाक करते-करते हम हेलीकॉप्टर में बैठ गए। हेलीकॉप्टर में सामान ले जाने की भी एक सीमा होती थी। बारह किलोग्राम से ज्यादा सामान ले जाना मना था। बारी-बारी सभी के सामान की चेकिंग हो रही थी, जिसका सामान  लिमिट से ज्यादा हो रहा था, उस सामान को बाहर फेंक दिया जा रहा था। मैं भी थोड़ा डर गई थी कि कहीं हमारा सामान भी ज़्यादा न हो, पर हमारा सामान लिमिट में ही था। 

    सभी औपचारिकताओं के पूर्ण होने पर सभी को जरूरी हिदायतें दी गई और हम धीरे-धीरे आकाश की ओर उड़ने लगे। शुरू शुरू में धुकधुकी सी हो रही थी, मानो हम पंख लगाए आसमान में उड़ रहे हों। आसमान से सभी घर छोटे-छोटे डिब्बे की तरह लग रहे थे और साथ में बहती व्यास नदी एक कूहल की तरह लग रही थी।धीरे-धीरे कुल्लू मनाली से होते हुए हम बर्फीली चोटियों के ऊपर से गुज़रने लगे। आसमान से सफ़ेद बर्फ से ढके पहाड़ और पेड़ों पर बर्फ़ होने के कारण वे गुलदस्ते की भांति प्रतीत हो रहे थे। बेटियां भी उस मनमोहक दृश्य को देखकर पुलकित, रोमांचित हो रही थी।






 सच में बर्फीली वादियां प्रकृति की अद्भुत ,अलौकिक एवं अद्वितीय रचना होती है। चारों तरफ सफेद चादर सी बर्फ फैली थी, मानो धरती ने मुलायम सफेद ओढ़नी ओढ़ रखी हो। सुबह का समय था तो बर्फ पर पड़ती सूरज की किरणें सुनहरी चमक बिखेर रही थी। ये बर्फीली वादियां देखने में न केवल स्वर्ग की सी प्रतीत हो रही थी ,बल्कि एक अलौकिक शांति और सुकून भी दे रही थी। 40 मिनट के इस सुहाने सफर को तय करते हुए हम केलांग पहुंचने वाले थे। 

हेलीकॉप्टर धीरे-धीरे सिस्सू हेलीपैड की ओर बढ़ रहा था और हम खुशी में झूम रहे थे। हेलीकॉप्टर से उतरते ही पतिदेव ने गाड़ी में बिठाया और हम अपने खुशनुमा अनुभवों को उनके साथ बयां करते-करते केलांग पहुंच गए। लकड़ीनुमा बने उस सरकारी क्वार्टर में हम तीन दिनों तक रुके। वहां चारों तरफ बर्फ से लकदक पहाड़ों को निहारते हुए तीन दिनों का कुछ पता ही नहीं चला। हफ्ते में दो बार फ्लाइट होती थी तो चौथे दिन हम फ्लाइट से वापिस घर चल पड़े। सात-आठ दिनों के बाद घर में भागवत था तो इसीलिए हमें घर आने की भी जल्दी थी, लेकिन उन बर्फ से ढकी हसीन वादियों में जो आनंद हमने तीन दिनों में लिया, वह  सुनहरी यादें बनकर हमारी स्मृतियों में ताउम्र जीवंत रहेगा।



                              - वसुंधरा धर्माणी, बिलासपुर, हिप्र



15 December 2024

कहानी- दोस्ती




सचिन के फोन पर किसी का फोन आया और सचिन जल्दी से कहीं जाने के लिए घर से निकल ही रहा था कि विश्वास जो उसके बचपन का दोस्त था उसके पास आया और उसने सचिन से पूछा कि क्या हुआ, लेकिन सचिन ने उसे टाल दिया और हड़बड़ी में वहां से चला गया। विश्वास हैरत से उसे देखता रहा और किसी अनिष्ट की आशंका में उसने सचिन का पीछा करने का निश्चय किया। 

कुछ देर ढूंढने के बाद सचिन उसे मिल गया लेकिन घायल अवस्था में एक सुनसान जगह पर जहां लोगों की आवाजाही कम थी। विश्वास ने तुरंत एम्बुलेंस बुला कर सचिन को अस्पताल पहुंचाया और पुलिस एवं उसके घरवालों को सूचित किया। कुछ ही दिनों में सचिन ठीक हो गया और बोला कि कुछ लोग कई दिनों से उसे काम करने के लिए अपने साथ मिलाना चाहते थे, उन्होंने अपने उच्च अधिकारी से मिलने के लिए उसे तुरंत बुलवाया था लेकिन उनका काम नशीले पदार्थ सप्लाई करना था, जिसे सुनकर सचिन के पैरों तले से जमीन निकल गई और उसने उस काम को करने से साफ इंकार कर दिया।उन लोगों को यह डर था कि कहीं सचिन उनका राज न खोल दे इस लिए उसे खत्म करने के लिए एकाएक उस पर हमला कर दिया और उसे मरने के लिए छोड़ कर चले गए। 




सचिन अपने माता-पिता को साथ लेकर विश्वास के घर गया और विश्वास का शुक्रिया अदा करते हुए बोला कि दोस्त अभी तो काफ़ी दिनों से हमारा कोई सम्पर्क भी नहीं है तो भी तुम ने मेरे बारे में इतना सोचा और मेरी जान बचाई, ये सुनकर विश्वास बोला, दोस्त हम बचपन के दोस्त हैं और दोस्ती कभी इस बात की मोहताज नहीं होती कि हम आपस में कितना मिलते  हैं और साथ में कितना वक्त  बिताते हैं। अच्छे और सच्चे दोस्त दिल से जुड़े होते हैं और चेहरे से ही एक-दूसरे की जरूरत समझ लेते हैं। 

ये सुनकर सचिन विश्वास के गले लग गया, दोनों दोस्तों की आंखों में ख़ुशी के आंसू थे। ये देख कर सचिन के माता-पिता की आंखें भी नम हो गई और वे खुशी से एक साथ बोले,"और हमें तुम्हारी दोस्ती पर नाज़ है!"


                                                                       - कंचन चौहान, बीकानेर