साहित्य चक्र

22 August 2026

दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में...


दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है। इसे बराऐख़ास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नज़रिए से देखने में कुछ दूसरे ही ख़ास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं, बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।

रोटी-रोज़गार मिले,नहीं मिले,संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अख़बार तो हैं ही। कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है ?





किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारग़र हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा। तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।

मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त,न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल.फिर भी नागरिकों की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाऍं.क्या ये संभव नहीं?एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों! कलाओं का जादू,अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते,अपनी स्थापनाऍं एक हद तक ही बरक़रार रख पाता है।

बाद मुद्दत के आज़ादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं, भूखे रहे हैं, सज़ाऍं काटी हैं। आज फिर से विदेशी पूॅंजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज़ की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।


स्वतंत्र-विकलताऍं बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताऍं घट रही हैं। विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है। हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते,न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।

धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाॅंधभरा साम्राज्य भी। दिक़्क़त और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोख़रोश से शामिल है, जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है ?

कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली अमी अस्तो, अमी अस्तो,अमी अस्त...?


- राजकुमार कुम्भज




कच्चा मकान


बहुत समय पहले किसी गांव में शंकर नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार पर आलसी था। साथ ही उसकी एक बुरी आदत थी वह अपनी गलती दूसरों पर थोप देता था और खुद अपनी गलती को स्वीकार करने से कतराता था। वह उस गांव में एक कच्चे घर में रहता था। वह एक ऐसे परिवार से आता था जिसमें सब गरीब थे। उसके पिता जी ने उसके लिए विरासत में केवल यही एक कच्चा मकान छोड़ा था।





गांव में ज्यादातर घर पक्की ईटों के बने थे जो एक-दो कच्चे थे उनके मालिकों ने अपने घर के सामने ईंटे गिरवा शुरू भी कर दिया था। अब गांव में बस शंकर का परिवार ही था जो अभी तक कच्ची मिट्टी के घर में रहता था। शंकर के पास एक जमीन थी, जो उसके पूर्वजों की थी। उसी पर परिवार का सारा बोझ था, पर वह जमीन भी अब बूढी हो चुकी थी। खेती उतनी खास होती नहीं थी। एक दिन शंकर तमतमाते हुए घर में घुसा।

“मेरे पिता ने मुझे पैदा ही क्यों किया?”

शंकर ने खाट पर बैठते हुए कहा- “क्या हुआ जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”

पत्नी ने पूछा- “अरे! कम से कम इस मिट्टी के घर में तो नहीं रहना पड़ता, बरसात भी आने वाली है पता नहीं इस घर का अब क्या होगा? अब तो खेती भी बंद हो रही है। नहीं तो पैसों से मैं भी ईंटे गिरवा लेता।”

“तो इसमें आपकी बाबूजी की क्या गलती है?” “उन्हीं की तो गलती है, इतना सम्मान पाकर क्या मिला? यह कच्चा घर और बंजर होती जमीन!”

शंकर चाहता तो मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे इकट्ठे कर लेता, पर वह अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर की ओर देखकर तमतमाते हुए कुछ बुदबुदाने लगा।

शंकर ने उसकी गरीबी का जिम्मेदार अपने पिता को ठहराया। वह पहले कुछ काम किया भी करता था। अब तो वह भी बंद हो गया। सुबह देर से उठता था, दोपहर को खेत पर बिना मन के जाता और अगर धूप तेज होती तो जाता ही नहीं था। फसल हुई या नहीं, गायों ने चरा या बिना पानी के सुख गई, इसकी उसको कोई परवाह नहीं थी। उससे कोई पूछता की खेती आजकल नहीं तो रही है क्या? तो कहता- “अरे भाई मेरे पिता की बदकिस्मती मेरे सर आ गई है, झेलना ही पड़ेगा”




एक दिन ऐसा आया कि रात के चूल्हे के लिए पड़ोसी से अनाज मांगना पड़ा। घर तो कमजोर था ही और इस कमजोरी में सुई चुभाने के लिए बरसात भी हो गई और इतनी की शंकर का घर मिट्टी में मिल गया। शंकर और उसकी पत्नी जमीन पर बैठे कुछ सामान संदूक में रख रहे थे ताकि वह भीग ना जाए। तभी ऊपर बची हुई छत के खपड़े से कुछ, शंकर के सिर पर गिरा।

“हाय! सिर फोड़ डाला” शंकर चिल्लाया। जब नीचे देखा तो एक गंदा और पुराना झोला पड़ा था।

“अरे! यह क्या है?” उसकी पत्नी ने हैरान होकर पूछा।

“क्या मालूम?”

शंकर ने झोले को धीरे से खोला, वह झोला नोटों से भरा हुआ था। यह देख दोनों की आंखें फटी रह गईं। उस नोटों के साथ एक पुराना कागज़ का टुकड़ा भी था। जब शंकर ने उस कागज को खोला तो उसमें उसके पिता की लिखावट थी। और उसमें लिखा था

प्रिय शंकर,
मुझे पता है कि यदि तुम्हें यह पत्र मिला है तो तुम्हारा मिट्टी का कच्चा घर बरसात में ढह चुका है। मैने इस झोले में पैसे रखे हैं, जो मैने अपने जीवन भर में कमाए हैं। जिसे तुम अपने पक्के घर की कामना पूरी कर सकते हो। मैं चाहता था कि तुम अपनी मेहनत से एक नया घर बनवाओ। पर, ये पैसे तुम्हारी विरासत हैं। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।

- तुम्हारे पिता

यह पढ़कर शंकर की आंखों में आंसू आ गए।
पिता के लिए उसके दिल में जो खराब तस्वीर बनी हुई थी, वह साफ हो जाती है। उसे अपनी गलती का भी पता चलता है। वह उन पैसों से एक नया पक्का घर बनावत है और एक नई उपजाऊ जमीन भी खरीदता है। उस जमीन पे वह बैल की तरह काम करके काफी तरक्की करता है।


- प्रणव राज, बिहार



उत्तराखण्ड की जनजातियाँ: कठिन परिस्थितियों में जीवन और संस्कृति की मिसाल


हमारा राज्य उत्तराखण्ड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य बना। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वर्तमान में देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखण्ड एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है। इसकी सीमाएँ चीन और नेपाल से लगती हैं। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाएँ चीन-तिब्बत से लगी हुई हैं, जबकि पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर की सीमाएँ नेपाल से जुड़ी हैं। नीति और माना जैसे सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।



उत्तराखण्ड में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, बुक्सा, थारू, राजी और अन्य जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति है, जो उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। इन जनजातीय समुदायों की आजीविका लंबे समय से भेड़-बकरी पालन, ऊनी वस्त्र निर्माण, पशुपालन, कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा स्थानीय उत्पादों के व्यापार पर निर्भर रही है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। नवंबर से फरवरी तक इन क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण कई रास्ते बंद हो जाते हैं।

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोग अपने जीवन और परंपराओं को आज भी मजबूती से सँजोए हुए हैं। कई परिवार सर्दियों के आने से पहले ही कई महीनों के लिए राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं। अपने पशुओं के लिए भी पर्याप्त चारा और घास-पत्ती पहले से एकत्र कर ली जाती है, ताकि बर्फबारी और रास्ते बंद होने के दौरान उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इन लोगों का जीवन प्रकृति के अनुकूल ढलने का एक अद्भुत उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इनके मन में जीवन के प्रति गहरा धैर्य, आत्मनिर्भरता और संतोष दिखाई देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, ये समुदाय अपनी मेहनत और परंपराओं के सहारे जीवन को आगे बढ़ाते रहे हैं।

परंपरागत रूप से कुछ जनजातीय समुदाय छह महीने ऊँचाई वाले अपने मूल क्षेत्रों में और सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने मैदानी क्षेत्रों में बिताते हैं। वे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करते हैं। यह मौसमी प्रवास उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल रही हैं। शिक्षा का प्रसार हुआ है और सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी जनजातीय समुदायों तक पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर रही है और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तलाश रही है। आज कई युवा पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार को भी अपना रहे हैं।

हालाँकि, आज भी अनेक परिवारों की जड़ें अपने पुश्तैनी गाँवों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। उनके पूर्वजों से मिली जमीन, घर, पशुपालन और स्थानीय कारोबार आज भी उनकी सामाजिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों की धरती भी है। यहाँ अनेक प्रकार के लोकपर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के लोग अपनी सरलता, मिलनसारिता, मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ इस सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।

इन समुदायों ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा है, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसलिए उत्तराखण्ड की जनजातियाँ हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



- सुमन डोभाल काला


लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



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वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

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सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


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हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


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आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


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इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


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छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ पढ़िए






छोटे घरो मे बड़े दिलवाले रहते है,
उम्र गुजर रहीं इक लाठी के सहारे मग़र,
इन्ही घरों मे प्रकृति प्रेम के मतवाले रहते है।

                                                 - राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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घर छोड़ डोली पर यहां आई,
गुजरा जीवन,साथ सिर्फ यादें यहां।
आ गई सांझ की बेला,मिलूंगी फिर वहां अपनों से,
लेकर यहां अंतिम विदाई।

- रोशन कुमार झा


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रेत-हेत रो मेळ है,
घर कांई ओ हवामहळ है।
बडेरा मायता री संगत है,
अपणायत री रंगत है।
घर भला ही काच्चो है,
पण हेत घणों पाक्को है।

- डॉ. जितेन्द्र कुमार बोयल


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ये सिर्फ तस्वीर नहीं, एक कहानी है,
जिसमें मेहनत की अमिट निशानी है।

- सूरजमल AkS


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आशियाना अपना हो, भले वो जैसा हो,
महल हो या झोपड़ी हो, बस वो अपना हो।

- चुन्नू साहा


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यह घर मिट्टी का है,
मगर इसके भीतर एक पूरी ज़िंदगी दफ़्न है।
टूटी छत के नीचे न जाने कितने मौसम गुज़रे होंगे,
और यह बूढ़ी माँ-लाठी के सहारे-आज भी ज़िंदगी ढो रही है।
जिस उम्र में सिर पर सिर्फ़ सुकून की छाँव होनी चाहिए,
उस उम्र में अभाव अब भी उसका पीछा कर रहा है।
कुछ तस्वीरें गरीबी नहीं दिखातीं,
वे समाज की संवेदनहीनता का आईना बन जाती हैं।

- आरती कुशवाहा


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झोपड़ी छोटी है, मगर हौसले आसमान से ऊँचे हैं,
यही तो भारत के गाँवों के असली किस्से हैं।
मिट्टी का घर, हाथ में लाठी और आँखों में विश्वास,
यही सादगी तो है हमारे गाँव की सबसे बड़ी पहचान।

- बीना सेमवाल


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निशान

वक्त रुकता नहीं...
जाते जाते निशान छोड़ जाता है;
कभी चहरे पर, कभी दीवारों पर।
जिसकी चुप्पी साबित करतें हैं-
जिंदगी में सबसे बड़ा सहारा,
बूढ़ी मां और बूढ़ा घर।

- सुतपा घोष


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जर्जर बदन जर्जर आँगन।
जर्जर हुआ है आज ये मन।
कोई न साथी अंतिम सफर है,
बोझ लगने लगा है ये जीवन।

- कला भारद्वाज


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जरा जब जीवन में आए,
सहारा कोई नहीं।
घास फूस के अपनी झोपड़ी।
उसी में जीवन बिताएं।
जरा जब जीवन में आए।

- अनुरोध त्रिपाठी


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जीवन की हर तपिश को
सहकर जर्जर हुई है ये काया,
उस पर देखो ये कैसी है प्रभु की माया।
घास फूस का जर्जर सा घर,
और संग है हरे-भरे पेड़ों की छाया।

- रूचिका राय


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दादी मां मैं सबकी प्यारी,
छड़ी है मेरी सबसे न्यारी।
घर है मेरा घास-फूंस का,
सौंधी खुश्बू घर आंगन की।

- सुमन डोभाल काला


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आज की प्रमुख रचनाएँ- 22 अगस्त 2023





धन्य हैं वे माता पिता
जिन्होंने अपने बच्चों की दोस्ती
अक्षरों से कराई।
ज़ब बच्चे बड़े हुए
तो दोस्त भी बड़े होकर
शब्द बन गये।

बच्चे को बड़ा होते देख कर
आवश्यकताएं बड़ी होने लगीं
दोस्त की अब मजबूरी बन गयी
शब्द से वाक्य बनना पड़ा।

अब वाक्य अपने दोस्त के
साथ साथ मिलकर खेलने लगा.
फिर वाक्य पैराग्राफ,
पाठ,अध्याय की यात्रा
कराते हुये किताबों की दुनिया
उपहार में भेंट कर दी।

इस शर्त के साथ कि
तुम मुझसे दोस्ती मत तोड़ना।
दुनिया की कोई ताकत
तुम्हें तोड़ न पायेगी.
जो मेरा दोस्त बना
उसे दुनिया छोड़ न पायेगी।

ये अक्षर, शब्द, वाक्य
पाठ, अध्याय, की यात्रा
जब किताब तक आ जाती है।
दुनिया की हर मंजिल
अपने आप कदमों में आ जाती है...
फिर हर अक्षर हो जाते हैं चैतन्य
ऐसे बच्चों से माता पिता
भी सदा हो जाते हैं धन्य...


- राधेश विकास


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सहमति के सूत्र


“असहमति पर सहमत” होने के बजाय
अब समय है,“सहमति पर सहमत” होने का।
मत अलग हो सकते हैं,
पर मन अलग नहीं होने चाहिए।
हम सभी परिवर्तन लाने की क्षमता रखते हैं,
लेकिन वह तभी संभव है
जब हम सुनना सीखें,
एक-दूसरे से जुड़ें,
और साथ मिलकर चलने का विकल्प चुनें।
हमें यह नहीं खोजना कि
हम कहाँ और किन विषयों में अलग हैं,
बल्कि उस सूत्र को पकड़ना है
जहाँ हमारी सोच, संवेदनाएँ
और उद्देश्य एक-दूसरे से मिलते हों।
फिर देखिए,
संवाद का स्वर कितना बदल जाता है,
जब तर्क जीतने के लिए नहीं,
समझने के लिए किए जाते हैं।
क्योंकि अंततः,
विश्वास मानिए,
जब संवाद समानता के उस
छोटे से बिंदु से शुरू होता है,
तब समाधान स्वयं रास्ता बना लेते हैं।
क्योंकि “विचारों की एकता से पहले,
हृदयों का जुड़ना आवश्यक है।”


- नरेंद्र मंघनानी


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छद्म

जलेबी टेढ़ी है,
पर मीठी सबको लगती है।
ताड़ बहुत ऊँचा है,
फिर भी अकेला खड़ा है।

पिंजरे में पंछी को
दाना-पानी सब मिलता है,
छत मिलती है, सुकून मिलता है-
पर खुले आसमान को
देखकर वह रोता है।

बनारस में देव बसते हैं,
घाटों पर दीप जलते हैं,
मंदिरों में घंटियाँ बजती हैं-
फिर भी उन्हीं गलियों में
गंदगी है, कारागार भी है।

हर चमक रोशनी नहीं,
हर ऊँचाई कामयाबी नहीं,
हर सुख आज़ादी नहीं,
साधु के भेष में रावण आता है,
हर बार सीता को हर ले जाता है।


- रोशन कुमार झा


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ज़ब
सवालों का जवाब
सिर्फ लाठी हो जाए।
हिंसा,
दमन,चोरी,
सीनाजोरी परिपाटी हो जाए।
चारों
तरफ ठहाके हों
आततायी अठ्ठाहासों को,
तब
लोकतंत्र की रक्षा में
हर हाथ में लुकाठी हो जाये।


- राधेश विकास


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उम्र का आखिरी वसंत

वह जवानी में पीस लेती थी ,
मन भर अनाज...
लीप लेती थी आंगन,
पोत लेती थीं कच्ची दीवारें,
सांझ होने से पहले,
जला लेती थी आले में रखी डिबिया...
लेकिन उम्र के आखिरी वसंत में,
ढूँढती है लाठी का सहारा...
नंगे पैर खुद को व्यवस्थित करते हुए,
निहारती है गीले छप्पर पर उगती हुई बेल,
कुछ खरपतवार...
जैसे उसकी ममता,
राह निहारती है कि लौटकर आएंगे
वो परिंदे जो बरसों पहले,
उसे अकेला छोड़कर सीमा के पार उड़ गए थे।
काई लगे गलियारे...
उन पर फिसलते हुए आँसू
और उनके ना लौटकर आने वाली टीस...
झुर्रियों में पड़े हुए प्रतीक्षा के घाव
ये जर्जर हुआ शरीर
उम्र का आखिरी वसंत और आखिरी सांसे...


- मंजू सागर


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तस्वीरों से झाँकती जिंदगी,
अतीत की याद दिलाती है।
वर्तमान में मुस्कुराती वह,
भविष्य के लिए पथ बनाती है।

अंतर्मन की पीड़ा को छुपाकर
दुनिया को भरमाती है।
स्याह सफेद से भी इतर रंग
दुनिया को दिखाती है।

तस्वीरों से जो तौले जिंदगी,
उनपर ये हँसती जाती है,
लम्हों में जी ले जिंदगी को
यह हुनर आजमाती है।

काश की खींच सकूँ कुछ ऐसी तस्वीरें
जो मन का आईना बन जाए,
सिर्फ चेहरे की सुंदरता ही नहीं
मन के हर भावों से रूबरू हमें करवाए।

प्रेम रहे स्वयं से तो
तस्वीरें भी खिलखिल जाती है,
खींच लेती वह फूलों सी
मुस्कुराती जिंदगी
और स्वयं से आँख मिचौली कर जाती है।


- रूचिका राय


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तब बहुत याद आऊँगा

जाना तो है ही एक दिन,
मैं भी चला जाऊँगा...
जैसे सब चले गए।
हाँ इक रोज़,
सुबह, दोपहर या शाम,
चाहे करता रहूँ कोई भी काम,
या खटिया पर सोए,
करता रहूँ आराम।

तुम सजती-सँवरती रहना,
आईने में अपनी छवि
निहारते हुए इतराती रहना।
अपने यौवन का निखार देख,
मंद-मंद मुस्कुराती रहना।

कभी कानों पर जुल्फों को सँभालते,
कानों की बाली को देखते,
कभी नाक की फूल वाली कील देख,
धड़कनों को घटाती-बढ़ाती रहना।

नैन-नक़्श की उन तारीफ़ों को,
जो कभी तुमने सुनी थीं मुझसे,
उन्हें याद कर मुस्काती रहना।

तुम बैठी रहना यह ग़ुरूर लिए
कि तुम्हें चाहने वाले तो बहुत हैं,
मगर मुझ तक प्यार का एहसास
न पहुँचने देना... न पहुँचने देना।

मगर कोई बात नहीं,
जाना तो है ही एक दिन,
मैं भी चला जाऊँगा...
तब बहुत याद आऊँगा,
हाँ... तब बहुत याद आऊँगा।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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उम्मीद और हौसला

उम्मीद और हौसला दोनों का होना है जरूरी
जीवन जीने के वास्ते, ये दोनों बिना है अधूरी
उम्मीद यदि है किसी से तो, जीने की ललक बढती है
मन में हौसला रखकर, उम्मीद को पूरी करने होती है।

लेकिन एक बात का और है, हमें ख्याल रखना
उम्मीद किसी से उतना ही रखना, जितने सकोगे सहना
क्योंकि उम्मीद को तोड़ने में, लोगों के देर नहीं है लगती
हाँ, कहकर पलभर मे ही बाजी है पलट देती।

हौसला जिसने खुद को मजबूत है बनाये रखा
उसके वास्ते, कोई भी कार्य उसने आसानी ही देखा
फिर भी चुन्नू कवि कहते है ये बाते सदा
जीवन मे वहीं आगे बढा, जो उम्मीद और हौसला बनाये रखा।


- चुन्नू साहा


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गर्वित होकर जिंदगी

गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

जीवन की हर राह पर, सच्चाई का साथ।
मन में रखिए प्रेम को, हाथों में हो हाथ।
कर्मों से पहचान हो, निर्मल हो हर लेख-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

बीते कल की भूल से, सीखें नया प्रकाश।
मेहनत को आधार दें, मन में रखें विश्वास।
आँधी आए राह में, मुड़कर के मत देख-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

दीन-दुखी के दर्द को, अपना समझें पीर।
नेकी की राहों चले, बनकर सदा फकीर।
जिसके कारण मुस्कुरा, दुखता चेहरा एक-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

ज्ञान-दीप जलता रहे, मिटे जगत अंधकार।
वाणी में मधुरता रहे, कर्मों में संस्कार।
शब्द-शब्द में सत्य हो, भाव रहें आलेख-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।

नाम नहीं बस काम से, जीवन हो पहचान।
अपने अच्छे कर्म से, बढ़े देश का मान।
जग में जब तक साँस हो, रखते रहें विवेक-
गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।।

माटी से उठकर सदा, माटी का रखिए मान।
अपनों के सुख-दुख में, बनिए सच्चे इंसान।
जीवन ऐसा छोड़िए, याद करे हर एक-
सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख।।


- डॉ. सत्यवान सौरभ


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आज रचे नव भोर में

आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

नई सुबह की रोशनी, लेकर आए आस।
मन में प्रेम जगाइए, हर चेहरे पर हास।
मिल-जुलकर हम गढ़ सकें, सुंदर जग की रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

बीती रातें छोड़कर, आगे बढ़ते मीत।
सत्य-धर्म की राह पर, चलो जलाएँ दीप।
नव सपनों को दे चलें, मेहनत की संगीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

जाति-धर्म की बात सब, मन से कर दें दूर।
मानवता के रंग में, मिल हो हम भरपूर।
प्रेम बने पहचान अब, मिटे भेद की रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

शब्दों में हो माधुर्य, कर्मों में हो नेह।
दुख में साथी हम बने, सुख में बाँटें स्नेह।
हर आँगन में गूँज हो, खुशियों की नव रीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

ज्ञान-विज्ञान के साथ में, संस्कारों का मान।
नई सोच के संग रहे, अपनी मिट्टी शान।
प्रगति करे संसार पर, बची रहे मन प्रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

नारी को सम्मान दें, बच्चों को दें ज्ञान।
श्रमिक के श्रम का करें, दिल से हम सम्मान।
समानता के दीप से, जगमग हो हर जीत-
सौरभ अपनापन रहे, धर कर रूप पुनीत।।

प्रकृति हमारी माँ सरी, इसका रखें खयाल।
नदियाँ, वन, पर्वतों से, पूछें उनका हाल।
हरियाली के साथ हो, जीवन की संगीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।

मन में आशा, आँख में, सपनों की सौगात।
हाथों में विश्वास हो, किस्मत का हो साथ।
सौरभ प्रेम-सद्भाव से, महके जीवन-रीत-
आज रचे नव भोर में, नए दौर के गीत।।


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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आज सब भारतीय हैं...
कल से फिर धर्म, जाति,
संप्रदाय की बेड़ियों में जकड़े होंगे....
और मुल्ले, कटुए, जिहादी,
भंगी, और चमार कहलायेंगे....
आज अशफ़ाक़ और बिस्मिल की मिसालें दी जाएंगी...
कल फिर किसी अशफ़ाक़ और
अब्दुल की दाढ़ी नोच कर मॉब लिंचिंग की जाएगी,
आज भारत माता की वंदना की जाएगी,
कल फिर किसी महिला की इज़्ज़त तार तार की जाएगी....
आज हम सब भारतीय हैं गाया जाएगा,
कल फिर किसी को छोटी जात वाला बोल कर
एक ही गिलास से पानी पीने और
घोड़े पर बैठने को लेकर मार दिया जायेगा.....
आज सब स्कूलों में एकता और
अखंडता का पाठ पढ़ाया जाएगा,
कल फिर किसी टीचर द्वारा किसी बच्चे के धर्म और
जाति के आधार पर भेदभाव किया जायेगा...
आज सारे नेता उजले लिबास में देशप्रेम से ओत प्रोत होंगे,
कल फिर बेईमानी, चोरी और घोटाले में व्यस्त होंगे..
आज अधिकारी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की कसमें खाएंगे,
कल फिर चंद रुपयों के लिए किसी गरीब,
ज़िंदा को मुर्दा दिखा कर ज़मीन हड़प जाएंगे.....


- अज़ीम


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स्वतंत्रता के दस पर्यायवाची शब्दों का समायोजन

गुलामी के जंजीर को अब है तोड़ने,
आजाद है हम, हम आये है आजादी लेने।

पराधीनता हमें कभी स्वीकार नहीं करना,
स्वाधीनता का है,अब हमें अधिकार पाना।

बंधनों में कब तक बंधे रहेगे, बताओ भला,
मुक्ति का मार्ग को प्रशस्त तो ही मुसीबत टला।

स्वाययता, स्वतंत्रता के बराबर ही है बतलाता
मिले यदि स्वाययता तो ऐ अच्छी समझौता।

जीवन में जीने वास्ते, आवश्यक है स्वच्छंदता
बिना रोक टोक के काम आसानी से है होता।

रिहाई ही अपराध बोध को है कम करता
वर्ना सजा से तो जीवन नर्क है बन जाता।

जीव जगत में आना जाना, निरंतर है बंधा
मोक्ष मिली यदि तो, बात है एकदम जुदा।

स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है इसे मानो
लिये हो जन्म धरा पर तो, स्वराज को तू मानो।

मुक्तिलाभ सबको सरल भाव से नही मिलती
इसे पाने हेतु कठिन राह से गुजरना ह पड़ती।

मनमानी कर लेना आसान नहीं, और ठीक भी नहीं
परेशानियों का आमंत्रण है, और काम बिगाड़े भी कही कही।


- चुन्नू साहा


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गायेगें आज आजादी की तराणा

हँसने खेलने की है ये। अपनी जिन्दगानी
वन्दगी है सब भाई बहन जो है हिन्दुस्तानी
प्रेम भाव से करता हूँ देश को नमस्कार
पावन देवभूमि है जम्बू दीप ये हमार
अस्सी वर्ष की है ये हमारी जन्म की आजादी
अक्रान्ता के द्वारा हो गई इस धरती की बर्बादी
वीर शहीदों को करता हूँ नित्य ही प्रणाम
जिन्होंने शहादत देकर दी है अपनी आवाम
इस धरती की मिट्टी हेतु हाजिर है हमारी कुर्बानी
माँ भारती के लिये कर देगें शहीद अपनी जवानी
कसम खाते हैं स्वाधीनता के लिये हजारों बार
मिल कर करेगें अपने दुश्मन पे बार बार प्रहार
उन गद्दारों से बच कर रहना है मेरे देश के साथी
दिखला रहा है दो दाँत बन कर ये सब हाथी
दिल में छुपाये है बैरी दुश्मन से गहरा प्यार
राष्ट्र हित में करना है ऐसे जयचन्दों पे वार
माँ भारती के हैं हम सच्चे वीर राष्ट्रभक्त सपूत
मिटा देगें जो भी बनेगें माँ भारती के कपूत
हम पर बुरी नजर ना रख ओ नादान जमाना
सीने में भर देगें हम भारतीय गोली का नजराना


- उदय किशोर साह

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18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


14 August 2026

आज की रचनाएँ- 15 अगस्त 2026






मैं रहूं या ना रहूं

बिलासपुर लेखक संघ से है
प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए

रक्त की बूंदें मेरी, कपाल की भरदें दवात,
हड्डियों की कलमें लिखें मां भारती की आरती,
देवधरा गुणगान हो,
कहलूरी का सम्मान हो,
और लेखक संघ वैभव चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं....

जय जय करो पुरुषार्थ की परमार्थ की।
हर हाल में निजस्वार्थ पराजय चाहिए,
वैभव अजर अमर रहे यही गीत गाना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए

दुश्मनों से कह दो भारत,
अमर है, यह सत्य कहना सीख लो
सच ना बोले ऐसी जीव्हा को ही बाहर खींच लो
वैभव अजर है अमर रहना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए

- बृजलाल लखनपाल


*****


नफरत

नफरत की चश्मा उतार कर देखो
सामने दिखेगा तुम्हें सिर्फ इन्सान
मन को सुकून देने वाला है
जब नफरत का करोगे अपमान

नफरत की बीज मन में ना  डालना
छीन लेता है ये जीवन का सुकून
नफरत की पौधा और इनका फल
पैदा करता है अदावत की  जूनून

इतिहास के पन्ने पलट कर देख लो
मिट गई है सूरमाओं की हस्ती
जीवन के सुख में आग लगा देता है
जल गई है धरा पे बस्ती की  बस्ती

नफरत की जो खोल बैठा है दुकान
मिट गई है उस सज्जन की जहान
सगे सवंधी सड़क पे आ गये हैं
पड़ गई है उनकी मुसीबत में जान

गुस्से क़ो ठंडे बस्ते में रख मेरे भाई
गुस्सा है अब बारूद की एक ढ़ेर
अपनो में हो या बेगानों की ताईं
गुस्से से नही है सुकुन को कभी खैर


- उदय किशोर साह


*****


हर की उमस
और इस गहन ताप से 
निकलकर
ठिठुरते हुए जाड़ों में चलते हैं
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।

वादियों की बाहों में
सिमटते हुए बादल,
हवाओं की तरंगों में
हरियाली का फैला हुआ आँचल
फलों से लदे हुए झाड़ों में चलते हैं,
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।

जहां हर एक मोड पर
मंजिल नजर आती हैं।
बहता हुआ पानी देखकर ,
थकान उतर जाती है।
जहां पत्थरों का सीना फाड़कर
झरने निकलते हैं।
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।

ठंडी हवा जब
छूकर गुजरती है,
सुबह के कोहरे पर सुनहरी धूप ,
चांदी सी बिखरती है,
बर्फ के घरौंदे,
उस धूप से पिघलते हैं।
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।


- मंजू सागर


*****


कैसे ?

आज अपनी नौकरी बचानी मुश्किल,
धंधा-कारोबार चलना हुआ मुश्किल,
ख़ुद पे भरोसा करना हुआ मुश्किल,
औरों की क्या बात करें।

सोचो, आज़ादी जो दिलाई अंग्रेज़ों से,
हमें इस आज़ादी को कैसे बचाओगे ?
इस देश की मिट्टी का ऋण
कैसे चुकाओगे ?
सोचो ज़रा, अपना फ़र्ज़
कैसे निभाओगे ?

चील की नज़र से खग का नीड़
कैसे बचाओगे?
भेड़ियों से मेमने को
कैसे बचाओगे ?

जिस आज़ादी के लिए ख़ून बहा,
उस ख़ून का ज़रा भी
तुममें कतरा है ?
हार नहीं मानोगे ?
जज़्बा है ?
जोश है ?
अगर हाँ, तो आगे बढ़ो-
वरना हर ख़ामोशी तुम्हारी
देश के लिए ख़तरा है।

सोचो ज़रा,
ये देश सिर्फ़ तुम्हारा नहीं,
तुम्हारे पुरखों की अमानत है।
इस मिट्टी पर जो ऋण है तुम्हारा,
उसे चुकाना भी
तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।

आज जो मुश्किल है,
उससे लड़ोगे कैसे?
अपने हक़ के लिए
खड़े होगे कैसे?
जिस आज़ादी को
ख़ून से सींचा गया था,
उसकी हिफ़ाज़त
करोगे कैसे ?

सवाल सिर्फ़ आज़ादी का नहीं,
सवाल अपने होने का है।
सवाल सिर्फ़ हक़ का नहीं,
सवाल फ़र्ज़ निभाने का है।

तो सोचो ज़रा-
जब वक़्त तुमसे पूछेगा,
तुम क्या जवाब दोगे?
जिस मिट्टी ने तुम्हें पहचान दी,
उसका ऋण कैसे चुकाओगे ?


- रोशन कुमार झा


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तिरंगा- हमारी आन, बान और शान

हमारी आन, बान और शान है तिरंगा
गर्व से लहराती है, खुली आसामन मे तिरंगा
भारत देश के प्रतीक चिन्ह है ये तिरंगा
पहचान बताती है हमारी ये तिरंगा।

जहां भी रहो, जैसे भी रहो, यदि थामे हो तिरंगा
गुजरे यदि कोई वहाँ से तो पहचान बताती तिरंगा
देखते ही लोग कहेगे, देखो ये है भारतीय तिरंगा
तब तुम्हे गर्व महसूस होगी, कहोगे वाह तिरंगा।

अपने घरो में, कार्यालय में, शान से लहराओ तिरंगा
हाँ, सम्मान के साथ ही लहराना तुम तिरंगा
संघर्ष, बलिदान के बाद ही मिली है हमें तिरंगा
इसीलिए तुम सब संभाले रखो ठीक से तिरंगा ।

आज़ाद मुल्क के आज़ादी के बताती तिरंगा
जब-जब देखो तुमसब ये तिरंगा
गुलामी की जंजीर टूटती दिखायेगी ये तिरंगा
आओ हमसब मिलकर लहराये तिरंगा


- चुन्नू साहा


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राष्ट्र-गौरव तिरंगा

​केसरिया साहस का प्रतीक, श्वेत शांति की छाया,
हरे रंग ने भारत भू पर, अनुपम रूप सजाया।

मध्य सुशोभित धर्मचक्र यह, गति का पाठ पढ़ाता,
पिंगली वेंकैया का यह सपना, जग में मान बढ़ाता।

​जय भारत, जय ध्वज यह, जन-जन का अभिमान,
कश्मीर से  कन्याकुमारी तक, गूंजे भारत महान!

​अखंडता और एकता की, यह पावन परिभाषा,
उन्नति और समृद्धि की, जन-जन की अभिलाषा।

चौबीसों तीलियाँ सिखलातीं,निरंतर बढ़ते जाना,
सत्य, त्याग ,कर्मनिष्ठा से, भारत-भाग्य जगाना।

​जय भारत, जय ध्वज यह, जन-जन का अभिमान,
कश्मीर से  कन्याकुमारी तक, गूंजे भारत महान!

​हर घर पर लहराए तिरंगा, गौरव-गाथा गाए,
सारे जहाँ से अच्छा यह देश, सदा मुस्काए।

जाति,पंथ और भेद भुलाकर,राष्ट्र-धर्म अपनाएँ,
भारत माता के चरणों में, हम शीश सदा झुकाएँ।

​जय हिंद, जय भारत


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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हुंकार

भरी थी हुंकार गगन हिंद का गुंजाया था,
इंकलाब के नारों से वतन को जगाया था।

वतन के खातिर कितने वीरों ने लहू बहाया था,
अपने लहू की खुशबू से तिरंगे को महकाया था।

लहू के हर कतरे ने जोश हिंद में जगाया था,
जीवन को नहीं वीरों ने शहादत को अपनाया था।

कितनी मांओं के दिल अंदर से रोया था,
क्या क्या सपना जो उन्होंने संजोया था।

सपना बेशक वो पूरा न हो पाया था,
क्योंकि वीर बेटों ने वतन को अपना बनाया था।

मरते दम तक सिर्फ वतन को दिल में बसाया था,
खुदमुख़्तारी न मिलने तक सियाहपोशी को अपनाया था।

तिरंगे की आन बान शान को अपना बनाया था,
आजादी का ये दिन कांटों का ताज पहन कर आया था।


- राज कुमार कौंडल


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तिरंगा झंडा

तिरंगा झंडा की शान बढ़ाएंगे
देश भक्तों को तैयार करेंगे
तन मन अर्पण के यत्न करेंगे
हम अपने कर्तव्य को निभाएंगे।

गली गली में झंडा लेकर चलेंगी
लोगों के दिल में भक्ति जगाएंगी
शांति वातावण को पैदा करेंगी
हम तिरंगा झंडा की रक्षा करेंगी।

तीन रंगों की झंडा शोभायमान
देश केलिए प्रतीक और पहचान
सभी धर्मों करता भक्ति से नमन
घर घर में लहराते तिरंगा हर दिन।

देश भक्तों के त्याग तिरंगा
वीरों के बलिदान तिरंगा
सभी धर्मों की एकता तिरंगा
स्वतंत्रता को याद दिलाता तिरंगा।


- श्रीनिवास एन


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आज़ादी

सबसे पहले सबसे ज्यादा
हमको प्यारी आजादी
सबको प्यारी आजादी
मातृभूमि पर मर मिटने वाले
को पसंद थी आजादी.

इंकलाब जिंदाबाद है
भगत सिंह के नारों से
हुये कुर्बान वीर सपूत जो
उनको पसंद थी आजादी

आज़ादी कोई भीख नहीं है
नहीं किसी की बपौती
गाँव के युवा स्त्रियों जवान को,
गाँव के किसान को
दुनिया जहान को
पसंद थी आजादी


- मनोज कौशल


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तिरंगा प्यारा-प्यारा

तिरंगा प्यारा-प्यारा है,
भारत देश हमारा है।
केसरिया देता बलिदान,
सफेद सिखाता शांति महान।
हरा रंग खुशहाली लाए,
नीला चक्र आगे बढ़ाए।
पंद्रह अगस्त का दिन है न्यारा,
आजादी का पर्व है प्यारा।
वीरों ने जो बलिदान दिया,
हमने स्वतंत्र आसमान लिया।
मिल-जुलकर हम आगे बढ़ेंगे,
भारत का सम्मान बढ़ाएँगे।
पढ़-लिखकर बनेंगे होशियार,
देश बनाएँगे सुंदर-शानदार।
न ऊँच-नीच, न कोई भेद,
सबके मन में प्रेम का मेल।
भारत माँ की जय-जयकार,
तिरंगा रहे सदा ऊँचा-ऊँचा अपार

*****

स्वतंत्रता दिवस महान

आओ बच्चों, आज मनाएँ,
आजादी का पर्व महान।
फहराएँ हम प्यारा तिरंगा,
गूँजे भारत का जयगान।
वीरों ने सपने सँजोए थे,
भारत हो स्वतंत्र महान।
हँसते-हँसते देश के खातिर,
कर डाला अपना बलिदान।
केसरिया हमको सिखलाए,
साहस, त्याग और बलिदान।
श्वेत रंग कहता है सबसे,
रखना मन में सदा समान।
हरा रंग खुशहाली लाए,
धरती का बढ़ता सम्मान।
नीला चक्र हमें समझाए,
चलते रहना बनकर गतिमान।
नन्हे हाथों में किताबें हों,
आँखों में हों नए अरमान।
मेहनत, सच्चाई और एकता से,
हम ऊँचा करें हिंदुस्तान।
जाति-धर्म के भेद भुलाकर,
बनें प्रेम की मीठी तान।
मिलकर ऐसा देश बनाएँ,
जिस पर गर्व करे हर इंसान।
भारत माँ की जय बोलेंगे,
गूँजे हर आँगन-हर मैदान।
स्वतंत्रता का पर्व मनाएँ,
जय हिंद! जय हिंद! हिंदुस्तान


- गोपाल कौशल भोजवाल


*****


स्वतंत्रता दिवस

15 अगस्त 1947 को देश हमारा आज़ाद हुआ,
वीरों के बलिदानों से भारत आबाद हुआ।

पर लगता है आज भी कहीं हम गुलाम हैं,
जातिवाद और भेदभाव के बीच परेशान हैं।

आरक्षण का दर्द भी आज तलक छलकता है,
भ्रष्टाचार का पैमाना रोज़ नया ही बढ़ता है।

नेता अपनी रोटी सेंकें, जनता को लॉलीपॉप देते हैं,
अपनी-अपनी स्वार्थ की दुकानें सजाकर बैठे हैं।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो की नीति,
आज भी बाँट रही है देश को, कैसी है यह रीति।

सच्चा स्वतंत्रता दिवस तभी हम मनाएँगे,
जब अपने विचार खुलकर कह पाएँगे।

जब जाति-धर्म से ऊपर इंसानियत का मान होगा,
तभी तिरंगे का सच्चा सम्मान होगा।

जब हर नागरिक निर्भय होकर अपना अधिकार पाएगा,
तभी मेरा भारत सच में आज़ाद कहलाएगा।


- गरिमा लखनवी


*****


माँ एक शब्द नहीं
एक भाव है
एक विज्ञान है
एक महासागर है
एक पूर्ण विराम
एक घर ही नहीं
सम्पूर्ण ब्रह्मांड है
आकाश है
हिमालय जैसी ऊँची
घाटी जैसी गहरी
माँ ही तो है धरा
माँ एक अंक है
माँ एक वेद है
जिसमें सम्पूर्ण भण्डार
वेदों का वेद
जो कोरी सलेट को
भर भर ज्ञान दे
वही तो है माँ
जो अपने कलेजे
के टुकड़े को भी दान दे
धन्य है माँ
माँ मेरी माँ

- सुमन डोभाल काला


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आखिरी दुआ

थक चुकी हैं मेरी आँखें अब
तेरे नाम का रास्ता देखते-देखते...
जिस रास्ते से होकर
तुम गए थे शहर की ओर
मेरे दिल से निकालकर
इन दिनों मेरी आँखें
उसी रास्ते की मिट्टी में रहती हैं
मैं अपनी भीगी-भीगी आँखों से
दर्द से भरे दिल के साथ
तुम्हारे अलविदा कहते हुए
पैरों के निशान को रोज़ देखती हूँ
बरसों-बरस हो गए हैं तुम्हें,
अब तो मेरे दिल को भी याद नहीं
न जाने कितने बरस हो गए हैं तुम्हें
मेरी मोहब्बत से दूर
शहर के बाज़ार में गए हुए
इतने बरसों में
कभी-कभी मेरी रूह मुझसे कहती है
कि शहर की आबो-हवा में जाकर
ज़रा से बदल गए हो तुम
मुझे और मेरी मोहब्बत को
अपने दिल से भुला चुके हो तुम
पर मैं इस कमबख्त, निगोड़े दिल का
क्या करूँ, ये है कि
मानने को राज़ी ही नहीं है
अगर तुम समझते हो
कि मेरी रूह ने
तुम्हारे किरदार पर
मोहब्बत के वादे से मुकरने की
झूठी तोहमत लगाई है
तो फिर आओ ना मेरी बाँहों में
तुम्हें मेरी मोहब्बत का खुला निमंत्रण है
आकर मेरी बाँहों में, मेरी रूह की बात को
और कुछ नहीं, एक झूठ साबित कर जाओ ना
आखिर तुम्हें डर किस बात का है
तुम मुझे बताओ ना
देखो, मैं तुम्हारी कहानी का ही एक किरदार हूँ
मेरी तरफ से तो मैं अभी भी तुम्हारा प्यार हूँ
पर मुझे लगने लगा है अब ये
कि मेरी कहानी को, मेरे दिल को
बरसों पहले अलविदा कह चुके हो तुम
मेरी साँसों ने सिसक-सिसक कर
सदियों तक तुम्हारे ख़त का इंतज़ार किया
पर तुम्हारी मोहब्बत के इंतज़ार ने
मुझे आँखों में पानी के सिवा और कुछ न दिया
बस अब एक आख़िरी दुआ का ख़त मैं लिखकर जाऊँगी
अपने लहू से, तुम्हारी बेवफ़ाई के नाम
तुम्हारी रूह के लिए दुआ में
आख़िरी ख़त लिखकर अपने लहू से
अपनी मोहब्बत की समाप्ति का ऐलान
इस सारी कायनात के सामने कर जाऊँगी
मैं ऐसे कैसे चली जाऊँ मैं बिना कुछ कहे
तुमने मेरी मोहब्बत को समझा क्या है
इस कायनात में...
तुम्हें आज बेवफ़ा कहकर
बदनाम कर जाऊँगी मैं


- आकाश शर्मा आजाद




*****


ग़ज़ल

उतनी ये ज़िंदगानी है।
जितना दाना -पानी है।

छांँह मिले या धूप कहीं,
सबको राह बितानी है।

हैं सबके अपने मसले,
सबकी राम कहानी है।

कुछ में खिलती मुस्कानें ,
कुछ आँखों में पानी है।

यूँ महफूज़ समझ रहना,
तेरी ये नादानी है।

ठेठ पुरानी बात कोई,
लगती अब बचकानी है।

तब तक है मस्ती खोरी,
जब तक साथ जवानी है।


- नवीन माथुर पंचोली



*****


तुहें मिन्जों खून देवा मैं देणी अज़ादी

जुल्म सए कने सब कुछ गवाया
तिन्हें जे एह देश कराया आज़ाद
तिन्हारी कुर्बानियां नी भुली सकदे
सोने री चिड़िया थी करी तरी बर्बाद

भगत सिंह राजगुरु कने सुखदेव
तीनों थे दृढ़ निश्चय रे पक्के
ज्यादा उम्र नी थी इन्हांरी
पर अंगरेजां रे छड़वाई तिरे थे छक्के

चंद्रशेखर आज़ाद था तगड़ा जवान
मुछाँ हमेशा रहन्दी थी खड़ियां
अंग्रेजें लाया बतेहरा ज़ोर पर
पन्हाई नी सके तिसजो हथकड़ियां

सुभाष चंद्र बोसे आज़ाद हिंद सेना बणाई
अंग्रेजां कने लड़ी डटी कने आज़ादी री लड़ाई
तुहें मिन्जों खून देवा मैं देणी अज़ादी
सारे हिन्दुस्तानियाँ जो एह आवाज थी लगाई

आज़ादी री लड़ाई लड़ने वाल़ेयां कित्ते बड़े कम्म
छुपी छुपी करदे थे कम्म कई टोलियां थी बणाई
गांवां गांवां गल़ी गल़ी लोकां रे मना बिच
देशभक्ति री थी अलख जगाई

बौहत जवान पकड़े कने जेलां च पाये
मारी दिते सै सैजे थोड़ा बी गलाये
सेल्युलर जेला च लोकां पर कित्ते बड़े अत्याचार
लोहे री बेड़ियों च जकड़े कुछ फांसीया लटकाए

कर्ज तिन्हांरा नी सकदे कदी बी उतारी
तिन्हें जे जेलां च सारी उम्र गुज़ारी
आओ अज मिली सारे तिन्हांजो याद करिये
तिन्हें जे आज़ादिया खातर जिन्दगी दित्ति वारी


- रवींद्र कुमार शर्मा


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स्वतंत्रता!
सिर्फ एक शब्द नहीं है।
बल्कि विश्वास है, अहसास है,
नागरिकों का अधिकार है।
अच्छी शिक्षा प्राप्त करना...
जो मन करे वो खाना...
जहां चाहे वहां घूमना...
जो मर्जी वो पहनना...
और अपने वोट से,
नेताओं का चुनाव करना...
स्वतंत्रता! सिर्फ एक शब्द नहीं है,
यह लोकतंत्र की आत्मा है।


- दीपक कोहली


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मैली गंगा

नीर बहाती गंगा, पीर बताती गंगा,
घाट-घाट की प्यास बुझाए, जीवन की आस जगाती गंगा।

माँ कहकर जिसे पुकारा, उसकी ही गोद मैली है,
श्रद्धा के दीप जलाते हम, पर थैली कूड़े से भरी है।

अस्थि, फूल और पूजन-सामग्री, सब तुझमें बहा देते हैं,
पाप धुलाने की चाह में, तेरा ही आँचल मैला करते हैं।

कल-कल करती धारा पूछे, कब तक मेरा मान घटाओगे ?
मुझमें आस्था रखते हो तो, मुझको स्वच्छ कब बनाओगे ?

गंगा केवल जलधारा नहीं, जन-जीवन की श्वास है,
जिसकी निर्मलता में ही, भारत की सच्ची आस है।

आओ, गंगा को गंगा रहने दें, कचरे का भार न दें,
माँ की निर्मल गोद बचाकर, आने वाली पीढ़ी को उपहार दें।

नीर बहाती गंगा रहे, निर्मल बहती गंगा रहे,
हमारी श्रद्धा तभी सच्ची हो , जब माँ गंगा स्वच्छ रहे।


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आजादी

आजादी केवल तिरंगे की शान नहीं,
केवल सीमा की पहचान नहीं।
आजादी वह उजली साँस है,
जिसमें हर मन का अपना आकाश है।

सोच सकूँ बिना भय, बिना बंधन,
कह सकूँ सच बिना किसी उलझन।
अपने सपनों को पंख लगा सकूँ,
अपने कर्मों से राह बना सकूँ।

रहने की आजादी सम्मान के साथ,
जीने की आजादी समान अधिकार के साथ।
काम वही, जिसमें मन की उड़ान हो,
हर श्रम को अपना सम्मान हो।

आजादी केवल मुझ तक सीमित न रहे,
हर हाथ को अवसर,
हर आँख में सवेरे रहे।
नारी हो, नर हो, निर्धन या धनवान
सबको मिले जीने का समान आसमान।

और सबसे बड़ी आजादी यही
इंसान होकर इंसान बने रहें।
नफरत से मुक्त, करुणा से भरे,
अपने भीतर के दीपक को धरे।

देश तभी सचमुच आजाद कहलाएगा,
जब हर मन निर्भय मुस्कुराएगा।
तिरंगा तभी ऊँचा लहराएगा जब
हर भारतीय सम्मान से जी पाएगा।


- डाॅ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2

वो वीर थे महान हुए देश पर कुर्बान-2
जय हिन्द का नारा हम लगायेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना

गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2

बाँधे सर पर थे कफन मारे चुन-चुन के दुश्मन
झंडा सीमा पर हम तो लहरायेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना

गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2

राजगुरु सुखदेव संग भगत सिंह
थे वीर-2
असेम्बली को जब बम से उड़ाये थे
वंदे मातरम गाये थे ना

गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2

बोस उध्दम आजाद की है कुर्बानी याद
कैसे याद परम वीर नहीं आयेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना

गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 💐


- रिंकी सिंह, मुंबई


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तिरंगा

हवा से नहीं,
फौजियों की साँस से लहराता है तिरंगा,
किसी डोर से नहीं,
उनके हौसलों से बंधा है तिरंगा।

जिस मिट्टी को हम
माँ कहकर माथे से लगाते हैं,
उसकी हिफाज़त में
वे अपनी जवानी छोड़ आते हैं।

हम चैन से सोते हैं
तो कोई सीमा पर जागता है,
हम घर में दीप जलाते हैं
तो कोई बर्फ़ में भी
सीने में सूरज जगाए रखता है।

किसी माँ की आँखों का सपना है वह,
किसी पिता का अभिमान,
किसी बहन की राखी है,
किसी पत्नी का मौन विश्वास,
और किसी बच्चे के लिए
पापा के लौट आने की आस है वह।

गोली जब सीने को चीरती है,
तो दर्द से पहले
देश निकलता है उस जवान की साँसों से...
और जब आख़िरी साँस
मिट्टी में मिल जाती है,
तब वही साँस
तिरंगे में समा जाती है।

इसलिए मत कहना
कि तिरंगा केवल हवा में लहराता है....
वह तो उन अनगिनत वीरों की
धड़कनों पर लहराता है
जिन्होंने अपना आज दे दिया
ताकि हमारा कल मुस्कुरा सके।

तिरंगा कपड़ा नहीं है,
यह शहीदों की आख़िरी साँस का विस्तार है।


- नरेंद्र मंघनानी


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तिरंगा लहराया है, गगन ने सर झुकाया है,
आज़ादी का जश्न, हिंदुस्तान मुस्कुराया है।

मंगल पांडे कीललकार, भगत सिंह की रफ़्तार,
बापू की अहिंसा और सुभाष चंद्र की वो धार।

कैसे आज़ादी का जश्न ये सुहाना आया है,
भारत माँ के वीरों ने, अपना लहू बहाया है।

नहीं ये बस पंद्रह अगस्त की तारीख़ पुरानी,
हर कण-कण में बसी है, बलिदान की कहानी।

जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर सब आए हैं,
देख आज़ादी का जश्न, गीत मिलकर गाए हैं।

सदियों की दासतां का बोझ हमने उतार दिया,
विजय के इस जश्न से, जग को सँवार दिया।

अधिकार मिले हैं हमको, अब कर्तव्यों की बारी है,
संविधान की मर्यादा, हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

अशिक्षा, भेदभाव कुरीतियों को मिटाना है,
आज़ादी के जश्न में, नया दीप जलाना है।

विज्ञान हो या अंतरिक्ष, अब हम सब आगे बढ़ते हैं,
आत्मनिर्भर भारत का, हर सपना सच हम करते हैं।

यह देश हमारा संतों का, यह भूमि पावा, वीरों की,
आज़ादी का जश्न मनाओ, देखो महक तक़दीरों की।

​आवाज़ें गूंज उठी जय हिंद! जय हिंद! के नारों की,
मुश्ताक़ याद करो तुम कुर्बानी भारत मां के लालों की।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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जहां पर्वत आसमान से मिलते हों,
जहां हर गली में फूल खिलते हों,
जहां की जमीन कभी बांझ नहीं होती,
जहां सुख, समृद्धि और शांति साथ मिलती हों।

जहां की पवन शीतलता का वरदान लाती हो,
जहां पेड़ पर बैठी हर चिड़िया गाती हो,
सूर्य जिसका एक एक कर्ण रोशन करे,
हर गली में जो आजादी की राह बनाती हो।

उस देश भारत को नमन करता हूं,
उसमें महानता की और बूंदे भरता हूं,
भारत को विश्वगुरु बनाने की,
भारत को ऊंचाइयों पे ले जाने की कोशिश करता हूं।


- प्रणव राज


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