साहित्य चक्र

13 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 13 अगस्त 2026







अमृत मंथन

अमृत मंथन होता है यहाँ हर बार,
सबकी लगती अमृत पाने को कतार।

देव आज भी छले जाते हैं,
राहु-केतु अमृत पा जाते हैं।
कौन चलाए सुदर्शन चक्र यहाँ ?
कृष्ण भी सब देख
मौन बंसी बजाते हैं।

हर बार अपने हिस्से में
बस हलाहल ही आता है,
अमृत मंथन का युग
अब केवल कथा कहलाता है।

क्या नौकरी, क्या पढ़ाई,
क्या तबादलों का व्यापार।
रोज़ खुलती सरकारों की कलई,
रोज़ नया होता भ्रष्टाचार।

प्रजातंत्र अब
बस चुनावों तक सीमित है,
जनता हर दिन ठगी जाती,
सत्ता फिर भी जीवित है।

गरीब को हर ठग नोच रहा,
हर घड़ी, हर पग।
न्याय खड़ा है मौन यहाँ,
सत्य बना है अभागा जग।

कब फिर कोई कृष्ण आएगा?
कब सुदर्शन फिर लहराएगा?
कब इस मंथन से अमृत निकलेगा,
और विष पीने वाला भी मुस्कुराएगा ?


- रोशन कुमार झा


*****


मेरी अपनी मधुशाला

पीले जितना पी सकता है
तू इन अंगूरों की हाला,
मैं खड़ा हूं तेरे बगल में
लेकर दोनों हाथों में प्याला।

कवि बनकर आया साकी
लेकर कविताओं की हाला,
मन भर सुनता जा तू
सुनाती जाएगी मेरी मधुशाला।

यहां का पता भूल न पाते
जो लोग हाथों में लिए रहते प्याला,
मैं भी उन्हें भूल न पता
जो उन्हें पिलाता हूं हाला।

कवि का रस ऐसा चढ़ा
की कभी खाली न होता उनका प्याला,
शाम को उनके साथ
खड़ी होकर चल दी मेरी मधुशाला।


- प्रणव राज


*****


घूटन

करूंगा शिकायत
रब के दर पर
जिन्होंने मुझे रुलाया है।
मुस्कुरा कर
औरों के संग
मेरी आंखों में आंसू लाए है।
थक चुका हूं
हर रिश्ते को निभा कर
अब जाकर
अपने रब के घर
उसको अपना
हर गम सुनाऊंगा।
दुआएं जिनको
रास न आई मेरी
देकर बददुआएं उनको
अपनी बिरहा की कहानी
सब को सुनाऊंगा।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****


अपने तो अपने होते है

अपने तो अपने होते हैं ,
उसे पराये,हम क्यो समझते है ?
सुख दुख की हरेक घड़ी में,
अपने ही तो,पास आते है।

भले कभी-कभार थोडी मनमुटाव होती है,
विचार एक दुसरे से मेल नही खाती है,
निज मन मर्जी को ,हम कर लेते है
लेकिन फिर भी,अपनापन तो रखते है।


नाराजगी का बात को मन मे रखकर
खुश ना रह सकोगे, अपनो से दुर होकर,
इस बात को ,हमे सोचना तो होता है,
जैसे भी हो,अपने तो फिर से मना लेते है।

दो चार दिनों की जिंदगी मे पराये को लेकर
अपनो से दुर रहना,है एकदम बेकार,
पराये तो सिर्फ, खुश मे ही दिखते है,
अपने तो, सदैव अपने ही होते है।


- चुन्नू साहा, पाकूड


*****


समस्या गिनाना आसान है,
समाधान खोजना कठिन

हम अक्सर बस समस्याएँ बताते जाते हैं...
यह गलत है, वह ठीक नहीं है,
यह क्यों हुआ, वह कैसे हो गया...
लेकिन कभी ठहरकर यह नहीं सोचते कि
इसका हल क्या हो सकता है?
हम स्वयं इसके लिए क्या कर रहे हैं ?
और यदि अभी कुछ नहीं कर रहे,
तो क्या कर सकते हैं ?

समस्या सामने रखकर
जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डाल देना बहुत आसान है।
फिर सामने वाला उस समस्या के बारे में
सोचता रहे, उलझता रहे और समाधान खोजता रहे।

लेकिन असली समझदारी तब है,
जब हम समस्या के साथ
समाधान की दिशा भी लेकर आएँ।
क्योंकि केवल यह कहना कि
“समस्या है” शिकायत है;
और यह कहना कि
“समस्या है, आइए देखते हैं
इसे कैसे हल करें” जिम्मेदारी है।
समाधान खोजने वाले ही परिवर्तन लाते हैं।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


आदिवासी- प्रकृति के सच्चे प्रहरी
ए.सी. के कमरों में हम,
फिर भी बेचैन और बीमार,
हर सुविधा पास हमारे,
फिर भी जीवन लाचार।
वो जंगल में रहते हैं,
धरती को माँ कहते हैं,
जड़ी-बूटी अपनी दवा,
प्रकृति से ही जीते हैं।
न बोतल का पानी चाहिए,
न कृत्रिम हवा का सहारा,
पेड़-पौधों से रिश्ता उनका,
धरती ही उनका संसार सारा।
बिरसा मुंडा ने भी कहा था,
जल-जंगल-जमीन हमारी,
अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति,
यही तो है पहचान हमारी।
हमने प्रकृति को छोड़ा,
और रोगों को अपनाया,
उन्होंने प्रकृति को थामा,
तो जीवन स्वस्थ बनाया।
सोचो ज़रा-
सभ्यता आगे बढ़ी है,
या प्रकृति से दूर खड़ी है ?


- बीना सेमवाल


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सच्चे रक्षक हैं आदिवासी
जल, जंगल, जमीन के
सच्चे रक्षक हैं
आदिवासी.
भारत भूमि के सच्चे
सेवक हैं आदिवासी
उन्हें पसंद है जंगलों के
पेड़ पौधे पशु पक्षी
जंगली जानवर
जंगलों के घास और फूस.
उन्हें पसंद है
प्रकृति की बनाई
संस्कृति
पहनावा रहन-सहन
बात विचार.
वे मूलनिवासी हैं
इस धरती के
उन्हें पसंद है यहां
रहना खाना.
सच में ,
जल जंगल जमीन के
सच्चे रक्षक हैं
आदिवासी
मूलनिवासी..!


- मनोज कौशल


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सुमन का अंतर्मन

एक शाम अलसायी सी,
मन में महिमा मुस्कायी सी।
डगमग डोल रही डाली से,
क्षण-क्षण में मुरझाई सी।

कभी गजरा बन इठलाती है,
प्रभु-पद पर शीश नवाती है।
समझे न कोई सुमन की व्यथा,
पल-पल जो काटी जाती है।

बीज से बढ़कर बचपन मुस्काया,
शाखों पर भ्रमरों का गुंजन छाया।
कैसे बांधूं अपने पाश में उनको,
मकरंद का मधुर मिलन न हो पाया।

बस यही मेरी लघु कहानी है,
पल दो पल की जिंदगानी है।
खुशबू ही मेरी खास पहचान,
बगिया-मंदिर महकानी है।

सींच-सींच तुमने पाला है,
चमन चहुंओर संभाला है।
पूरा अधिकार तुम्हारा मुझ पर,
तेरी खुशी ने मुझे निहाला है।

तूने बढ़ाया सदा मेरा मान,
हर मोड़ पर मिला सम्मान।
शहीदों के शीश चढ़ूं जब मैं,
बढ़ जाता मेरा गौरव-गान।


- सविता सिंह 'मीरा'


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​बरस रही है आज जो सावन की ये घटा,
दिल को हंसी शाम,याद इक बात आ गई।

​बूंदों के शोर में तेरी आवाज़ सी लगी,
जैसे ,सावन में तू बनके मेहमान आ गई।

​तन्हाईयों के शहर में जलते हैं दिए अब ,
हर मोड़ पर जैसे तेरी परछाई आ गई।

​मौसम है वो ही सर्द और सुलगती है आरज़ू,
जाने कहाँ से घूम कर फ़िर बरसात आ गई।

​मुश्ताक़ अब न पूछ हमसे हिज्र का मज़ा,
जीने की हसरत, ज़िंदगी की शाम आ गई।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह "सहज़"


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शराब है विनाश की दवाई

मदिरापान का जो हुआ यहाँ शिकार
उजड़ा उस जालिम का घर .परिवार
नशे की लत में नाली में वो समाया
अपने नौनिहाल को भूख से तड़पाया

मदिरा क़ा करो जग में सब वहिष्कार
बचा लो भाई खुद की हँसता संसार
गर पाना है समाज में मान सम्मान
मदिरालय से छुड़ा लो अपनी पहचान

अंगूरी रस का जग में हो तिरस्कार
इन्सानियत जिसे नहीं करती स्वीकार
फिर रोग व्याधि की दलदल में क्यूं जायें
सोम रस को कभी जीवन में ना अपनायें

सभ्य हो सभ्यता पर करो अब विचार
हैवानियत से बच कर रहना मेरे यार
गृहणी की बात मान कर रोज मस्कुराना
मधुशाला से उजड़ गये पढ़े लिखे सयाना

लालपरी की मत कर जीवन में इन्तजार
इस बेवफा ने रूलाया है कितने ही परिवार
बुद्धि विनाश की है ये जहर सी दवाई
अच्छे अच्छे की करा दी है जग में हँसाई


- उदय किशोर साह


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'कच्चे धागे' की ताकत

सन उन्नीस सौ तिहत्तर की है यह बात
नहीं भूलती अब भी वह कष्टकारी रात
'कच्चे धागे' फ़िल्म लगी थी मंडी कृष्णा टाकीज़ में
पहुंचे जब वहां देखा बेकाबू थे हालात

लाइन इतनी लंबी कि खिड़की तक पहुंचना था मुश्किल
कुछ लोग ब्लैक में बेच रहे थे टिकट
जैसे ही हम उन तक पहुंचे टिकट हो गए खत्म
पिक्चर तो देखनी थी समस्या खड़ी हो गई विकट

किसी तरह हम भी लाइन में हो गए खड़े
धीरे धीरे सरकते सरकते खिड़की तक पहुँचे हम
हमने भी पैसे मुट्ठी में डाल कर खिड़की में हाथ डाल दिया
भीड़ ने धक्का मारा फंस गया हाथ निकल रहा हो जैसे दम

हाथ फंस गया खिड़कीं में न अंदर जाए न बाहर
भीड़ के धक्के से उखड़ गए पांव दर्द से हम रहे थे कराह
पसीना पसीना हो रहे थे हवा में लटके हुए
हाथ बाहर निकालने के लिए हम पूरा जोर रहे थे लगा 

बहुत देर के बाद टिकट मिला हाथ भी खिड़की से छूटा
बाल बिखरे हुए सूरत रोनी जैसे किसी ने हो बहुत पीटा
टिकट मिलते ही दोस्तो के चेहरे पर मुस्कुराहट छाई
मैं अधमरा सा हो गया था मानो किसी ने प्राण हो खींचा

पिक्चर मे कहाँ लगे दिल अब तो कलाई पर था ध्यान
कलाई के दर्द ने कर रखा था बहुत परेशान
दोस्त तो ले रहे थे 'कच्चे धागे' का आनंद
कलाई सूज गई थी मेरी तो निकल रही थी जान

होस्टल था हमारा गुरुद्वारे से थोड़ा आगे
पिक्चर देखकर हम होस्टल की तरफ थे भाग रहे
वापिस जब आये रात बारह बजे चुपके से गेट के पास
देखा जब तो होस्टल वार्डन और चौकीदार थे जाग रहे

होस्टल वार्डन ने की हम सब की बहुत धुनाई
डर के मारे मुंह से चूँ तक नहीं निकल पाई
तमाशा देखने खड़े हो गए आकर सारे
'कच्चे धागे' की ताकत उम्र भर के लिए खूब समझ आई


                   - रवींद्र कुमार शर्मा


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कत्थई सी शाम

वही कत्थई सी शाम
और मन में समंदर के जैसा शोर!
लहरें टकराकर लौट जाती हैं
और अपने पीछे छोड़ जाती हैं
सफेद नमक....
कुछ अधूरी ख्वाहिशें
और स्मृतियों की सीपियां।

मैं नंगे पांव दौड़कर
उठा लेती हूं वो सीपियां और नमक,
बना लेती हूं मन के समंदर किनारे,
एक सुंदर सा घर,
मेरा घर....
घर में दरवाज़े और कुछ खिड़कियां।
लेकिन नहीं आती उन खिड़कियों से हवा।
होने लगती है घुटन...

कठोर लहरें टकराती हैं दरवाजों से,
तो खनकने लगती हैं सीपियां,
और फिर वही कुछ टूटने का शोर...
अथाह शोर...
दीवारों से झड़ने लगती हैं स्मृतियाँ,
गिरने लगती हैं तस्वीरें,
जब झांकता है समंदर दरारों से
टूट जाते हैं स्वप्न....

मेरा प्रेम और तुम्हारा छल,
मौन करता है लहरों का शोर,
छोड़ जाता है सन्नाटा...
तुम्हारा छल....
बहता है आंखों से बनकर नमक
यही है मेरे प्रेम का अंतिम अवशेष
गहरी रात में,
फिर से डूब जाएगी कत्थई शाम।

सीपियां छिपा लेंगी,
मेरे अश्रु मोती बनाकर...
खुद में और बंद हो जाएंगी,
सदा के लिए...
सफेद नमक घुल जाएगा
आंखों के समंदर में,
फिर प्रतीक्षा रहेगी ना स्मृतियां,
रहेगा तो ये समंदर....
ये कत्थई शाम....
मेरा प्रेम और तुम्हारा छल...


- मंजू सागर


*****


खालीपन

हर चेहरे पर मुस्कानों का उजला संसार है,
फिर भी जाने क्यों मन इतना लाचार है।
क्षण-क्षण को तस्वीरों में बाँध लिया हमने,
पर जीने के पल जाने कहाँ खो दिए हमने।

गैलरी भरी है पर दिल है खाली,
हर तस्वीर मुस्कुराती, फिर भी आँखें हैं सवालों वाली।
हज़ारों चेहरों का साथ है इस आभासी भीड़ में,
फिर भी कोई अपना नहीं मिलता इस भीड़ में।

कभी रिश्ते धड़कनों से पहचाने जाते थे,
बिन कहे ही आँखों से हाल सुनाए जाते थे।
अब हाल पूछने को भी संदेश भेजना पड़ता है,
और दर्द छिपाने को मुस्कुराना पड़ता है।

तस्वीरें चेहरे बचा सकती हैं, स्पर्श नहीं,
यादें साथ रख सकती हैं, अपनापन नहीं।
इंसान को आखिर भीड़ नहीं एक दिल चाहिए,
जो तस्वीर नहीं, उसके आँसू पढ़ सके बस वही अपना चाहिए।


- डाॅ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****


सॅंकरे हैं दरवाज़े

हर गली,तॅंग गली,भूली-बिसरी-सी
दीवारें ही दीवारें हैं,हर तरफ़,चारों तरफ़
खिड़की दिखाई नहीं देती है कहीं कोई
सॅंकरे हैं दरवाज़े और मुॅंड़ेर ही मुॅंड़ेर
कहने को हैं दिशाऍं दस आने-जाने को
मगर हर बार,हर कहीं,दोराहे-चौराहे
इधर जाऊॅं कि उधर जाऊॅं कि किधर
उलझता ही जाता हूॅं उलझनों की तरह
धूप में बैठी स्त्रियाॅं बुनती हैं स्वेटर जैसे
ऊन का गोला नहीं है सूर्य

*******

जीवन में जीवन जैसा.

भूले से भूल गया जो भी
याद आ ही जाता है ऑंखें खुलते ही
बशर्ते कि नींद नहीं हो आचरण में
पत्थर बरस रहे हों सिर ऊपर छोटे-बड़े
और पैरों में बॅंधी हों बेड़ियाॅं लोहे की
सोने से ज़्यादा मॅंहगा बिकता हो साहस
डरते-डरते मरने से पहले मरते हों वीर
खोना-पाना कठिन नहीं है,ज़रा भी नहीं
नियम नहीं है कि जो खोया,फिर पाया
नमक नहीं,पानी नहीं,क़िताब नहीं है
तब फिर बचता ही क्या है जीवन में
जीवन जैसा,पाने जैसा ?

*******

एक औरत अंधेरे में.

एक औरत अंधेरे में
जाग रही है सदियों से घर के लिए
और भाग रही है नॅंगे पाॅंव जॅंगल-जॅंगल
तलाश रही है अन्न,जल और आग
कुऍं की गहराई तक जाती नहीं हैं सीढ़ियाॅं
बिखरे-बिखरे हैं नन्हीं तितलियों के रॅंग
औरत समेट रही है कुछ सूखी लकड़ियाॅं
ताकि सेंक सके चार रोटियाॅं घर के लिए
लोरी सुनकर भूखे ही सो गए हैं बच्चे
देर नहीं,सुबह हो रही है,जाग रहे हैं बच्चे
बच्चों के जागने से पहले,ज़रा कुछ पहले
उम्मीद लिए घर पहुॅंचना है एक औरत को
एक औरत अंधेरे में

*******

बच्चों की पीठ पर

घोड़े बन रहे हैं बच्चे
एक-दूसरे की पीठ पर सवार होकर
उड़ रहे हैं खुले आसमान की ओर
मुठ्ठियों में कसकर पकड़ लेने को चाॅंद
और चाॅंद है कि रोज़ ही अपनी अदा में
घटता-बढ़ता रहता है नितांत बेशर्मी से
शर्म जो होती ज़रा भी तो डूब न मरता
सीधे-सरल उतरकर ज़मीन पर
बच्चों की पीठ पर

*******

है ज़िम्मेदारी कारण कविता

बदलती हैं हवाऍं,बदलता है पानी
बदलते है शहर,बदलते हैं नाम शहरों के
सुर सॅंगीत के बदलते हैं ताल सहित
तान बदलती हैं,तानें बदलते हैं धार अपनी
साज़िशें बंद कमरों की अपने ही हठ में
बदलती रहती हैं दृष्टि और दृष्टिकोण
गूॅंथते हुए मिर्च-मसालों में ढ़ेरों लिप्साऍं
मगर ज़िद है ज़िम्मेदारी कारण कविता
कि बदलती नहीं है रीढ़


- राजकुमार कुम्भज


*****


उसकी इच्छा

जब कुछ समझ न आए,
हर चीज़ तुम्हें उलझाए,
रहना ख़ामोश, रखना हौसला,
कि बाढ़ का पानी भी
धीरे-धीरे उतर जाएगा।

लहरें डराएँगी,
रातें होंगी लंबी,
काली, विकराल।
याद रखना, तेरे पीछे कोई है,
जो रखेगा तुझे संभाल।

अपने भी मजबूर होंगे,
परछाई भी दूर होगी,
सिर्फ़ होंगे तुम- अकेले।

यही तुम्हारी परीक्षा होगी,
जानो, वही होगा
जो उसकी इच्छा होगी।

बस तुम ख़ामोश रहना,
हौसला बनाए रखना,
वक़्त चाहे जितना लगे,
ये दौर भी गुजर जाएगा।


- रोशन कुमार झा


*****


तुम्हारे स्वागत में मधुशाला

आओ प्रिय तुम्हें पकड़ा
देता हूं मधु का प्याला,
कह देता हूं साकी को
भर देगा वह स्वर्ण हाला।

पी लेना तुम मन भर हाला
खाली कभी न होगा वह प्याला,
आते रहना हमेशा मेरे पास
सब जगह दिखेगी मेरी मधुशाला। (1)

कमरे से निकल कर
आ बैठना मदिरालय में
पिलाता रहेगा भोला साकी,
देता रहेगा एक नया प्याला।

तुम्हारे लिए यहां के
दरवाज़े हमेशा खुले हैं,
आ बैठना दोस्तों संग
स्वागत करेगी मधुशाला। (2)


- प्रणव राज



*****







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