साहित्य चक्र

07 August 2026

लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल





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