साहित्य चक्र
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27 April 2025

मैं, एक खिलौना नहीं


मैं एक छोटा-सा सफेद खरगोश हूँ- नरम रेशमी बालों वाला, मासूम आँखों से दुनिया को देखने वाला। मेरा नाम कभी किसी ने नहीं रखा, और शायद रखा भी होता तो कोई पुकारता नहीं। मेरी दुनिया एक टोकरी में सिमटी हुई है, जो अक्सर एक औरत के हाथ में होती है।





ये कहानी है मनाली की, उस बर्फीले पहाड़ की जहाँ हर चीज़ पर एक सफेदी की चादर सी बिछी होती है। लोग आते हैं वहाँ सैर-सपाटे को, तस्वीरें खिंचवाते हैं, हँसते हैं, और फिर चले जाते हैं। और मैं... मैं वहीं का वहीं रह जाता हूँ- उस औरत की हथेली में, जिसने मुझे एक तमाशा बना दिया है।

सुबह से शाम तक वो औरत मुझे अपनी गोद में लेकर खड़ी रहती है और कहती है, 

"आ जाओ जी, सिर्फ़ 20 रुपए में फोटो खिंचवाओ प्यारे खरगोश के साथ!"

लोग हँसते हैं, बच्चे चिल्लाते हैं- "मम्मी खरगोश! मम्मी देखो, कितना क्यूट है!"  

कोई मेरी नाक को छूता है, कोई मेरे कान खींचता है। पर किसी ने कभी मेरी आँखों में झाँककर नहीं देखा... जहाँ ठंडी हवा से छलकते आँसू होते हैं।

हर कोई स्वेटर, जैकेट, दस्ताने और टोपी में लिपटा होता है। और मैं? बस एक नंगी जान हूँ, जिसे कोई महसूस ही नहीं करता। मेरे पाँव बर्फ पर ठिठुरते हैं, मेरा दिल हर छूअन से कांपता है, पर मैं चुप हूँ... क्योंकि मैं एक "खिलौना" हूँ ना!

शाम ढलती है, सूरज हिमालय की चोटियों में छिप जाता है। मैं सोचता हूँ- अब शायद घर जाकर चैन मिलेगा, गरमी मिलेगी। पर उस औरत ने मुझे न प्यार से उठाया, न कोई कंबल दिया। बस उसी पुराने लोहे के पिंजरे में डाल दिया जहाँ मैं रातें काटता हूँ।

मैं कोने में दुबक जाता हूँ। बाहर का शोर बंद हो जाता है, पर मेरे दिल में एक सन्नाटा गूंजता है। कभी सोचा है, जब खिलौना भी साँस लेता हो तो कैसा लगता है उसे खिलौना कहे जाना ?

काश... कोई मुझे सिर्फ़ 20 रुपए का न समझता।  

काश... कोई मेरी ठंडी साँसें सुन पाता।  

काश... मैं सिर्फ़ एक तस्वीर का हिस्सा नहीं, किसी के प्यार का हकदार होता।

मैं भी जीना चाहता हूँ... खुले मैदानों में दौड़ना, हरी घास में लोटना, किसी की गोद में चैन से सोना- बिना कैमरे, बिना पैसों के... बस दिल से।

मैं एक खिलौना नहीं हूँ। मैं भी महसूस करता हूँ क्योंकि

मैं भी एक ज़िंदा दिल हूँ।


                                                       - विकास बिश्नोई


19 April 2025

"भूल भुलैया में भटक गया मैं"

  भूल भुलैया में भटक गया मैं, कभी इधर गया कभी उधर गया मैं, मुआ तमंचा छुपाने के चक्कर में शर्ट भी उतार कर फेंक दिया था। फिर भी अपना कमरा ढूंढ नहीं पाया। मकान मालिक का नाम भी भूल गया था।

        हुआ यूं कि, इस बार काफी विलम्ब से साइड की ओर गया था। मैं क्या करूं उस गांव में उल्टा घुसा था। लेंड़े के कमरे में पहले रहता था, अब टेंम्भरे के कमरे में जाना था। वहां दो - चार दिन रुकने के बाद घर लौट आया था, मुआ काम ही ऐसा था।





            हां तो हम नीचे धोती का तहमक लगाया हुआ था। ऊपर बनियान, बनियान के ऊपर फुल शर्ट पहन रखा था। पता नहीं जिंदगी में कभी भी तमंचा का इस्तेमाल नहीं किया था मैंने! वैसे गांव मेरा तमंचा का शौकीन था, तमंचा वालों का सम्मान भी बहुत होता था।

            मेरे पास ट्रेन में बैठने के बाद मिला था तमंचा, पता नहीं कब, क्यों आया था यह मेरे पास, क्या पता बस में किसी ने दिया यह भी मालूम नहीं। मुझे रोना आ रहा था, फिर भी रो नहीं पा रहा था। तमंचा जो मेरे क्षेत्र का गुरूर, मेरे क्षेत्र की पहचान हुआ करता है; खुशी या गम के बीच मुझे झुला रहा था, मैं न हंस पा रहा था न रो पा रहा था। बड़ी अजीब स्थिति थी मेरी!

             नीचे तहमक की मुर्री ढीली पड़ गई थी। मुआ 'मरता क्या ना करता' तमंचा अब गिरा तब गिरा की स्थिति पैदा हो गई थी। मैंने मुर्री कसकर पकड़ ली थी। तमंचा मेरे लिए मुसीबत बन गया था। पता नहीं यह मेरे गांव की पहचान क्यों बना बैठा है? 

             भारी डर थी कि, यह जरा भी किसी की जानकारी में आया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह चलता है कि, नहीं चलता है, फिर चलता है तो कैसे चलाया जाता है यह भी मुझे पता नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह मेरे पास आया कैसे? 

             पसीना - पसीना हो गया था। तमंचा आफत गले पड़ी थी। किसी को पता चला तो मोबाइल का जमाना है मैं जान नहीं पाऊंगा पुलिस आकर मुझे ले जाएगी, यहां मेरी जमानत कौन लेगा? मैं भारी असहाय अपने-आपको मान रहा था। 

             मुर्री ढीली हो गई थी कसकर पकड़ रखा था, अब उसे कैसे कसूं! इस मुसीबत तमंचे को कैसे, कहां छुपाऊं! पसीना से तरबतर शर्ट की बटन जाने कैसे खोल दिया था मैंने! तुरकरे के घर से होकर बार बार निकलना मेरे लिए बहुत शर्मिंदगी की बात थी। 

            मुझे पूरब, पश्चिम लग रहा था, उत्तर, दक्षिण लग रहा था। क्या पता भुलना चारा लांघ गया था या मैं खुद क्या हो गया था। एक बुजुर्ग से पूछा, क्योंकि वर्तमान कमरा के मालिक का नाम एकदम से भूल गया था; बार बार दिमाग पर जोर लगा रहा था, दिमाग होता तो काम करता वह तो नोटों के साथ गैस लेने चला गया था। 

            मुआ तमंचा छुपाने के चक्कर में मेरी तो हालत खस्ता हो रही थी। मैं उसे कसकर पकड़ लिया था, कभी उसकी नाल, कभी उसकी मूठ बाहर निकलने के लिए जिद कर रहे थे। 

            मैंने उस बुजुर्ग से पूछा, बताना भूल गया आपसे, मैंने दिमाग को दबाकर, जोर लगाकर पूछा, 'दादा जी, मेरा कमरा कहां है बता दो मैं, मकान मालिक का नाम भूल गया हूं, पुराने मकान मालिक लेंडे जी थे, वहीं पहुंच जाऊं ऐसा कर दो!' 

            बुड्ढा भड़क गया शायद उसका लेंडे का छत्तीस का आंकड़ा था। उसने अपनी बुढ़िया को बुलाया कहा, "इनको कमरा दिखा दो!" 

           यह तमंचा अब बार बार निकलना चाहता था, कभी इधर कभी उधर झांकने लगा था। अब मैं तहमक को इकट्ठा करके तमंचा की नाल सहित कसकर पकड़ लिया था; ऐसा पकड़कर कर रखा था कि, मेरा हाथ भी दर्द करने लगा था। 

            इससे पहले कि, वह बुढ़िया मुझे कमरा दिखाती तब तक मैं भागने के जुगाड़ लगा रहा था। इधर यह तमंचा आड़े आ रहा था। 

            मैंने कहा, "मुझे मेरे कैंप का रास्ता बता दो! कैंप ही पहुंचा दो!"
             वह लोग तो कमरा देने के मूड में थे। एक शायद उनका विरोधी रहा होगा, उसने मुझे कैंप का रास्ता इशारा से बताया। मैं उधर चला कि, बुढ़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। अब तो तमंचा है मेरे पास पोल खुल जाएगी! इस एहसास से ही मैं रुआसा हो गया था; रो भी नहीं सकता था।

             मेरा शर्ट उतर चुका था। शाम हो गई थी यह गनीमत थी वरना तमंचा राम के कारण जेल निश्चित थी। जेल की कल्पना से ही मैं पसीने से लथपथ हो गया था। पसीने से भीगा मैं उस दिशा की ओर भागा, जिस दिशा में कैंप बताया गया था।

             वहां उस रास्ते में काली गिट्टी बिछी थी। कैंप के रास्ते में पहले तो गिट्टी बिछी नहीं थी। अब मरता क्या न करता लेंडे जी का मकान वहीं कहीं होगा। यह सोच रहा था कि, लेंडे जी की घरवाली वहां से निकली। मैंने पूछा, "मैं जिस कमरे में रहता था, वह कमरा किधर है!"

            उसने कहा, "यही तो है, आपका कमरा जहां तुम रहते थे; अब वहां, उधर रहते हो!" सारे कमरों का नक्शा ही बदल गया था। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। 

            मैं कैंप का रास्ता फिर से पूछा, शाम गहरा चुकी थी। किसी ने जोर से कहा, "यही तो है, कैंप का रास्ता!" 

            मेरा तमंचा गिरते - गिरते बचा था। मैं पकड़ मजबूत करने ही वाला था कि, मेरी नींद खुल गई! 

             मैं अपने बिस्तर पर हूं, बड़ी देर तक में विस्वास हुआ! वरना यह तमंचा तो मुसीबत बन गया था। शर्ट भी उतर गया था। तहमक भी ढीला हो गया था।
            बिना किसी से बताए मैं नित्य क्रिया करने चल दिया था। वह स्वप्न मैं भुला नहीं पा रहा था।

            इस भूल - भुलैया के चक्कर में पड़कर अपना सबकुछ भूलकर भटकता रहा। इस तमंचे के चक्कर में जिसे कभी याद भी नहीं किया था, कितना परेशान हुआ। बाप - पुरुषों की इज्जत जाते - जाते बची वरना जेल जाना होता तो, तो सबकुछ लुटा चुका होता।

            नींद नहीं टूटती तो अब तक की जो मेरी हालत होती उसका मैं वर्णन नहीं कर पाता! शुक्र है कि मैं जाग गया; बच गया वरना अब तक तो मेरा क्या हाल होता मैं भी नहीं जानता।


                                                -  डॉ. सतीश "बब्बा" 


28 January 2025

कहानी- कुड़ी



 "चलो रे सब ! दिनेश कुड़ी लाया है !!" अचानक मेरे कानों में आवाज गूंजी। मेरे चचेरे भाई की आवाज थी यह।उन दिनों मैं इंटर की पढ़ाई कर रहा था। कभी-कभी अपने गांव आता था। ऐसे ही उस दिन मैं गांव में ही था।मेरे गांव के बच्चे और लड़के किसी के घर मेहमान आने पर भी देखने के लिए जमा हो जाते हैं, यहां तो दिनेश चचा ने कुड़ी(लड़की) लाया था तो भला बच्चों में कौतूहल क्यों न हो। मैं भी दौड़कर दिनेश चचा के घर की ओर भागा।





   दिनेश चचा के आंगन में गांव के लोगों की भीड़ भरी थी। किसी तरह भीड़ चीरकर आगे निकला तो देखा बीच आंगन में एक खाट पर लंबे बालों में दिनेश चचा बैठे थे। उन दिनों टीम इंडिया में नई-नई महेंद्र सिंह धौनी की एंट्री हुई थी सो हमारे झारखण्ड में लंबे बाल रखने का एक ट्रेंड चल पड़ा था। इससे मैं भी अछूता नहीं था। दिनेश चचा के ठीक बगल में खाट पर एक सुंदर, छरहरी काया वाली पटियाला सूट पहनी पंजाबी कुड़ी भी थी। दोनों की जोड़ी बहुत शानदार लग रही थी। गांव-मुहल्ले के सम्मानित लोग और दिनेश चचा के घर के बड़े लोग उन दोनों को घेरकर गांव-समाज की पारंपरिक पंचायती शुरू कर चुके थे।

   दरअसल कुछ महीने पहले ही दिनेश चचा काम की तलाश में पंजाब गये थे। वहीं पर उस कुड़ी से नज़रें मिलीं। फिर दोनों करीब आए। कुड़ी का नाम गुरमीत कौर था। उसके बाद तो उनका प्यार इस क़दर परवान चढ़ा कि एक दिन कुड़ी ने पंजाब की लहलहाती गेहूं और सरसों के माहौल को छोड़कर दिनेश का हाथ थामकर झारखण्ड की खूबसूरत पहाड़ी वादियों के आगोश में आने का फैसला किया। आज़ वही ख़ास दिन था।

  खैर ! पंचायती खत्म हुई। दिनेश चचा और गुरमीत कौर को एक साथ जीवन बिताने की मंजूरी मिली। दिनेश चचा के घर वालों की शर्त थी कि बेशक वो अपने हिस्से में अपनी बीवी के साथ रहकर आगे की ज़िंदगी जिए लेकिन स्वर्णकार समाज में उसे एंट्री नहीं दिया जाएगा। प्रेमी जोड़े ने घरवालों और गांव वालों की इस शर्त को सहर्ष मंजूर कर लिया।

  धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा। कुड़ी कुछ ही दिनों में गांव के बच्चे,बूढ़े,औरत, युवक-युवतियां सबके दिल में बस गई। वो सबके साथ घुल-मिल कर रहती। कभी-कभी गांव के बच्चों के साथ जींस-टी शर्ट पहन कर क्रिकेट खेलने चली जाती तो कभी गांव की गलियों में गिल्ली-डंडा भी खेलती थी। हमारे गांव के परिवेश में यह सब थोड़ा सा अजूबा ज़रूर था लेकिन हमारा गांव शिक्षा के लिहाज़ से इतने आगे की सोच रखता है कि हर नई चीज़ को स्वीकार करने में ज्यादा समय नहीं लगाता है। 





इसलिए कुड़ी को भी गांव में किसी भी तरह से कोई दिक्कत नहीं हुई। चूंकि मेरे गांव के लोग परस्पर सहयोग के लिए भी एक मजबूत सामाजिक ढांचे के रूप में व्यवस्थित है इसलिए बीतते वक्त के साथ कुड़ी को गांव के सरकारी स्कूल में अनुबंध पर सिलाई सिखाने के काम में भी लगा दिया। दिनेश चचा इधर-उधर काम करने जाते और कुड़ी सिलाई सिखाने के साथ ही घर पर लोगों के कपड़े भी सिलाई करने लगी जिसके बदले उसे कुछ पैसे भी मिल जाते थे। दोनों की ही जिंदगी ट्रैक पर चलने लगी।

   अचानक एक दिन गांव में ख़बर फैली कि कुछ पंजाबी लोग पुलिस लेकर गांव आए हैं। यह खबर मिलते ही पूरा गांव दिनेश चचा के घर की ओर भागा। कुड़ी के पापा पंजाब से कुछ लोग और पुलिस को लेकर आए थे। कुड़ी यहां से जाना नहीं चाह रही थी पर जबरदस्ती उनके पापा उसे यहां से लेकर जाने लगे। दिनेश चचा की आंखें भर आईं और साथ ही गांव के सभी लोगों में मायूसी सी छा गई। लेकिन अगले ही पल कुड़ी ने आत्मविश्वास से भरकर जो कहा उसे सुनकर सबके चेहरे खिल उठे। उसने सबकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा- "डोंट वरी यार ! पंछी हूं ! मुझे कैद कैसे रख पाएंगे ये ? फ़िर से उड़कर आ जाऊंगी !"

  सचमुच कुछ ही दिनों बाद एक सुबह कुड़ी वापस भी आ गई। एक बार फिर दिनेश चचा की ज़िंदगी में बहार और गांव के लोगों के चेहरे पर ख़ुशी लौट आई थी। एक बार फिर दोनों खुशी-खुशी साथ रहने लगे। लेकिन अचानक एक दिन उनकी जिंदगी में हलचल मच गई। पारिवारिक कलह की वजह से दोनों का घर में जीना मुहाल हो गया। लेकिन दोनों ने ही हिम्मत नहीं हारी। इतने दिनों से रहते हुए इलाके में उनकी सब लोगों से अच्छी पहचान हो गई थी सो बगल के गांव में एक आदमी की जमीन पर उन्हें घर बनाकर रहने की इजाजत मिल गई। कुड़ी और दिनेश चचा ने मिलकर जल्दी ही ईंट और मिट्टी का एक छोटा सा घर तैयार कर डाला। अब उस पर एस्बेस्टस की छत भी डाल दी गई। दोनों उसी में रहने लगे।एक बार फिर से दोनों की ज़िंदगी पटरी पर लौट आई थी। 

हालांकि अबतक उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था लेकिन दोनों की लाइफस्टाइल में सुधार आने लगा था। दिनेश चचा मजदूरी का काम छोड़कर अब एक नेटवर्क मार्केटिंग का काम करने लगे थे। कुड़ी भी इस काम में उसका हाथ बंटाती थी। अब तो दिनेश चचा ने एक स्प्लेंडर बाइक भी ले ली थी। मुझे उनकी जोड़ी और उनके मिलन की कहानी इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि मैं हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करता था कि इनकी जोड़ी को किसी की नज़र ना लगे। ये लोग दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करें। सिर्फ़ इन्हें ही नहीं बल्कि हर अच्छी जोड़ी को देखकर मैं बहुत गहराई से सोचता हूं। मुझे यह भी लगता है कि इन मामलों में मेरी तरह से नहीं सोचता होगा।






   लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। पांच साल बाद एक दिन अचानक पता चला कि कुड़ी कहीं ग़ायब है। वो चार-पांच दिन से लापता है। वास्तव में हुआ क्या है ये किसी को मालूम नहीं था। कोई कहता कि कुड़ी को उसके पापा ले गए हैं, कोई कहता किसी ने उसे मार दिया है तो कोई कहता कुड़ी किसी के साथ भाग गई है। मेरा मन विचलित हो उठा। मेरा दिल बिल्कुल इस बात को नहीं मान सकता था कि जिस लड़की ने दिनेश चचा के लिए इतना संघर्ष किया वो किसी और के साथ हरगिज़ नहीं भाग सकती। अब तक मैं भी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी कर सरकारी स्कूल में पारा शिक्षक की नौकरी करने लगा था। मैं पैदल उसी गांव से होकर अपने स्कूल जाता था जहां उन लोगों ने घर बनाया था। 

कभी-कभी दिनेश चचा को अकेले घर घुसते या घर से निकलते देखता तो मन व्यथित हो उठता। मन ही मन सोचता कि या खुदा ! सबकुछ ठीक कर देना। इनकी प्रेम-कहानी का इस तरह से खात्मा नहीं कर सकते आप। मुझे पूरी उम्मीद थी कि ज़रूर शाय़द कुड़ी पंजाब ही गई है और एक दिन फिर से उड़कर आ जाएगी। इसी बीच अचानक एक दिन मैं गांव के ही किसी आदमी के साथ बाइक से गांव लौट रहा था। रास्ते में देखा कुछ लोग किसी आदमी का अंतिम संस्कार कर नदी से लौट रहे हैं। मैंने बाइक वाले से पूछा कि कौन मर गया। उस आदमी ने बताया कि दिनेश मर गया। 

मैं अंदर से कांपकर मायूस हो गया। रूंधी हुई आवाज़ में पूछा कि उसे क्या हुआ था। उस आदमी ने बताया कि उसे कोई बीमारी थी इलाज के दौरान मर गया। मैं मन ही मन नियति को कोसने लगा कि कैसा तेरा खेल है ? कहां तो मैं सोचता था कि एक बार फिर से चमत्कार होगा और कुड़ी फिर से लौट आएगी। उसके बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन यहां तो उम्मीदों पर पूर्ण विराम लग चुका था। एक हसीन प्रेम कहानी का दर्दनाक अंत हो चुका था। आजतक किसी को पता नहीं कि कुड़ी का क्या हुआ ?

 
                                                       - कुणाल


22 January 2025

"आस्था और विश्वास"


आज का युग विज्ञान का युग है। इक्कीसवीं सदी के साथ भारत भी ज्ञान, विज्ञान,धर्म, दर्शन, खोज अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि करते हुए, दुनियां के तमाम विकासशील देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाये खड़ा हुआ है। शिक्षा के बढ़ते मान दण्ड और शिक्षित मानव समुदाय के चलते कुछ प्राचीन परम्पराओं,मान्यताएं और रूढ़ियॉ अपनी अप्रामाणिकता के कारण स्वत: ही अस्तित्वहीन होती जा रही हैं।





आज का मानव किसी भी बात को मानने से पहले हर दृष्टिकोण से अवलोकन,मनन और चिंतन कर उसकी सत्यता और वैज्ञानिक प्रमाण प्राप्त करने की चाह रखता है। प्रमाणिकता के साथ उसकी कसौटी पर खरी उतरने वाली बात पर ही विश्वास करता है। किन्तु कभी कभी हमारे सामने कुछ ऐसी घटनाएं घट जातीं हैं,जिन्हें हम अपनी आंखों से देखकर भी सहजता पूर्वक विश्वास नहीं कर पाते हैं।

ऐसी ही एक घटना का मैं,मेरा परिवार और मेरा पूरा मौहल्ला साक्षी बना। यह घटना महज कोई संयोग थी या कोई चमत्कार यह निर्णायक नहीं है ,किन्तु इस घटना से आप सभी को अवगत कराते हुए मुझे आत्मिक संतुष्टि अवश्य मिलेगी ,साथ ही मेरा विश्वास और भी प्रगाढ़ होगा।

यही कोई तीन दशक पुरानी बात है जब मेरे पिताजी सिंचाई विभाग में सेवारत रहते परिवार के साथ नगर सेवढ़ा जिला दतिया .म.प्र. में ही अपने निर्माणाधीन मकान में निवासरत थे। पिताजी,माताजी,दीदी,भैया और मैं, कुल पांच सदस्य थे परिवार में। दीदी की शादी बहुत पहले ही हमारे पैट्रिक ग्राम घमूरी जिला भिंड में रहते ही हो गई थी और वो अपनी ससुराल में रहतीं थीं ।

 अतः अब नगर सेवढ़ा के इस मकान में रहने वाले हम चार सदस्य ही थे। पिताजी(बाबूजी) की नौकरी और गांव की थोड़ी सी पुस्तैनी जमीन ही आय का साधन थी। सीमित आय में भी परिवार का निर्वहन और हम भाईयों की शिक्षा के खर्च के बाद बचे पैसों से पिताजी क्रम क्रम से घर का निर्माण कराया करते थे। हमारा मकान जिस स्थान पर बनवाया जा रहा था उस स्थान पर उस समय बहुत कम मकान बने हुए थे। आसपास पड़ी खाली जगह में कंटीली झाड़ियां पथरीले खंडहर अधिक थे‌।

समय असमय जहरीले जीव जन्तु और सांपों का निकलना हो जाया करता था । माताजी स्वभाव से ही धार्मिक और कोमल हृदय कहीं हैं, किसी भी जीव को न मारने देखतीं,विशेषकर सांप को तो कभी नहीं। वे सांपों को देव रूप बताकर तर्क-वितर्क करतीं और हमेशा ही उनकी रक्षा करतीं हुईं घर से दूर निकलवा देखतीं। बाबूजी नाराज होते हुए कहते - ये तो भगतिन हैं ,इन्हें तो सब में भगवान दिखते हैं। "मां कहतीं" ऐसी बात नहीं है ,पर कईबार  स्वप्न में मुझे मातारानी(जगदम्बा"दुर्गा माई) ने दर्शन दिए हैं। 

न जाने मुझे क्यों लगता है जैसे यहीं कहीं उनका साक्षात वास हो। " और बाबूजी" उनकी बात को अंधविश्वास मानकर आई गई  कर जाते,मकान निर्माण से बचें पत्थरों के खण्डों को बाबूजी ने घर के लिये पुते कच्चे आंगन में ही एक और रखवा दिए थे।

ये खण्डे लगभग पांच वर्ष तक एक ही जगह एक ही स्थान पर ज्यों के त्यों रखें रहे। पुनः निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिये मजदूरों से उन खण्डों को उस स्थान से हटवाया जा रहा था कि उन पत्थरों के बीच एक काला सर्प दिखा जो लगभग पांच छह फीट लंबा था। उसे देखते ही मजदूर भय के कारण दूर जाकर खड़े हैं गये और काम करने से मना कर दिया।

बाबूजी ने मजदूरों के हाथों में लाठियां थमाते हुए कहा कि इस सर्प को हटा दो न हटे तो मार दो। मारने की बात सुनकर माताजी मेरे पास आईं चूंकि मैं सो रहा था मुझे जगाते हुए बोलीं "महाराज आये हैं" मैंने उनीदे लहजे में पूछा -"कौन महाराज..?" तो उन्होंने पूरी बात बता दी और कहा ये मजदूर कहीं उसे मार न दें। तुम जाकर उसे (सर्प को) बाहर निकाल दो। मैं उस स्थान पर पहुंचा तो कोई भी मुझे उन पत्थरों तक नहीं जाने दे रहा था। 

न जाने कौन-सी शक्ति के कारण मुझे में जिद और विश्वास पैदा हो गया था, मैंने आगे बढ़ते हुए कहा कि मुझे कुछ नहीं होगा। मैं पत्थर निकालता हूं तुम लोग उठाकर ले जाना। और मैंने एक एक कर पत्थर के खण्डे निकाल दिये। चार छह खण्डे ही बचे हैं कि सांप अचानक गुस्से से भर आया और फन फैलाकर उन खण्डों पर ऊपर आकर बैठ गया। सारे प्रयास असफल नजर आ रहे थे, वह न तो भाग रहा था न हि किसी को उन खण्डों तक पहुंचने दे रहा था। 

सब तमाशा देख रहे थे। तभी माताजी कटोरी में दूध लेकर आईं ,वे निडर हो सांप के पास गईं और दूध की कटोरी सामने रख दी हाथ जोड़कर प्रणाम  किया जैसे  विनती कर रहीं हों। सांप ने दूध पिया और हट गया पर ! सांप के आने जाने का सिलसिला करीब चालीस मिनिट अनवरत चलता रहा, तब जाकर शेष बचे खण्डों को हटाया गया। अब उस स्थान पर सिर्फ एक पत्थर का  छोटा सा टुकड़ा जो लगभग तीन से चार इंच का था बस वही पड़ा हुआ दिखाई दे रहा था। मैं उसे भी उठाने बड़ा तो सांप पुन: उस पत्थर फन फैलाकर बैठ गया मानो जैसे कोई संकेत दे रहा था। 

माता जी ने कहा कि अब क्या है क्यों परेशान कररहे हो। तो उस सर्प ने उस पत्थर की एक परिक्रमा की और अपने आप दरवाजे से निकलकर झाड़ियों में चला गया। माताजी ने जब उस छोटे से पत्थर को उठाया तो उसके पृष्ठ भाग पर सिंघ सवार मां दुर्गा की बनी हुई मूर्ति देखकर परिवार जन ,मजदूर, मौहल्ले वाले सब हतप्रद रह गये। माताजी कभी अपने हाथों में उस मूर्ति को देखतीं ,कभी उस सर्प के क्रिया कलाप को  याद करतीं हुईं यह समझने का प्रयास करतीं कि यह कोई सामान्य घटना है,या चमत्कार हैं। पर जो भी हो आस्था और विश्वास पर ही मानव टिका है बाकी सब नश्वर है।

              
                                         - राणा भूपेंद्र सिंह


08 January 2025

कहानी- प्यार की एक नाजुक उड़ान


यह एक ठंडी सर्दियों की दोपहर थी। आसमान में धुंध छाई हुई थी, और ठंडी हवा ने पेड़ों की शाखाओं को बेजान कर दिया था। मां घर के दरवाजे पर खड़ी थीं, धूप की उम्मीद में। तभी, एक नाजुक तितली, जो शायद ठंड से जूझ रही थी, हल्के-हल्के अपने पंख फड़फड़ाती हुई उनके सामने आ गई।

मां ने जैसे ही दरवाजा खोला, तितली झिझकते हुए अंदर उड़ आई। उसके पंख कांप रहे थे, और वह कमजोर लग रही थी। तितली सीधा मां के हाथ पर आकर बैठ गई। मां की हथेली की हल्की गर्मी ने तितली को जैसे नई ऊर्जा दी। मां ने उसे बहुत प्यार से देखा और धीरे से कहा, "तुम बहुत ठंडी हो गई हो, मेरी बच्ची।"





तितली जैसे उनकी बात समझ गई हो। उसने धीरे-धीरे अपने पंख फड़फड़ाए, मानो जवाब दे रही हो। मां ने तितली की तरफ देखते हुए उससे बातें करना शुरू कर दिया। उनके शब्दों में ऐसी ममता थी, जैसे वह तितली को सुकून दे रही हों। तितली भी हर बार अपने पंख हिला कर मां की बात का जवाब देती रही।

कुछ समय बाद, पिताजी घर लौटे। तितली ने मां की हथेली से उड़ान भरी और पिताजी के हाथ पर आकर बैठ गई। पिताजी ने मुस्कुराते हुए उसे देखा। उन्होंने भी उसे बड़े प्यार से अपनी हथेली पर रखा। कुछ पल के लिए तितली ने जैसे अपने नाजुक पंखों से उनकी उंगलियों को महसूस किया। फिर वह वापस मां के हाथ पर चली गई।

तितली की यह छोटी-सी उड़ान, मां और पिताजी के बीच, ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी नाजुकता और गर्मजोशी दोनों बांट रही हो। उसके पंखों की हलचल और उसकी मासूमियत ने घर के ठंडे माहौल में एक अद्भुत गर्मजोशी भर दी।  

लेकिन धीरे-धीरे तितली की ऊर्जा कमजोर पड़ने लगी। उसके पंख अब पहले की तरह नहीं हिल रहे थे। कुछ देर बाद वह फिर से पिताजी की हथेली पर आकर बैठ गई। इस बार, उसकी नाजुक काया स्थिर हो गई।

मां और पिताजी ने चुपचाप एक-दूसरे को देखा। उनकी आंखों में एक गहरी उदासी थी। तितली का छोटा-सा जीवन समाप्त हो चुका था। लेकिन वह अपनी आखिरी घड़ियों में जो गर्मी और सुकून ढूंढ़ने आई थी, वह उसे यहां मिल चुका था।

हमने उसे घर के बगीचे में एक छोटे से गड्ढे में दफना दिया। तितली के लिए यह हमारी छोटी-सी श्रद्धांजलि थी। वह आई थी, हमारे घर की ठंड को अपनी नाजुकता से पिघलाने। उसका जाना यह सिखा गया कि जीवन में कुछ पल कितने मूल्यवान होते हैं।


                                                          - विकास बिश्नोई, हिसार, हरियाणा


15 December 2024

कहानी- मोहलत

बिरजू चारपाई पर बैठा गहन चिंता में डूबा था। तभी लालाजी का मुंशी ज़ोर से किवाड़ की कुंडी बजाता है- बिरजू ओ बिरजू दरवाज़ा खोल। बिरजू काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलकर- "राम-राम" मुंशी जी, आइए बैठिये।





मुंशी- बैठने का टाइम नहीं है, लालाजी ने पैसे के लिए बोला है।
बिरजू- हुज़ूर, थोड़े दिन की 'मोहलत' और दिला दीजिये! मैं जल्द ही कुछ ना कुछ इंतज़ाम कर लूंगा।

मुंशी- लालाजी अब और मोहलत नहीं दे सकते! तेरे पास सिर्फ़ कल तक का समय है, या तो लालाजी के पूरे पैसे लौटा दे; नहीं तो तेरे गिरवी रखे खेतों को बेचकर सूद सहित सारा पैसा वसूला जाएगा।

जब तुम्हारी पैसे चुकाने की औकात नहीं है तो उधार लेते क्यों हो? यह कहकर मुंशी बुदबुदाता हुआ चला गया। उसके जाते ही बिरजू वापस निराशा के सागर में खो गया।

कुछ देर बाद बिरजू की पत्नी अपने पुराने ज़ेवर बिरजू के हाथ में रखते हुए बोली- इन्हें बेचकर लालाजी का कर्ज़ा चुका दीजिये। मैं और ज़्यादा आपकी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर सकती। जब हमारे बच्चे किसी लायक बनेंगे तब फिर से बनवा लूँगी। अपनी पत्नी के त्याग और समर्पण को देखकर बिरजू की मायूस आँखें छलछला उठी।

- आनन्द कुमार


कहानी- अनजानी


इंटरमीडिएट(विज्ञान) की फाइनल परीक्षा चल रही थी। उस दिन मेरा फिजिक्स का पेपर था। परीक्षा दो बजे से थी लेकिन मैं सवा एक बजे ही पहुंच गया था। परीक्षा केंद्र के बाहर एक दुकान पर कोल्ड ड्रिंक पी रहा था। अचानक मेरी नज़र नीली सूट पहनी बला की खूबसूरत एक लड़की पर पड़ी।





अगले करीब पंद्रह-बीस मिनट तक एक-दूसरे से निगाहों में बातें होती रहीं। स्वभाव से मैं हमेशा शर्मीला रहा हूं इसलिए बात तो करना चाहा लेकिन हिम्मत नहीं हुई। मैं सोच में खोया हुआ ही था कि उसने अचानक से मेरे पास आकर पूछा-आपका भी एग्जाम है क्या ? मैं सकपका कर अपनी झेंप छिपाते हुए धीरे से हां कहा। उसके बाद फिर हल्की-फुल्की बातचीत और परिचय हुआ।

उसने बताया कि वो भी पीपीके कॉलेज बुंडू में ही पढ़ती है। इसके बाद दोनों एग्जाम लिखने चले गए।दो साल बुंडू कॉलेज में पढ़ा लेकिन पहली दफे किसी लड़की को देखकर दिल के सारे तार झनझना उठे थे। पूरे पेपर के दौरान मैं उसी के बारे सोचता रहा। बेताबी ऐसी थी कि कितनी जल्दी पेपर खत्म हो और बाहर निकल कर उसका नाम और पता पूछूंगा।

उन दिनों मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करते थे। मैं पेपर खत्म होते ही भागा-भागा सीधे गेट पर आकर खड़ा हो गया। आंखें भीड़ में बस उसी को ढूंढ रही थी। अचानक जब गेट से निकली तो मैं बदहवास हो गया। उसने मुझे नहीं देखा था। मैं पूछने के लिए आगे क़दम बढ़ाया ही था कि ठीक गेट के सामने बाइक लेकर एक लड़का खड़ा था। शाय़द उसका भाई ही था।

मैं सोचने लगा कम से कम नजरें तो एक बार मिल जाए।वो बाइक पर बैठी और इधर मेरा दिल बैठ गया कि अब आंखों में भी बात नहीं होगी। अगले ही पल मानो चमत्कार हो गया और एक बार फिर हमारी नजरें मिलीं। एक कातिलाना मुस्कुराहट के साथ बाय की और बाइक आगे बढ़ गई। मैं ख़ुमारी में खोया एकटक तबतक उसे निहारता रहा जबतक कि वो आंखों से ओझल नहीं हो गई।

यूं तो मैं कॉलेज नहीं के बराबर जाता था क्योंकि ट्यूशन सर मना किए थे कि सरकारी कॉलेज है, सुविधा अच्छी नहीं है। इसलिए मटरगश्ती करने कॉलेज नहीं जाना है। लेकिन एग्जाम खत्म होने के बाद करीब एक महीने तक लगातार प्रतिदिन कॉलेज गया।

जाकर नजरें बस उसी को ढूंढती। दोपहर तक छान मारने के बाद मायूस होकर लौट आता। धीरे-धीरे यह सिलसिला बंद कर दिया क्योंकि वो फ़िर कभी नहीं मिली। आज़ भी वो मुस्कुराहट याद कर अनायास ही मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाती है। सोचता हूं कि काश वो अनजानी फिर कभी मिल जाती दो पल ही सही।

- कुणाल



कहानी- दोस्ती




सचिन के फोन पर किसी का फोन आया और सचिन जल्दी से कहीं जाने के लिए घर से निकल ही रहा था कि विश्वास जो उसके बचपन का दोस्त था उसके पास आया और उसने सचिन से पूछा कि क्या हुआ, लेकिन सचिन ने उसे टाल दिया और हड़बड़ी में वहां से चला गया। विश्वास हैरत से उसे देखता रहा और किसी अनिष्ट की आशंका में उसने सचिन का पीछा करने का निश्चय किया। 

कुछ देर ढूंढने के बाद सचिन उसे मिल गया लेकिन घायल अवस्था में एक सुनसान जगह पर जहां लोगों की आवाजाही कम थी। विश्वास ने तुरंत एम्बुलेंस बुला कर सचिन को अस्पताल पहुंचाया और पुलिस एवं उसके घरवालों को सूचित किया। कुछ ही दिनों में सचिन ठीक हो गया और बोला कि कुछ लोग कई दिनों से उसे काम करने के लिए अपने साथ मिलाना चाहते थे, उन्होंने अपने उच्च अधिकारी से मिलने के लिए उसे तुरंत बुलवाया था लेकिन उनका काम नशीले पदार्थ सप्लाई करना था, जिसे सुनकर सचिन के पैरों तले से जमीन निकल गई और उसने उस काम को करने से साफ इंकार कर दिया।उन लोगों को यह डर था कि कहीं सचिन उनका राज न खोल दे इस लिए उसे खत्म करने के लिए एकाएक उस पर हमला कर दिया और उसे मरने के लिए छोड़ कर चले गए। 




सचिन अपने माता-पिता को साथ लेकर विश्वास के घर गया और विश्वास का शुक्रिया अदा करते हुए बोला कि दोस्त अभी तो काफ़ी दिनों से हमारा कोई सम्पर्क भी नहीं है तो भी तुम ने मेरे बारे में इतना सोचा और मेरी जान बचाई, ये सुनकर विश्वास बोला, दोस्त हम बचपन के दोस्त हैं और दोस्ती कभी इस बात की मोहताज नहीं होती कि हम आपस में कितना मिलते  हैं और साथ में कितना वक्त  बिताते हैं। अच्छे और सच्चे दोस्त दिल से जुड़े होते हैं और चेहरे से ही एक-दूसरे की जरूरत समझ लेते हैं। 

ये सुनकर सचिन विश्वास के गले लग गया, दोनों दोस्तों की आंखों में ख़ुशी के आंसू थे। ये देख कर सचिन के माता-पिता की आंखें भी नम हो गई और वे खुशी से एक साथ बोले,"और हमें तुम्हारी दोस्ती पर नाज़ है!"


                                                                       - कंचन चौहान, बीकानेर


12 December 2024

कहानी- मित्र


राम एक बहुत अच्छा लड़का था, लेकिन शहर आकर कुसंग ने उसके जीवन को बर्बादी की तरफ धकेल दिया। ज़ब उसे इस बात का अहसास हुआ तब तक उसका सब कुछ लुट चुका था और वह जीवन में एकाकी हो गया था। परन्तु ऐसे समय में श्याम ने उसका हाथ थामा और राम से दोस्ती कर ली।



श्याम ने राम को हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और उसकी एक अच्छे मित्र की तरह सदैव सहायता की। परिणामस्वरूप राम ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुधार किया। वह पढ़ाई, खेल, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन करने लगा।

नियमित और कठोर परिश्रम के कारण, वह अंततः एक श्रेष्ठ चिकित्सक बना। आज राम अपने जीवन में सफलता का पूरा श्रेय श्याम और श्याम की दोस्ती को देता है। श्याम ने वास्तव में 'दोस्ती ' शब्द को पूर्ण रूप से सार्थक किया था।

- प्रवीण कुमार


09 December 2024

लघुकथा- परछाई

बसंत का मौसम शुरू ही हुआ था। नीरा,परिवार और मित्रो के साथ पिकनिक पर गई है। मौसम का आनन्द लेते हुए, नीरा अकेले ही जंगल की ओर चल पड़ी। अचानक उसके पैर थम गए। 

वो जहां खड़ी है, वहां जंगल घना नहीं है। डूबते सूरज के रंग सा, फूलों से भरा एक पेड़, नीरा ठीक उसके पास जाकर झरे हुए फूलों कोहाथों में उठाकर नम आंखों से देख रही है। 





फागुन का माह, हल्की हवाएं चल रही हैं। पेड़ पर लगे फूल नीरा को छू कर जमीन पर गिर रहे है। शाम के चार ही बजे थे। ढलती धूप में, सुनहरी पीली मिट्टी पर पेड़ की तिरछी छांव ने नीरा को अपनी बाहों में भर लिया। नीरा सिसक कर रोने लगी। 

तीन चार साल की छोटी सी उम्र में नीरा और दादी का साथ छूट गया था। दादी बीमार थी पर दुलार में कभी कोई कमी नहीं थी। पलाश के फूल दादी को अति प्रिय थे। तब से हर फागुन नीरा की निगाहे पलाश ढूंढती हैं।





आज मानो इस पलाश की परछाई में उसकी तलाश पूरी हुई। उसे बड़ा सुकून मिला। जाने कब घंटों बीत गए। इतने में उसकी सहेलियों उसे पुकारते हुए वहां पहुंची। नीरा जमीन पर बैठी, पलाश की पेड़ पर सर टिकाए सोई हुई थी।


                            - सुतपा घोष, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


08 December 2024

लघु कथा - चिट्ठी



जून महीने की तपती दोपहर थी। सूरज अपनी पूरी ताकत लिए आसमान में चमक रहा था और गली में सन्नाटा पसरा था। सब कुछ थमा-थमा सा लग रहा था, सिवाय डाकिए के जो अपनी साइकिल पर घंटी बजाता हुआ हर घर के सामने से गुज़र रहा था।





किसी को कुशल क्षेम जानने के लिए पत्र का इंतजार था, तो किसी को परीक्षा परिणाम का डर, किसी को बिल की चिंता खाए जा रही थी तो कोई विरहन परदेश में रह रहे पिया की प्रेम पाती को पाने के लिए आकुल थी। गली का प्रत्येक व्यक्ति बस डाकिए की घंटी से चौकन्ना हो जाता था। 

        आज शर्मा जी भी दरवाजे की चौखट तक दौड़े दौड़े आए कि शायद संजय का कोई पत्र आया हो। संजय उनका बेटा,, जो भारतीय सेना में दो साल से अपनी सेवाएं दे रहा था। पूरे गांव में शर्मा जी बड़ी शान से कहते थे, कि मैंने अपने बेटे को भारत मां की रखवाली के लिए भेजा है। संजय का पत्र कई दिनों से आया नहीं था इसलिए चिंतित भी थे, लेकिन डाकिए को देखकर आशा की किरण नज़र आ रही थी। 





डाकिया भी थोड़ी देर रुक कर शर्मा जी के हाथ पर चिट्ठी रखकर चला गया। शर्मा जी जल्दी-जल्दी चश्मा टटोल कर पत्र खोलने लगे। शुरू की चार पंक्तियां पढ़कर ही वे वहीं चौखट पर औंधे मुंह गिर गए। परिवार वाले भी घबरा गए कि आखिर चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा था? पढ़ कर पता चला कि संजय अपनी धरती मां के लिए कुर्बान हो गया था। 


                                                                - वसुंधरा धर्माणी 


06 December 2024

कहानी- अल्हड़ लड़की



       पहाड़ियों के बीच में सुंदर सा गांव चारों तरफ हरियाली , पेड़ पौधे , सीढ़ीदार खेत , और लकड़ी के पत्थर के मजबूत घर जिनमें बड़े बड़े आंगन जिसको कि मिट्टी से लीपा हुआ था और उसमें चटाई पर धूप सेंकती हुई एक सोलह साल की लड़की जिसका नाम सोना है साफ सुथरा रंग और गुलाबी गाल और होंठ सबको अपनी तरह आकृषित करते सोना थी भी बला की खूबसूरत लड़की... वह हाथ में किताब लिए हुए शायद अपना पाठ याद करती हुई आंगन में बैठी है....





        तभी किचन से मां की आवाज आती है सोना बेटा आके नाश्ता कर ले... किचन में चली जाती सोना जहां पर उसकी दादी, दादा जी और उसके पिताजी और छोटा भाई भी रोटी और सब्जी खा रहे थे... मां ने सोना को भी सब्जी रोटी और दूध दिया... सभी नाश्ता खत्म कर चुके थे...

          सोना और उसका छोटा भाई स्कूल के लिए तैयार हो के स्कूल चले जाते है मां झट से बर्तन धो के और सफाई करके खेत को चली जाती ही है... दादी और दादा जी भी काम में लग जाते है... 

          धीरे धीरे सोना बारहवीं पास करके कॉलेज में चली जाती है जो भी सोना को देखता वही बहाने से उससे पूछताछ करने की कोशिश करते थे...
         
पर सोना इतनी भी नादान न थी वही सब समझती थी क्यों हर कोई उससे बात करते है सब उससे दोस्ती करना चाहते है... पर सोना अपनी पढ़ाई करती और अच्छे नंबरों से पास होती...

          इतने में एक दिन दूर का एक लड़का सोना को देखते ही आवक रह गया उसने पहले कभी इतनी सुंदर लड़की नि देखीं थी वह झट से सोना से प्यार कर बैठा और सोना थोड़ा कतराती और तिरछी नजर से देख कर उसको अपना दिल दे बैठी पर सोना डरती भी थी कि उसकी वजह से कहीं मैं बदनाम न हो जाऊं लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे मगर वह क्या करती वह भी अपने दिल के आगे मजबूर थी...

        अब वह कॉलेज जाती तो अनगिनत लोग उसको चाहते थे पर वह तो उस अंजान को अपना दिल दे बैठी थी अब वह और अजनबी धीरे धीरे कभी कभी मिलते तो थोड़ी देर की ही मुलाकात में हो जिंदगी भर के सपने देखती और वह उसको अपने प्रेमजाल में फंसा के खुश होता था और अनेक वादे करता उसको शादी का झांसा देता वह पागल भी उसका झूठ न पकड़ पाई और वह भी रंगीन दुनिया में खो जाती...

          अब सोना का ग्रेजुएशन पूरा होने को था इतने में सोना को एक बाज रूपी इंसान देखता है और वह उसको पाने के लिए सारे प्रयत्न करता है... उसका प्रेमी भी न जाने कहां चले गया सोना ने आखिर हार मान ली कि वह अब उसकी जिंदगी से जा चुका है और वह अब उस बाज रूपी इंसान की पत्नी बन गई...

       सोना की किस्मत में तो प्यार ही नहीं था वह बाज रूपी इंसान उसको शराब पीकर रोज मारता पीटता और गालियां देता वह बेचारी आसूं बहाती हुई उस भगवान को कोसती कि क्यों पैदा किया जब खुशियां ही नहीं लिखी तूने मेरी किस्मत में...

         पर अब हो भी क्या सकता था वह बस अब दिन काट रही थी इसी बीच उसके दो बच्चे हो गए अब वह उनका लालन पालन करने लगीं सोच कर कि कभी तो उसकी किस्मत पलटेगी... अब उसके बच्चे भी बड़े हो गए और अपनी मां को प्यार करते और उसका ख्याल रखते...

         अब सोना खुश थी और अब न उसके पास न वह इंसान था न बाज रूपी इंसान क्योंकि उसके पास था तो अपने बच्चों का प्यार और साथ...

         अब सोना खुले आसमान में गोते लगा रही थी अपने बच्चों के साथ अपने बच्चों के साथ जिन्होंने उसे प्यार दिया सम्मान दिया और आजादी दी अपने अतीत रूपी पिंजरे को तोड़ती हुई वह आजाद है... 

आज वह हंसती है, खिलखिलाती है, मुस्काती है, सपने देखती है, गुनगुनाती है, और खुले आसमान में तितली की तरह ऊंचाई भरती हुई, एक हिरनी की तरह कुलांचे मारती हुई हर दिन जीती है ...

        ये है सोना की कहानी और आज सोना बहुत खुश है अपनी छोटे से परिवार के साथ...!

        
                              - सुमन डोभाल काला,   देहरादून, उत्तराखंड


03 December 2024

रंग-बिरंगे...

रास्ता दौड़ रहा है, किसी सरपट दौड़ती ट्रेन की तरह, और मैं ठहर गई हूँ। सब कुछ आगे बढ़ता जा रहा है। मैं भी जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगी हूँ, पर रास्ते की रफ़्तार का साथ नहीं दे पा रही। बस गिरने ही वाली हूँ, लेकिन मैं गिरना नहीं चाहती। लड़खड़ाते हुए, भागने लगी हूँ।

मेरी धड़कनें तेज हो चुकी हैं। मन घबरा रहा है कि कहीं गिर न जाऊँ। दौड़ते-दौड़ते आसपास देखा तो पाया, और भी लोग दौड़ रहे हैं। कुछ मेरी ओर देखते हुए आगे निकल गए। मैं रोना चाहती हूँ ज़ोर से चीखना चाहती हू लेकिन वक़्त नहीं है। मैं रेस में हूँ। रेस छोड़ नहीं सकती।





क्या यह सच में रेस है ? मेरी शू-लेस ढीली हो चुकी है, खुलने को है। पर इसे बाँधने का भी वक़्त नहीं। क्या सच में वक़्त नहीं है ? आँखों के आँसू अब पसीने में बदल चुके हैं। मैं दौड़ रही हूँ। मेरा शरीर तरबतर हो गया है।

बाकी धावक उस रेस के अंत में, उस लाल झंडे पर निगाहें टिकाए हुए हैं। पर मैं... मैं दौड़ते हुए सोच रही हूँ—अगर वह झंडा मिल भी गया, तो उसके बाद क्या करना है ? अब मेरा ध्यान दौड़ पर नहीं, सोच पर है। मेरे पैर थके नहीं हैं, पर उनकी रफ़्तार धीमी हो गई है। सब कुछ अचानक और तेज़ हो गया है। जैसे कोई तीव्र गति से चलता पंखा हो, जिसकी पंखुड़ियों की गिनती करना मुश्किल हो।

मेरा सिर चकरा रहा है।
शोर है—बहुत तेज़ शोर। लोग चीख रहे हैं।
मेरी धड़कने अब मेरे कानों को ज़ोर ज़ोर से पुकार रही है।
मेरी दौड़ अब चाल में बदल रही है।

फिर अचानक, एक ज़ोर की आवाज़ आई-
"रुको!"
"रुक जाओ!"
"रुको!"
मैं रुक गई।
कहाँ जा रही हो?
वह लाल झंडा तुम्हारे लिए नहीं है।
यह रास्ता तुम्हारे लिए है।
तुम्हें इस पर चलना है, अपनी चुनी हुई गति से।

मैं ठहरते ठहरते वापस दौड़ने लगी, मैं रास्ते की ओर देख मुस्कुराई,रास्ता मुझे देखकर मुस्कुराया। अब कोई शोर सुनाई नहीं दे रहा है,अब कोई एक झंडा नहीं है। हज़ारों झंडे हैं।

रंग-बिरंगे।
मैं उन्हें पार करते हुए दौड़ रही हूँ।
हाँ, अब मैं दौड़ रही हूँ।
अपनी चुनी हुई गति से।