बहुत समय पहले किसी गांव में शंकर नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार पर आलसी था। साथ ही उसकी एक बुरी आदत थी वह अपनी गलती दूसरों पर थोप देता था और खुद अपनी गलती को स्वीकार करने से कतराता था। वह उस गांव में एक कच्चे घर में रहता था। वह एक ऐसे परिवार से आता था जिसमें सब गरीब थे। उसके पिता जी ने उसके लिए विरासत में केवल यही एक कच्चा मकान छोड़ा था।
गांव में ज्यादातर घर पक्की ईटों के बने थे जो एक-दो कच्चे थे उनके मालिकों ने अपने घर के सामने ईंटे गिरवा शुरू भी कर दिया था। अब गांव में बस शंकर का परिवार ही था जो अभी तक कच्ची मिट्टी के घर में रहता था। शंकर के पास एक जमीन थी, जो उसके पूर्वजों की थी। उसी पर परिवार का सारा बोझ था, पर वह जमीन भी अब बूढी हो चुकी थी। खेती उतनी खास होती नहीं थी। एक दिन शंकर तमतमाते हुए घर में घुसा।
“मेरे पिता ने मुझे पैदा ही क्यों किया?”
शंकर ने खाट पर बैठते हुए कहा- “क्या हुआ जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”
पत्नी ने पूछा- “अरे! कम से कम इस मिट्टी के घर में तो नहीं रहना पड़ता, बरसात भी आने वाली है पता नहीं इस घर का अब क्या होगा? अब तो खेती भी बंद हो रही है। नहीं तो पैसों से मैं भी ईंटे गिरवा लेता।”
“तो इसमें आपकी बाबूजी की क्या गलती है?” “उन्हीं की तो गलती है, इतना सम्मान पाकर क्या मिला? यह कच्चा घर और बंजर होती जमीन!”
शंकर चाहता तो मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे इकट्ठे कर लेता, पर वह अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर की ओर देखकर तमतमाते हुए कुछ बुदबुदाने लगा।
शंकर ने उसकी गरीबी का जिम्मेदार अपने पिता को ठहराया। वह पहले कुछ काम किया भी करता था। अब तो वह भी बंद हो गया। सुबह देर से उठता था, दोपहर को खेत पर बिना मन के जाता और अगर धूप तेज होती तो जाता ही नहीं था। फसल हुई या नहीं, गायों ने चरा या बिना पानी के सुख गई, इसकी उसको कोई परवाह नहीं थी। उससे कोई पूछता की खेती आजकल नहीं तो रही है क्या? तो कहता- “अरे भाई मेरे पिता की बदकिस्मती मेरे सर आ गई है, झेलना ही पड़ेगा”
एक दिन ऐसा आया कि रात के चूल्हे के लिए पड़ोसी से अनाज मांगना पड़ा। घर तो कमजोर था ही और इस कमजोरी में सुई चुभाने के लिए बरसात भी हो गई और इतनी की शंकर का घर मिट्टी में मिल गया। शंकर और उसकी पत्नी जमीन पर बैठे कुछ सामान संदूक में रख रहे थे ताकि वह भीग ना जाए। तभी ऊपर बची हुई छत के खपड़े से कुछ, शंकर के सिर पर गिरा।
“हाय! सिर फोड़ डाला” शंकर चिल्लाया। जब नीचे देखा तो एक गंदा और पुराना झोला पड़ा था।
“अरे! यह क्या है?” उसकी पत्नी ने हैरान होकर पूछा।
“क्या मालूम?”
शंकर ने झोले को धीरे से खोला, वह झोला नोटों से भरा हुआ था। यह देख दोनों की आंखें फटी रह गईं। उस नोटों के साथ एक पुराना कागज़ का टुकड़ा भी था। जब शंकर ने उस कागज को खोला तो उसमें उसके पिता की लिखावट थी। और उसमें लिखा था
प्रिय शंकर,
मुझे पता है कि यदि तुम्हें यह पत्र मिला है तो तुम्हारा मिट्टी का कच्चा घर बरसात में ढह चुका है। मैने इस झोले में पैसे रखे हैं, जो मैने अपने जीवन भर में कमाए हैं। जिसे तुम अपने पक्के घर की कामना पूरी कर सकते हो। मैं चाहता था कि तुम अपनी मेहनत से एक नया घर बनवाओ। पर, ये पैसे तुम्हारी विरासत हैं। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।
- तुम्हारे पिता
यह पढ़कर शंकर की आंखों में आंसू आ गए।
पिता के लिए उसके दिल में जो खराब तस्वीर बनी हुई थी, वह साफ हो जाती है। उसे अपनी गलती का भी पता चलता है। वह उन पैसों से एक नया पक्का घर बनावत है और एक नई उपजाऊ जमीन भी खरीदता है। उस जमीन पे वह बैल की तरह काम करके काफी तरक्की करता है।
- प्रणव राज, बिहार


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