कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं तो ये बात मेरे ऊपर भी चरितार्थ होती है। ऐसा है कि नेतागिरी का गुण बचपन से ही मुझमें कूट-कूटकर भरा था ये बात और है कि इतना बारीक कूटा गया था कि आप जैसे साधारण मनुष्यों को बिना सूक्ष्मदर्शी वो गुण दिखाई देना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। हालांकि नेतागिरी के गुण से ओत-प्रोत होने के बावजूद मुझे कभी भी तिल मात्र भी इसका घमंड नहीं रहा है।
तो बात शुरू करते हैं हाईस्कूल के दिनों से ! उन दिनों हाईस्कूल हमारे यहां सातवीं से ही शुरू हो जाता था तो हमलोग जैसे ही सातवीं में पहुंचे तो मुझे पहली बार अपने-आप में नेता के छुपे हुए गुण का अहसास हुआ। मैंने अपनी क्लास में आठ-दस लड़कों की एक टोली बना ली थी। दो ही महीनों में एक दिनचर्या बन चुकी थी कि पहली घंटी का क्लास करने के बाद उन सभी लड़कों को बहकाकर स्कूल से बाहर ले जाना है। बाहर जाकर स्कूल के आस-पास खेतों, होटलों, साईकिल दुकान, खोमचे वाले के पास आदि जाकर खूब मटरगश्ती करनी है। कभी बेर खानी है तो कभी सिंदुआर की झाड़ियों में मोटी डालियों पर लटकना है और सीधे टिफिन से ठीक पहले वाली घंटी के वक्त क्लास लौटना है। हालांकि बाहर जाने से पहले बाक़ी लड़के बाद में होने वाली कुटाई को लेकर सशंकित रहते थे लेकिन मजाल है कि मेरे गुरु मंत्र दिए जाने के बाद कोई डर छू-मंतर न हो जाए ?
ये अलग बात है क्लास लौटने के बाद रोज़ाना शर्मनाक तरीके से स्कूल के चपरासी खुदू मामा द्वारा कुटाई होती थी। मैं मन ही मन सोचता कि कम से कम टीचर्स से मार खाते तो इज्ज़त तो बनी रहती क्लास में ! खैर मार खा-खाकर मैं और मेरे गैंग के लड़के ढीठ बन चुके थे। क्लास दर क्लास दसवीं कक्षा तक मेरी बहुमुखी नेतागिरी की प्रतिभा में और भी निखार आता गया और हमलोग हुड़दंग और फ़िर कुटाई के बड़े-बड़े कीर्तिमान रच डाले। स्कूल में सभी टीचर्स और दो चपरासी में कोई ऐसा नहीं बचा था जिसका बीपी बढ़वाकर हमलोग उनसे न धुले हों। मैं उन लड़कों का नेता था इसलिए मेरे नाम एक खास कीर्तिमान दर्ज था। कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात तक नहीं करने वाले अत्यंत शांत स्वभाव वाले बाउरी सर से भी मैं प्रसाद पा चुका था। मेरे अलावा पूरे स्कूल में उन्होंने कभी किसी को एक चांटा तक नहीं मारा था तो आप समझ सकते हैं मेरे टैलेंट का लेवल।
कॉलेज तो मैं कभी ज्यादा गया नहीं इसलिए मेरे कॉलेज के सहपाठी मेरी नेतागिरी के अभूतपूर्व कौशल से महरूम रह गए। लेकिन जिस लॉज में हम छह लड़के रहते थे वहां मैं कैसे चूक सकता था। सुबह चार बजे उठकर जॉगिंग करने जाना और लौटकर फिर दस बजे तक सोना। रूम में गैस चूल्हा रहने के बावजूद होटल में सामूहिक भोजन। कभी चांडिल डैम,कभी सूर्य मंदिर तो कभी रातों को ऑर्केस्ट्रा देखने जाना। रूम में समय-समय पर ताश खेल का मजमा लगाना ये सब मेरी ही उत्कृष्ट नेतागिरी और मोटिवेशन का कमाल था।
कालांतर में कुछ ख़ास कारणों से तकरीबन 19 की उम्र में मेरी शादी हुई। इसके बाद मैं गांव शिफ्ट हो गया। क़रीब एक साल बाद हमारे यहां विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी थी। चुनावी जंग में इस बार हमारे ईचागढ़ विधानसभा की रणभूमि में यूं तो तीन बार के विजेता विधायक सिंह जी सहित वर्तमान विधायक सह डिप्टी सीएम स्व सुधीर महतो जी ताल ठोंक रहे थे। लेकिन उस बीच इस दफे केला छाप पर मेरे पिता के मित्र श्री कार्तिक महतो जी दहाड़ रहे थे।
चहुं ओर बस उनकी ही चर्चा थी और लगभग यही सबको महसूस हो रहा था कि इस बार कार्तिक जी ही बाजी मारेंगे। मुझे वोटर बने महज़ एक या डेढ़ साल ही हुए थे। सो युवा जोश से लबरेज़ मैं जब कार्तिक जी से मिला तो एक बार फिर मेरे अंदर का कद्दावर नेता जाग गया। फिर क्या ? मैं युद्ध स्तर पर कार्तिक जी के लिए कैंपेन में लग गया। विश्वास नहीं कीजिएगा कि मैंने ग्रासरूट लेवल पर इतना भयंकर और तूफ़ानी चुनाव प्रचार किया कि अंततः कार्तिक जी 18 हज़ार वोटों से हार गए। सक्रिय राजनीति की दुनिया में यह मेरी पहली उपलब्धि थी।
चुनाव के ठीक बाद मेरा चयन पारा शिक्षक के पद पर हुआ। कुछ दिन शांत रहने के बाद जब मैं अपने प्रखंड स्तर पर पारा शिक्षक संघ का सचिव बना तो मुझे एक बार फिर अपनी नेतागिरी का कौशल दिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उन दिनों पारा शिक्षकों के मानदेय का भुगतान प्रखंड स्तर से ही होता था लेकिन अनियमित ! मैंने इस अनियमितता को दूर करने का बीड़ा अपने कंधों पर ले लिया। यकीन मानिए जिस माह से मैंने मुहिम शुरू की उसके बाद अगले नौ महीनों तक मानदेय का फंड ही नहीं आया। इस प्रकार मैं अपने शिक्षक संगठन में भी नेतागिरी के कीर्तिमान हेतु एक दो-ढाई सौ ग्राम साइज़ का मील का पत्थर गाड़ चुका था।
वर्ष 2014 में सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में मेरे सबसे फेवरेट युवा लोकप्रिय लीडर,तीन बार के डिप्टी सीएम और एक बार के होम मिनिस्टर परम आदरणीय सुदेश कुमार महतो जी हमारे लोकसभा प्रत्याशी के रूप खड़े थे। मैं तो पहले से ही पार्टी में जुड़ा ही था ऊपर से फेवरेट लीडर को देखकर मेरी बांछे खिल गई। ख़ुदा कसम मैं भाव-विभोर होकर इतनी तन्मयता से ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया कि उनकी जमानत जब्त होते-होते बची।
वर्ष 2018 आते-आते मैं अपने शिक्षक संगठन में अपनी धाकड़ नेतागिरी की बदौलत प्रखंड से प्रोन्नति पाकर जिला सोशल मीडिया प्रभारी बन चुका था। उन दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन पारा शिक्षकों का धरना-प्रदर्शन,घेराव होता रहता था। मैं कहां पीछे रहने वाला था ! हर दिन अखबारों में बयानबाज़ी और जहां-तहां लोकल टीवी चैनलों पर बाइट देकर इतराना मेरी दिनचर्या बन चुकी थी। उस समय टेट पास, प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित पारा शिक्षक एक साथ एकजुट होकर चट्टानी एकता के साथ अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत थे। मैं ही वो महामानव और कर्मठ नेता हूं जिसने पारा शिक्षकों की चट्टानी एकता में छेद कर उसमें एक बरगद का बीज डाल दिया था। 2019 तक आते-आते बरगद अपनी जड़ें फैलाकर चट्टानों में दरार पैदा करना शुरू कर चुका था।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में हम पारा शिक्षक तत्कालीन राज्य सरकार की नीतियों से इतने क्षुब्ध थे कि मैंने जीवन में पहली बार सहाय जी के "हाथ" मजबूत करने की ठान ली। मेरा आक्रोश और नेतागिरी का जोश उफ़ान मार रहा था। मैंने जी-जान लगाकर सहाय जी की सहायता करने की कोशिश की लेकिन अंततः सहाय जी असहाय हो गए।
2021 के अंत तक मैं संगठन के लिए मेहनत कर पारा शिक्षकों की एकता वाली चट्टान को कटिंग पत्थर के टुकड़ों में तब्दील करने में कामयाब हो चुका था। पारा शिक्षक संघ तीन धड़ों में बंट चुका था।अब मैं और ज्यादा प्रमोट होकर टेट पास पारा शिक्षकों के संघ का प्रदेश प्रवक्ता बन चुका था। मतलब मैं राज्य स्तर का बड़ा नेता बन चुका था। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि बतौर प्रवक्ता मैंने इतना धुआंधार परफॉर्मेंस दिया कि 2022 की शुरुआत तक टेट पास पारा शिक्षक संघ मेरे सकल प्रयासों से मेरे कर-कमलों द्वारा तीन फाड़ हो चुके थे। मेरी इसी निःस्वार्थ सेवा भावना और लगन की वजह से जनवरी 2022 में मुझे टेट पास पारा शिक्षकों एवं गैर पारा कैंडीडेट्स का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।
बतौर प्रदेश अध्यक्ष हमारी मुहिम थी कि बिना परीक्षा ही पूर्व की तरह काउंसलिंग के जरिए शिक्षक नियुक्ति कराना। मैं प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नायक फिल्म के शिवाजी राव की तर्ज़ पर ताबड़तोड़ धरना-प्रदर्शन चालू कर दिया। सिर्फ़ यही नहीं, संगठन के सदस्यों की सहमति पर कोर्ट में केस भी करवा दिया गया। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि महज़ एक साल के भीतर सरकार ने हमारी मांगों को दरकिनार कर ठिकाने लगाते हुए अपनी ही नियमावली के साथ शिक्षक नियुक्ति का विज्ञापन ज़ारी कर दिया। फिर क्या ? उसके बाद हमारी नेतागिरी के भी घोड़े लग गए !
दुर्भाग्यवश मैं आज़ प्राइमरी टीचर हूं। सरकारी प्रावधानों से बंधे होने के कारण फिलवक्त मैं खेत की मेड़ के नीचे दुम दबाकर चुपचाप बैठे सियार की तरह अपनी भी नेतागिरी की चूल मारती पूंछ को "दबड़ाकर (मोड़कर)" बैठा हुआ हूं। और इसी वज़ह से बहुत सारे लोग राहत की सांस ले रहे हैं। मैं जहां भी और जिसके भी समर्थन में नेतागिरी में उतर जाऊं, उसके घोड़े लगना तय है। यही मेरी काबिलियत और खासियत दोनों ही हैं। खैर ! मुझमें नेतागिरी का जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। जनकल्याण की चाहत दिल में अभी भी तरोताजा है। बस वक्त का इंतजार है। लोगों का कल्याण मैं करता आया हूं और करके रहूंगा क्योंकि.....नेता तो मैं हूं ना।
- कुणाल
नोट- यह लेख केवल हास्य और व्यंग्य हेतु लिखा गया है।

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