साहित्य चक्र
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11 August 2025

लघुकथा: साल 3032 में शायद


साल 3032 के उस दिन विश्व स्नेह नियंत्रण केंद्र ने तात्कालिक घोषणा की कि 'नागरिकों ध्यान दो। सालों पहले कोई मानवता नाम का वायरस था, जो फिर से जाग्रत हो गया है। यह मानवता एक भयानक बग है, जो आपके शरीर के सिस्टम में अचानक प्रकट होता है और फिर मनुष्य अजीब हरकतें करने लगता है। अगर अचानक कोई व्यक्ति किसी के दुख में उसकी मदद के लिए भागता दिखाई दे तो समझ लीजिए कि वह इस वायरस का शिकार हो गया है।'





इस वायरस के लक्षण अनदेखा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लक्षण हैं किसी को रोते देख कर आपकी आंखों का नम होना, जरूरतमंद व्यक्ति को देख कर अपनेआप हाथ का जेब की ओर बढ़ जाना, किसी की तकलीफ सुन कर उसकी मदद के लिए तलब लगना, किसी की गलती के लिए उससे बदला लेने के बजाय उसे माफ कर देने की इच्छा होना और अगल-बगल से गुजर रही गाय और कुत्ते को डंडा या लात मारने का मन न होना।

इसमें किसी भी तरह का बदलाव आप खुद में या घर के किसी भी सदस्य में अनुभव करें तो तत्काल नजदीक के मानवता नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें। हमारे वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इस मानवता का एंटीडाॅट बनाने में लग गए हैं। प्रधानमंत्री की ओर से घोषणा की गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति में मानवता के गुण दिखाई दें, तुरंत उससे दूर हट जाएं, उसे अकेला छोड़ दें।


हमारी खुफिया एजेंसी का मानना है कि यह वायरस भारत नाम के देश से फैला है। सामान्य जनता से निवेदन है कि वह चिंता न करे। सोशल डिस्टेंस रखे। किसी की ओर देख कर भूल से भी न मुसकराएं, प्यार और सरलता का अनुभव होते ही तत्काल उसे नष्ट कर दें। दिन में तीन बार बिना वजह झगड़ा करते रहें या किसी निर्दोष को बिना वजह नुकसान पहुंचाते रहें।

जब तक एंटीडाॅट की खोज नहीं हो जाती, तब तक 'लुच्चईसीटामोल' और 'स्वार्थोमाइसीन' की खुराक बारबार लेते रहें। याद रखिए मानवता से जीवन सुधर सकता है। इसलिए इससे सतर्क रहें।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह




07 August 2025

राखी एहसासात और तहज़ीब का रेशमी धागा


राख़ी एक निहायत ही मुक़द्दस और जज़्बाती बंधन है, जो सदियों से भाई-बहन के रिश्ते की मज़बूती, मोहब्बत, ईसार और बे-ग़रज़ अपनाइयत का मज़हर रहा है। इस रेशमी धागे में सिर्फ़ धागों की मजबूती नहीं होती, बल्कि इसमें लिपटी होती है बहन के दिल की हर दुआ, हर फ़िक्र और हर महसूस किया गया जज़्बा। राख़ी वह महीन सा रिश्ता है, जो नज़र नहीं आता, लेकिन दिलों को ऐसे बाँधता है कि उम्र भर की दूरी और शिकवे भी इस धागे के सामने बेमानी हो जाते हैं।





यह पर्व हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राख़ी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र, सुख-शांति और हर बुरे वक़्त से हिफ़ाज़त के लिए दुआ करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन की हिफ़ाज़त, सम्मान और हर ख़ुशी को अपनी ज़िम्मेदारी समझकर निभाने का वादा करता है। यह रस्म केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय तहज़ीब का वो अनमोल हिस्सा है जिसमें रिश्तों की गर्माहट, अपनापन और इंसानी जज़्बात गहराई से समाए होते हैं।

राख़ी का दिन घरों में सिर्फ मिठाइयाँ और उपहारों तक सीमित नहीं होता। इस दिन हर कोना खुशियों से जगमगा उठता है। नन्हें बच्चे रंग-बिरंगे कपड़ों में सजते हैं, बड़े बुज़ुर्गों के चेहरों पर मुस्कान बिखरी होती है और घर में प्यार और अपनत्व का माहौल एक जश्न की सूरत इख़्तियार कर लेता है।

इस मौक़े पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि राख़ी सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि यह रिश्तों की उस बुनियाद का ज़िक्र है जो भावनाओं, विश्वास और ज़िम्मेदारियों पर टिकी होती है। जैसा कि कहा गया है- रिश्ते रस्मों से नहीं, बल्कि एहसासों से बनते हैं। यही एहसास राख़ी के दिन सबसे ज्यादा महसूस होता है।

यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि आधुनिकता के इस तेज़ दौर में भी पारिवारिक मूल्य, सांस्कृतिक विरासत और भावनाओं की अहमियत कभी कम नहीं होती। राख़ी का यह रेशमी धागा हमारे समाज को मुलायम लेकिन मजबूत डोर से जोड़ने का काम करता है।

 राख़ी सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि यह हमारे तहज़ीबी शऊर और रूहानी वाबस्तगियों का आइना है। यह वह दिन है जो हमें यह सिखाता है कि प्यार, फिक्र और क़ुर्बानी ही रिश्तों की असल ताक़त होते हैं।


                                                      - डॉ. मुश्ताक अहमद शाह


31 July 2025

प्रेमचंद का साहित्य कहानी या उपन्यास नहीं, बल्कि भारत की हकीकत है।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी (तत्कालीन बनारस) के समीप एक छोटे से गाँव लमही में हुआ था। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और समाज अनेक प्रकार की कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक विषमताओं से ग्रस्त था। उनके माता-पिता ने उनका नाम रखा ,धनपत राय श्रीवास्तव। बचपन में ही वे मातृ-पितृ स्नेह से वंचित हो गए। प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा,आर्थिक अभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और सामाजिक असंतुलन ने उनके व्यक्तित्व को ऐसे आकार में ढाला कि उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य या कल्पना नहीं, बल्कि पीड़ित समाज की वाणी बनाया।





प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा में 'नवाबराय' उपनाम से की। उनकी पहली प्रकाशित कृति 'सोज़े वतन' ब्रिटिश सरकार को इतनी नागवार गुज़री कि उस पर पाबंदी लगा दी गई। इसके बाद उन्होंने 'प्रेमचंद' नाम अपनाया और हिंदी लेखन की ओर अग्रसर हुए। उनके साहित्य में जो यथार्थ चित्रण है, वह उनके जीवनानुभवों का निष्कलंक प्रतिबिंब है। उनके पात्र सीधा पाठक से बात करते हैं, उसकी पीड़ा को उसका स्वयं का अनुभव बना देते हैं। चाहे वह 'धीरू' जैसा किसान हो, 'होरी' हो या 'निर्मला' हर पात्र आमजन से आता है और उसे सच के धरातल पर खड़ा करता है।

प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' यूं ही नहीं कहा गया। उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसी कालजयी रचनाएं दीं जिन्होंने साहित्य को केवल अभिजात वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि जनमानस की आवाज़ बना दिया। 'गोदान' में एक किसान की वेदना और साहूकारी शोषण की मार्मिक कथा है, तो 'गबन' मध्यमवर्गीय मानसिकता और नैतिक संघर्ष का अद्भुत चित्रण है। 'निर्मला' बाल विवाह की त्रासदी और नारी-जीवन की विडंबनाओं को परत-दर-परत खोलती है, तो ‘सेवासदन’ स्त्री मुक्ति की पुकार बन जाती है। 'रंगभूमि' में एक अंधे भिक्षुक सूरदास के माध्यम से पूंजीवाद और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई गई है।

उनकी कहानियाँ, 'कफन', 'दो बैलों की कथा', 'पूस की रात', 'पंच परमेश्वर', 'बड़े घर की बेटी'न केवल साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से अत्यंत सशक्त हैं। 'कफन' में हाशिये पर खड़े मानवों का कठोर यथार्थ है, तो 'पूस की रात' में निर्धन किसान की विवशता और संघर्ष। 'दो बैलों की कथा' में मनुष्यता की संवेदना और पशु-पात्रों के माध्यम से मानवीय पीड़ा का जो चित्र रचा गया है, वह अद्वितीय है।






प्रेमचंद का साहित्य बहुपरतीय है, वह महज़ कहानी या उपन्यास नहीं, एक विचारधारा है। उन्होंने साहित्य को 'सत्य के अन्वेषण' और 'समाज-सुधार' का साधन माना। उनके लिए लेखन धर्म था,और इसीलिए उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़कर स्वराज्य आंदोलन से सांस्कृतिक स्तर पर जुड़ाव किया।

उनकी भाषा में कहीं बनावट नहीं, कोई अलंकारिक बड़प्पन नहीं ,बल्कि सादगी, आत्मीयता और जीवन की सरल-सच्चाई है। उन्होंने खड़ी बोली को वह गरिमा और सरसता दी जिसकी भाषा में एक ओर संवेदना की नर्मी हो, दूसरी ओर विचार की शक्ति। लोकभाषा, भावप्रवाह और कथ्य की सहजता यही उनके लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता थी। उन्होंने साहित्य में आदर्श और यथार्थ का एक अद्भुत समन्वय स्थापित किया, जिसका असर हिंदी साहित्य की आगे की पीढ़ियों पर गहराई से पड़ा।

मुंशी प्रेमचंद ने जीवनभर वंचितों, उत्पीड़ितों, स्त्रियों, मजदूरों, किसानों और दलितों की आवाज़ को मंच दिया। उन्होंने उन कहानियों को लिखा जिन्हें समाज अक्सर अनसुना करता रहा। यह उनकी लेखनी का ही प्रताप था कि उन्होंने एक कालखंड को भाषा और कथ्य के माध्यम से जीवंत कर दिया और उनके पात्र कालजयी बन गए।





8 अक्टूबर 1936 को जब वे इस संसार से विदा हुए, उस समय वे आर्थिक रूप से असमर्थ, शारीरिक रूप से अस्वस्थ, लेकिन नैतिक रूप से इतने समृद्ध थे कि उनकी चिताभस्म से साहित्य की चेतना आज भी जल रही है। उनके साहित्य में एक युग की परछाइयाँ हैं और भविष्य के बदलाव की संभावनाएँ भी।

आज जब हम हर 31 जुलाई को ‘राष्ट्रीय लेखक दिवस’ के रूप में प्रेमचंद की जयंती मनाते हैं, तो यह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि भर नहीं होनी चाहिए, बल्कि लेखक, पाठक और समाज के रूप में यह संकल्प होना चाहिए कि प्रेमचंद के सिद्धांत , यथार्थवाद, संवेदना, समाजसापेक्षता और समानता , को हम अपने जीवन, लेखन और कर्म में आत्मसात करें। यही मुंशी प्रेमचंद के प्रति हमारी सच्ची नमन होगी।


- डॉ. मुश्ताक अहमद




29 July 2025

आज की रचनाएँ- 29 जुलाई 2025





ये कैसा रिश्ता 

सात फेरों का सात जन्मों 
 का रिश्ता माना जाता 
पर आज इस रिश्ते में 
खोट जरूर नजर आता।
सात जन्म तो क्या निभाने 
एक ही जन्म लग गया है
अब मौत से रूबरू करवाने।
पत्नी अर्धांगिनी मानी जाती 
उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े 
कर फ्रीज में डाली है जाती।
प्रेम विवाह कर रिश्ता बनाया जाता 
फिर गैर मर्द से रिश्ता बनाकर
 पति का क़त्ल करवाया जाता।
पति के टुकड़े टुकड़े कर नीले ड्रम में डाले
स्वयं गैर मर्द संग कारनामें किए काले।
हनीमून मनाने निकले घर से जब
पुराने प्रेमी से क़त्ल करवाकर सांस ली तब।
पति परमेश्वर था माना जाता 
आज तो उसके टुकड़ों को टाइलों 
के नीचे  पत्नी द्वारा दबाया है जाता।
बाईक पर जब  घूमने है निकले
सैल्फी के बहाने पति को नदी में धका
देकर बोली ये तो स्वयं है फिसले।
दोनों में थोड़ी कहा-सुनी हुई जब
पत्नी ने पति की जीभ काट ली तब।
नाग पंचमी मनाने पति संग मायके आई
फरार हुई प्रेमी संग फिर चैन पाई।
जो एक दूजे के होते थे  प्रेम में दिवानें
आज एक दूजे का खून करके धूम लगे हैं मचानें ।
आखिर ये रिश्ता इतना बिगड़ कैसे गया 
हो सकता है इसमें कोई तीसरा आ गया।
इस रिश्ते को बचाने की मुहिम चलानी होगी 
अन्यथा एक बड़ी त्रासदी झेलनी होगी।

- विनोद वर्मा


*****


गुलाबी शामें, सुनहरी रातें

दुनिया मोहब्बत के रंगों से सजी है
फिर भी हर नज़ारा उधार
सा लगता है।
भीगती बारिश, चमकती बूँदें, 
गुलाबी शामें, सुनहरी रातें,
सब उसकी यादों में, 
उसके बिना अधूरे से लगते हैं।
चाँद तारे की महफ़िलें,
हवाओं की सिहरन,
उसकी मुस्कान न हो तो,
सब सूना-सूना सा है।
दिल हर पल पूछता है ,
ये मंज़र उदास क्यों है?
जवाब सिर्फ धड़कनों 
में छुपा होता है।
मोहब्बत पास हो तो हर
मौसम ख़ूबसूरत,
वो न हो तो हर नज़र बेजान।
यही है इश्क़ की तड़प,
जुदाई में हर ख़ुशी बेरंग,
फिर भी दिल में उम्मीद की
किरण रहती है।
कभी ये बरसात, ये हवा,
फिर से उसके साथ हसीन हो जाए।
ये तेरी यादों का मौसम है,
हर मंज़र तेरा नाम पुकारता है।
हर लफ़्ज़  मेरा तुझमें खो जाता है।

- डॉ. मुश्ताक अहमद



*****


जीवन की चाल

वो हर मोड़ पर बस फिसलते रहे,
हम सच्चाई के साथ चलते रहे।

वो माया के प्याले सँभालते रहे,
हम ख़्वाबों में सच्चाई पलते रहे।

वो शोहरत के पीछे मचलते रहे,
हम सुकूनों में खुद को बदलते रहे।

वो रिश्तों की दीवार छलते रहे,
हम टूटे हुए दिल भी मलते रहे।

वो हर दिन नया ज़ख़्म छलते रहे,
हम हर दर्द में गीत गुनगुनाते रहे।

वो दुनिया के रंगों में ढलते रहे,
हम उजली हकीकत में जलते रहे।

- शशि धर कुमार


*****


मैं ही मैं हूं 

जब तुम्हें मैं कहीं दिखाई ना दूं ,
हर तरफ खामोशी हो 
और मैं कहीं सुनाई ना दूं !
सोचकर देखना कि मैं नहीं हूं 
मैं कहीं नहीं हूं ....... 
महसूस करना मुझे ...
हर कोने में , तस्वीर में , अपनी आंखों में ...
दर्पण में , बीती यादों  की तह में ...
पलक मत झपकना ... वरना गिर जाऊंगी 
आंसू बनकर तुम्हारे पहलू में ....
उस आंसू की खुशबू महसूस करना ...
या रोककर उसमें देखना सतरंगी पल 
कुछ अनछुए अहसास ....
सोचकर देखना कि मैं नहीं हूं 
मैं कहीं नहीं हूं .....
मुश्किल लगने लगेंगी राहें ...
और मंजिल.... दूर ...बहुत दूर ....
एक अनजाना सा डर रोकने लगेगा सांसें 
पर देखना कि मैं हूं ...
यही कहीं आसपास ....
जहां भी महसूस कर सको 
मेरी उपस्थिति ...... मैं वहीं हूं 
.... मैं हूं .... हर जगह हूं....
ख्याल में .... खुशबू में आंखों में ....
सिर्फ मैं हूं .... मैं ही मैं हूं .....

- मंजू सागर 


*****


संशय

हां मैं लिखता हूं
तुम्हारी मुस्कुराहट में 
अपना वजूद लिखता हूं।

हां मैं देखता हूं 
तुम्हारी छुपती निगाहों में 
अपना अस्तित्व देखता हूं।

 हां मैं मुस्कुराता हूं
 तुम्हारी स्मृति में खोकर
 हृदय तल से मुस्काता हूं।

हां मैं डरता हूं 
एक बेनाम रिश्ते को 
एक नाम देने से डरता हूं।

- डॉ. राजीव डोगरा


*****


वो घर पुराना

वो मेरा पुराना घर,
थे बेपरवाह,नहीं था डर।
सालों बाद जब पड़े कदम,
तैर गए वो सारे मंजर।

आने लगी हँसी की आवाज़ें,
कुछ ढूँढ रही थीं मेरी निगाहें।
सब कुछ तो मिला मगर,
फीकी पड़ गईं अब मुस्कुराहटें।

देखो दीवारें भी रो पड़ीं,
बंद हुई वो भी घड़ी।
किसी आशा से तकती थी जो,
इंतज़ार में यूँ ही खड़ी।

सजता था चूल्हा उसी ओर,
माँ जगाती "उठ, हो गई भोर!"
चारों तरफ फैला वीराना,
नहीं रहा अब कोई भी शोर।

अब तो हैं सबके अलग कमरे,
कौन उठाए किसी के नखरे?
पहले रहते थे सब एकत्रित,
आज सब लगते बिखरे-बिखरे।

अबकी मनाएँ वहीं त्योहार,
सजाएँ फिर से घर-आँगन-द्वार।
नींव न बिखरे कभी भी फिर,
इनका हम पर बड़ा उपकार।

- सविता सिंह मीरा

*****


पतवार

ज़िंदगी की कश्तियाँ टूटी नहीं अब तक,
हौंसलों की बाँह में हर बार पतवार है।

छीन लेता है भले कुछ रोज़ ये संसार भी,
मगर सीने में दबी इक मौन कमान है।

हार कर हर मोड़ पर सीखा यही मैंने,
हर शिकस्ते-ज़िंदगी में छुपा जहान है।

सफ़र लम्बा है, मगर रुकता नहीं पांव,
थक चले जिस्म, दिल में न कोई थकान है।

जिसको लोग समझे हैं बस इक मुसाफ़िर,
उसके हौसलों में छुपी पूरी जान है।

ज़ख्म खाकर भी जो मुस्काता रहा हर रोज़,
उसके जज़्बों को मेरा सच्चा सम्मान है।

कितने तो टूटे मगर फिर भी न बिखरे,
दिल के तहख़ानों में बचे कुछ अरमान है।

डूबते हैं सब मगर बचते वही अक्सर,
जिनके पास आख़िरी कोई पतवार है।

- शशि धर कुमार

*****

प्रेम!

ढाई अक्षर का एक शब्द
यही रिश्ताहै न !
हम दोनों के दरमियां ?
जानता हूं मैं,तुम्हारा प्रेम भी
सच्चा है, परअंतर है कुछ,
हम दोनों के,प्रेम की परिभाषा में,
मेरे लिए,किसी दिल के
एक कोने का, किसी दूसरे दिल के
एक कोने से, बंध जाना,
अनदेखी गिरह से,प्रेम है !
तुम्हारे लिए,एक देह का,
दूसरी देह से,मात्र स्पर्श ही
प्रेम है! माना दोनों ही
प्रेम के रूप हैं,
लेकिन,
तुम देखना, मेरा प्रेम
बढ़ेगा, बढ़ता रहेगा और बना रहेगा,
अनंत-काल तक, पर तुम्हारा प्रेम !
शायद,धुंधला पड़ जाएगा
समय के साथ।
पता है,ढाई अक्षर के,
इस शब्द में,एक और एक अक्षर,
का जुड़ना,बताता है कि,
कि स्वीकार कर लिया है,
मैंने प्रेम किया तुम्हारी
परिभाषा को।
पर वो आधा अक्षर,अभी अधूरा ही है,
जो मेरे प्रेम की,
परिभाषा है,
साथ यूं ही खड़ा है
बस इस उम्मीद में कि शायद,
इसे तुम पूरा करोगे,
किसी दिन।

- विकास कुमार शुक्ल


*****

कहासुनी

मन से आगे बढ़ना सीखो !
मन से मिलना सीखो!
आपस में क्या लड़ना ?
मन न मिले तो दूर हो जाओ !
मन ही मन क्यों किसी को कोसना ?
माटी का खिलौना हो, माटी में है मिलना,
किस पर इतना अभिमान करना,
क्या है मेरा इस जग में ?
बस मोह का बन्धन है,
यहाँ सुलझे हुए भी उलझे हुए हैं,
दो दिन की है जिंदगानी,
तू तू मैं मैं क्यों किसी से करना ?
तुमने कहा मैंने सुना,
मैंने कहा तुमने सुना,
मन में गाँठ मत रखना,
कहासुनी हो गई तो,
बात को दिल से मत लेना,
अपनों से क्यों झगड़ना ?
प्रेम से मिलकर रहना सीखो!

- चेतना सिंह


*****



19 July 2025

नरेंद्र सोनकर के दोहे




जात-पांत के जाल में, उलझा हर इंसान। 
    किंकर्तव्यविमूढ़ है, खो बैठा निज ज्ञान।।

बोले जो हृदय अगूढ़, सीधा सादा भाव।  
    सत्य-वचन में ताक़तें, झूठ न पाए ठाव।।

नरेन्द्र खोजे सत्य को, रखे न छद्म विचार। 
    अगूढ़ मन से बोलता, करे विवेक प्रसार।।

थाम ऊँगली चल पड़ा, जीवन की हर चाल। 
    साया जैसे साथ थे, पिता सरीखी ढाल।।  

बोल उठी हर शोषिता, करे भीम पर नाज़।  
    संविधान से बल मिला, बदली काया आज।।

बुद्ध न होते आज तो, बुझती न यह पीर।  
    दुख की जो पहचान कर, बाँटी सबमें नीर।।

पीड़ा देख भटक गए, छोड़ दिए सब पंथ।  
बुद्ध बने करुणा-धरा, शांति-धर्म के ग्रंथ।।

पूँछ  उठी  ये  लेखनी , लिए  सार  का  केन्द्र। 
    कविता लिखे नरेन्द्र को, कि कविता को नरेन्द्र।।

सौ कह दे जो एक में, रहे भाव में नित्य।  
ताल-छन्द लय-गेय की,धरा वही साहित्य।।

विद्या से कुछ हो नहीं, विनय बिना जो जाय। 
जाके मन में दंभ है, ताको गुरू न भाय।।


                                         - नरेन्द्र सोनकर 'कुमार सोनकरन'



14 July 2025

जातिवाद पर नरेंद्र सोनकर के दोहे




कहें गर्व-अधिकार से, नारी दलित यतीम।  
    नाम नहीं, नारा नहीं, नारायण हैं भीम।।

जन्म हुआ रे भीम का, खुशी महल-खपरैल।  
    शंखनाद है न्याय की, तिथि चौदह अप्रैल।।
                       
समता औ' सम्मान ही, संविधान की थीम।  
सृजित किए आंबेडकर, बोलो जय जय भीम।।
            
शिक्षित बनो संघर्ष करो, रहो संगठित और।
 चलो बुद्ध के राह पर, बनो राष्ट्र-सिरमौर।।

थी मानवता  के लिए , मनु की  नीति अफीम।
    खाक किए आंबेडकर, बोलो जय जय भीम।।

जनमानस कल्याण ही, है जिसका अस्तित्व।
  माने  उसके  ज्ञान  का, लोहा  सारा  विश्व।।

  प्रतिज्ञा बाईस भली, करे जगत कल्याण।
    हैं आंबेडकरवाद की, मूल मंत्र औ' प्राण।।

   बाभन बनिया वैश्य क्या, क्या कुर्मी कुम्हार।
      दुश्मन से लोहा लिये, पासी खटिक चमार।।

  मनु का ब्राह्मणवाद रे, जल-भुन हुआ अधीर।
      व्यासपीठ पर बैठ ज्यों, बाँचा कथा अहीर।।

  क्या क्रिसमस क्या लोहड़ी, क्या होली क्या ईद। 
     जाति निगलती आ रही, समता की उम्मीद।।

  क्या रिश्ता क्या बन्धुता, जाति गले की फाँस। 
       घुट-घुट कर अब जी रही, मानवता हर साँस।।

   शिक्षा है वो शेरनी, शब्द-अक्षर वो दूध।  
    पिये जो जितना ज्यादा, लंबा टिके वजूद।।

   तिल-तिल मरता रोज़ है, भूखा नंगा जान।
       जाति नहीं ये गोह है, चबा रही इंसान।। 

  खून माँस भी एक है, जाति योनि भी एक।
     फिर नरेन्द्र हैं क्यों नहीं, सभी आदमी एक ? 

  जिस मिट्टी के आप हैं, उसी मिट्टी के सूद।
     ब्राह्मण देवता बोलिए, क्यों अछूत हैं सूद ? 

वे नरेन्द्र पशुतुल्य हैं, क्या ब्राह्मण क्या सूद।
     अन्तस में जिनके नहीं, मानवता मौजूद।।

  ऊँच-नीच की भावना, छूआछूत का मैल।  
     शिक्षा निष्प्रभावी बनी, जाति-धर्म जड़ बैल।।


*****

क्या कबीर रसखान क्या, क्या रहीम रैदास।  
परिवर्तन आया नहीं, देश जाति का दास।।
       
क्या रहीम रैदास क्या, क्या कबीर क्या सूर।  
कहें सभी अच्छा नहीं, जातिवाद नासूर।।
  
 क्या ललई पेरियार क्या, क्या कबीर चार्वाक।  
    दिए चुनौती तर्क से, कटी ब्रह्म की नाक।।    

 दर्शन सच्चा  बुद्ध का, पंचशील  है  रीढ़।  
  समता करुणा शील से,बनती जग में पीढ़।।

कैसी श्रद्धा-भावना, कैसा व्रत-उपवास।  
    मानवता ही जब नहीं, पूजा नहीं परिहास।। 

 

                                       - नरेन्द्र सोनकर 'कुमार सोनकरन' 


08 July 2025

कहानी- हँसी की कीमत

राजू वर्मा का जीवन उन हजारों करोड़ों भारतीयों की तरह था, जिनका नाम किसी सरकारी दस्तावेज़ में भले हो, पर जिनकी पहचान दुनिया में नहीं होती। वह एक निजी कंपनी में चपरासी था। काम छोटा था, पर मन में बड़ा आदरभाव लिए चलता। 



एक तरह से वह पूरे दफ्तर की धुरी था- सबसे पहले पहुँचता, चाय बनाता, फाइलें पहुँचाता, और बॉस की डाँट भी चुपचाप पी जाता। उसकी साइकिल की टोकरी में सब्जियों से ज़्यादा उसकी आशाएँ लटकती थीं- बच्चों की फीस, पत्नी की दवाई, और कभी-कभार एक मिठाई की पुड़िया।

जीवन सरल था, पर सधा हुआ था- जैसे पुराने समय की दोपहरी, जिसमें धूप तो होती है, पर झुलसती नहीं।

एक दिन, कंपनी से एक पत्र आया- सादी भाषा में एक भयानक निर्णय लिखा था- “हमें खेद है...” और बस। दफ्तर बंद हो गया था। ज़िंदगी की गाड़ी, जो अब तक कच्ची सड़कों से चलती हुई आ रही थी, एक गड्ढे में गिर पड़ी।

राजू कई दिनों तक अवाक रहा। नौकरी ढूँढने निकला, पर कहीं से जवाब न मिला। कहीं कहा गया- "काम नहीं है", कहीं- "आपकी उम्र अब ऐसी नहीं रही", और कहीं तो यह भी- "अब तुम्हारे जैसे लोगों की ज़रूरत नहीं।"

छह महीने बीत गए। बच्चों की हँसी कम होने लगी, और घर में चुप्पियाँ बढ़ गईं। राशन के डिब्बे खाली होते गए, और दिल में चिंता भरने लगी। 

मकान मालिक ने एक रात दरवाज़े पर दस्तक दी- वही दस्तक जो सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं, आत्मा पर होती है- "कल तक किराया नहीं दिया तो घर खाली कर दो।"

उस रात सीमा ने रोटी परोसी और एक सवाल भी- “हम बच्चों को क्या जवाब देंगे, उन्हें कल कहाँ लेकर जाएंगे?”

राजू ने जवाब नहीं दिया। उसने रोटी का एक टुकड़ा पानी में डुबोकर निगला- जैसे अपनी आत्मा को निगल रहा हो।

सुबह होते-होते, वह कुछ और हो गया था। न चेहरा बदला था, न शरीर, पर आँखों में अब एक औरत की तरह लाचारी थी- वह लाचारी, जो आँसू नहीं बहाती, पर दिल में समंदर रखती है।




उसने बाज़ार से एक जोकर की नकली नाक, सस्ता विग, और कुछ रंग खरीदे। पुराने कपड़ों को काट-पीटकर एक भड़कीला पहनावा बनाया। आईने में खुद को देखा, तो खुद पर हँस पड़ा। पर यह हँसी बाहर की थी, भीतर तो वह रो पड़ा।

अब वह पुरानी दिल्ली की गलियों में जोकर बनकर घूमता था- हाथ में तख़्ती- “जोकर के साथ सेल्फी- सिर्फ 10 रुपये।”

हँसी अब उसकी रोज़ी थी। हर मुस्कान के पीछे आँसुओं का समंदर छुपा था।

लोग उसकी ओर देखकर हँसते, बच्चे ताली बजाते, कोई वीडियो बनाता।

एक बच्चा बोला, “माँ! जोकर रो क्यों रहा है?”
माँ ने कहा, “बेटा, ये बस एक्टिंग कर रहा है।”

कौन समझे कि यह अभिनय नहीं था, यह एक पिता का आत्मबलिदान था।

राजू घर आने से पहले अपना रंग मिटा देता। बच्चे पूछते, “पापा, आज भी मीटिंग थी क्या?”
वह मुस्कुरा देता। सीमा कुछ नहीं कहती, पर उसकी आँखें बहुत कुछ पूछतीं।

एक दिन गुड़िया ने अपनी नोटबुक में जोकर की तस्वीर बनाई थी- हाथ में दिल था और नीचे लिखा था- “मेरा हीरो”

राजू ने वह पन्ना देखा और फूट-फूटकर रो पड़ा।

एक दिन उसका बेटा आरव बोला, “पापा, टीचर ने कहा कि जो सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है, वो सबसे बहादुर होता है। मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूँ।”

राजू ने कहा, “बनेगा बेटा, मुझसे बड़ा।”

आरव ने धीरे से कहा, “पापा, कल मैंने आपको देखा था। आप जोकर थे… लेकिन मेरे लिए, आप सबसे महान इंसान हो। आपने अपनी इज़्ज़त, अपनी खुशी, अपना स्वाभिमान सब कुछ हमारे लिए छोड़ दिया। लोग आपको 10 रुपये का जोकर समझते हैं, पर मेरे लिए आप सबसे कीमती इंसान हो।”

उस दिन राजू पहली बार रंगों के बिना मुस्कुराया—एक सच्ची, आत्मा से निकली मुस्कान। उसने बेटे को गले से लगाया और कहा, “तेरा पिता जोकर नहीं, एक योद्धा है- जो बच्चों के भविष्य की लड़ाई मैदान में उतरकर लड़ता है।”



                                                 - विकास बिश्नोई




स्नेहा की मेडिटेशन डायरी से...

जीवन को भौतिक अस्तित्व में लाने के लिए दो बिंदु या दो सिरों का होना अनिवार्य है। जब ये दो सिरे नही तो केवल अथाह अनन्त शून्य होता है, जैसे अंतरिक्ष।





आत्मा की जीवन को महसूस करने की वासना।
आत्मा ने देह को वस्त्र की तरह ओढ़ा।
इंद्रियों के साथ देह बनी उपकरण एवं माध्यम।
शुरू हुई एक यात्रा।


इन दो सिरों के बहुत से नाम हो सकते हैं।
अच्छा, बुरा/अंधेरा, उजाला/सुख, दुख/झूठा, सच्चा (कल्पना,यथार्थ)/जन्म, मृत्यु/सूक्ष्म, विकराल आदि आदि.. याद रहे ये सब मनुष्य द्वारा दिए गए "नाम" भर हैं भाषा के शब्द स्वर।

आत्मा का निजी अनुभव ही आभास है, कामना है, वासना है और ध्येय।
निजी अनुभव को भी जिस स्थिति में मनुष्य है, उस सिरे के आसपास का अनुपात अर्थात बुरा, कम बुरा और अच्छा, ज़्यादा अच्छा इत्यादि ही तय करेगा।

इन्हीं दो सिरों के बीच की यात्रा 'जीवन' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच सारे 'अनुभव आभास' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच कहीं 'अवसर और चुनाव' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच हरपल झूलता, जूझता मनुष्य है।

देह रूपी मनुष्य के पास इन सिरों के आसपास के अनुपात मात्र हैं, जिसमें से यथा शक्ति, बुद्धि, सद्बुद्धि, वृत्ति और परिस्थिति अनुरूप वह चुनाव करता है। चुनाव करना उसकी नियति है, क्योंकि चुनाव न करना भी जड़वत खड़े हो रुक जाना है। यात्रा घड़ी के कांटों सी चलती रहती है मनुष्य चले या न चले।

इन दो सिरों के बीच हम तिनके मात्र भाग कर, नाच कर, रो कर, हँस कर, दुखी होकर या हार मान कर जैसे भी चलना चाहे, चल लें। सृष्टि को कोई फ़र्क नही पड़ता।

इतना बड़ा ब्रह्मांड और हम तिनका मात्र। तिनका यदि अहाँकारी हो स्वयं को चट्टान समझ यदि विरोध में उतरे भी तो, उस चट्टान रूपी अहँकार से न केवल स्वयं को भारी करेगा, बल्कि स्वयं को आहत ही करेगा। अनवरत यात्रा में किसी सिरे के पास वो चट्टान बना पड़ा रहेगा और समय समाप्ति पर बन जाएगा धूल का कण।

तो धूल के कण के समान हल्के हो उड़ना और हवा की गति में, उसके वेग में स्वयं को समर्पित कर उड़ते रहना कहीं ज़्यादा शांति दायक व आंनद दायक हो सकता है।

या फिर करना सीख ले उस भीतर बैठे आत्म से वार्तालाप। जो लाया है तुम्हें अपनी किसी लालसा, मंशा और कार्मिक फल के अंतर्गत।

और अच्छे बुरे जो केवल शब्द और अनुपात हैं, उसके फेर में पड़ने से बचना ही मुक्ति है। मैं हूँ इस यात्रा में क्या केवल एक आकस्मिक राही या सुनियोजित राही ?

मौन में बैठ कभी जाँचना और कभी संवाद करना आत्मा से...



- स्नेहा देव


सात रचनाकारों की सात कविताएँ




माँ की पुकार

पलकों के आँचल में जिसे छुपाया,
जीवन की हर धूप से जिसे बचाया।
खुद जलकर छाया बन गई,
अनुभव की घुट्टी दिन-रात पिलाई।

नौ माह की पीड़ा को मुस्कुराकर सहा,
नींदों को त्यागकर तेरे सपनों को पंख दिया।
उँगली पकड़ चलना सिखाया,
हर ठोकर पे खुद को गिरा, तुझे संभाला।

'माँ' पहला शब्द सुनने को तरसते कानों ने
जब सुना — तो जैसे जीवन ने गीत गाया।
तेरे हर दर्द की दवा बनी,
तेरे अनकहे जज़्बातों को भी समझा, बिना कहे।

तेरी तोतली बोली जब गूंजती,
हर क्षण एक कविता सी लगती।
बच्चे से इंसान बनाया तुझे,
संस्कारों की धूप में नहलाया तुझे।

तेरा परिवार रचाया,
हर दुःख का सामना कर सुखी तुझे बनाया।
पर आज तूने ही मुझे…
बुद्ध आश्रम का रास्ता दिखलाया।

जिस ममता ने तुझे जन्म दिया,
उसी को आज तूने तज दिया।
कभी सोच, तेरी मुस्कान के पीछे
कितने आँसू छुपाए मैंने… सिर्फ तेरे लिए।


- निशि धल सामल

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विस्तार दे दो

विज्ञान की परिधि में बंधी मेरी काया
सांसों की तारों से ही घिरी थी माया ।
संबधो के घेरों से जब बांध दिया तुमने
कितनी दूर हाय मुझे कर दिया था तुमने।

विस्मृत मन कैसे पहचानें विस्तृत को,
अंतर तार जुड़े से थे तुमसे फिर भी
जग संबधो के दान को न कर सकी,
उपहेलना,जो तुमने मुझे किया था समर्पित

विस्तृत तुम्हारी दृष्टि देखती थी मुझको,
विशाल तेरे हाथ सदा पकड़ ते थे मुझको
मेरी राह के हर कांटों को थे सुलझाते।
कुछ न कह कर भी वह सांनिध्य पा जाते
ऐसे ही जीवन की राह में चलते चलते।
पहुंची हूं मैं उस मंजिल जहां तुम रहते।
पर फिर भी क्यों दूरी तुम मुझसे बरतते।
क्यों नहीं तुम गले लग मुझको पागल करते
मै भी चाहती हूं, तुम्हारे प्रेम में पागल होना
सारी इच्छाओं की तिलांजलि दे तुममें खोना।
मेरे लिए भले न हो सरल तुमको पाना।
पर तुम्हें तो आता है सागर सा प्रेम बिखराना।
विखरा दो अपनी प्रेम की मोती मम अंचल
नैन मेरे भी तेरे दर्शन को हो जाए विकल।
मीरा, राधा,रुकमणी बन न पाऊं भले ही मै,
पर शबरी सा प्रेमी बन हो जाऊं पागल।

- रत्ना बापुली

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"अब सिवा अंबेडकर के रहनुमा कोई नहीं"

कारवाॅं कोई नहीं है , रास्ता कोई नहीं,
अब सिवा अंबेडकर के रहनुमा कोई नहीं।

छाॅंव में बाबा ने लाकर तब बिठाया था हमें,
धूप से बचने का जब था आसरा कोई नहीं।

दासता की दास्ताॅं पढ़ते तो तुम भी जानते,
दर्द में डूबी हुई ऐसी, कथा कोई नहीं।

बस तुम्हारे दम से 'बाबा' रौशनी मिलती गयी,
रौशनी का वर्ना देता था पता कोई नहीं।

आदमी में आदमीयत है तो वो इंसान है,
है जो मानवता तो फिर छोटा-बड़ा कोई नहीं।

बस यही एक दाग़ है इंसानियत के नाम पर,
हैं जहाॅं में सब बराबर, मानता कोई नहीं।

आपकी ऊॅंचाइयों तक कोई क्या जा पाएगा,
आप जैसा इस जमीं पर, दूसरा कोई नहीं।


- आर.पी. सोनकर तल्ख़ 'मेहनाजपुरी'


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मन विकल

सघन तम में क्यों मन विकल,
नयन सूखते कभी सजल,
निज उर की  थाह न पाती,
अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।

तुम मुझ में और मैं हूँ तुममें,
ज्यों कृष्ण राधामय राधा कृष्ण मय, 
क्यों पल-पल अब यह समझाती,
हम तो ठहरे एक दूजे के थाती,
अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।

सोहे  ना तनिक कर्णफूल,
श्रृंगार लागे है  जैसे शूल,
मोम से  बँधी हुई एक बाती,
उष्मा से तेरे ही  पिघल जाती,
अंजन मसि से लिखूं  मैं पाती।

हर आहट से  चौंक पडूँ, 
कभी भागूँ  कभी लौट पडूँ,
कुंतल काली मुझे भरमाती,
अठखेलियां इसकी तनिक  न भाती,
आनन को मेरे  है तड़पाती,
अंजन मसि से  लिखूँ मैं  पाती।


                             - सविता सिंह मीरा


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अनूठा व्यक्तित्व

जो देखना चाहते हैं
मेरी तबाही का मंजर
उनको बता दूं
मैं सर्वदा बहने वाला हूं
पर तुम शाश्वत न रहने वाले हो।

जो देखना चाहते हैं
मेरी आंखों में आंसू
उनको बता दूँ
मैं इस आब-ए-चश्म में
डूब कर ही तैरना सीखा है।

जो देखना चाहते हैं
गम-ए-हयात में मुझे डूबता हुआ
उनको बता दूँ
इसी समुद्र में विजय की नौका पर
हर मंजिल फ़तह करना सीखा है।

जो देखना चाहते हैं
मुझे दूसरों के आगे नत हुआ
उनको बता दूँ
माँ काली के आगे सिर झुका कर ही
सिर उठाकर जीना सीखा है।


                                - डॉ.राजीव डोगरा


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मत किसी के दिल को यूं ही दुखाना

मत किसी के दिल को यूं ही दुखाना
हमेशा मीठा बोलना औरों के काम आना
अमीरों को देख कर रुख बदल लेते हैं लोग
दुखियों की करना सेवा गरीबों को मत सताना

करना ऐसा नेक काम याद जो रखे ज़माना
जरूरतमंद की करना सहायता मत बनाना कोई बहाना
चेहरे पर यदि किसी के मुस्कुराहट ला सको
इससे बढ़कर नहीं दुनियां का कोई खज़ाना

इतना भी मत उलझना किसी उलझन में
कि समझ न आये लगे सिर चकराना
पैदा होता है हल सभी उलझनों का उलझनों के साथ
शांत मन से सोचना तब सुलझाना

नए लोगों से भी रखना वास्ता अपना
लेकिन पुरानों को भी मत भूल जाना
पुरानी चीजों को फेंक देते है आजकल लोग
नया नौ दिन याद रखना सौ दिन चलता है पुराना

मिट्टी हो जाएगा हर जीव इस दुनियां का
ढूंढता फिर रहा है फिर भी खज़ाना
मृगतृष्णा है जो कभी नहीं भरती
सबको पता है साथ कुछ नहीं जाना


- रवींद्र कुमार शर्मा


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जिन्दगी थोड़ा रुक - रुक कर चलना, 
अभी तो मेरे बहुत से, फर्ज निभाना बाकी है। 


जीवन भर सभी को अपना समजा, 
अभी तो यह मेरा सारा, भर्म मिटाना बाकी हैं। 

अपने तो कुछ घेरों से रिश्ता बनाया, 
हमें उन सभी रिश्तों मे, शर्म छिपाना बाकी हैं। 

अभी - अभी तो मेने शुरू किया चलना, 
वो सारे सुख - दुःख के, कर्ज चुकाना बाकी है। 


मन्दिर - मजिद मे जिस को पहचाना, 
इस मानवता को वह, धर्म फैलाना बाकी हैं। 

जिन - जिन की दुवाओ से मैने जिवन पाया, 
उन बिन माँगी दुवाओ पर, कर्म निभाना बाकी हैं। 

अपने जिन हाथों से उसने सिंदूर मिटाया, 
उनकी आँखों में मुझको वह, दर्द देखाना बाकी हैं


                                                        - अनिल चौबीसा


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