साहित्य चक्र
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07 August 2026

लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल





21 July 2026

कहानी- सुगंधा


सुगंधा एक गृहिणी थी। सुबह से लेकर शाम तक वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उसे अपने लिए समय निकालना तो दूर, दिन, तारीख़ और वार का भी ध्यान नहीं रहता था।

सुबह उसकी दिनचर्या सबसे पहले शुरू होती और रात में सबसे बाद में समाप्त होती। कभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का अलग नाश्ता बनाना होता, कभी सास-ससुर की सेवा करनी होती, तो कभी पति की फरमाइशें पूरी करनी होतीं। इन सबके बीच कब सुबह से शाम हो जाती, उसे स्वयं भी पता नहीं चलता था।





ऐसा नहीं था कि सुगंधा के जीवन में कोई दुख नहीं था। यदि किसी काम में थोड़ी-सी भी देर हो जाती, तो पति की ऊँची आवाज़ सुननी पड़ती। यदि सास-ससुर की किसी अपेक्षा में थोड़ी-सी भी कमी रह जाती, तो उनके उलाहने मिलते। बच्चों की शिकायतें भी समय-समय पर उसके हिस्से में आती ही रहती थीं।

सुगंधा हर संभव प्रयास करती कि उसके कारण पति, सास-ससुर या बच्चों को शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह अपनी क्षमता से बढ़कर सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करती। फिर भी यदि कभी किसी को समझाना पड़ता, तो वह अपने बच्चों को ही समझा देती। उसे लगता था कि शायद यही सबसे आसान रास्ता है।

लेकिन इतना सब करने के बाद भी वह सबको खुश नहीं रख सकी। धीरे-धीरे वह ऐसी गृहिणी बनती जा रही थी, जो दूसरों की खुशियों के लिए तो दिन-रात लगी रहती थी, लेकिन अपनी खुशी का उसे स्वयं भी पता नहीं था। उसका पूरा जीवन पति, बच्चों, सास-ससुर और घर की जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह गया था।

यदि कभी वह अपनी कोई छोटी-सी इच्छा या फरमाइश ज़ाहिर भी कर देती, तो अक्सर उसे यही सुनने को मिलता- "तुझे जाना ही कहाँ है? तुम तो सारा दिन घर पर आराम ही करती हो।"

यह सुनकर वह हर बार मुस्कुरा देती, जबकि वह जानती थी कि जिसे लोग आराम कह रहे हैं, वह वास्तव में बिना रुके चलने वाला एक अंतहीन सफर था। एक दिन अचानक सुगंधा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसमें खड़े होने तक की शक्ति नहीं बची।

डॉक्टर ने उसे कुछ दिनों तक पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी। अब घर की सारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी परिवार पर आ गई। कुछ ही दिनों में घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया। तब सुगंधा के ससुर ने उससे कहा, "कुछ दिन तुम अपने मायके चली जाओ। वहाँ तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल हो जाएगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"

यह सुनकर सुगंधा हैरान रह गई। आज तक जब भी उसने कहीं जाने की बात की थी, उसे यही कहा जाता था- "तुम्हारे बिना इस घर का कोई काम नहीं चल सकता।" लेकिन आज उसके बीमार पड़ते ही उसे मायके जाने की अनुमति भी मिल गई।

कुछ समय मायके में रहकर जब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटी, तो उसने घर का बदला हुआ रूप देखा। घर में एक पूर्णकालिक नौकरानी रख ली गई थी। सास-ससुर अपनी क्षमता के अनुसार अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने लगे थे। बच्चे अपनी चीज़ें अपनी जगह रखने लगे थे और उसके पति भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर नहीं रहते थे।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि नौकरानी घर का काम उतनी लगन, सफाई और व्यवस्थित ढंग से नहीं करती थी, जितनी निष्ठा और बारीकी से सुगंधा किया करती थी। कई काम अधूरे रह जाते, कुछ चीज़ें इधर-उधर पड़ी रहतीं और कई बार उसकी कार्यशैली में लापरवाही भी दिखाई देती। फिर भी घर में कोई उससे शिकायत नहीं करता था।

सुगंधा को याद आया कि जब वह पूरे मन से, बिना किसी शिकायत के, दिन-रात घर के लिए लगी रहती थी, तब भी उसकी छोटी-सी भूल पर उसे सुनना पड़ता था। लेकिन आज, नौकरानी से वही काम पूरी तरह न होने पर भी सभी शांत थे। कारण केवल इतना था कि सबको डर था कि यदि वह भी काम छोड़कर चली गई, तो घर की जिम्मेदारियाँ फिर उनके कंधों पर आ जाएँगी।

उसी क्षण सुगंधा को जीवन का एक गहरा सत्य समझ में आया। आवश्यकता से अधिक दूसरों का काम करते रहने से केवल अपनी परेशानियाँ ही नहीं बढ़तीं, बल्कि हम अनजाने में अपने प्रियजनों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी छीन लेते हैं। सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन सहायता उतनी ही होनी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो। यदि एक ही व्यक्ति हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेगा, तो उसके पास स्वयं के लिए समय और ऊर्जा कभी नहीं बचेगी।

उधर परिवार ने भी एक महत्वपूर्ण सीख प्राप्त की। उन्हें एहसास हुआ कि यदि सुगंधा अकेले ही पूरे घर का भार उठाती रही, तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाएगी। वह केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं वाली एक इंसान भी है। उसका भी अपने जीवन पर उतना ही अधिकार है, जितना घर के किसी और सदस्य का।

उस दिन के बाद परिवार ने घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लीं। बच्चों ने अपने काम स्वयं करने शुरू कर दिए। सास-ससुर ने अपनी क्षमता के अनुसार अपने काम स्वयं करने शुरू किए और उसके पति ने भी घर के कामों में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझा। सुगंधा से भी कहा गया कि अब वह अपने लिए समय निकाले, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे और अपने अधूरे शौक पूरे करे।

सुगंधा ने महसूस किया कि जब पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ केवल एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी जाती हैं, तो वह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से थकने लगता है। लगातार बढ़ता हुआ बोझ उसे तनावग्रस्त
और चिड़चिड़ा बना देता है। लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाते हैं, तो न केवल एक व्यक्ति का भार कम होता है, बल्कि पूरे परिवार का जीवन अधिक संतुलित, सहज और सुखद बन जाता है। जिम्मेदारियों का बँटवारा केवल काम कम नहीं करता, बल्कि रिश्तों में सहयोग, सम्मान और अपनापन भी बढ़ाता है।

घर किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है। और जो परिवार यह समझ जाता है, वहाँ केवल काम ही नहीं बँटते, बल्कि खुशियाँ भी बाँटी जाती हैं।


                                   - कंचन चौहान, बीकानेर



15 July 2026

लघुकथा- "याद का बहाना"






"मम्मी, अभी नहीं... शाम को ले आएँगे।"

मेरे इतना कहते ही माँ की आँखें कहीं दूर टिक गईं। धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हारे पापा होते, तो मेरी बात टालते नहीं। धनिया पत्ता भी कहना पड़ता, तो उसी वक्त ले आते।"

घर में एक पल को सन्नाटा छा गया। हम भाई-बहन एक-दूसरे का चेहरा देखते रह गए। शब्द किसी के पास नहीं थे, केवल एक अनकहा अपराधबोध था।

तभी मन ने समझाया- माँ को शिकायत धनिया पत्ते की नहीं थी; वह तो बस यादों का एक बहाना था। दरअसल, उन्हें आज भी उस व्यक्ति की कमी खलती है, जिसने जीवन भर उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को अपने प्रेम का सम्मान समझा।

सविता सिंह मीरा 
जमशेदपुर

 

05 July 2026

कहानी- आखिरी टिकट


स्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते कदमों की आवाज़ें किसी बेचैन धड़कन-सी सुनाई दे रही थीं। अनाउंसमेंट बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था। “गाड़ी संख्या 12155, भोपाल एक्सप्रेस, कुछ ही मिनटों में प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन से प्रस्थान करेगी…”

टिकट खिड़की के सामने लंबी कतार लगी थी। उसी कतार के आख़िरी छोर पर खड़ी थी, नैना। उसकी उँगलियाँ भीग चुकी थीं, पर हथेली में दबा वह पुराना-सा पत्र अब भी सुरक्षित था। पत्र के कोने घिस गए थे, शब्द हल्के पड़ गए थे, पर एक पंक्ति आज भी उतनी ही साफ़ थी।


“अगर कभी लौटना चाहो, तो मैं उसी शहर,
उसी स्टेशन पर तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”






तुम्हारा आरव

नैना ने काँपते हाथों से पत्र मोड़ा। पंद्रह साल पहले वह इसी शहर से गई थी,बिना मुड़कर देखे, बिना कुछ कहे, बिना किसी सफ़ाई के। उसने प्रेम को ठुकराया नहीं था; बस घरवालों की इच्छा, पिता की बीमारी, और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारियों के आगे अपने मन को चुप करा दिया था। फिर जीवन की दौड़ में इतनी उलझी कि पीछे छूटे एक चेहरे को बस यादों में रख सकी।

लेकिन तीन दिन पहले अचानक पुराने सामान के बीच उसे यह पत्र मिला। उसी के साथ एक और कागज़ एक अस्पताल की पर्ची, जिस पर किसी परिचित लिखावट में दर्ज था।

“आरव मेहरा हृदय रोग विभाग।”

बस तब से उसके भीतर एक ही बेचैनी थी,उसे जाना है। एक बार। केवल एक बार। कहने के लिए नहीं कि वह आज भी उससे प्रेम करती है; बल्कि यह पूछने के लिए कि क्या इतने वर्षों बाद भी किसी के इंतज़ार की उम्र बची रह जाती है ?

कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। नैना जब खिड़की तक पहुँची, तो क्लर्क ने स्क्रीन पर नज़र डालते हुए कहा “भोपाल? … सिर्फ़ एक टिकट बची है। आख़िरी टिकट।”

नैना का दिल जैसे उछलकर गले में आ अटका।
“मुझे वही चाहिए,” उसने तुरंत कहा।
क्लर्क ने टिकट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी।
“जल्दी कीजिए, ट्रेन खुलने वाली है।”

नैना ने टिकट पकड़ ली। वह कागज़ का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए किसी अवसर, किसी प्रायश्चित, किसी अधूरे वाक्य का अंतिम शब्द बन गया था। वह भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी। ट्रेन सीटी दे चुकी थी। किसी तरह डिब्बे में चढ़कर उसने राहत की साँस ली। सीट पर बैठते ही उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश की बूँदें शीशे पर बह रही थीं और बाहर का शहर पीछे छूटता जा रहा था वैसे ही जैसे वर्षों पहले छूटा था। फर्क बस इतना था कि तब वह भाग रही थी, और आज लौट रही थी।

रात लंबी थी। डिब्बे की पीली रोशनी में उसने फिर पत्र खोला। हर शब्द जैसे कोई पुराना घाव सहला रहा था। “नैना, प्रेम का अर्थ साथ पाना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी के निर्णय का सम्मान करते हुए उसी मोड़ पर खड़े रहना भी प्रेम होता है…”

नैना की आँखें भर आईं। क्या सचमुच कोई पंद्रह साल तक उसी मोड़ पर खड़ा रह सकता है ? सुबह जब ट्रेन भोपाल पहुँची, तो उसके कदमों में अजीब-सी घबराहट थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने सीधा उसी अस्पताल का रुख किया, जिसका नाम पर्ची पर लिखा था।

अस्पताल के हृदय रोग विभाग में असामान्य शांति थी। नैना ने रिसेप्शन पर जाकर धीमे स्वर में पूछा “मुझे आरव मेहरा से मिलना है।”

रिसेप्शन पर बैठी नर्स ने कुछ क्षण उसे देखा, फिर रजिस्टर पलटते हुए पूछा “आप कौन ?”

नैना के पास इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं था। वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली “पुरानी पहचान हूँ… बहुत पुरानी।”


नर्स ने गहरी साँस ली। “आप देर से आई हैं।”
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “मतलब…?”
“कल रात उनकी मृत्यु हो गई।”


शब्द बहुत साधारण थे, पर नैना के भीतर जैसे सब कुछ टूटकर बिखर गया।
उसने सामने की कुर्सी पकड़ ली। होंठ काँपे, पर आवाज़ न निकली। इतने वर्षों की दूरी, इतने बरसों का मौन, इतनी सारी अनकही बातें- सब एक ही वाक्य के नीचे दब गईं “आप देर से आई हैं।”

उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। वह किसी तरह खुद को सँभालकर मुड़ी ही थी कि नर्स ने उसे पुकारा “सुनिए…”

नैना ठिठक गई। नर्स ने दराज़ से एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा निकाला। “उन्होंने कहा था अगर कभी ‘नैना’ नाम की कोई स्त्री आए, तो यह उसे दे देना।”

नैना के हाथ काँप उठे। उसने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पुरानी रेल टिकट थी पीली पड़ चुकी, किनारों से मुड़ी हुई। उसके पीछे आरव की लिखावट थी
“उस दिन तुम चली गई थीं। मैं इसी स्टेशन तक तुम्हें छोड़ने आया था। मैंने सोचा था, तुम्हें रोकूँगा… पर तुम्हारी आँखों में मजबूरी देख ली। तुम्हारी ट्रेन छूटने के बाद मैंने वापसी के लिए टिकट लिया था । आखिरी टिकट। तब समझा कि कुछ यात्राएँ साथ होकर भी अकेले पूरी करनी पड़ती हैं।

मैंने विवाह नहीं किया। इंतज़ार भी नहीं कहा उसे… बस मन ने तुम्हारे हिस्से की जगह किसी और को दी ही नहीं। यदि तुम कभी लौटो, तो अपने आपको दोष मत देना। प्रेम में देर हो सकती है, अभाव हो सकता है, विरह हो सकता है । पर शिकायत नहीं होनी चाहिए। और हाँ, यदि यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचे, तो समझना मैंने तुम्हें अंतिम बार नहीं, आखिरी साँस तक चाहा।”

नैना के आँसू उस टिकट पर गिरते रहे। वह टिकट अब सिर्फ़ एक यात्रा का प्रमाण नहीं था; वह उन दो जीवनों का दस्तावेज़ था जो साथ चल सकते थे, पर समय की पटरियाँ उन्हें अलग दिशाओं में ले गईं। नर्स ने धीरे से कहा "उनके तकिए के नीचे यह टिकट हमेशा रहती थी। आखिरी दिनों में भी अक्सर कहते थे। ‘कुछ लोग लौटते नहीं, फिर भी उनके लिए दरवाज़ा खुला रखना चाहिए।"

नैना ने टिकट को सीने से लगा लिया। वह अस्पताल की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर वही सुबह थी, वही भीगा शहर, वही भागती दुनिया पर उसके भीतर सब कुछ स्थिर हो चुका था। उसने पहली बार जाना। हर स्टेशन पर छूट जाने वाली चीज़ ट्रेन नहीं होती; कभी-कभी एक पूरा जीवन छूट जाता है।

और उस दिन उसे यह भी समझ आया कि
दुनिया में सबसे भारी कागज़ कोई वसीयत,
कोई डिग्री, कोई दस्तावेज़ नहीं होता।
सबसे भारी होता है वह “आखिरी टिकट”,
जो हमें वहाँ तो पहुँचा देती है जहाँ हमें जाना था,
पर वहाँ नहीं पहुँचा पाती जहाँ हमें समय रहते होना चाहिए था।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'