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22 August 2026

लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



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वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

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सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


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हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


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आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


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इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


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07 August 2026

लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल





21 July 2026

कहानी- सुगंधा


सुगंधा एक गृहिणी थी। सुबह से लेकर शाम तक वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उसे अपने लिए समय निकालना तो दूर, दिन, तारीख़ और वार का भी ध्यान नहीं रहता था।

सुबह उसकी दिनचर्या सबसे पहले शुरू होती और रात में सबसे बाद में समाप्त होती। कभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का अलग नाश्ता बनाना होता, कभी सास-ससुर की सेवा करनी होती, तो कभी पति की फरमाइशें पूरी करनी होतीं। इन सबके बीच कब सुबह से शाम हो जाती, उसे स्वयं भी पता नहीं चलता था।





ऐसा नहीं था कि सुगंधा के जीवन में कोई दुख नहीं था। यदि किसी काम में थोड़ी-सी भी देर हो जाती, तो पति की ऊँची आवाज़ सुननी पड़ती। यदि सास-ससुर की किसी अपेक्षा में थोड़ी-सी भी कमी रह जाती, तो उनके उलाहने मिलते। बच्चों की शिकायतें भी समय-समय पर उसके हिस्से में आती ही रहती थीं।

सुगंधा हर संभव प्रयास करती कि उसके कारण पति, सास-ससुर या बच्चों को शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह अपनी क्षमता से बढ़कर सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करती। फिर भी यदि कभी किसी को समझाना पड़ता, तो वह अपने बच्चों को ही समझा देती। उसे लगता था कि शायद यही सबसे आसान रास्ता है।

लेकिन इतना सब करने के बाद भी वह सबको खुश नहीं रख सकी। धीरे-धीरे वह ऐसी गृहिणी बनती जा रही थी, जो दूसरों की खुशियों के लिए तो दिन-रात लगी रहती थी, लेकिन अपनी खुशी का उसे स्वयं भी पता नहीं था। उसका पूरा जीवन पति, बच्चों, सास-ससुर और घर की जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह गया था।

यदि कभी वह अपनी कोई छोटी-सी इच्छा या फरमाइश ज़ाहिर भी कर देती, तो अक्सर उसे यही सुनने को मिलता- "तुझे जाना ही कहाँ है? तुम तो सारा दिन घर पर आराम ही करती हो।"

यह सुनकर वह हर बार मुस्कुरा देती, जबकि वह जानती थी कि जिसे लोग आराम कह रहे हैं, वह वास्तव में बिना रुके चलने वाला एक अंतहीन सफर था। एक दिन अचानक सुगंधा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसमें खड़े होने तक की शक्ति नहीं बची।

डॉक्टर ने उसे कुछ दिनों तक पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी। अब घर की सारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी परिवार पर आ गई। कुछ ही दिनों में घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया। तब सुगंधा के ससुर ने उससे कहा, "कुछ दिन तुम अपने मायके चली जाओ। वहाँ तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल हो जाएगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"

यह सुनकर सुगंधा हैरान रह गई। आज तक जब भी उसने कहीं जाने की बात की थी, उसे यही कहा जाता था- "तुम्हारे बिना इस घर का कोई काम नहीं चल सकता।" लेकिन आज उसके बीमार पड़ते ही उसे मायके जाने की अनुमति भी मिल गई।

कुछ समय मायके में रहकर जब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटी, तो उसने घर का बदला हुआ रूप देखा। घर में एक पूर्णकालिक नौकरानी रख ली गई थी। सास-ससुर अपनी क्षमता के अनुसार अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने लगे थे। बच्चे अपनी चीज़ें अपनी जगह रखने लगे थे और उसके पति भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर नहीं रहते थे।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि नौकरानी घर का काम उतनी लगन, सफाई और व्यवस्थित ढंग से नहीं करती थी, जितनी निष्ठा और बारीकी से सुगंधा किया करती थी। कई काम अधूरे रह जाते, कुछ चीज़ें इधर-उधर पड़ी रहतीं और कई बार उसकी कार्यशैली में लापरवाही भी दिखाई देती। फिर भी घर में कोई उससे शिकायत नहीं करता था।

सुगंधा को याद आया कि जब वह पूरे मन से, बिना किसी शिकायत के, दिन-रात घर के लिए लगी रहती थी, तब भी उसकी छोटी-सी भूल पर उसे सुनना पड़ता था। लेकिन आज, नौकरानी से वही काम पूरी तरह न होने पर भी सभी शांत थे। कारण केवल इतना था कि सबको डर था कि यदि वह भी काम छोड़कर चली गई, तो घर की जिम्मेदारियाँ फिर उनके कंधों पर आ जाएँगी।

उसी क्षण सुगंधा को जीवन का एक गहरा सत्य समझ में आया। आवश्यकता से अधिक दूसरों का काम करते रहने से केवल अपनी परेशानियाँ ही नहीं बढ़तीं, बल्कि हम अनजाने में अपने प्रियजनों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी छीन लेते हैं। सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन सहायता उतनी ही होनी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो। यदि एक ही व्यक्ति हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेगा, तो उसके पास स्वयं के लिए समय और ऊर्जा कभी नहीं बचेगी।

उधर परिवार ने भी एक महत्वपूर्ण सीख प्राप्त की। उन्हें एहसास हुआ कि यदि सुगंधा अकेले ही पूरे घर का भार उठाती रही, तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाएगी। वह केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं वाली एक इंसान भी है। उसका भी अपने जीवन पर उतना ही अधिकार है, जितना घर के किसी और सदस्य का।

उस दिन के बाद परिवार ने घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लीं। बच्चों ने अपने काम स्वयं करने शुरू कर दिए। सास-ससुर ने अपनी क्षमता के अनुसार अपने काम स्वयं करने शुरू किए और उसके पति ने भी घर के कामों में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझा। सुगंधा से भी कहा गया कि अब वह अपने लिए समय निकाले, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे और अपने अधूरे शौक पूरे करे।

सुगंधा ने महसूस किया कि जब पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ केवल एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी जाती हैं, तो वह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से थकने लगता है। लगातार बढ़ता हुआ बोझ उसे तनावग्रस्त
और चिड़चिड़ा बना देता है। लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाते हैं, तो न केवल एक व्यक्ति का भार कम होता है, बल्कि पूरे परिवार का जीवन अधिक संतुलित, सहज और सुखद बन जाता है। जिम्मेदारियों का बँटवारा केवल काम कम नहीं करता, बल्कि रिश्तों में सहयोग, सम्मान और अपनापन भी बढ़ाता है।

घर किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है। और जो परिवार यह समझ जाता है, वहाँ केवल काम ही नहीं बँटते, बल्कि खुशियाँ भी बाँटी जाती हैं।


                                   - कंचन चौहान, बीकानेर



04 January 2026

लघुकथाः तसल्ली


शाम के तकरीबन 7 बज रहे थे। आज़ की पांचवीं पार्सल डिलीवरी कर तेज़ी से वापस स्टोर की ओर लौट रहा था। आमतौर पर शाम के इस वक्त लाल बिल्डिंग चौक और भालोटिया रोड पर भीड़ अपने शबाब पर होती है। लेकिन रोजाना ऐसे माहौल से गुज़रकर बाइक को सलीके से पार करने की हममें दक्षता आ गई है। सभी राइडर्स इस जगह को जल्दी से पार कर जाने पर खुद को विजयी महसूस करते हैं।





मैं भी लाल बिल्डिंग चौक पार कर विजयी मुस्कान के साथ आदित्यपुर-कांड्रा एक्सप्रेस वे पर चढ़ते ही एक उत्तेजना के साथ एक्सीलेटर को कसता चला गया। अभी केडिया चौक पार करने ही वाला था कि अचानक से मेरी नज़र उस छोटे से मासूम पिल्ले पर पड़ी जो डिवाइडर के बीच में खड़ा कभी इस ओर की सड़क तो कभी उस ओर की सड़क पर आधा कूदकर जाता, फिर तेज़ रफ़्तार गाड़ियों का रेला देखकर डर से वापस डिवाइडर पर चढ़ जाता।

मैं अपनी तेज़ रफ़्तार के कारण थोड़ा-सा आगे बढ़ चुका था लेकिन महज़ तीन-चार सेकेंड के भीतर जो मेरे मानस पटल पर कौंधा उसने मुझे बाइक रोकने पर मजबूर कर दिया। मुझे अपने मार्ग गुरू का वो कथन याद आ गया जिसमें कहा गया है कि पातक यानि पाप के तीन स्तर होते हैं। ऐसा काम जो नहीं करना चाहिए वो कर दिया।

उदाहरणार्थ किसी की हत्या करना,हाथ काट देना या चोरी करना आदि पातक की श्रेणी में आते हैं। दूसरे स्तर का पाप है अतिपातक! मतलब ऐसा काम जो करना चाहिए था और नहीं किया वह अतिपातक है। जैसे किसी जरूरतमंद या बेबस इंसान की मदद करनी चाहिए थी और मौके पर मौजूद रहकर भी नहीं किया तो यह अतिपातक है।

तीसरे स्तर का पाप ऐसे कार्य को कहा जाता है जो एक उदाहरण छोड़ जाता है। आने वाले समय में भी उससे लोग प्रेरित होकर उसकी युगों-युगों तक पुनरावृत्ति करते हैं।इसे कहा जाता है महापातक! उदाहरणार्थ रावण ने साधु के वेश में आकर सीता का हरण किया। यदि वह अपने असली रूप में आकर सीता का हरण करता तो यह केवल पातक होता।

लेकिन चूंकि उसने साधु के वेश में सीता का हरण किया तो उसने समाज में एक नया तरीका ईजाद कर दिया अपहरण का कि इस प्रकार वेश बदलकर भी अपहरण किया जा सकता है। जिसकी पुनरावृत्ति अपराधी लोग युगों-युगों तक करते आ रहे हैं।





खैर बाइक रोकने से पहले के करीब तीन-चार सेकेंड में मेरे दिमाग ने अहसास कर लिया था कि मैं क्या कर रहा हूं। उस मासूम से पिल्ले के लिए मेरे कुछ मिनट देना कर्तव्य है जिससे उसकी जान बच सकती है। वरना हो सकता है रोड पर सरपट दौड़ती गाड़ियां क्या पता उतनी संजीदगी न दिखाएं और उसे रौंदते हुए चले जाएं। शाय़द उसे मेरी ज़रूरत है और ऐसे में मैं नहीं रुका तो यह द्वितीय श्रेणी का पाप यानि अतिपातक हो जाएगा। और यूं भी यह मेरी पार्ट टाइम जॉब है, थोड़ा वक्त बर्बाद भी हो गया तो क्या ही हो जाएगा।

मैं बाइक खड़ी कर सीधे डिवाइडर पर जा पहुंचा। एक बार लगा कि पकड़ कर सीधे उसे सर्विस लेन के बाहर छोड़ आऊं। लेकिन वह बिल्कुल भी छोटा नहीं था इसलिए थोड़ा सा डर भी था कि कहीं काट न ले मुझे। मुझे अपनी ओर बढ़ता देख वह फ़िर से कभी सड़क पर तो कभी डिवाइडर पर भागदौड़ करने लगा। क़रीब दस मिनट तक मैं उससे कबड्डी-कबड्डी खेलकर परेशान हो चुका था। इस बीच मुझे देखकर एक फल बेचकर लौट रहे ठेले वाले ने भी अपना ठेला किनारे लगाकर मेरी मदद करने में जुट गया।






अब हम दो लोग मिलकर उसे एक्सप्रेस वे से बाहर ले जाने की कोशिश करने लगे। लेकिन मजाल है कि वो पिल्ला हमारे इरादे को समझ पाए। इस फेर में यह भी डर था कि हमें देखकर भागते हुए सचमुच किसी गाड़ी की चपेट में आ गया तो "रक्षा में हत्या" हो जाएगी।

क़रीब बीस -पच्चीस मिनट की आपाधापी के बाद वह मुख्य सड़क पर ही खड़ी एक कार के नीचे जाकर दुबक गया। परेशान ठेलेवाले ने हताश होकर मुझसे कहा- "जाने दीजिए भैया! इसको इसका काल खींच रहा है, हमलोग बचा नहीं पाएंगे। मुसीबत ये थी कि दोनों ओर आसपास कोई कटिंग भी नहीं थी जिससे वह पिल्ला मुख्य सड़क से सर्विस लेन पर जा सके। यानि उसे मुख्य सड़क पर ही लगभग आधा किलोमीटर ले जाने के बाद ही कटिंग थी। मैं भी कहां हार मानने वाला था।

उसे किसी तरह कार के नीचे से डांटकर बाहर निकाला। फिर ठेलेवाले की मदद से मुख्य सड़क के ही बिल्कुल किनारे-किनारे कैरी करते हुए उसे गम्हारिया प्रखंड कार्यालय के गेट तक ले गया। वहां से उसे तेज़ी से भगाते हुए कार्यालय कैंपस के काफी भीतर तक खदेड़कर आया। पूरे घटनाक्रम में कड़ाके की ठंड के बावजूद पसीना छूट गया था। लेकिन जब उसे खदेड़कर पैदल अपनी बाइक की ओर लौटने लगा तो हवाओं के साथ ठंड पड़ते पसीने के साथ ही दिल को भी ठंडक पहुंच रही थी। मन में एक तसल्ली थी कि उस पिल्ले की रक्षा का जो अवसर ईश्वर ने प्रदान किया उसे मैंने पूरा किया।






हमारे साथ दैनिक जीवन में न जाने कितने ही ऐसे मौके रोज़ाना आते हैं। कई बार हम उसे हल्के में लेते हुए नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आग्रह है सभी से कि कभी भी ऐसे मौकों को नज़रंदाज़ न करें। जहां आप सक्षम हों और संभव हो तो थोड़ा सा वक्त निकालकर जरूरतमंदों की मदद ज़रूर करें चाहे वो इंसान हों या पशु-पक्षी। दावा करता हूं कि इससे कोई प्रत्यक्ष लाभ तो नहीं होगा लेकिन मन को एक अलौकिक तसल्ली मिलेगी।


- कुणाल


25 September 2025

व्यंगात्मक लघुकथा- काला कुत्ता



आज कल लोगो का शौक अजब गज़ब होते जा रहा है। गाय पालने वाले घरों में कुत्ते पाले जा रहे है। बड़े शान से उसका दाम भी बताया जा रहा है, 12000 का हैं, 14000 का है। अपने बिहार की राजधानी पटना से लिए, मैंने भी ऐसे ही उनकी थोड़ी प्रशंसा कर दी। मतलब भाई जी को फूला दिया। कुत्ता तो कुत्ता है भाई जी एकदम कुचु कुचु टहकार करिया। बहुत स्मार्ट लुक लग रहा है। इसका कोई जवाब नहीं है।





इतना सुनते ही पूछिए मत फिर क्या था। अंग्रेजी और हिंदी यानी हिंगलिश में उसका खाना पखाना तक चर्चा का विषय बना दिया और लगा हमको पकाने, फिर क्या मैं भी भोजपुरीया हिंदी में जम्हाई लेते लेते कुछ देर लपेटता रहा। मन ही मन सोचता रहा, बताइए भला दिन भर जो नशा में चूर रहता हो।

माँ बाप का एकलौता बारिश हो। खाने पीने में शुद्ध से ऊपर शाकाहारी हो। घर का खर्चा की बात ही नहीं करनी मुझे। पढ़ने-लिखने में कलक्टर को भी शर्मिंदा करता हो। ओ आज कुत्ते की डाइट पर लेक्चर दे रहा हो, तो मन का प्रसन्न होना लाजमी ही होगा।

ओ भी तब जब भाई जी के मुखारबिन्द से कुत्ते जैसे जानवर को डाइट मे रोज केला, सेब, दूध-भात और पियोर शाकाहारी खिलाने की बात सुननी पड़े। ध्यान दीजियेगा रोज मतलब प्रतिदिन, तब-जब कृषि की पढ़ाई के समय
एनिमल हस्बेंडरी वाले सर से बातों बातों में कुत्ते की भी चर्चा सुन चूका हूँ।
कि कुत्ता जानवर मांसाहारी होता है, के आलावा गप गप अंडा मास खाते कुत्ते, ओ करिया हो या सफ़ेद या चितकबरा कुत्ता मतलब कुत्ता। जिसको देखता भी हूँ आप लोग भी देखें ही होंगे। ये आशा नहीं पूर्ण विश्वास है जी। हसीं और गुस्सा दोनों आ रहा था।






मग़र कर भी कुछ नहीं सकता था। इतने तारीफ पे तारीफ सुनने के बाद ओ बेचारा काला कुत्ता मेरे गली में छेरते हुए यानी पतला पोट्टी करते हुए अपने आवास कि तरफ अपने मालिक के साथ प्रस्थान करने लगा। मैं भी चैन की सांस लेने ही वाला था कि ध्यान आया कि कांड कर गया कुत्ता, मेरे ही गली में मेरे दरवाज़े के पास ही ओ काला कुत्ता लिक्विड फॉर्म में हग चूका है।

मैं गलियों को गालियों के साथ धोने कि सोचने लगा ताकि कल सुबह किसी अपनों के पैरो का श्रृंगार न हो जाए और फिर मैं धोने लगा। अब बस जा रहा हूँ स्न्नान करने गाय पालने वाले कुत्ते पर आ जाए, तो आप भी अचंभित ना होइएगा।

आपकी गली में आपके दरवाज़े पर भी ये सॉलिड या लिक्विड फॉर्म में सुबह-सुबह मिल सकता है। बी अलर्ट क्योंकि मेरा प्रैक्टिकल अनुभव है जी धोने का धोने का हा.. हा.. हा.. हा..


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु' / बक्सर, बिहार



11 August 2025

लघुकथा: साल 3032 में शायद


साल 3032 के उस दिन विश्व स्नेह नियंत्रण केंद्र ने तात्कालिक घोषणा की कि 'नागरिकों ध्यान दो। सालों पहले कोई मानवता नाम का वायरस था, जो फिर से जाग्रत हो गया है। यह मानवता एक भयानक बग है, जो आपके शरीर के सिस्टम में अचानक प्रकट होता है और फिर मनुष्य अजीब हरकतें करने लगता है। अगर अचानक कोई व्यक्ति किसी के दुख में उसकी मदद के लिए भागता दिखाई दे तो समझ लीजिए कि वह इस वायरस का शिकार हो गया है।'





इस वायरस के लक्षण अनदेखा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लक्षण हैं किसी को रोते देख कर आपकी आंखों का नम होना, जरूरतमंद व्यक्ति को देख कर अपनेआप हाथ का जेब की ओर बढ़ जाना, किसी की तकलीफ सुन कर उसकी मदद के लिए तलब लगना, किसी की गलती के लिए उससे बदला लेने के बजाय उसे माफ कर देने की इच्छा होना और अगल-बगल से गुजर रही गाय और कुत्ते को डंडा या लात मारने का मन न होना।

इसमें किसी भी तरह का बदलाव आप खुद में या घर के किसी भी सदस्य में अनुभव करें तो तत्काल नजदीक के मानवता नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें। हमारे वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इस मानवता का एंटीडाॅट बनाने में लग गए हैं। प्रधानमंत्री की ओर से घोषणा की गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति में मानवता के गुण दिखाई दें, तुरंत उससे दूर हट जाएं, उसे अकेला छोड़ दें।


हमारी खुफिया एजेंसी का मानना है कि यह वायरस भारत नाम के देश से फैला है। सामान्य जनता से निवेदन है कि वह चिंता न करे। सोशल डिस्टेंस रखे। किसी की ओर देख कर भूल से भी न मुसकराएं, प्यार और सरलता का अनुभव होते ही तत्काल उसे नष्ट कर दें। दिन में तीन बार बिना वजह झगड़ा करते रहें या किसी निर्दोष को बिना वजह नुकसान पहुंचाते रहें।

जब तक एंटीडाॅट की खोज नहीं हो जाती, तब तक 'लुच्चईसीटामोल' और 'स्वार्थोमाइसीन' की खुराक बारबार लेते रहें। याद रखिए मानवता से जीवन सुधर सकता है। इसलिए इससे सतर्क रहें।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह




30 April 2025

लघु कथा- घूंघट


मैं टैक्सी में बैठी अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। दूर सड़क के किनारे एक महिला अपने एक हाथ में दूध की बरनी लटकाए हुए और दूसरे हाथ से बार - बार अपने घूंघट को खींच रही थी। 





शायद सड़क पार करने का इंतजार कर रही थी। देखने में वह महिला अधेड़ उम्र से थोड़ा ज्यादा ही लग रही थी। उसे देख मुझे ख्यालल आया कि घूंघट की ओट तो छोड़ो, शायद इस उम्र में कुदरती आंखों से भी कम दिखना आम बात होगी। 

उसी उधेड़बुन में टैक्सी उसे पीछे छोड़ आगे निकल गयी और मैं अपने काम में व्यस्त हो गई। अगले दिन अखबार में एक कोने में छपी खबर ने मुझे झकझोर दिया। 

ख़बर थी, "तेज रफ़्तार ट्रक ने अधेड़ महिला को कुचला, अज्ञात चालक के खिलाफ मामला दर्ज।" मुझे बार-बार सड़क किनारे घूंघट में खड़ी महिला का ध्यान आ रहा था।


                                                        - कंचन चौहान, बीकानेर




30 January 2025

लघु कथा- कन्या भ्रूण हत्या


किसी शहर में सुरेश नाम का बहुत बड़ा व्यापारी रहता था। उसकी तीन बेटियां और एक बेटा था।  बेटा-  बेटी में  भेदभाव की भावना से ग्रसित था। बेटा-बेटी की शादी ब्याह कर चुका था। बहू को प्रसव पीड़ा प्रारंभ हुई तो सुरेश और उसका बेटा  नजदीक के अस्पताल में बहू को भर्ती कराया और खुशखबरी का बड़ी बेसब्री से इंतजार करने लगे। बार-बार निगाहें अस्पताल के दरवाजे तक जाती और रुक जाती और मन बार-बार अपने इष्ट का स्मरण करके यही प्रार्थना करता कि हे! प्रभु आज तो अच्छी खबर सुनने को मिल जाए। 





तभी अस्पताल का दरवाजा खुलता है और डॉक्टर बाहर आई और बोली बधाई हो नाती हुआ है। सबके चेहरे खुशी से खिल उठे सुरेश को खुशी के मारे कुछ समझ नहीं आया और उसने झट से अपने गले से एक सोने  की चेन निकाली और डॉक्टर को देते हुए बोला ये लो बधाई का इनाम डॉक्टर ने 2 मिनट तक सुरेश की तरफ देखा उसके बाद उसकी चेन उसको वापस कर दी। और विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़ कर बिना कुछ बोले अपने रूम में चली जाती है। 

सुरेश को उस डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया और बोला घमंडी डॉक्टर ने मेरा बहुत बड़ा अपमान कर दिया पर कारण क्या था यह बात उसकी समझ में नहीं आई। इधर डॉक्टर सोच रही थी कि तीन आजन्मी बेटियों का हत्यारा उसके हाथ से चेन ले कर मुझे उसके पाप में शामिल नहीं होना है। सुरेश ने तीन बार बहू का अबॉर्शन उसी डॉक्टर से कराया था। इसीलिए उस डॉक्टर को सुरेश जैसे व्यक्ति से सख्त नफरत थी। सुरेश जैसे कुत्सित विचारधारा के लोगों के कारण ही आज भी कोख में बेटियों को मार दिया जाता है।


                                                                - सीमा त्रिपाठी 

21 January 2025

दयालुता का दीपक संदेश

हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसे एक शांत और सुरम्य गाँव में एक वृद्धा रहती थीं, जिन्हें सभी स्नेह से "अम्मा" कहते थे। अम्मा अपनी मुस्कान, निस्वार्थ सेवा और अद्भुत पकवान बनाने के लिए प्रसिद्ध थीं। उनके स्नेहपूर्ण स्वभाव के कारण गाँव के लोग उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते थे।

एक दिन गांव में एक नया लड़का आया, जिसका नाम राहुल था। राहुल एक तेज-तर्रार और जिज्ञासु लड़का था, लेकिन उसकी शरारतें उसे अक्सर मुसीबत में डाल देती थीं। वह बच्चों के साथ मज़ाक करता और लोगों को परेशान करता। राहुल की चंचलता से गाँव वाले परेशान हो गए थे।




एक दिन अम्मा ने राहुल को ध्यान से देखा और उसकी शरारतों के पीछे छिपी चमक और उत्साह को महसूस किया। उन्हें विश्वास था कि यह ऊर्जा सही दिशा में लगाई जाए तो राहुल एक बेहतरीन इंसान बन सकता है। एक दिन, जब राहुल शरारत के बाद परेशान होकर पेड़ के नीचे बैठा था, तब अम्मा ने उसे अपने पास बुलाया।

अम्मा ने राहुल को अपने हाथों से बनी मिठाई दी और धीरे-धीरे उससे बातें करना शुरू किया। उन्होंने उसे कहानियाँ सुनाई। इसके बाद हर दिन अम्मा राहुल को कुछ नया सिखाती। कभी किसी बूढ़े किसान की मदद करना, तो कभी किसी घायल पक्षी का उपचार करना।

शुरू में राहुल ने अम्मा की बातों को हल्के में लिया, लेकिन धीरे-धीरे अम्मा की दयालुता और स्नेह ने उसका दिल जीत लिया। वह अब अम्मा के साथ समय बिताने लगा और उनके दिए हर छोटे-बड़े कार्य को एक चुनौती की तरह लेने लगा। धीरे-धीरे राहुल ने महसूस किया कि दूसरों की मदद करना कितना संतोषजनक हो सकता है।

समय के साथ, राहुल में बदलाव आने लगा। अब वह अपने दोस्तों के प्रति दयालु, बड़ों के प्रति आदरपूर्ण और जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति रखने लगा। राहुल की शरारतें एक नए रूप में बदल गयीं। वह बच्चों को हँसाने और गाँव के कामों में मदद करने के लिए अपनी चतुराई का उपयोग करने लगा। इससे राहुल ने गांव वालों का दिल जीत लिया।

गाँव वाले राहुल के इस बदलाव को देख कर आश्चर्यचकित थे। क्योंकि उन्होंने राहुल में एक नई ऊर्जा और सच्चाई देखी, जो पहले उनके लिए सिर्फ एक उपद्रवी था। एक दिन, गाँव के लोग अम्मा के पास गए और राहुल में आए इस अद्भुत बदलाव के लिए उनका धन्यवाद किया।

अम्मा मुस्कुराईं और बोलीं- "हर बच्चे में अच्छाई छिपी होती है। उसे बाहर लाने के लिए प्यार और धैर्य की जरूरत होती है। एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने में कभी प्रकाश कम नहीं होता है।"

उस दिन के बाद, राहुल को "गाँव का दीपक" कहा जाने लगा। राहुल ने गाँव के हर व्यक्ति के जीवन में उजाला भरने का काम किया। और यह सब उस स्नेहमयी अम्मा की वजह से संभव हो पाया, जिन्होंने अपनी दयालुता से न सिर्फ राहुल का जीवन बदला, बल्कि पूरे गाँव को एक नया संदेश दिया।


                                 - दीपक कोहली

11 January 2025

चार पैसे वाला गणित

हमारे समय में 11वीं में बोर्ड की परीक्षा के बाद में ही कालेज दाखिला होता था । इसलिये नवीं में ही विज्ञान , वाणिज्य या कला संकाय में से एक पर सोच विचार कर निर्णय करना आवश्यक होता ताकि तीन साल बाद यानि ग्यारहवीं के बोर्ड परीक्षा बाद स्नातक वाली पढ़ाई  उसी अनुरूप से पूरी की जा सके । सो मेरे प्रधानाध्यापक जी ने आठवीं में गणित वाले अच्छे परिणाम स्वरूप, मेरे बड़े भाई को समझा कर विज्ञान संकाय में मेरा दाखिला का आवेदन ले लिया । 

दस ग्यारह माह पश्चात एक दिन मेरी विज्ञान वाली पुस्तकों को देख पिताजी के ध्यान में आया कि मैं तो विज्ञान संकाय ले रखा है, सो विफर पड़े और कह दिया कि विज्ञान अपने काम की नहीं। वाणिज्य संकाय से पढ़ाई करनी है। ध्यान रखना चार पैसे जब पास में होंगे तभी यह दुनिया तुम्हारी  कद्र करेगी । इसलिये चार पैसे कमाने पर ध्यान देना है। उस समय तो मैं यही समझा कि पढ़ाई के साथ कमाने का समझा रहे हैं। 






लेकिन बाद में जब मैंने अपने परिवार के सम्बन्धियों के यहाँ भी बड़े बुजुर्गों को डाँट कर अपने से छोटों को कहते सुना  कि चार पैसे कमाने अक्ल नहीं है। देर तक सोने में मन तो लगता है न ? तब चार पैसा वाली बात सुन बड़ा ही आश्चर्य हुआ और यह चार पैसा वाली गुत्थी को समझनें की ललक जागी । 

इसी बीच रास्ता पार करने के लिये जब सड़क पर खड़ा था तभी बगल में खड़े दो दोस्त आपस में बात कर रहे थे जहाँ एक कह रहा था "सारी जिंदगी निकली जा रही है, कमाने में लेकिन अभी तक चार पैसे नहीं जुटा पाया हूँ", फिर जबाब में दूसरे ने कहा "जब पढ़ने नहीं दिया हमें,  इस ज़माने ने, तो लगादी पूरी ताकत अपनी, हमने चार पैसा कमाने में"। यह वार्तालाप जब कान मे पड़ा जिसमें फिर चार पैसा सुनने मिला तब अपने घर पर पढ़ाने वाले शिक्षक से इस को समझाने का आग्रह किया । 

उन्होंने मुझे बताया कि उपरोक्त सभी में चार पैसा का प्रयोग एक कहावत की तरह हुआ है। फिर उन्होनें कहावत के बारे में बताते हुये बताया कि कहावतें प्रायः सांकेतिक रूप में होती हैं यानि वो वाक्यांश जो  "जीवन के दीर्घकाल के अनुभवों को छोटे वाक्य में कह कर आपको समझा देती हैं।"

इसके बाद उन्होनें यह भी बताया कि 'चार' शब्द से हमारे यहाँ अनेक मुहावरे बहुत ही प्रयोग में लाए जाते हैं जैसे चार पैसे कमाओगे, तब समझ में आयेगा.. के अलावा  चार लोग क्या कहेंगे....,  चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात...

चार सौ बीसी करना....,  वगैरह वगैरह। उन्होनें यह भी बताया कि अनेक तरह के अर्थों को समझाती अनेक कहावतें हमारी संस्कृति में उपलब्ध है। मैं एक एक कर सभी का मतलब समझा दूँगा।लेकिन अभी चार पैसे कमाओगे, तब समझ में आयेगा.. वाले  अखाणे [कहावत] का मायने विस्तार से समझ लो । उनके द्वारा समझाया गया मतलब को मैं यहाँ आप सभी पाठकों के साथ सांझा कर रहा हूँ जो इस प्रकार है - 

उन्होनें यह चार पैसे कमाओगे, तब समझ में आयेगा.. वाले  अखाणे [कहावत] का मतलब विस्तार से समझाया ।  उसी को मैं यहाँ आप सभी पाठकों के साथ सांझा कर रहा हूँ जो इस प्रकार है - 

पहला पैसा को कुँए में डालना ...मतलब.."अपने परिवार के पेट रूपी कुँए में डालना होता है अर्थात अपना तथा अपने परिवार पत्नी, बच्चों का भरण-पोषण करना, पेट भरने के लिए।"

दूसरे पैसे से पिछला कर्ज उतारना...मतलब.."माता पिता द्वारा किए गए हमारे पालन-पोषण वाला  क़र्ज़ उतारने के लिए... यानि  उनकी सेवा के लिए दूसरा पैसा है।"

तीसरे पैसे को आगे क़र्ज़ देना है ...मतलब.."अपनी संतान को पढा़ लिखा कर योग्य [क़ाबिल] बनाने के लिए ताकि वो भी आगे वृद्धावस्था में आपका ख़्याल रख अपना कर्ज उतार सकें..."

चौथा पैसा को संभाल...मतलब.."आड़े वक्त के लिए जमा करने के लिए होता है,अर्थात शुभ कार्य करने के लिए दान, सन्त सेवा, असहायों की सहायता करने के लिए, यानि निष्काम सेवा करना, क्योंकि हमारे द्वारा किए गये इन्ही शुभ कर्मों का फल हमें इस जीवन के बाद मिलने वाला है। याद रखें हमारे सनातन धर्मानुसार दान दक्षिणा की तरह और भी शुभ कार्यों जैसे सत्कर्मों का फल हमें अगले जन्म में मिलता है।

अन्त में उपरोक्त वर्णित का निष्कर्ष यही है कि इस कहावत में  चार पैसे का मतलब सम्पूर्ण धन से है और उसके चार  हिस्सों को जिंदगी में कैसे उपयोग करना है या उनका जिंदगी में क्या महत्व है, कैसे खर्च करें, किस किस मद में खच करें, को समझ लेना है। ध्यान रखें यदि आपने तीन हिस्से किये तो ऊपर समझाये गये सारे कार्य सुचारु रूप से पूरे नहीं कर पायेंगे और चार हिस्से के बाद पाँचवे हिस्से की ज़रूरत ही नहीं है..!! 

अतः उपरोक्त वर्णित कार्यों को सही ढंग से पूर्ण करने के लिये हमें हमारे धन को चार हिस्सों में विभाजित करना आवश्यक होता है । इस तरह ऊपर उल्लेखित तथ्यों को ही संक्षिप्त में लोकोक्ति के रूप में  चार पैसे कमाओगे, तब समझ में आयेगा.. कह कर सामने वाले को चार पैसों का गणित समझा दिया जाता है। 



                                   - गोवर्धन दास बिन्नानी "राजा बाबू"


09 December 2024

लघुकथा- परछाई

बसंत का मौसम शुरू ही हुआ था। नीरा,परिवार और मित्रो के साथ पिकनिक पर गई है। मौसम का आनन्द लेते हुए, नीरा अकेले ही जंगल की ओर चल पड़ी। अचानक उसके पैर थम गए। 

वो जहां खड़ी है, वहां जंगल घना नहीं है। डूबते सूरज के रंग सा, फूलों से भरा एक पेड़, नीरा ठीक उसके पास जाकर झरे हुए फूलों कोहाथों में उठाकर नम आंखों से देख रही है। 





फागुन का माह, हल्की हवाएं चल रही हैं। पेड़ पर लगे फूल नीरा को छू कर जमीन पर गिर रहे है। शाम के चार ही बजे थे। ढलती धूप में, सुनहरी पीली मिट्टी पर पेड़ की तिरछी छांव ने नीरा को अपनी बाहों में भर लिया। नीरा सिसक कर रोने लगी। 

तीन चार साल की छोटी सी उम्र में नीरा और दादी का साथ छूट गया था। दादी बीमार थी पर दुलार में कभी कोई कमी नहीं थी। पलाश के फूल दादी को अति प्रिय थे। तब से हर फागुन नीरा की निगाहे पलाश ढूंढती हैं।





आज मानो इस पलाश की परछाई में उसकी तलाश पूरी हुई। उसे बड़ा सुकून मिला। जाने कब घंटों बीत गए। इतने में उसकी सहेलियों उसे पुकारते हुए वहां पहुंची। नीरा जमीन पर बैठी, पलाश की पेड़ पर सर टिकाए सोई हुई थी।


                            - सुतपा घोष, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


08 December 2024

लघु कथा - चिट्ठी



जून महीने की तपती दोपहर थी। सूरज अपनी पूरी ताकत लिए आसमान में चमक रहा था और गली में सन्नाटा पसरा था। सब कुछ थमा-थमा सा लग रहा था, सिवाय डाकिए के जो अपनी साइकिल पर घंटी बजाता हुआ हर घर के सामने से गुज़र रहा था।





किसी को कुशल क्षेम जानने के लिए पत्र का इंतजार था, तो किसी को परीक्षा परिणाम का डर, किसी को बिल की चिंता खाए जा रही थी तो कोई विरहन परदेश में रह रहे पिया की प्रेम पाती को पाने के लिए आकुल थी। गली का प्रत्येक व्यक्ति बस डाकिए की घंटी से चौकन्ना हो जाता था। 

        आज शर्मा जी भी दरवाजे की चौखट तक दौड़े दौड़े आए कि शायद संजय का कोई पत्र आया हो। संजय उनका बेटा,, जो भारतीय सेना में दो साल से अपनी सेवाएं दे रहा था। पूरे गांव में शर्मा जी बड़ी शान से कहते थे, कि मैंने अपने बेटे को भारत मां की रखवाली के लिए भेजा है। संजय का पत्र कई दिनों से आया नहीं था इसलिए चिंतित भी थे, लेकिन डाकिए को देखकर आशा की किरण नज़र आ रही थी। 





डाकिया भी थोड़ी देर रुक कर शर्मा जी के हाथ पर चिट्ठी रखकर चला गया। शर्मा जी जल्दी-जल्दी चश्मा टटोल कर पत्र खोलने लगे। शुरू की चार पंक्तियां पढ़कर ही वे वहीं चौखट पर औंधे मुंह गिर गए। परिवार वाले भी घबरा गए कि आखिर चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा था? पढ़ कर पता चला कि संजय अपनी धरती मां के लिए कुर्बान हो गया था। 


                                                                - वसुंधरा धर्माणी 


06 December 2024

कहानी- अल्हड़ लड़की



       पहाड़ियों के बीच में सुंदर सा गांव चारों तरफ हरियाली , पेड़ पौधे , सीढ़ीदार खेत , और लकड़ी के पत्थर के मजबूत घर जिनमें बड़े बड़े आंगन जिसको कि मिट्टी से लीपा हुआ था और उसमें चटाई पर धूप सेंकती हुई एक सोलह साल की लड़की जिसका नाम सोना है साफ सुथरा रंग और गुलाबी गाल और होंठ सबको अपनी तरह आकृषित करते सोना थी भी बला की खूबसूरत लड़की... वह हाथ में किताब लिए हुए शायद अपना पाठ याद करती हुई आंगन में बैठी है....





        तभी किचन से मां की आवाज आती है सोना बेटा आके नाश्ता कर ले... किचन में चली जाती सोना जहां पर उसकी दादी, दादा जी और उसके पिताजी और छोटा भाई भी रोटी और सब्जी खा रहे थे... मां ने सोना को भी सब्जी रोटी और दूध दिया... सभी नाश्ता खत्म कर चुके थे...

          सोना और उसका छोटा भाई स्कूल के लिए तैयार हो के स्कूल चले जाते है मां झट से बर्तन धो के और सफाई करके खेत को चली जाती ही है... दादी और दादा जी भी काम में लग जाते है... 

          धीरे धीरे सोना बारहवीं पास करके कॉलेज में चली जाती है जो भी सोना को देखता वही बहाने से उससे पूछताछ करने की कोशिश करते थे...
         
पर सोना इतनी भी नादान न थी वही सब समझती थी क्यों हर कोई उससे बात करते है सब उससे दोस्ती करना चाहते है... पर सोना अपनी पढ़ाई करती और अच्छे नंबरों से पास होती...

          इतने में एक दिन दूर का एक लड़का सोना को देखते ही आवक रह गया उसने पहले कभी इतनी सुंदर लड़की नि देखीं थी वह झट से सोना से प्यार कर बैठा और सोना थोड़ा कतराती और तिरछी नजर से देख कर उसको अपना दिल दे बैठी पर सोना डरती भी थी कि उसकी वजह से कहीं मैं बदनाम न हो जाऊं लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे मगर वह क्या करती वह भी अपने दिल के आगे मजबूर थी...

        अब वह कॉलेज जाती तो अनगिनत लोग उसको चाहते थे पर वह तो उस अंजान को अपना दिल दे बैठी थी अब वह और अजनबी धीरे धीरे कभी कभी मिलते तो थोड़ी देर की ही मुलाकात में हो जिंदगी भर के सपने देखती और वह उसको अपने प्रेमजाल में फंसा के खुश होता था और अनेक वादे करता उसको शादी का झांसा देता वह पागल भी उसका झूठ न पकड़ पाई और वह भी रंगीन दुनिया में खो जाती...

          अब सोना का ग्रेजुएशन पूरा होने को था इतने में सोना को एक बाज रूपी इंसान देखता है और वह उसको पाने के लिए सारे प्रयत्न करता है... उसका प्रेमी भी न जाने कहां चले गया सोना ने आखिर हार मान ली कि वह अब उसकी जिंदगी से जा चुका है और वह अब उस बाज रूपी इंसान की पत्नी बन गई...

       सोना की किस्मत में तो प्यार ही नहीं था वह बाज रूपी इंसान उसको शराब पीकर रोज मारता पीटता और गालियां देता वह बेचारी आसूं बहाती हुई उस भगवान को कोसती कि क्यों पैदा किया जब खुशियां ही नहीं लिखी तूने मेरी किस्मत में...

         पर अब हो भी क्या सकता था वह बस अब दिन काट रही थी इसी बीच उसके दो बच्चे हो गए अब वह उनका लालन पालन करने लगीं सोच कर कि कभी तो उसकी किस्मत पलटेगी... अब उसके बच्चे भी बड़े हो गए और अपनी मां को प्यार करते और उसका ख्याल रखते...

         अब सोना खुश थी और अब न उसके पास न वह इंसान था न बाज रूपी इंसान क्योंकि उसके पास था तो अपने बच्चों का प्यार और साथ...

         अब सोना खुले आसमान में गोते लगा रही थी अपने बच्चों के साथ अपने बच्चों के साथ जिन्होंने उसे प्यार दिया सम्मान दिया और आजादी दी अपने अतीत रूपी पिंजरे को तोड़ती हुई वह आजाद है... 

आज वह हंसती है, खिलखिलाती है, मुस्काती है, सपने देखती है, गुनगुनाती है, और खुले आसमान में तितली की तरह ऊंचाई भरती हुई, एक हिरनी की तरह कुलांचे मारती हुई हर दिन जीती है ...

        ये है सोना की कहानी और आज सोना बहुत खुश है अपनी छोटे से परिवार के साथ...!

        
                              - सुमन डोभाल काला,   देहरादून, उत्तराखंड