साहित्य चक्र
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22 August 2026

दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में...


दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है। इसे बराऐख़ास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नज़रिए से देखने में कुछ दूसरे ही ख़ास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं, बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।

रोटी-रोज़गार मिले,नहीं मिले,संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अख़बार तो हैं ही। कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है ?





किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारग़र हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा। तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।

मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त,न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल.फिर भी नागरिकों की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाऍं.क्या ये संभव नहीं?एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों! कलाओं का जादू,अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते,अपनी स्थापनाऍं एक हद तक ही बरक़रार रख पाता है।

बाद मुद्दत के आज़ादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं, भूखे रहे हैं, सज़ाऍं काटी हैं। आज फिर से विदेशी पूॅंजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज़ की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।


स्वतंत्र-विकलताऍं बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताऍं घट रही हैं। विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है। हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते,न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।

धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाॅंधभरा साम्राज्य भी। दिक़्क़त और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोख़रोश से शामिल है, जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है ?

कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली अमी अस्तो, अमी अस्तो,अमी अस्त...?


- राजकुमार कुम्भज




कच्चा मकान


बहुत समय पहले किसी गांव में शंकर नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार पर आलसी था। साथ ही उसकी एक बुरी आदत थी वह अपनी गलती दूसरों पर थोप देता था और खुद अपनी गलती को स्वीकार करने से कतराता था। वह उस गांव में एक कच्चे घर में रहता था। वह एक ऐसे परिवार से आता था जिसमें सब गरीब थे। उसके पिता जी ने उसके लिए विरासत में केवल यही एक कच्चा मकान छोड़ा था।





गांव में ज्यादातर घर पक्की ईटों के बने थे जो एक-दो कच्चे थे उनके मालिकों ने अपने घर के सामने ईंटे गिरवा शुरू भी कर दिया था। अब गांव में बस शंकर का परिवार ही था जो अभी तक कच्ची मिट्टी के घर में रहता था। शंकर के पास एक जमीन थी, जो उसके पूर्वजों की थी। उसी पर परिवार का सारा बोझ था, पर वह जमीन भी अब बूढी हो चुकी थी। खेती उतनी खास होती नहीं थी। एक दिन शंकर तमतमाते हुए घर में घुसा।

“मेरे पिता ने मुझे पैदा ही क्यों किया?”

शंकर ने खाट पर बैठते हुए कहा- “क्या हुआ जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”

पत्नी ने पूछा- “अरे! कम से कम इस मिट्टी के घर में तो नहीं रहना पड़ता, बरसात भी आने वाली है पता नहीं इस घर का अब क्या होगा? अब तो खेती भी बंद हो रही है। नहीं तो पैसों से मैं भी ईंटे गिरवा लेता।”

“तो इसमें आपकी बाबूजी की क्या गलती है?” “उन्हीं की तो गलती है, इतना सम्मान पाकर क्या मिला? यह कच्चा घर और बंजर होती जमीन!”

शंकर चाहता तो मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे इकट्ठे कर लेता, पर वह अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर की ओर देखकर तमतमाते हुए कुछ बुदबुदाने लगा।

शंकर ने उसकी गरीबी का जिम्मेदार अपने पिता को ठहराया। वह पहले कुछ काम किया भी करता था। अब तो वह भी बंद हो गया। सुबह देर से उठता था, दोपहर को खेत पर बिना मन के जाता और अगर धूप तेज होती तो जाता ही नहीं था। फसल हुई या नहीं, गायों ने चरा या बिना पानी के सुख गई, इसकी उसको कोई परवाह नहीं थी। उससे कोई पूछता की खेती आजकल नहीं तो रही है क्या? तो कहता- “अरे भाई मेरे पिता की बदकिस्मती मेरे सर आ गई है, झेलना ही पड़ेगा”




एक दिन ऐसा आया कि रात के चूल्हे के लिए पड़ोसी से अनाज मांगना पड़ा। घर तो कमजोर था ही और इस कमजोरी में सुई चुभाने के लिए बरसात भी हो गई और इतनी की शंकर का घर मिट्टी में मिल गया। शंकर और उसकी पत्नी जमीन पर बैठे कुछ सामान संदूक में रख रहे थे ताकि वह भीग ना जाए। तभी ऊपर बची हुई छत के खपड़े से कुछ, शंकर के सिर पर गिरा।

“हाय! सिर फोड़ डाला” शंकर चिल्लाया। जब नीचे देखा तो एक गंदा और पुराना झोला पड़ा था।

“अरे! यह क्या है?” उसकी पत्नी ने हैरान होकर पूछा।

“क्या मालूम?”

शंकर ने झोले को धीरे से खोला, वह झोला नोटों से भरा हुआ था। यह देख दोनों की आंखें फटी रह गईं। उस नोटों के साथ एक पुराना कागज़ का टुकड़ा भी था। जब शंकर ने उस कागज को खोला तो उसमें उसके पिता की लिखावट थी। और उसमें लिखा था

प्रिय शंकर,
मुझे पता है कि यदि तुम्हें यह पत्र मिला है तो तुम्हारा मिट्टी का कच्चा घर बरसात में ढह चुका है। मैने इस झोले में पैसे रखे हैं, जो मैने अपने जीवन भर में कमाए हैं। जिसे तुम अपने पक्के घर की कामना पूरी कर सकते हो। मैं चाहता था कि तुम अपनी मेहनत से एक नया घर बनवाओ। पर, ये पैसे तुम्हारी विरासत हैं। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।

- तुम्हारे पिता

यह पढ़कर शंकर की आंखों में आंसू आ गए।
पिता के लिए उसके दिल में जो खराब तस्वीर बनी हुई थी, वह साफ हो जाती है। उसे अपनी गलती का भी पता चलता है। वह उन पैसों से एक नया पक्का घर बनावत है और एक नई उपजाऊ जमीन भी खरीदता है। उस जमीन पे वह बैल की तरह काम करके काफी तरक्की करता है।


- प्रणव राज, बिहार



उत्तराखण्ड की जनजातियाँ: कठिन परिस्थितियों में जीवन और संस्कृति की मिसाल


हमारा राज्य उत्तराखण्ड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य बना। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वर्तमान में देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखण्ड एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है। इसकी सीमाएँ चीन और नेपाल से लगती हैं। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाएँ चीन-तिब्बत से लगी हुई हैं, जबकि पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर की सीमाएँ नेपाल से जुड़ी हैं। नीति और माना जैसे सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।



उत्तराखण्ड में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, बुक्सा, थारू, राजी और अन्य जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति है, जो उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। इन जनजातीय समुदायों की आजीविका लंबे समय से भेड़-बकरी पालन, ऊनी वस्त्र निर्माण, पशुपालन, कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा स्थानीय उत्पादों के व्यापार पर निर्भर रही है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। नवंबर से फरवरी तक इन क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण कई रास्ते बंद हो जाते हैं।

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोग अपने जीवन और परंपराओं को आज भी मजबूती से सँजोए हुए हैं। कई परिवार सर्दियों के आने से पहले ही कई महीनों के लिए राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं। अपने पशुओं के लिए भी पर्याप्त चारा और घास-पत्ती पहले से एकत्र कर ली जाती है, ताकि बर्फबारी और रास्ते बंद होने के दौरान उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इन लोगों का जीवन प्रकृति के अनुकूल ढलने का एक अद्भुत उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इनके मन में जीवन के प्रति गहरा धैर्य, आत्मनिर्भरता और संतोष दिखाई देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, ये समुदाय अपनी मेहनत और परंपराओं के सहारे जीवन को आगे बढ़ाते रहे हैं।

परंपरागत रूप से कुछ जनजातीय समुदाय छह महीने ऊँचाई वाले अपने मूल क्षेत्रों में और सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने मैदानी क्षेत्रों में बिताते हैं। वे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करते हैं। यह मौसमी प्रवास उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल रही हैं। शिक्षा का प्रसार हुआ है और सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी जनजातीय समुदायों तक पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर रही है और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तलाश रही है। आज कई युवा पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार को भी अपना रहे हैं।

हालाँकि, आज भी अनेक परिवारों की जड़ें अपने पुश्तैनी गाँवों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। उनके पूर्वजों से मिली जमीन, घर, पशुपालन और स्थानीय कारोबार आज भी उनकी सामाजिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों की धरती भी है। यहाँ अनेक प्रकार के लोकपर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के लोग अपनी सरलता, मिलनसारिता, मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ इस सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।

इन समुदायों ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा है, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसलिए उत्तराखण्ड की जनजातियाँ हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



- सुमन डोभाल काला


18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


13 August 2026

क्योंकि नेता तो मैं हूं ना....



कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं तो ये बात मेरे ऊपर भी चरितार्थ होती है। ऐसा है कि नेतागिरी का गुण बचपन से ही मुझमें कूट-कूटकर भरा था ये बात और है कि इतना बारीक कूटा गया था कि आप जैसे साधारण मनुष्यों को बिना सूक्ष्मदर्शी वो गुण दिखाई देना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। हालांकि नेतागिरी के गुण से ओत-प्रोत होने के बावजूद मुझे कभी भी तिल मात्र भी इसका घमंड नहीं रहा है।

तो बात शुरू करते हैं हाईस्कूल के दिनों से ! उन दिनों हाईस्कूल हमारे यहां सातवीं से ही शुरू हो जाता था तो हमलोग जैसे ही सातवीं में पहुंचे तो मुझे पहली बार अपने-आप में नेता के छुपे हुए गुण का अहसास हुआ। मैंने अपनी क्लास में आठ-दस लड़कों की एक टोली बना ली थी। दो ही महीनों में एक दिनचर्या बन चुकी थी कि पहली घंटी का क्लास करने के बाद उन सभी लड़कों को बहकाकर स्कूल से बाहर ले जाना है। बाहर जाकर स्कूल के आस-पास खेतों, होटलों, साईकिल दुकान, खोमचे वाले के पास आदि जाकर खूब मटरगश्ती करनी है। कभी बेर खानी है तो कभी सिंदुआर की झाड़ियों में मोटी डालियों पर लटकना है और सीधे टिफिन से ठीक पहले वाली घंटी के वक्त क्लास लौटना है। हालांकि बाहर जाने से पहले बाक़ी लड़के बाद में होने वाली कुटाई को लेकर सशंकित रहते थे लेकिन मजाल है कि मेरे गुरु मंत्र दिए जाने के बाद कोई डर छू-मंतर न हो जाए ?





ये अलग बात है क्लास लौटने के बाद रोज़ाना शर्मनाक तरीके से स्कूल के चपरासी खुदू मामा द्वारा कुटाई होती थी। मैं मन ही मन सोचता कि कम से कम टीचर्स से मार खाते तो इज्ज़त तो बनी रहती क्लास में ! खैर मार खा-खाकर मैं और मेरे गैंग के लड़के ढीठ बन चुके थे। क्लास दर क्लास दसवीं कक्षा तक मेरी बहुमुखी नेतागिरी की प्रतिभा में और भी निखार आता गया और हमलोग हुड़दंग और फ़िर कुटाई के बड़े-बड़े कीर्तिमान रच डाले। स्कूल में सभी टीचर्स और दो चपरासी में कोई ऐसा नहीं बचा था जिसका बीपी बढ़वाकर हमलोग उनसे न धुले हों। मैं उन लड़कों का नेता था इसलिए मेरे नाम एक खास कीर्तिमान दर्ज था। कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात तक नहीं करने वाले अत्यंत शांत स्वभाव वाले बाउरी सर से भी मैं प्रसाद पा चुका था। मेरे अलावा पूरे स्कूल में उन्होंने कभी किसी को एक चांटा तक नहीं मारा था तो आप समझ सकते हैं मेरे टैलेंट का लेवल।

कॉलेज तो मैं कभी ज्यादा गया नहीं इसलिए मेरे कॉलेज के सहपाठी मेरी नेतागिरी के अभूतपूर्व कौशल से महरूम रह गए। लेकिन जिस लॉज में हम छह लड़के रहते थे वहां मैं कैसे चूक सकता था। सुबह चार बजे उठकर जॉगिंग करने जाना और लौटकर फिर दस बजे तक सोना। रूम में गैस चूल्हा रहने के बावजूद होटल में सामूहिक भोजन। कभी चांडिल डैम,कभी सूर्य मंदिर तो कभी रातों को ऑर्केस्ट्रा देखने जाना। रूम में समय-समय पर ताश खेल का मजमा लगाना ये सब मेरी ही उत्कृष्ट नेतागिरी और मोटिवेशन का कमाल था।

कालांतर में कुछ ख़ास कारणों से तकरीबन 19 की उम्र में मेरी शादी हुई। इसके बाद मैं गांव शिफ्ट हो गया। क़रीब एक साल बाद हमारे यहां विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी थी। चुनावी जंग में इस बार हमारे ईचागढ़ विधानसभा की रणभूमि में यूं तो तीन बार के विजेता विधायक सिंह जी सहित वर्तमान विधायक सह डिप्टी सीएम स्व सुधीर महतो जी ताल ठोंक रहे थे। लेकिन उस बीच इस दफे केला छाप पर मेरे पिता के मित्र श्री कार्तिक महतो जी दहाड़ रहे थे।

चहुं ओर बस उनकी ही चर्चा थी और लगभग यही सबको महसूस हो रहा था कि इस बार कार्तिक जी ही बाजी मारेंगे। मुझे वोटर बने महज़ एक या डेढ़ साल ही हुए थे। सो युवा जोश से लबरेज़ मैं जब कार्तिक जी से मिला तो एक बार फिर मेरे अंदर का कद्दावर नेता जाग गया। फिर क्या ? मैं युद्ध स्तर पर कार्तिक जी के लिए कैंपेन में लग गया। विश्वास नहीं कीजिएगा कि मैंने ग्रासरूट लेवल पर इतना भयंकर और तूफ़ानी चुनाव प्रचार किया कि अंततः कार्तिक जी 18 हज़ार वोटों से हार गए। सक्रिय राजनीति की दुनिया में यह मेरी पहली उपलब्धि थी।

चुनाव के ठीक बाद मेरा चयन पारा शिक्षक के पद पर हुआ। कुछ दिन शांत रहने के बाद जब मैं अपने प्रखंड स्तर पर पारा शिक्षक संघ का सचिव बना तो मुझे एक बार फिर अपनी नेतागिरी का कौशल दिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उन दिनों पारा शिक्षकों के मानदेय का भुगतान प्रखंड स्तर से ही होता था लेकिन अनियमित ! मैंने इस अनियमितता को दूर करने का बीड़ा अपने कंधों पर ले लिया। यकीन मानिए जिस माह से मैंने मुहिम शुरू की उसके बाद अगले नौ महीनों तक मानदेय का फंड ही नहीं आया। इस प्रकार मैं अपने शिक्षक संगठन में भी नेतागिरी के कीर्तिमान हेतु एक दो-ढाई सौ ग्राम साइज़ का मील का पत्थर गाड़ चुका था।

वर्ष 2014 में सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में मेरे सबसे फेवरेट युवा लोकप्रिय लीडर,तीन बार के डिप्टी सीएम और एक बार के होम मिनिस्टर परम आदरणीय सुदेश कुमार महतो जी हमारे लोकसभा प्रत्याशी के रूप खड़े थे। मैं तो पहले से ही पार्टी में जुड़ा ही था ऊपर से फेवरेट लीडर को देखकर मेरी बांछे खिल गई। ख़ुदा कसम मैं भाव-विभोर होकर इतनी तन्मयता से ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया कि उनकी जमानत जब्त होते-होते बची।

वर्ष 2018 आते-आते मैं अपने शिक्षक संगठन में अपनी धाकड़ नेतागिरी की बदौलत प्रखंड से प्रोन्नति पाकर जिला सोशल मीडिया प्रभारी बन चुका था। उन दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन पारा शिक्षकों का धरना-प्रदर्शन,घेराव होता रहता था। मैं कहां पीछे रहने वाला था ! हर दिन अखबारों में बयानबाज़ी और जहां-तहां लोकल टीवी चैनलों पर बाइट देकर इतराना मेरी दिनचर्या बन चुकी थी। उस समय टेट पास, प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित पारा शिक्षक एक साथ एकजुट होकर चट्टानी एकता के साथ अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत थे। मैं ही वो महामानव और कर्मठ नेता हूं जिसने पारा शिक्षकों की चट्टानी एकता में छेद कर उसमें एक बरगद का बीज डाल दिया था। 2019 तक आते-आते बरगद अपनी जड़ें फैलाकर चट्टानों में दरार पैदा करना शुरू कर चुका था।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में हम पारा शिक्षक तत्कालीन राज्य सरकार की नीतियों से इतने क्षुब्ध थे कि मैंने जीवन में पहली बार सहाय जी के "हाथ" मजबूत करने की ठान ली। मेरा आक्रोश और नेतागिरी का जोश उफ़ान मार रहा था। मैंने जी-जान लगाकर सहाय जी की सहायता करने की कोशिश की लेकिन अंततः सहाय जी असहाय हो गए।

2021 के अंत तक मैं संगठन के लिए मेहनत कर पारा शिक्षकों की एकता वाली चट्टान को कटिंग पत्थर के टुकड़ों में तब्दील करने में कामयाब हो चुका था। पारा शिक्षक संघ तीन धड़ों में बंट चुका था।अब मैं और ज्यादा प्रमोट होकर टेट पास पारा शिक्षकों के संघ का प्रदेश प्रवक्ता बन चुका था। मतलब मैं राज्य स्तर का बड़ा नेता बन चुका था। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि बतौर प्रवक्ता मैंने इतना धुआंधार परफॉर्मेंस दिया कि 2022 की शुरुआत तक टेट पास पारा शिक्षक संघ मेरे सकल प्रयासों से मेरे कर-कमलों द्वारा तीन फाड़ हो चुके थे। मेरी इसी निःस्वार्थ सेवा भावना और लगन की वजह से जनवरी 2022 में मुझे टेट पास पारा शिक्षकों एवं गैर पारा कैंडीडेट्स का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।

बतौर प्रदेश अध्यक्ष हमारी मुहिम थी कि बिना परीक्षा ही पूर्व की तरह काउंसलिंग के जरिए शिक्षक नियुक्ति कराना। मैं प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नायक फिल्म के शिवाजी राव की तर्ज़ पर ताबड़तोड़ धरना-प्रदर्शन चालू कर दिया। सिर्फ़ यही नहीं, संगठन के सदस्यों की सहमति पर कोर्ट में केस भी करवा दिया गया। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि महज़ एक साल के भीतर सरकार ने हमारी मांगों को दरकिनार कर ठिकाने लगाते हुए अपनी ही नियमावली के साथ शिक्षक नियुक्ति का विज्ञापन ज़ारी कर दिया। फिर क्या ? उसके बाद हमारी नेतागिरी के भी घोड़े लग गए !

दुर्भाग्यवश मैं आज़ प्राइमरी टीचर हूं। सरकारी प्रावधानों से बंधे होने के कारण फिलवक्त मैं खेत की मेड़ के नीचे दुम दबाकर चुपचाप बैठे सियार की तरह अपनी भी नेतागिरी की चूल मारती पूंछ को "दबड़ाकर (मोड़कर)" बैठा हुआ हूं। और इसी वज़ह से बहुत सारे लोग राहत की सांस ले रहे हैं। मैं जहां भी और जिसके भी समर्थन में नेतागिरी में उतर जाऊं, उसके घोड़े लगना तय है। यही मेरी काबिलियत और खासियत दोनों ही हैं। खैर ! मुझमें नेतागिरी का जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। जनकल्याण की चाहत दिल में अभी भी तरोताजा है। बस वक्त का इंतजार है। लोगों का कल्याण मैं करता आया हूं और करके रहूंगा क्योंकि.....नेता तो मैं हूं ना।


- कुणाल



नोट- यह लेख केवल हास्य और व्यंग्य हेतु लिखा गया है।

07 August 2026

सच्चे और निस्वार्थ रिश्ते, आज के दौर की सबसे बड़ी पूंजी


जीवन के इस कठिन और तेज़ रफ़्तार दौर में जहाँ हर इंसान अपनी ही दुनिया, अपने स्वार्थ और व्यस्तता के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है, वहाँ कई बुनियादी मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। आज की इस स्वार्थी दुनिया में रिश्तों की नींव अक्सर लेन-देन और अपने फ़ायदे पर रखी जाने लगी है। ऐसे माहौल में सच्चे, निष्ठावान और निस्वार्थ रिश्ते किसी अनमोल मोती या उपहार से कम नहीं हैं।





निस्वार्थ रिश्तों का महत्व- किसी भी इंसान की असली दौलत उसके बैंक खाते या संपत्ति नहीं, बल्कि उसके वे वफ़ादार रिश्ते होते हैं जो ख़ुशी में मुस्कुराते हैं और दुख में ढांढस बंधाते हैं। एक सच्चा रिश्ता वह है जो किसी शर्त, पृष्ठभूमि या आर्थिक लाभ का मोहताज न हो। जो इंसान बिना किसी मतलब के आपका सम्मान करे, आपकी उपस्थिति की सराहना करे और बिना कहे आपकी तकलीफ़ को समझ ले, वही आपकी वास्तविक पूंजी है।

मुश्किल घड़ी में परीक्षा- रिश्तों की सच्ची पहचान हमेशा मुश्किल और परीक्षा के समय ही होती है। जब जीवन में संकट आता है, सफ़लताएं मुंह मोड़ लेती हैं और अपने भी अजनबी लगने लगते हैं, तब जो कुछ हाथ आपका सहारा बनते हैं, वही जीवन के असल स्तंभ होते हैं। कठिन समय में साथ निभाने वाले लोग इंसान को निराशा के अंधेरे से निकालकर नई उम्मीद और हौसला देते हैं।

रिश्तों की हिफाजत और समझदारी- आज के इस ख़ुदग़र्ज़ दौर में दिल से चाहने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। यही वजह है कि ऐसे रिश्तों की क़द्र करना, उनमें आने वाली दूरियों को समय रहते दूर करना और उन्हें संभालकर रखना ही असली बुद्धिमानी है। रिश्तों में अहंकार, ग़लतफ़हमियां और उपेक्षा दूरियों की वजह बनती हैं, जबकि विनम्रता, सहनशीलता और अपनापन रिश्तों को लंबे समय तक जीवंत रखते हैं।

जीवन संक्षिप्त है और यह सफर अकेले तय करना मुमकिन नहीं है। इसलिए अपने आसपास मौजूद उन निष्कपट और निस्वार्थ रिश्तों को पहचानिए जो आपसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखे बिना जुड़े हैं। उनकी क़द्र कीजिए, उन्हें समय दीजिए और इन रिश्तों को सुरक्षित रखिए, क्योंकि यही वे पूंजी हैं जो इंसान को जीवन के कठिन रास्तों पर कभी अकेला नहीं छोड़ती।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


15 July 2026

जीवन का 'शून्य' और हमारी भागदौड़ का अर्थ


जीवन की पूरी यात्रा एक ऐसे अंतहीन राजमार्ग की तरह है, जहाँ हम अनगिनत पड़ावों को पार करते हुए एक मंज़िल की तलाश में जुटे रहते हैं, पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि इस आपाधापी, इस अथक श्रम और भौतिक संसाधनों के संचय के अंत में हमारे हाथ क्या लगेगा? हम 'कर लूँ जमा दौलत-ओ-ज़र, उसके बाद क्या?' के उस बुनियादी सवाल को अक्सर अपनी व्यस्तताओं के शोर में दबा देते हैं, जबकि यही वह प्रश्न है जो हमें इंसान होने की सच्ची परिभाषा से रूबरू कराता है।





दरअसल, हमारी तमाम उपलब्धियां, सजे-धजे आशियाने और दुनियावी शोहरत का गुमान, वक्त की रेत पर बनी उन लकीरों की तरह है जो पहली लहर के साथ ही अपना अस्तित्व खो देती हैं। साहित्य और शेर-ओ-शायरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उस रूहानी ठहराव का आईना हैं, जहाँ हम अपनी रूह से मिलते हैं, और जब हम अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं गढ़ते, बल्कि उन अनकहे सच को कागज़ पर उतारते हैं जो भीड़ में कहीं खो गए थे।

जीवन का शाश्वत सत्य तो वही है कि 'उठी थी ख़ाक, ख़ाक से मिल जाएगी वहीं', यह एक ऐसा दर्शन है जो हमारे भीतर के अहंकार को गलाकर करुणा की खाद बनता है, क्योंकि यदि हम यह हृदय से स्वीकार कर लें कि मिट्टी से बने इस पुतले को अंततः उसी मिट्टी में विलीन होना है, तो फ़िर नफ़रत, द्वेष और पद-प्रतिष्ठा के मोह का कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। हमारा जीवन महज़ एक सांख्यिकीय डेटा या संपत्तियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन निश्छल पलों का समूह है जो हमने किसी के दुःख को साझा करके, किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरकर या अपनों की आँखों में प्रेम बनकर जिए हैं।

अंततः, जब ज़िंदगी का चिराग़ बुझने को होगा, तब दौलत और पद की रसीदें नहीं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए परोपकार और प्रेम की ख़ुशबू ही हमारे साथ जाएगी, इसलिए इस यात्रा के दौरान उस 'शून्य' को पहचानना आवश्यक है जहाँ हम सब एक समान हैं, ताकि अंत में जब यह सवाल ज़हन में उठे कि 'उसके बाद क्या ?', तो हमारे पास उत्तर में पछतावे की जगह एक संतुष्ट मुस्कान हो।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



09 July 2026

कम उपचारक नहीं होता आलिंगन अथवा जादू की झप्पी






कई लोग अपने मित्रों अथवा परिचितों से बड़ी गर्मजोशी से मिलते हैं। अच्छी तरह
से हाथ मिलाते हैं अथवा गले मिलते हैं। कई लोग हाथ मिलाने की बजाय कुछ उँगलियाँ
आगे कर देते हैं और वो भी इस तरह से जैसे उनकी उँगलियाँ टूटी हुई हों या वे मनुष्य
न होकर रोबोट हों। अभिवादनस्वरूप जो शब्द बोलेंगे वो भी एकदम सपाट लहजे में व
बिना किसी स्नेह व आत्मीयता के। इससे रिश्तों में ताज़गी व स्थायित्व नहीं रह पाता
और संबंध मृतप्राय होने लगते हैं।


जब भी दोस्तों व परिचितों से मिलें गर्मजोशी से
मिलें। आयु के अनुसार प्यार व सम्मान के साथ अभिवादन के शब्द बोलें। समवयस्कों
से गले मिलें और बच्चों को गोद में ले लें इससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती
क्योंकि जादू की झप्पी देना अथवा आलिंगनबद्ध होना या किसी को अपनी बाँहों में भर
लेना अभिवादन का आत्मीय तरीक़ा ही नहीं अपितु एक अत्यंत सुखद अनुभूति व एक
अप्रतिम स्वास्थ्यवर्धक एवं उपचारक प्रक्रिया भी है। पाश्चात्य जगत में तो एक कहावत
ही प्रचलित है कि जो रोज़ आलिंगन करता है वह हमेशा तनावमुक्त व स्वस्थ रहता है।


हम किसी को अपनी बाँहों में तभी अच्छी प्रकार से लेते हैं जब हम अतिशय
प्रेममय होते हैं और जब हम किसी को आलिंगनबद्ध करते हैं अथवा हमें कोई अपने
आगोश में लेता है तो भी हम प्रेममय होने लगते है। हमारी बॉडी कैमिस्ट्री परिवर्तित होने
लगती है। यदि वह आलिंगन अर्थपूर्ण है और उससे हमें प्रसन्नता मिल रही है तो हमारे
शरीर में लाभदायक हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है। इसका विपरीत भी उतना ही
सही है। यदि कोई व्यक्ति द्वेष अथवा कपट के वशीभूत होकर किसी का आलिंगन
करता है तो सामनेवाले का रोम-रोम सुलग उठता है जिससे उसके शरीर में लाभदायक के
बजाय तनाव उत्पन्न करने वाले हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जिससे वो बेचैनी
का अनुभव करने लगता है और फ़ौरन प्रतिरक्षात्मक स्थिति में आ जाता है।




एक माँ अपने बच्चे को विशेष रूप से छोटे बच्चे को दिन में न जाने कितनी बार
अपनी बाँहों में भरती है, कितनी बार उसे अपनी छाती से लगाकर थपथपाती है। इस
आलिंगन का आनंद एक माँ ही अनुभव कर सकती है दूसरा कोई नहीं। बच्चा भी माँ की
गोद में, उसके आलिंगन में न केवल सुरक्षित अपितु आनंदित भी अनुभव करता है। जो

बच्चे चलना सीख जाते हैं और सरपट दौड़ते हैं वे भी अपनी माँ की गोद अथवा उसके
आलिंगन में आने के लिए मचलते रहते हैं। इसका एक ही कारण है और वो ये कि वे
आलिंगनबद्ध होकर प्रसन्नता के सागर में ग़ोते लगाने लगते हैं। बच्चा चोट, भूख, दर्द
अथवा अन्य किसी कारण से कितना भी क्यों न रो रहा हो बस एक बार उसे अपने
आलिंगन में ले लीजिए वो सब कुछ भूलकर सामान्य हो जाएगा और जल्दी ही हँसने-
मुस्कुराने लगेगा। ये आलिंगन का ही प्रभाव होता है।

आलिंगन की प्रक्रिया माँ और बच्चे दोनों को न केवल प्रसन्नता व बच्चे को
भावनात्मक सुरक्षा व सबलता प्रदान करने में सहायक होती है अपितु दोनों को अच्छा
स्वास्थ्य व रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सक्षम होती है। इन क्षणों में दोनों के शरीरों की
अतःस्रावी ग्रंथियों में जो रासायनिक परिवर्तन होता है वो उनके शरीर की रोगावरोधक
प्रणाली को सुदृढ़ करता है जिससे दोनों ही स्वस्थ रहते हैं और किसी भी रोग की स्थिति
में शीघ्र रोगमुक्त हो जाते हैं।

जो माँ या बच्चे आलिंगन के विभिन्न रूपों के इन अद्भुत
प्रसन्नतादायक व आरोग्यवर्धक अनुभवों से वंचित रह जाते हैं उनके जीवन में इन
अभावों की पूर्ति अन्यत्र संभव ही नहीं। माँ की कोमल मसृण बाँहें हों अथवा पिता की
मज़बूत भुजाएँ या फिर दादा-दादी व नाना-नानी के आत्मीयतापूर्ण नाज़ुक हाथों का स्पर्श
इन सभी में निहित होता है पूर्ण सुरक्षा का एहसास व आनंद का परस्पर आदान-प्रदान।
इन क्षणों की उपेक्षा करना ही अस्वास्थ्यकर है।






विभिन्न आधुनिक शोधों से भी ज्ञात होता है कि आलिंगन का हमारे हृदय,
मस्तिष्क व दूसरे अंगों पर दीर्घकालीन आरोग्यकारी प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन बीस सेकेंड
का आलिंगन व्यक्ति को मानसिक रूप से सक्रिय व चुस्त-दुरुस्त रखने और हृदय की
बीमारियों से बचाने में काफ़ी हद तक कारगर होता है।

आलिंगन से व्यक्ति में इंफेक्शन
का मुक़ाबला करने की शक्ति बढ़ती है। विभिन्न प्रकार के तनावों के स्तर को संतुलित
रखने व अवसाद को रोकने में आलिंगन बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
परोक्ष रूप से आलिंगन व्यक्ति की स्मरण शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने में भी
मददगार होता है। प्रश्न उठता है कि आलिंगन तनाव को कैसे कम करता है और इससे
उसकी स्मरण शक्ति कैसे ठीक रहती है?

वास्तव में आलिंगन के दौरान जो आनंदानुभूति होती है उससे हमारी पीयूष ग्रंथि
से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन पर्याप्त मात्रा में निकलकर हमारे रक्त में मिल जाता है
जो शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले दूसरे हार्मोंस के दुष्प्रभाव को निष्क्रिय बना देता
है। इस प्रकार हम न केवल तनाव से बचे रहते हैं अपितु निरंतर तनावमुक्त व शांत
रहने के कारण अपनी याददाश्त को भी ठीक रख पाते हैं।

आलिंगन करने से न केवल
हृदय की धड़कनों व रक्तदाब को कम करने में सहायता मिलती है अपितु सर्दी-ज़ुकाम
जैसी व्याधियों में भी आराम मिलता है। हमारे शरीर की एड्रिनल ग्रंथि से स्रावित होने
वाला हार्मोन कार्टिसोल एक तनावप्रदायक हार्मोन है जो उच्च रक्तचाप, अस्थिभंगुरता,
दुश्चिंता, अवसाद व स्थूलकायता तक के लिए उत्तरदायी होता है।


इन स्थितियों अथवा व्याधियों से बचने के लिए खानपान पर नियंत्रण, व्यवस्थित
जीवनशैली, व्यायाम व चिकित्सक द्वारा उपचार अपेक्षित है लेकिन जो व्यक्ति आलिंगन
से दूर नहीं भागते उन्हें उपरोक्त व्याधियों से अधिक नहीं जूझना पड़ता। तनाव उत्पन्न
करने वाले किसी भी हार्मोन के दुष्प्रभाव से मुक्ति पाने व अपने को स्वस्थ रखने के
लिए आलिंगन एक प्रभावशाली क्रिया है।

मनोवैज्ञानिक व पारिवारिक चिकित्सक
वर्जीनिया सैटिर कहती हैं कि हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रतिदिन चार
बार, अपने रख-रखाव के लिए प्रतिदिन आठ बार व अपनी वृद्धि के लिए प्रतिदिन बारह
बार आलिंगन करना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है कि हम जितनी ज़्यादा बार
आलिंगन करते हैं वह हमारे हित में होता है। आलिंगन बहुत काम की चीज़ है लेकिन
आलिंगन से पूर्व हमें हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और पूर्णतः सात्त्विक
भाव के साथ किसी को अपने बाहुपाश में लेना चाहिए।

संबंधों के निर्माण व उनमें माधुर्य व विश्वसनीयता उत्पन्न करने में भी आलिंगन
का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। किसी के गले लगकर अथवा उसे अपनी बाँहों में भरकर
उसका अभिवादन करके हम अपरिचितों को भी अपने अधिक निकट आने के लिए तैयार
कर लेते हैं। कुछ व्यक्ति इस कला में निष्णात होते हैं और सबसे खुली बाँहों और खुले
दिल से मिलकर उनसे तत्क्षण आत्मीयता स्थापित कर लेते हैं। हम जब तक परस्पर
आलिंगन करने में संकोच करते रहते हैं हमारे संबंधों में औपचारिकता ही बनी रहती है
जिससे प्रगाढ़ता नहीं आ पाती। बच्चे हों या युवा, स्त्री हो या पुरुष आलिंगन अथवा जादू

की झप्पी सबको प्रसन्नता व आरोग्य प्रदान करने में सक्षम है। एक अत्यंत भयभीत
बच्चे अथवा किसी बड़े को आलिंगनबद्ध कर लीजिए और देखिए कि कैसे वो फ़ौरन
भयमुक्त व स्वस्थ हो जाता है। यदि हम स्वयं को किसी के आलिंगन के योग्य भी बना
लेते हैं तो ये भी जीवन की बहुत बड़ी उपलिब्ध ही है।


- सीताराम गुप्ता



चौमासा की डरावनी रातें!


पहाड़ दूर से जितने प्यारे और सुंदर दिखाई देते हैं, अक्सर पहाड़ों का जीवन उससे उतना ही डरावना व खतरनाक होता है। चौमास यानी बरसात के मौसम में पहाड़- नदियों की उफान, हरियाली की हनक और कीट-पतंगों के आक्रमण से भर जाते हैं। चौमास में महीनों बारिश लगी रहती है और बारिश के कारण स्थानीय लोगों के मन में आंतरिक डर बना रहता है।

चौमास में अधिक बारिश के कारण पहाड़ों की नदियाँ विकराल रूप धारण की रहती है। जमीन यानी पहाड़ों का खिसकना, रोड़-पुलों व घरों का टूटना, पेड़ों का गिरना और आपदा आना पहाड़ों में सामान्य बात है। इसीलिए शायद! पहाड़ के स्थानीय लोग अपने घर में हमेशा 1-2 माह का राशन बचाकर चलते हैं। कहते है कि जैसी परस्थितियाँ होती हैं, वैसे ही उपाय खोजे जाते हैं। अपने घर में हमेशा राशन का भंडार करके रखना पहाड़ों के लोग का वहां की परस्थितियों से लड़ने का एक कारगर हथियार है।






चौमास की रातों में कभी-कभी पहाड़ी लोग बिना सोए भी रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें नींद नहीं आती, बल्कि इसलिए क्योंकि पहाड़ों की ज्यादा बारिश डरा देती है। पहाड़ियों का डरना भी वाज़िब है, क्योंकि प्रकृति का कहर बिना बताएँ आती है और वो इंसानों की तरह जाति-धर्म व लिंग का किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करती है। पहाड़ों के हर गांव में चौमास की रातों के कई दर्दनाक किस्से दफ्न है। शायद इन्हीं दर्दनाक किस्सों ने पहाड़ियों को कोमल हृदय का मानुष बनाया है।

पहाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ी लोग हृदय से जितने कोमल होते हैं, उतने ही उनके हौंसले बुलंद होते हैं। पहाड़ी प्रकृति से बार-बार टूटता-डरता है, मगर हिम्मत नहीं हारता है। चौमास की डरावनी रातें पहाड़ियों को डराती तो जरूर हैं, मगर पहाड़ी लोग प्रकृति से कभी रूठते या नफरत नहीं करते हैं। क्योंकि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं और उसके कहर को माँ की डांट समझ कर सह लेते हैं।

पहाड़ों में चौमासा जितना डरावना होता है, उतना ही लाभदायक और प्यारा भी होता है, क्योंकि चौमासा अपने साथ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, नदियों की सु.. सु… सुसुहाहट और चिड़ियों की चहचहाहट लेकर आती है। चौमासा यानी आषाढ़, सावन, भादो और कार्तिक का माह और वर्षा ऋतु का मौसम होता है। चौमासा को वर्षावास, चतुर्मास और चातुर्मास्य भी कहते हैं।


- दीपक कोहली



05 July 2026

योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

21 June 2026

काफल: उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ी मेरे बचपन की मीठी यादें

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।




हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।





जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।


आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।


आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।


आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।


- बीना सेमवाल


07 June 2026

उत्तराखंड की संस्कृति का सच्चा सिपाही: झुसिया दमाई


भारत के अधिकांश राज्यों की संस्कृति को बचाने का सबसे अधिक श्रेय उन लोगों को जाता है जो लोक संगीत, गायन आदि के माध्यम से संस्कृति और सभ्यता को जन-जन तक पहुंचा कर जिंदा रखते है। भारत में जिन लोगों ने संस्कृति और सभ्यता का बोझ अपने कंधों पर उठाया, उन लोगों के साथ भारतीय समाज ने कभी भी न्याय नहीं किया; बल्कि उन लोगों को भेदभाव, अपमान और अत्याचार का शिकार होना पड़ा।

आज भले ही कुछ लोग संगीत और गाना-बजाना इत्यादि के जरिए खूब शोहरत हासिल कर रहे हैं, मगर एक समय था जब इस काम को करने वालों के साथ समस्त समाज जातीय भेदभाव करता था। इसी भेदभाव के कारण देश के कई राज्यों की संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर आ गई है।





आज हम बात करेंगे उत्तराखंड की संस्कृति और सभ्यता को जिंदा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले झुसिया दमाई की। झुसिया दमाई का जन्म 1910 में बस्कोट, नेपाल में हुआ था। यह क्षेत्र उत्तराखंड के कुमाऊं से जुड़ा हुआ है। इसलिए झुसिया दमाई को आधा नेपाली आधा (भारतीय) कुमाऊनी कहा जाता है। दमाई उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल क्षेत्र में पाए जाने वाली जाति है।

सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के कारण भारत सरकार ने इस जाति को अनुसूचित जाति में रखा है। दमाई जाति का इतिहास बताता है कि ये मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में देवताओं को अवतरित करने का काम यानी जागर लगाने का काम करते थे। झुसिया दमाई भी इसी जाति से आते थे। अनपढ़ होने के बाद भी झुसिया दमाई देवताओं का श्रुति गान, वीरगाथाएं, भड़गाथा, श्रुति गीत, देव श्रुति, भगनौल, हुड़का और ढोल वादन आदि कला में परिपूर्ण थे।





उत्तराखंड में जब भी संस्कृति, सभ्यता और संगीत की बात होती है तो झुसिया दमाई का नाम जरूर लिया जाता है। झुसिया दमाई को यह काम उसके पिता रानुवां दमाई के द्वारा आर्थिक मजबूरी व गरीबी में मिला था। कहते हैं ना आर्थिक मजबूरी और गरीबी इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

कभी-कभी मुझे हैरान होती है यह जानकारी कि भारतीय समाज में एक समाज के साथ पूरा समाज भेदभाव करता है और जिस समाज के साथ भेदभाव होता है, वह समाज देवताओं का आह्वान करता यानी देवताओं को बुलाता है। मेरा प्रश्न है- जिस समाज के आह्वान से देवता आ जाते हैं, वह समाज कैसे अपवित्र और अछूत हो सकता है ?


- दीपक कोहली



28 April 2026

आत्म-सम्मान, स्वार्थ और संबंधों का बदलता स्वरूप- एक समग्र दृष्टिकोण


आज का समय विचारों के परिवर्तन का समय है, जहाँ एक ओर हमें बचपन से मिले संस्कार हैं और दूसरी ओर जीवन के अनुभवों से उपजी नई समझ। बचपन में हमने सीखा कि दूसरों की खुशी का ध्यान रखना चाहिए, परिवार को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए और हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। ये सिद्धांत हमारे व्यक्तित्व की नींव बनाते हैं और समाज को एकजुट रखते हैं।

किन्तु जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, अनुभव हमें यह भी सिखाते हैं कि केवल दूसरों के लिए जीना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति स्वयं के अस्तित्व, भावनाओं और आत्म-सम्मान की उपेक्षा करता है, तो वह भीतर से कमजोर होने लगता है। यहीं से एक नई समझ जन्म लेती है- स्वयं को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है जितना दूसरों को देना।





आत्म-सम्मान और स्वार्थ: असली अंतर

समाज में अक्सर “खुद को महत्व देना” स्वार्थ समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह आत्म-सम्मान है। स्वार्थ वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति केवल अपने हित के बारे में सोचता है, चाहे उससे दूसरों को नुकसान ही क्यों न हो। वहीं आत्म-सम्मान वह भावना है जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं, अपने अधिकारों और अपनी गरिमा को भी उतना ही महत्व देता है जितना वह दूसरों को देता है। अपनी खुशी का ध्यान रखना, अपनी सीमाएँ तय करना और अपनी ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग करना- ये सभी आत्म-सम्मान के संकेत हैं, न कि स्वार्थ के।

ऊर्जा और भावनाओं का सही उपयोग

हर व्यक्ति के भीतर एक सीमित लेकिन अत्यंत मूल्यवान भावनात्मक ऊर्जा होती है। यदि हम इसे उन लोगों पर खर्च करते हैं जो हमारे प्रेम, सम्मान और प्रयासों को महत्व नहीं देते, तो यह ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी भावनाओं और ऊर्जा का निवेश उन संबंधों में करें जहाँ हमें समझ, सम्मान और स्नेह प्राप्त हो। यह निर्णय कठिन अवश्य हो सकता है, किन्तु यह मानसिक और भावनात्मक संतुलन के लिए आवश्यक है।

रिश्तों का सच: पारस्परिकता का महत्व

एक स्वस्थ संबंध वही है जिसमें दोनों पक्षों से समान रूप से सम्मान, प्रेम और समझ हो। यदि कोई व्यक्ति लगातार अपने संस्कार, मेहनत, भावनाएँ और खुशियाँ किसी संबंध में देता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह बदले में भी वही अपेक्षा करे। यह अपेक्षा गलत नहीं है, बल्कि मानवीय संबंधों की बुनियाद है। किन्तु यदि बार-बार प्रयासों के बावजूद उपेक्षा, अनादर या असंतुलन बना रहता है, तो ऐसे संबंधों से दूरी बनाना आत्म-सम्मान की रक्षा का कदम होता है, न कि स्वार्थ का।





महिलाओं के संदर्भ में बदलती सोच

यह विषय महिलाओं के जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है। पारंपरिक समाज में महिलाओं को यह सिखाया गया कि उनका पहला कर्तव्य परिवार के प्रति है- चाहे इसके लिए उन्हें अपने आत्म-सम्मान तक का त्याग क्यों न करना पड़े। “इज्जत” और “समाज” के नाम पर उन्होंने अनेक बार अन्याय सहा। “मायका” और “ससुराल” के बीच उनकी पहचान सीमित कर दी गई, जैसे उनके लिए कोई तीसरी जगह हो ही नहीं सकती। किन्तु आज की महिला इस सोच को बदल रही है। वह यह समझ रही है कि सम्मान और प्रेम एकतरफा नहीं हो सकते। यदि उसे किसी संबंध में लगातार उपेक्षा या अपमान का सामना करना पड़ता है, तो उस संबंध से बाहर आना उसका अधिकार है।

दुर्भाग्यवश, इस आत्म-सम्मान को कई बार “अहंकार” या “जिद” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वास्तव में यह वर्षों से दबे हुए आत्म- सम्मान की पुनर्स्थापना है। आज की महिला अपने जीवन में ऐसे हालात स्वीकार नहीं करना चाहती, जिन्हें उसने अपनी पिछली पीढ़ियों की महिलाओं को सहते हुए देखा है।

स्वयं के लिए निर्णय लेना: स्वार्थ नहीं, समझदारी

जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसके प्रयासों, भावनाओं और सम्मान का मूल्य नहीं समझा जा रहा, तब उसे अपने लिए निर्णय लेने का अधिकार है। ऐसे लोगों और परिस्थितियों से दूरी बनाना, जो हमारे मानसिक और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करते हैं, एक आवश्यक कदम है। यह निर्णय समाज की पारंपरिक सोच के विपरीत लग सकता है, किन्तु यह आत्म-सम्मान और आत्म-सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।






निष्कर्ष: संतुलन ही समाधान है

जीवन हमें यह सिखाता है कि न तो पूर्ण रूप से दूसरों के लिए जीना सही है और न ही केवल अपने लिए। सही मार्ग वह है जहाँ हम दूसरों के प्रति संवेदनशील रहें, उनके लिए सम्मान और प्रेम बनाए रखें, लेकिन साथ ही अपने आत्म-सम्मान और गरिमा से कोई समझौता न करें।

यदि हम दूसरों को प्रेम, सम्मान और महत्व देते हैं, तो हम भी उसके अधिकारी हैं। जहाँ यह संतुलन बना रहता है, वहीं संबंध मजबूत और सार्थक बनते हैं। और जहाँ यह संतुलन बार-बार टूटता है, वहाँ अपने लिए सही निर्णय लेना ही सच्ची समझ और परिपक्वता का परिचायक है। अंततः, एक सशक्त समाज वही है जहाँ व्यक्ति अपने संस्कारों को संजोते हुए, अपने आत्म-सम्मान के साथ जीवन जी सके- और यही संतुलन हमें एक बेहतर और अधिक संवेदनशील समाज की ओर ले जाता है।


- कंचन चौहान


27 April 2026

पहाड़ों की नई जीवन रेखा, दुर्गम क्षेत्रों में सड़क क्रांति और विकसित भारत


भारत की भौगोलिक संरचना जितनी विविधतापूर्ण है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी। उत्तर के ऊंचे हिमालयी शिखरों से लेकर उत्तर-पूर्व की दुर्गम पहाड़ियों तक, एक समय था जब विकास की किरणें इन दुर्गम क्षेत्रों की चोटियों पर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती थीं। लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। वर्तमान में सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों तक पहुँचती सड़कें केवल डामर और कंक्रीट का जाल नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र रूपी शरीर की शिराएं और धमनियांबन चुकी हैं।

जिस प्रकार मानव शरीर में धमनियां ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय से शरीर के अंगों तक पहुँचाती हैं और शिराएं उसे वापस लाती हैं, ठीक उसी प्रकार ये सड़कें देश के मुख्य आर्थिक केंद्रों को सुदूर गांवों से जोड़ रही हैं।आर्थिक गतिशीलता, इन सड़कों के माध्यम से पहाड़ों का स्थानीय उत्पाद,चाहे वह जैविक फल हों, हस्तशिल्प हो या जड़ी-बूटियाँ,अब सीधे बड़े बाजारों तक पहुँच रहा है।





यह 'रक्त' का वह प्रवाह है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहा है। पहले एक बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने के लिए कई किलोमीटर पालकी या कंधे पर ढोना पड़ता था। आज एंबुलेंस सीधे घर के दरवाजे तक पहुँच रही है। दुर्गम क्षेत्रों के बच्चे अब उच्च शिक्षा के लिए शहरों से बेहतर तरीके से जुड़ पा रहे हैं।भारत के सीमावर्ती इलाकों में सड़कों का जाल बिछना केवल पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। 'सीमा सड़क संगठन' जैसी संस्थाएं कठिन परिस्थितियों में भी ऐसी सड़कों और सुरंगों (जैसे अटल टनल) का निर्माण कर रही हैं, जो हर मौसम में संपर्क बनाए रखती हैं।

"सड़क केवल दो स्थानों को नहीं जोड़ती, बल्कि यह दो संस्कृतियों, दो उम्मीदों और 'अंत्योदय' के संकल्प को भी जोड़ती है।"परिदृश्य तेज़ी से बदला है,सुविधाएं अब आमजन की पहुंच में हैं। विकसित भारत के विजन में 'कनेक्टिविटी' सबसे बड़ा स्तंभ है। जब सड़कें सुदूर गांव तक पहुँचती हैं, तो अपने साथ निम्नलिखित सुविधाएं भी लाती हैं।





डिजिटल इंडिया का विस्तार दिखाई देता है,सड़क के साथ-साथ ऑप्टिकल फाइबर बिछाना आसान हो जाता है, जिससे पहाड़ों में इंटरनेट पहुँच रहा है।
पर्यटन को बढ़ावा मिला है, ग्रामीण पर्यटन के जरिए स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। पलायन पर रोक लगी है,जब सुविधाएं और रोजगार गांव में ही मिलने लगते हैं, तो शहरों की ओर होने वाला मजबूर पलायन कम होने लगा है।

सड़कों का यह बढ़ता जाल इस बात का प्रमाण है कि विकास अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। देश के सबसे पिछड़े और दुरूह इलाकों तक पहुँचती ये 'धमनियां' राष्ट्र के शरीर में ऊर्जा का नया संचार कर रही हैं। यह बदलता बुनियादी ढांचा इस बात की गारंटी है कि विकसित भारत की यात्रा में कोई भी नागरिक और कोई भी क्षेत्र पीछे नहीं छूटेगा। आज पहाड़ केवल देखने में सुंदर नहीं रहे, बल्कि वे रहने और विकास करने के लिए भी सुलभ हो गए हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



बुनियादी कौशल

आज का युग, ज्ञान का नहीं, विज्ञान का युग बन गया है। बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ लेकर लौट रहे हैं परंतु जीवन के बुनियादी कौशलों से कोसों दूर हैं। वे ‘कक्षा ज्ञान’ में पारंगत हैं, लेकिन ‘ज़िंदगी के सबक़’ से अनजान।

मेरी छोटी बहन की कैंसर की कीमो थेरेपी के दौरान मैं उसके भावनात्मक सहयोग के लिए कुछ दिन उसके पास रही।

एक रात्रि, जब घरेलू सहायिका जा चुकी थी… मैं अपने भांजे को, जो प्रशासनिक अधिकारी है, दो महीने पहले ही भारतीय सिविल सेवा का प्रशिक्षण लेकर लौटा था... रात्रि का भोजन गर्म करके दे रही थी।






तभी मैंने महसूस किया कि किचिन सिंक का पानी रुक रहा है। किचिन में जो भी साधन, नुस्खे- पेचकस, सिरका, नींबू रस, चक्कू आदि मिला- उनसे मैंने सिंक के छिद्रों को खोलने की नाकाम कोशिश की।

अब तक बेटा भी भोजन समाप्त कर, किचिन में आ गया... मुझे सिक में सटर पटर करते देख पूछने लगा- मौसी क्या हुआ? मैंने तुरंत कहा- बेटा कोई मोटा मजबूत तार मिलेगा... लगता है सिंक के छिद्रों में कचरा फंसा है... पानी बह नहीं रहा।”

बेटा अपनी मासूम सी अनभिज्ञता जताते धीरे से बोला- “मौसी तार-वार तो मुझे कुछ पता नहीं...”

“ठीक है, तुम अपने कपड़ों की अलमारी से एक एल्यूमिनियम वाला या जिसका तार सख्त न हो... हैंगर ला दो।”

“ठीक है।” बेटा तुरंत हैंगर ले आया। मैंने हैंगर के हुक के नीचे जुड़े दोनों सिरों को प्लास व पेचकस की मदद से खोल, तार को सीधा

कर सिंक के छिद्रों में बारी-बारी घुमाया- जिससे सारा कचरा पाइप से होता हुआ, नीचे जाली पर इकट्ठा होने लगा। कुछ ही मिनटों में सारा पानी गड़-गड़ कर बह गया। बेटा ध्यान से मेरे सब उपक्रम देख रहा था।

वह चकित होकर बोला- “मौसी, आपने तो कमाल कर दिया! मौसी आज आप नहीं होती तो मैं क्या करता; मुझे तो ऐसे काम बिल्कुल नहीं आते।”

मैंने सहजता से कहा- बेटा जिंदगी की रोजमर्रा की जरूरतें किताबें नहीं, हमारे अनुभव ही हमें सिखाते हैं। उसके चेहरे पर संकोच और भीतर एक अजीब-सी आत्म-स्वीकृति थी- किताबी ज्ञान के बावजूद वह जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियों से निपटने में असहाय है।

यही आज के शिक्षित समाज की सच्चाई है। हमारे बच्चे तकनीकी, प्रबंधन और प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में दक्ष हैं, उनके पास डिग्री है, ज्ञान है, पर अनुभव नहीं। असल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं होता बल्कि जीवन जीने की समझ विकसित करना होता है।




परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘जीवन कौशल’ (Life Skills) के लिए कोई स्थान नहीं है। हम बच्चों को हर विषय की थ्योरी सिखा रहे हैं लेकिन प्रयोग नहीं। कभी-कभी लगता है- हमने बच्चों को इतना ‘स्मार्ट’ बना दिया कि वे अब किसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए गूगल सर्च करते हैं।

हर ज्ञान का असली मूल्य तभी है, जब वह जीवन को आसान बनाए। आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल बुद्धिमान नहीं, व्यवहारिक भी बनाएं क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी डिग्री- ‘अनुभव’ होती है, जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती, बस व्यवहार में लाने से मिलती है।


- नील मणि