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22 August 2026

लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



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वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

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सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


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हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


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आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


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इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


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21 July 2026

कहानी- सुगंधा


सुगंधा एक गृहिणी थी। सुबह से लेकर शाम तक वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उसे अपने लिए समय निकालना तो दूर, दिन, तारीख़ और वार का भी ध्यान नहीं रहता था।

सुबह उसकी दिनचर्या सबसे पहले शुरू होती और रात में सबसे बाद में समाप्त होती। कभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का अलग नाश्ता बनाना होता, कभी सास-ससुर की सेवा करनी होती, तो कभी पति की फरमाइशें पूरी करनी होतीं। इन सबके बीच कब सुबह से शाम हो जाती, उसे स्वयं भी पता नहीं चलता था।





ऐसा नहीं था कि सुगंधा के जीवन में कोई दुख नहीं था। यदि किसी काम में थोड़ी-सी भी देर हो जाती, तो पति की ऊँची आवाज़ सुननी पड़ती। यदि सास-ससुर की किसी अपेक्षा में थोड़ी-सी भी कमी रह जाती, तो उनके उलाहने मिलते। बच्चों की शिकायतें भी समय-समय पर उसके हिस्से में आती ही रहती थीं।

सुगंधा हर संभव प्रयास करती कि उसके कारण पति, सास-ससुर या बच्चों को शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह अपनी क्षमता से बढ़कर सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करती। फिर भी यदि कभी किसी को समझाना पड़ता, तो वह अपने बच्चों को ही समझा देती। उसे लगता था कि शायद यही सबसे आसान रास्ता है।

लेकिन इतना सब करने के बाद भी वह सबको खुश नहीं रख सकी। धीरे-धीरे वह ऐसी गृहिणी बनती जा रही थी, जो दूसरों की खुशियों के लिए तो दिन-रात लगी रहती थी, लेकिन अपनी खुशी का उसे स्वयं भी पता नहीं था। उसका पूरा जीवन पति, बच्चों, सास-ससुर और घर की जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह गया था।

यदि कभी वह अपनी कोई छोटी-सी इच्छा या फरमाइश ज़ाहिर भी कर देती, तो अक्सर उसे यही सुनने को मिलता- "तुझे जाना ही कहाँ है? तुम तो सारा दिन घर पर आराम ही करती हो।"

यह सुनकर वह हर बार मुस्कुरा देती, जबकि वह जानती थी कि जिसे लोग आराम कह रहे हैं, वह वास्तव में बिना रुके चलने वाला एक अंतहीन सफर था। एक दिन अचानक सुगंधा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसमें खड़े होने तक की शक्ति नहीं बची।

डॉक्टर ने उसे कुछ दिनों तक पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी। अब घर की सारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी परिवार पर आ गई। कुछ ही दिनों में घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया। तब सुगंधा के ससुर ने उससे कहा, "कुछ दिन तुम अपने मायके चली जाओ। वहाँ तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल हो जाएगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"

यह सुनकर सुगंधा हैरान रह गई। आज तक जब भी उसने कहीं जाने की बात की थी, उसे यही कहा जाता था- "तुम्हारे बिना इस घर का कोई काम नहीं चल सकता।" लेकिन आज उसके बीमार पड़ते ही उसे मायके जाने की अनुमति भी मिल गई।

कुछ समय मायके में रहकर जब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटी, तो उसने घर का बदला हुआ रूप देखा। घर में एक पूर्णकालिक नौकरानी रख ली गई थी। सास-ससुर अपनी क्षमता के अनुसार अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने लगे थे। बच्चे अपनी चीज़ें अपनी जगह रखने लगे थे और उसके पति भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर नहीं रहते थे।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि नौकरानी घर का काम उतनी लगन, सफाई और व्यवस्थित ढंग से नहीं करती थी, जितनी निष्ठा और बारीकी से सुगंधा किया करती थी। कई काम अधूरे रह जाते, कुछ चीज़ें इधर-उधर पड़ी रहतीं और कई बार उसकी कार्यशैली में लापरवाही भी दिखाई देती। फिर भी घर में कोई उससे शिकायत नहीं करता था।

सुगंधा को याद आया कि जब वह पूरे मन से, बिना किसी शिकायत के, दिन-रात घर के लिए लगी रहती थी, तब भी उसकी छोटी-सी भूल पर उसे सुनना पड़ता था। लेकिन आज, नौकरानी से वही काम पूरी तरह न होने पर भी सभी शांत थे। कारण केवल इतना था कि सबको डर था कि यदि वह भी काम छोड़कर चली गई, तो घर की जिम्मेदारियाँ फिर उनके कंधों पर आ जाएँगी।

उसी क्षण सुगंधा को जीवन का एक गहरा सत्य समझ में आया। आवश्यकता से अधिक दूसरों का काम करते रहने से केवल अपनी परेशानियाँ ही नहीं बढ़तीं, बल्कि हम अनजाने में अपने प्रियजनों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी छीन लेते हैं। सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन सहायता उतनी ही होनी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो। यदि एक ही व्यक्ति हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेगा, तो उसके पास स्वयं के लिए समय और ऊर्जा कभी नहीं बचेगी।

उधर परिवार ने भी एक महत्वपूर्ण सीख प्राप्त की। उन्हें एहसास हुआ कि यदि सुगंधा अकेले ही पूरे घर का भार उठाती रही, तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाएगी। वह केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं वाली एक इंसान भी है। उसका भी अपने जीवन पर उतना ही अधिकार है, जितना घर के किसी और सदस्य का।

उस दिन के बाद परिवार ने घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लीं। बच्चों ने अपने काम स्वयं करने शुरू कर दिए। सास-ससुर ने अपनी क्षमता के अनुसार अपने काम स्वयं करने शुरू किए और उसके पति ने भी घर के कामों में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझा। सुगंधा से भी कहा गया कि अब वह अपने लिए समय निकाले, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे और अपने अधूरे शौक पूरे करे।

सुगंधा ने महसूस किया कि जब पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ केवल एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी जाती हैं, तो वह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से थकने लगता है। लगातार बढ़ता हुआ बोझ उसे तनावग्रस्त
और चिड़चिड़ा बना देता है। लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाते हैं, तो न केवल एक व्यक्ति का भार कम होता है, बल्कि पूरे परिवार का जीवन अधिक संतुलित, सहज और सुखद बन जाता है। जिम्मेदारियों का बँटवारा केवल काम कम नहीं करता, बल्कि रिश्तों में सहयोग, सम्मान और अपनापन भी बढ़ाता है।

घर किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है। और जो परिवार यह समझ जाता है, वहाँ केवल काम ही नहीं बँटते, बल्कि खुशियाँ भी बाँटी जाती हैं।


                                   - कंचन चौहान, बीकानेर



04 January 2026

लघुकथाः तसल्ली


शाम के तकरीबन 7 बज रहे थे। आज़ की पांचवीं पार्सल डिलीवरी कर तेज़ी से वापस स्टोर की ओर लौट रहा था। आमतौर पर शाम के इस वक्त लाल बिल्डिंग चौक और भालोटिया रोड पर भीड़ अपने शबाब पर होती है। लेकिन रोजाना ऐसे माहौल से गुज़रकर बाइक को सलीके से पार करने की हममें दक्षता आ गई है। सभी राइडर्स इस जगह को जल्दी से पार कर जाने पर खुद को विजयी महसूस करते हैं।





मैं भी लाल बिल्डिंग चौक पार कर विजयी मुस्कान के साथ आदित्यपुर-कांड्रा एक्सप्रेस वे पर चढ़ते ही एक उत्तेजना के साथ एक्सीलेटर को कसता चला गया। अभी केडिया चौक पार करने ही वाला था कि अचानक से मेरी नज़र उस छोटे से मासूम पिल्ले पर पड़ी जो डिवाइडर के बीच में खड़ा कभी इस ओर की सड़क तो कभी उस ओर की सड़क पर आधा कूदकर जाता, फिर तेज़ रफ़्तार गाड़ियों का रेला देखकर डर से वापस डिवाइडर पर चढ़ जाता।

मैं अपनी तेज़ रफ़्तार के कारण थोड़ा-सा आगे बढ़ चुका था लेकिन महज़ तीन-चार सेकेंड के भीतर जो मेरे मानस पटल पर कौंधा उसने मुझे बाइक रोकने पर मजबूर कर दिया। मुझे अपने मार्ग गुरू का वो कथन याद आ गया जिसमें कहा गया है कि पातक यानि पाप के तीन स्तर होते हैं। ऐसा काम जो नहीं करना चाहिए वो कर दिया।

उदाहरणार्थ किसी की हत्या करना,हाथ काट देना या चोरी करना आदि पातक की श्रेणी में आते हैं। दूसरे स्तर का पाप है अतिपातक! मतलब ऐसा काम जो करना चाहिए था और नहीं किया वह अतिपातक है। जैसे किसी जरूरतमंद या बेबस इंसान की मदद करनी चाहिए थी और मौके पर मौजूद रहकर भी नहीं किया तो यह अतिपातक है।

तीसरे स्तर का पाप ऐसे कार्य को कहा जाता है जो एक उदाहरण छोड़ जाता है। आने वाले समय में भी उससे लोग प्रेरित होकर उसकी युगों-युगों तक पुनरावृत्ति करते हैं।इसे कहा जाता है महापातक! उदाहरणार्थ रावण ने साधु के वेश में आकर सीता का हरण किया। यदि वह अपने असली रूप में आकर सीता का हरण करता तो यह केवल पातक होता।

लेकिन चूंकि उसने साधु के वेश में सीता का हरण किया तो उसने समाज में एक नया तरीका ईजाद कर दिया अपहरण का कि इस प्रकार वेश बदलकर भी अपहरण किया जा सकता है। जिसकी पुनरावृत्ति अपराधी लोग युगों-युगों तक करते आ रहे हैं।





खैर बाइक रोकने से पहले के करीब तीन-चार सेकेंड में मेरे दिमाग ने अहसास कर लिया था कि मैं क्या कर रहा हूं। उस मासूम से पिल्ले के लिए मेरे कुछ मिनट देना कर्तव्य है जिससे उसकी जान बच सकती है। वरना हो सकता है रोड पर सरपट दौड़ती गाड़ियां क्या पता उतनी संजीदगी न दिखाएं और उसे रौंदते हुए चले जाएं। शाय़द उसे मेरी ज़रूरत है और ऐसे में मैं नहीं रुका तो यह द्वितीय श्रेणी का पाप यानि अतिपातक हो जाएगा। और यूं भी यह मेरी पार्ट टाइम जॉब है, थोड़ा वक्त बर्बाद भी हो गया तो क्या ही हो जाएगा।

मैं बाइक खड़ी कर सीधे डिवाइडर पर जा पहुंचा। एक बार लगा कि पकड़ कर सीधे उसे सर्विस लेन के बाहर छोड़ आऊं। लेकिन वह बिल्कुल भी छोटा नहीं था इसलिए थोड़ा सा डर भी था कि कहीं काट न ले मुझे। मुझे अपनी ओर बढ़ता देख वह फ़िर से कभी सड़क पर तो कभी डिवाइडर पर भागदौड़ करने लगा। क़रीब दस मिनट तक मैं उससे कबड्डी-कबड्डी खेलकर परेशान हो चुका था। इस बीच मुझे देखकर एक फल बेचकर लौट रहे ठेले वाले ने भी अपना ठेला किनारे लगाकर मेरी मदद करने में जुट गया।






अब हम दो लोग मिलकर उसे एक्सप्रेस वे से बाहर ले जाने की कोशिश करने लगे। लेकिन मजाल है कि वो पिल्ला हमारे इरादे को समझ पाए। इस फेर में यह भी डर था कि हमें देखकर भागते हुए सचमुच किसी गाड़ी की चपेट में आ गया तो "रक्षा में हत्या" हो जाएगी।

क़रीब बीस -पच्चीस मिनट की आपाधापी के बाद वह मुख्य सड़क पर ही खड़ी एक कार के नीचे जाकर दुबक गया। परेशान ठेलेवाले ने हताश होकर मुझसे कहा- "जाने दीजिए भैया! इसको इसका काल खींच रहा है, हमलोग बचा नहीं पाएंगे। मुसीबत ये थी कि दोनों ओर आसपास कोई कटिंग भी नहीं थी जिससे वह पिल्ला मुख्य सड़क से सर्विस लेन पर जा सके। यानि उसे मुख्य सड़क पर ही लगभग आधा किलोमीटर ले जाने के बाद ही कटिंग थी। मैं भी कहां हार मानने वाला था।

उसे किसी तरह कार के नीचे से डांटकर बाहर निकाला। फिर ठेलेवाले की मदद से मुख्य सड़क के ही बिल्कुल किनारे-किनारे कैरी करते हुए उसे गम्हारिया प्रखंड कार्यालय के गेट तक ले गया। वहां से उसे तेज़ी से भगाते हुए कार्यालय कैंपस के काफी भीतर तक खदेड़कर आया। पूरे घटनाक्रम में कड़ाके की ठंड के बावजूद पसीना छूट गया था। लेकिन जब उसे खदेड़कर पैदल अपनी बाइक की ओर लौटने लगा तो हवाओं के साथ ठंड पड़ते पसीने के साथ ही दिल को भी ठंडक पहुंच रही थी। मन में एक तसल्ली थी कि उस पिल्ले की रक्षा का जो अवसर ईश्वर ने प्रदान किया उसे मैंने पूरा किया।






हमारे साथ दैनिक जीवन में न जाने कितने ही ऐसे मौके रोज़ाना आते हैं। कई बार हम उसे हल्के में लेते हुए नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आग्रह है सभी से कि कभी भी ऐसे मौकों को नज़रंदाज़ न करें। जहां आप सक्षम हों और संभव हो तो थोड़ा सा वक्त निकालकर जरूरतमंदों की मदद ज़रूर करें चाहे वो इंसान हों या पशु-पक्षी। दावा करता हूं कि इससे कोई प्रत्यक्ष लाभ तो नहीं होगा लेकिन मन को एक अलौकिक तसल्ली मिलेगी।


- कुणाल


25 September 2025

व्यंगात्मक लघुकथा- काला कुत्ता



आज कल लोगो का शौक अजब गज़ब होते जा रहा है। गाय पालने वाले घरों में कुत्ते पाले जा रहे है। बड़े शान से उसका दाम भी बताया जा रहा है, 12000 का हैं, 14000 का है। अपने बिहार की राजधानी पटना से लिए, मैंने भी ऐसे ही उनकी थोड़ी प्रशंसा कर दी। मतलब भाई जी को फूला दिया। कुत्ता तो कुत्ता है भाई जी एकदम कुचु कुचु टहकार करिया। बहुत स्मार्ट लुक लग रहा है। इसका कोई जवाब नहीं है।





इतना सुनते ही पूछिए मत फिर क्या था। अंग्रेजी और हिंदी यानी हिंगलिश में उसका खाना पखाना तक चर्चा का विषय बना दिया और लगा हमको पकाने, फिर क्या मैं भी भोजपुरीया हिंदी में जम्हाई लेते लेते कुछ देर लपेटता रहा। मन ही मन सोचता रहा, बताइए भला दिन भर जो नशा में चूर रहता हो।

माँ बाप का एकलौता बारिश हो। खाने पीने में शुद्ध से ऊपर शाकाहारी हो। घर का खर्चा की बात ही नहीं करनी मुझे। पढ़ने-लिखने में कलक्टर को भी शर्मिंदा करता हो। ओ आज कुत्ते की डाइट पर लेक्चर दे रहा हो, तो मन का प्रसन्न होना लाजमी ही होगा।

ओ भी तब जब भाई जी के मुखारबिन्द से कुत्ते जैसे जानवर को डाइट मे रोज केला, सेब, दूध-भात और पियोर शाकाहारी खिलाने की बात सुननी पड़े। ध्यान दीजियेगा रोज मतलब प्रतिदिन, तब-जब कृषि की पढ़ाई के समय
एनिमल हस्बेंडरी वाले सर से बातों बातों में कुत्ते की भी चर्चा सुन चूका हूँ।
कि कुत्ता जानवर मांसाहारी होता है, के आलावा गप गप अंडा मास खाते कुत्ते, ओ करिया हो या सफ़ेद या चितकबरा कुत्ता मतलब कुत्ता। जिसको देखता भी हूँ आप लोग भी देखें ही होंगे। ये आशा नहीं पूर्ण विश्वास है जी। हसीं और गुस्सा दोनों आ रहा था।






मग़र कर भी कुछ नहीं सकता था। इतने तारीफ पे तारीफ सुनने के बाद ओ बेचारा काला कुत्ता मेरे गली में छेरते हुए यानी पतला पोट्टी करते हुए अपने आवास कि तरफ अपने मालिक के साथ प्रस्थान करने लगा। मैं भी चैन की सांस लेने ही वाला था कि ध्यान आया कि कांड कर गया कुत्ता, मेरे ही गली में मेरे दरवाज़े के पास ही ओ काला कुत्ता लिक्विड फॉर्म में हग चूका है।

मैं गलियों को गालियों के साथ धोने कि सोचने लगा ताकि कल सुबह किसी अपनों के पैरो का श्रृंगार न हो जाए और फिर मैं धोने लगा। अब बस जा रहा हूँ स्न्नान करने गाय पालने वाले कुत्ते पर आ जाए, तो आप भी अचंभित ना होइएगा।

आपकी गली में आपके दरवाज़े पर भी ये सॉलिड या लिक्विड फॉर्म में सुबह-सुबह मिल सकता है। बी अलर्ट क्योंकि मेरा प्रैक्टिकल अनुभव है जी धोने का धोने का हा.. हा.. हा.. हा..


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु' / बक्सर, बिहार



09 September 2025

लघुकथा- सबूत





"कैसी बात कर रही हैं बहन? सारे सबूत आपकी आंखों के सामने हैं। पहले आपके पति ने अपनी सेक्रेटरी की हत्या की। उसके बाद खुद आत्महत्या कर ली थी।" फोरेंसिक टीम के इंचार्ज ने थोड़ा तेज आवाज में कहा।

"बिलकुल नहीं साहब। आपकी जांच गलत दिशा में जा रही है। मेरे फति हनीट्रेप के जाल में नहीं फंसे, इसलिए षडयंत्र रच कर उन्हें मार दिया गया है।" विभूति ने रोते हुए कहा। 

"अरे बहन, रिवाल्वर पर उनके हाथ के फिंगर प्रिंट्स मिले हैं। इट्स ओपन एंड शट केस।"

"ध्यान से देखिए साहब, मैं भी वही कह रही हूं। रिपोर्ट में दाहिने हाथ का उल्वेख है। पर मेरे पति तो बाएं हाथ से सारे काम करते थे।"

यह सुन कर सभी मीडिया वाले फोरेंसिक एक्सपर्ट की ओर भागे।


                                          - वीरेंद्र बहादुर सिंह 



29 August 2025

अफ़साना और पुराने रिश्ते!


नंदू बड़ी खुशी और हल्की घबराहट के साथ शहर पहुँचा था। उसका बेटा अब शादी के बंधन में बंधने वाला था। दिल में उसने ठान रखा था कि जिन लोगों ने जीवन में उसे राह दिखाई, उनकी चौखट पर जाकर निमंत्रण देना उसका फ़र्ज़ है। सबसे पहले उसे याद आए अपने बड़े मासाब, वही, जिनकी सेवा उसने बचपन में मन से की थी।स्कूल में जब बाकी बच्चे खेलों में मस्त रहते, तब नंदू कभी तख़्ती धोता, कभी ब्लैकबोर्ड चमकाता, तो कभी कापी-कागज़ सजाता। डाँट भी पड़ी, थप्पड़ भी खाए, मगर नंदू के लिए मासाब की हर डाँट ममता जैसी ही थी।






और आज... बरसों बाद जब शादी का कार्ड लेकर उनके दरवाज़े पर पहुँचा तो शहर की भीड़, गर्मी और अजनबी गलियों ने उसे पसीने में नहला दिया। घर ढूँढने में मुश्किल हुई, पर आख़िरकार मासाब का पुराना मकान मिल ही गया।दरवाज़ा खोला तो सामने मासाब थे।

"सलाम मासाब! मैं नंदू... आपका पुराना शागिर्द।"पहले तो सहसा पहचान न पाए, फिर आँखों में चमक आ गई, "अरे, नंदू? तू आज भी याद करता है मुझे?"

नंदू ने कांपते हाथों से शादी का कार्ड उनके आगे रखा। "मासाब, मेरे लिए सम्मान ये होगा कि आप ज़रूर आइए। मैं चाहता हूँ मेरा बेटा जाने कि उसके बाप ने अपने गुरू को हमेशा दिल में रखा।"मासाब ने कार्ड लिया भी, मगर उनकी आँखों में कोई और सवाल तैर रहे थे। सोचने लगे, "कहीं ये ग़रीब मुझसे पैसे-वगैरह मांगने तो नहीं आया?"

चेहरे पर मुस्कान थी मगर जुबान पर दूसरा ही रस। उन्होंने बात बदलते हुए कहा,"थक गया होगा, आ चाय पी ले।"चाय आ गई, पर भोजन का ज़िक्र तक न हुआ। बच्चों को पुकार कर बुलाया भी नहीं। नंदू ने चुपचाप चाय पी और भारी मन से उठ गया। दिल में सोचता रहा,"शायद बड़े लोग ऐसे ही होते हैं। हम तो दिल से रिश्ते निभाते हैं, वे बस रस्म निभा देते हैं।"उसे याद आया, कैसे कभी मासाब के बेटा-बेटियों को उसने अपनी गोद में उठाकर घुमाया था, उनके लिए मिठाइयाँ लाया था, मेले से खिलौने खरीद कर दिए थे। मगर आज? कोई भी दरवाज़े पर आकर उसे पहचानने तक न निकला।


गाँव लौटते समय उसके दिल में कसक तो थी, मगर उसने खुद को समझाया, "मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया। बुलाना मेरा काम था, आना-न-आना अब उनकी मर्ज़ी।" शादी भव्य रूप से संपन्न हुई। नंदू ने जी-जान से अहसान चुकाया, मेहमानों को इज़्ज़त दी। केवल मासाब न आए। उनका घर वैसा ही बंद रहा, और उसी बंद घर में कहीं दबा रहा नंदू का शादी का कार्ड,खुला तक नहीं। कुछ दिन बाद शुक्ला जी, जो उसी गाँव में अध्यापक थे, अचानक मासाब से मिलने पहुँचे।

मुलाक़ात पर मासाब ने पूछा- "अरे भई शुक्ला जी, कहाँ से आ रहे हो ?"

शुक्ला जी हँसते हुए बोले- "नंदू के लड़के की शादी से आ रहा हूँ साहब... क्या शानदार शादी की है! पूरे गाँव ने देखा, बड़ा रुतबा हुआ उसका।"मासाब सुनते ही नि:शब्द रह गए। भीतर कहीं एक दर्द-सा घर कर गया। उस कार्ड को जिस पर उन्होंने नज़र तक न डाली थी, उसी में वो खुशी लिखी थी जिसे सबने देखा, बस उन्होंने नहीं।शुक्ला जी चले गए। कमरे में अकेले मासाब की निगाह मेज़ पर पड़ी। वहाँ धूल तले दबा वही कार्ड रखा था। काँपते हाथों से उठाकर खोल ही लिया। और जब पढ़ा "डॉ. आनंद (एम.बी.बी.एस.)"

नंदू के बेटे का नाम देख उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सालों तक जिन्हें उन्होंने ग़रीब समझा, उसी नंदू ने अपने बेटे को डॉक्टर बना दिया।और विडंबना देखिये, खुद मासाब अपने ही बेटे को अच्छी तालीम भी न दिलवा पाए थे।कार्ड उनके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा, मगर दिल पर जो बोझ गिरा, वो ज़िन्दगी भर न उठ सका।मासाब की आँखें नम हो गईं।

उन्होंने सोचा, "मैंने पूरी उम्र किताबें पढ़ाईं, मगर आज शागिर्द ने मुझे सबसे बड़ा सबक सिखाया ,कि मेहनत और सच्चा दिल ही असली गुरू हैं।"उस दिन मासाब की आँखें धुँधली थीं। उनका दिल पछतावे से भरा था। और उसी कमरे में, धूल-जमे कैलेंडर और गिरे हुए कार्ड के बीच ,समय की सबसे सख़्त सच्चाई दर्ज़ थी, कभी-कभी शिष्य वही हासिल कर लेता है, जो गुरू नहीं कर पाता।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह




08 August 2025

राखी का त्यौहार

मेरा बचपन बहुत ही शानदार बीता एक बड़े भाई और एक छोटा और दो बड़ी बहनों की छोटी बहन का दर्ज़ा मिला था। बचपन से ही बहुत होशियार और तेज थी सबकी चहेती भी थी।

          जब भी कोई त्यौहार आता बहुत ही उत्साहित हो जाती थी खासकर जब भी राखी का त्यौहार आता भाई को राखियां भेज देती तब चिट्ठी पत्री का दौर चलता था।

         भाई आर्मी में दूर-दूर पोस्टिंग होने के बाद भी हम बहनों को पैसे भेजने में कभी देरी नहीं करता था।

       हमारे पैसे टाइम पर आ जाते उस जमाने में 20 रुपए की बहुत ज्यादा वैल्यू थी तो भाई हम तीन बहनों और  ताऊ जी चाचा जी की बेटियों को भी पैसे भेजना नहीं भूलता था।

           हम लोग राखी के पैसे पाकर बहुत खुश होते थे और भाई की लंबी दुआ की कामनाएं करते थे क्योंकि हम अपने भाइयों से बहुत प्यार करते है आज भी।

प्रतिकात्मक छायाचित्र



            बचपन के वो दिन भुलाए नहीं भूलते है क्योंकि हमारे लिए हर दिन किसी त्यौहार से कम नहीं होते थे। आज भाई बहन सब अपने अपने परिवार के साथ बहुत व्यस्त हो गए है।

       मैं सबसे छोटी होने के बहुत फायदे में रहती हूं क्योंकि बहमें भी मुझे किसी बच्चे से कम नहीं समझती और आज भी वह मुझे पैसे आदि देती है बिल्कुल अपने बच्चों की तरह ही मानती हैं।

     आज भी राखी का त्यौहार आता है और भाइयों के लिए हमेशा ही ईश्वर से प्रार्थना करती हूं भाई कुछ भी दे या न दें प्रार्थना हमेशा करती रहूंगी।

            राखी हमारे भारत वर्ष का खाश त्यौहार है जो वर्षों से निरंतर चल रहा है और हमेशा निरंतर चलता रहेगा। भाई और बहनों का प्रेम का प्रतीक के रूप में।


                              - सुमन डोभाल काला, देहरादून, उत्तराखंड



रक्षाबंधन: बचपन की रेशमी यादें

रक्षाबंधन का नाम लेते ही बचपन की वो सुनहरी तस्वीरें आँखों में तैरने लगती हैं। मैं घर की सबसे छोटी थी– दो बड़ी बहनों में। भाईयो के नाम पर चाचा,ताऊ के बेटे थे, जो दूर रहते थे। त्योहार आते ही मन में उत्साह की लहर दौड़ जाती।



प्रतिकात्मक छायाचित्र




राखी से पहले ही भाईयों के लिए सुंदर सी राखी अपने छोटे - छोटे हाथों से बनाती और टीके के समान के साथ चिट्ठी भेजती, और दूर  रहने वाले भाई हर साल समय पर मनीऑर्डर भेज देते। उस समय के 50 रुपए भी ख़ुशियों का सागर लगते थे। जो भाईयों ने भी अपने पिताजी से लेकर दिए होते थे।

हम बहनें उन पैसों से चूड़ियाँ, रिबन और मिठाइयाँ खरीदकर भाई की लंबी उम्र की कामना करती थीं। आज सब अपने परिवारों में व्यस्त हैं, फिर भी राखी आते ही दिल वही बचपन ढूंढ़ता है। अब भी सभी मुझे बच्चों की तरह दुलारते हैं, कुछ न कुछ देती हैं।

राखी सिर्फ़ एक धागा नहीं, बल्कि उस रिश्ते का प्रतीक है, जो जीवन भर बिना शर्त प्रेम से बंधा रहता है।


                                      -  डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति' 





रक्षाबंधनः मेरा बचपन

मेरा बचपन गांव में गुज़रा है, अतः वह मोहक यादें, वह निश्छलता, वह चंचलता,वह स्वतंत्रता, शहरों में कहां।

आज भी उन दिनों की सुनहरी यादें दिलो दिमाग को ताजा तरीन कर देती है।
उन दिनों न पढाई का भारी बोझ था न ही बस्तों का, हां बड़े बड़े तख्त नुमा स्लेट होते थे जिसमें कोयला लगाकर चमकदार करना भी कोई पर्व से कम न था, मेरे पिताजी स्टेशन मास्टर थे।


इसलिए उनका तबादला रुरल एरिया या यों कहिए गांव में होता रहता था जिसका नाम कौवापुर, पचपेड़वा, तुलसी पुर, भवानी पुर आदि होते थे, शुरूआत की पढ़ाई मेरा गांव के स्कूलों में ही हुआ था। 

दिन भर धमा चौकड़ी करना, बागों में घूमना, तालाबों से कमल के फूल तोड़ कर उसका माला बनाकर गले में पहनना, छुपा छुपी, गोटी, कबड्डी,आदि खेल थे उस समय के, साथ ही साथ गुड़िया खेलना, गुड़िया की शादी रचाना,घर से खटाई चुरा कर लाना सखियों एवं दोस्तों के साथ मिलकर खाना आदि बातें क्या भूलें से भूलती है ?


प्रतिकात्मक छायाचित्र



मैं मां-बाप की एकलौती लड़की थी, अतः रक्षा बंधन का त्योहार सब मेरे यहां आकर मनाते थे,हमलोग मिलकर रेशमी धागों से खुद ही राखी बनाते थे, मिठाई वगैरा की दुकान तो होती नहीं थी अतः घर पर ही मालपूए, शक्कर पारा आदि बनाया जाता था। मेरी ही मां क्यों सभी बच्चों की मां इस काम में हमलोगों की हाथ बंटाती थी।

मुझे यह अनुभव ही नहीं होता था कि मेरा कोई भाई नहीं है गांव के सभी लड़के भाई एवं गांव के सभी लड़कियां एक दूसरे की बहन भाई बन जाती थी। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने एक कविता लिखी थी जो आज साझा करना चाह रही हूं।

रक्त संबंध नहीं है फिर भी 
हार्दिक संबध पावन है।

इस संबंध में बंधा हुआ,
जग का सारा जन जीवन हैं।

मै कैसे कह दूं सखी,
कुछ लोग यहां अनजाने है।

मुझे तो लगते सभी यहां 
जैसे जाने पहचाने हैं।


केवल रक्षा बंधन ही क्यों हर त्यौहार सादगी से पर बड़े आत्मियता से मिलकर हम लोग मनाते थे।

गांव के पास थोड़ी दूरी पर जंगल भी था हम शैतान बच्चे कहां मानने वाले थे चल देते थे कभी कभी हम बच्चों की टोली,जंगल जलेबी खाने,केवांच तोड़ने, शहतूत खाने आदि क्या क्या शायद आज की पीढ़ी इन चीजों को जानती भी न होगी।

पांचवीं कक्षा तक मै गांव में ही रही फिर शहर आ गयी पढ़ने पर आज भी वह बचपन का दिन भुला नहीं हूं।

गर्मी की छुट्टियों में मै केवल गांव ही जाती थी। एमए करने के बाद मै गांव में अन्य बच्चों को पढाना, सिलाई कढ़ाई सिखाना, आदि का काम करती थी,मन को संतुष्टि मिलती थी।

लसोढे का अचार मुझे बहुत पसंद है अतः जब भी गांव जाती ले आती थी।अंत में मै यह कहना चाहुंगी कि यदि जीवन का वास्तविक आनंद लेना हो तो गांव से बेहतर कुछ नहीं।


                                          - रत्ना बापुली, लखनऊ, उत्तरप्रदेश



08 July 2025

कहानी- हँसी की कीमत

राजू वर्मा का जीवन उन हजारों करोड़ों भारतीयों की तरह था, जिनका नाम किसी सरकारी दस्तावेज़ में भले हो, पर जिनकी पहचान दुनिया में नहीं होती। वह एक निजी कंपनी में चपरासी था। काम छोटा था, पर मन में बड़ा आदरभाव लिए चलता। 



एक तरह से वह पूरे दफ्तर की धुरी था- सबसे पहले पहुँचता, चाय बनाता, फाइलें पहुँचाता, और बॉस की डाँट भी चुपचाप पी जाता। उसकी साइकिल की टोकरी में सब्जियों से ज़्यादा उसकी आशाएँ लटकती थीं- बच्चों की फीस, पत्नी की दवाई, और कभी-कभार एक मिठाई की पुड़िया।

जीवन सरल था, पर सधा हुआ था- जैसे पुराने समय की दोपहरी, जिसमें धूप तो होती है, पर झुलसती नहीं।

एक दिन, कंपनी से एक पत्र आया- सादी भाषा में एक भयानक निर्णय लिखा था- “हमें खेद है...” और बस। दफ्तर बंद हो गया था। ज़िंदगी की गाड़ी, जो अब तक कच्ची सड़कों से चलती हुई आ रही थी, एक गड्ढे में गिर पड़ी।

राजू कई दिनों तक अवाक रहा। नौकरी ढूँढने निकला, पर कहीं से जवाब न मिला। कहीं कहा गया- "काम नहीं है", कहीं- "आपकी उम्र अब ऐसी नहीं रही", और कहीं तो यह भी- "अब तुम्हारे जैसे लोगों की ज़रूरत नहीं।"

छह महीने बीत गए। बच्चों की हँसी कम होने लगी, और घर में चुप्पियाँ बढ़ गईं। राशन के डिब्बे खाली होते गए, और दिल में चिंता भरने लगी। 

मकान मालिक ने एक रात दरवाज़े पर दस्तक दी- वही दस्तक जो सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं, आत्मा पर होती है- "कल तक किराया नहीं दिया तो घर खाली कर दो।"

उस रात सीमा ने रोटी परोसी और एक सवाल भी- “हम बच्चों को क्या जवाब देंगे, उन्हें कल कहाँ लेकर जाएंगे?”

राजू ने जवाब नहीं दिया। उसने रोटी का एक टुकड़ा पानी में डुबोकर निगला- जैसे अपनी आत्मा को निगल रहा हो।

सुबह होते-होते, वह कुछ और हो गया था। न चेहरा बदला था, न शरीर, पर आँखों में अब एक औरत की तरह लाचारी थी- वह लाचारी, जो आँसू नहीं बहाती, पर दिल में समंदर रखती है।




उसने बाज़ार से एक जोकर की नकली नाक, सस्ता विग, और कुछ रंग खरीदे। पुराने कपड़ों को काट-पीटकर एक भड़कीला पहनावा बनाया। आईने में खुद को देखा, तो खुद पर हँस पड़ा। पर यह हँसी बाहर की थी, भीतर तो वह रो पड़ा।

अब वह पुरानी दिल्ली की गलियों में जोकर बनकर घूमता था- हाथ में तख़्ती- “जोकर के साथ सेल्फी- सिर्फ 10 रुपये।”

हँसी अब उसकी रोज़ी थी। हर मुस्कान के पीछे आँसुओं का समंदर छुपा था।

लोग उसकी ओर देखकर हँसते, बच्चे ताली बजाते, कोई वीडियो बनाता।

एक बच्चा बोला, “माँ! जोकर रो क्यों रहा है?”
माँ ने कहा, “बेटा, ये बस एक्टिंग कर रहा है।”

कौन समझे कि यह अभिनय नहीं था, यह एक पिता का आत्मबलिदान था।

राजू घर आने से पहले अपना रंग मिटा देता। बच्चे पूछते, “पापा, आज भी मीटिंग थी क्या?”
वह मुस्कुरा देता। सीमा कुछ नहीं कहती, पर उसकी आँखें बहुत कुछ पूछतीं।

एक दिन गुड़िया ने अपनी नोटबुक में जोकर की तस्वीर बनाई थी- हाथ में दिल था और नीचे लिखा था- “मेरा हीरो”

राजू ने वह पन्ना देखा और फूट-फूटकर रो पड़ा।

एक दिन उसका बेटा आरव बोला, “पापा, टीचर ने कहा कि जो सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है, वो सबसे बहादुर होता है। मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूँ।”

राजू ने कहा, “बनेगा बेटा, मुझसे बड़ा।”

आरव ने धीरे से कहा, “पापा, कल मैंने आपको देखा था। आप जोकर थे… लेकिन मेरे लिए, आप सबसे महान इंसान हो। आपने अपनी इज़्ज़त, अपनी खुशी, अपना स्वाभिमान सब कुछ हमारे लिए छोड़ दिया। लोग आपको 10 रुपये का जोकर समझते हैं, पर मेरे लिए आप सबसे कीमती इंसान हो।”

उस दिन राजू पहली बार रंगों के बिना मुस्कुराया—एक सच्ची, आत्मा से निकली मुस्कान। उसने बेटे को गले से लगाया और कहा, “तेरा पिता जोकर नहीं, एक योद्धा है- जो बच्चों के भविष्य की लड़ाई मैदान में उतरकर लड़ता है।”



                                                 - विकास बिश्नोई




स्नेहा की मेडिटेशन डायरी से...

जीवन को भौतिक अस्तित्व में लाने के लिए दो बिंदु या दो सिरों का होना अनिवार्य है। जब ये दो सिरे नही तो केवल अथाह अनन्त शून्य होता है, जैसे अंतरिक्ष।





आत्मा की जीवन को महसूस करने की वासना।
आत्मा ने देह को वस्त्र की तरह ओढ़ा।
इंद्रियों के साथ देह बनी उपकरण एवं माध्यम।
शुरू हुई एक यात्रा।


इन दो सिरों के बहुत से नाम हो सकते हैं।
अच्छा, बुरा/अंधेरा, उजाला/सुख, दुख/झूठा, सच्चा (कल्पना,यथार्थ)/जन्म, मृत्यु/सूक्ष्म, विकराल आदि आदि.. याद रहे ये सब मनुष्य द्वारा दिए गए "नाम" भर हैं भाषा के शब्द स्वर।

आत्मा का निजी अनुभव ही आभास है, कामना है, वासना है और ध्येय।
निजी अनुभव को भी जिस स्थिति में मनुष्य है, उस सिरे के आसपास का अनुपात अर्थात बुरा, कम बुरा और अच्छा, ज़्यादा अच्छा इत्यादि ही तय करेगा।

इन्हीं दो सिरों के बीच की यात्रा 'जीवन' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच सारे 'अनुभव आभास' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच कहीं 'अवसर और चुनाव' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच हरपल झूलता, जूझता मनुष्य है।

देह रूपी मनुष्य के पास इन सिरों के आसपास के अनुपात मात्र हैं, जिसमें से यथा शक्ति, बुद्धि, सद्बुद्धि, वृत्ति और परिस्थिति अनुरूप वह चुनाव करता है। चुनाव करना उसकी नियति है, क्योंकि चुनाव न करना भी जड़वत खड़े हो रुक जाना है। यात्रा घड़ी के कांटों सी चलती रहती है मनुष्य चले या न चले।

इन दो सिरों के बीच हम तिनके मात्र भाग कर, नाच कर, रो कर, हँस कर, दुखी होकर या हार मान कर जैसे भी चलना चाहे, चल लें। सृष्टि को कोई फ़र्क नही पड़ता।

इतना बड़ा ब्रह्मांड और हम तिनका मात्र। तिनका यदि अहाँकारी हो स्वयं को चट्टान समझ यदि विरोध में उतरे भी तो, उस चट्टान रूपी अहँकार से न केवल स्वयं को भारी करेगा, बल्कि स्वयं को आहत ही करेगा। अनवरत यात्रा में किसी सिरे के पास वो चट्टान बना पड़ा रहेगा और समय समाप्ति पर बन जाएगा धूल का कण।

तो धूल के कण के समान हल्के हो उड़ना और हवा की गति में, उसके वेग में स्वयं को समर्पित कर उड़ते रहना कहीं ज़्यादा शांति दायक व आंनद दायक हो सकता है।

या फिर करना सीख ले उस भीतर बैठे आत्म से वार्तालाप। जो लाया है तुम्हें अपनी किसी लालसा, मंशा और कार्मिक फल के अंतर्गत।

और अच्छे बुरे जो केवल शब्द और अनुपात हैं, उसके फेर में पड़ने से बचना ही मुक्ति है। मैं हूँ इस यात्रा में क्या केवल एक आकस्मिक राही या सुनियोजित राही ?

मौन में बैठ कभी जाँचना और कभी संवाद करना आत्मा से...



- स्नेहा देव


30 April 2025

लघु कथा- घूंघट


मैं टैक्सी में बैठी अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। दूर सड़क के किनारे एक महिला अपने एक हाथ में दूध की बरनी लटकाए हुए और दूसरे हाथ से बार - बार अपने घूंघट को खींच रही थी। 





शायद सड़क पार करने का इंतजार कर रही थी। देखने में वह महिला अधेड़ उम्र से थोड़ा ज्यादा ही लग रही थी। उसे देख मुझे ख्यालल आया कि घूंघट की ओट तो छोड़ो, शायद इस उम्र में कुदरती आंखों से भी कम दिखना आम बात होगी। 

उसी उधेड़बुन में टैक्सी उसे पीछे छोड़ आगे निकल गयी और मैं अपने काम में व्यस्त हो गई। अगले दिन अखबार में एक कोने में छपी खबर ने मुझे झकझोर दिया। 

ख़बर थी, "तेज रफ़्तार ट्रक ने अधेड़ महिला को कुचला, अज्ञात चालक के खिलाफ मामला दर्ज।" मुझे बार-बार सड़क किनारे घूंघट में खड़ी महिला का ध्यान आ रहा था।


                                                        - कंचन चौहान, बीकानेर




27 April 2025

मैं, एक खिलौना नहीं


मैं एक छोटा-सा सफेद खरगोश हूँ- नरम रेशमी बालों वाला, मासूम आँखों से दुनिया को देखने वाला। मेरा नाम कभी किसी ने नहीं रखा, और शायद रखा भी होता तो कोई पुकारता नहीं। मेरी दुनिया एक टोकरी में सिमटी हुई है, जो अक्सर एक औरत के हाथ में होती है।





ये कहानी है मनाली की, उस बर्फीले पहाड़ की जहाँ हर चीज़ पर एक सफेदी की चादर सी बिछी होती है। लोग आते हैं वहाँ सैर-सपाटे को, तस्वीरें खिंचवाते हैं, हँसते हैं, और फिर चले जाते हैं। और मैं... मैं वहीं का वहीं रह जाता हूँ- उस औरत की हथेली में, जिसने मुझे एक तमाशा बना दिया है।

सुबह से शाम तक वो औरत मुझे अपनी गोद में लेकर खड़ी रहती है और कहती है, 

"आ जाओ जी, सिर्फ़ 20 रुपए में फोटो खिंचवाओ प्यारे खरगोश के साथ!"

लोग हँसते हैं, बच्चे चिल्लाते हैं- "मम्मी खरगोश! मम्मी देखो, कितना क्यूट है!"  

कोई मेरी नाक को छूता है, कोई मेरे कान खींचता है। पर किसी ने कभी मेरी आँखों में झाँककर नहीं देखा... जहाँ ठंडी हवा से छलकते आँसू होते हैं।

हर कोई स्वेटर, जैकेट, दस्ताने और टोपी में लिपटा होता है। और मैं? बस एक नंगी जान हूँ, जिसे कोई महसूस ही नहीं करता। मेरे पाँव बर्फ पर ठिठुरते हैं, मेरा दिल हर छूअन से कांपता है, पर मैं चुप हूँ... क्योंकि मैं एक "खिलौना" हूँ ना!

शाम ढलती है, सूरज हिमालय की चोटियों में छिप जाता है। मैं सोचता हूँ- अब शायद घर जाकर चैन मिलेगा, गरमी मिलेगी। पर उस औरत ने मुझे न प्यार से उठाया, न कोई कंबल दिया। बस उसी पुराने लोहे के पिंजरे में डाल दिया जहाँ मैं रातें काटता हूँ।

मैं कोने में दुबक जाता हूँ। बाहर का शोर बंद हो जाता है, पर मेरे दिल में एक सन्नाटा गूंजता है। कभी सोचा है, जब खिलौना भी साँस लेता हो तो कैसा लगता है उसे खिलौना कहे जाना ?

काश... कोई मुझे सिर्फ़ 20 रुपए का न समझता।  

काश... कोई मेरी ठंडी साँसें सुन पाता।  

काश... मैं सिर्फ़ एक तस्वीर का हिस्सा नहीं, किसी के प्यार का हकदार होता।

मैं भी जीना चाहता हूँ... खुले मैदानों में दौड़ना, हरी घास में लोटना, किसी की गोद में चैन से सोना- बिना कैमरे, बिना पैसों के... बस दिल से।

मैं एक खिलौना नहीं हूँ। मैं भी महसूस करता हूँ क्योंकि

मैं भी एक ज़िंदा दिल हूँ।


                                                       - विकास बिश्नोई