साहित्य चक्र
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08 July 2025

कहानी- हँसी की कीमत

राजू वर्मा का जीवन उन हजारों करोड़ों भारतीयों की तरह था, जिनका नाम किसी सरकारी दस्तावेज़ में भले हो, पर जिनकी पहचान दुनिया में नहीं होती। वह एक निजी कंपनी में चपरासी था। काम छोटा था, पर मन में बड़ा आदरभाव लिए चलता। 



एक तरह से वह पूरे दफ्तर की धुरी था- सबसे पहले पहुँचता, चाय बनाता, फाइलें पहुँचाता, और बॉस की डाँट भी चुपचाप पी जाता। उसकी साइकिल की टोकरी में सब्जियों से ज़्यादा उसकी आशाएँ लटकती थीं- बच्चों की फीस, पत्नी की दवाई, और कभी-कभार एक मिठाई की पुड़िया।

जीवन सरल था, पर सधा हुआ था- जैसे पुराने समय की दोपहरी, जिसमें धूप तो होती है, पर झुलसती नहीं।

एक दिन, कंपनी से एक पत्र आया- सादी भाषा में एक भयानक निर्णय लिखा था- “हमें खेद है...” और बस। दफ्तर बंद हो गया था। ज़िंदगी की गाड़ी, जो अब तक कच्ची सड़कों से चलती हुई आ रही थी, एक गड्ढे में गिर पड़ी।

राजू कई दिनों तक अवाक रहा। नौकरी ढूँढने निकला, पर कहीं से जवाब न मिला। कहीं कहा गया- "काम नहीं है", कहीं- "आपकी उम्र अब ऐसी नहीं रही", और कहीं तो यह भी- "अब तुम्हारे जैसे लोगों की ज़रूरत नहीं।"

छह महीने बीत गए। बच्चों की हँसी कम होने लगी, और घर में चुप्पियाँ बढ़ गईं। राशन के डिब्बे खाली होते गए, और दिल में चिंता भरने लगी। 

मकान मालिक ने एक रात दरवाज़े पर दस्तक दी- वही दस्तक जो सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं, आत्मा पर होती है- "कल तक किराया नहीं दिया तो घर खाली कर दो।"

उस रात सीमा ने रोटी परोसी और एक सवाल भी- “हम बच्चों को क्या जवाब देंगे, उन्हें कल कहाँ लेकर जाएंगे?”

राजू ने जवाब नहीं दिया। उसने रोटी का एक टुकड़ा पानी में डुबोकर निगला- जैसे अपनी आत्मा को निगल रहा हो।

सुबह होते-होते, वह कुछ और हो गया था। न चेहरा बदला था, न शरीर, पर आँखों में अब एक औरत की तरह लाचारी थी- वह लाचारी, जो आँसू नहीं बहाती, पर दिल में समंदर रखती है।




उसने बाज़ार से एक जोकर की नकली नाक, सस्ता विग, और कुछ रंग खरीदे। पुराने कपड़ों को काट-पीटकर एक भड़कीला पहनावा बनाया। आईने में खुद को देखा, तो खुद पर हँस पड़ा। पर यह हँसी बाहर की थी, भीतर तो वह रो पड़ा।

अब वह पुरानी दिल्ली की गलियों में जोकर बनकर घूमता था- हाथ में तख़्ती- “जोकर के साथ सेल्फी- सिर्फ 10 रुपये।”

हँसी अब उसकी रोज़ी थी। हर मुस्कान के पीछे आँसुओं का समंदर छुपा था।

लोग उसकी ओर देखकर हँसते, बच्चे ताली बजाते, कोई वीडियो बनाता।

एक बच्चा बोला, “माँ! जोकर रो क्यों रहा है?”
माँ ने कहा, “बेटा, ये बस एक्टिंग कर रहा है।”

कौन समझे कि यह अभिनय नहीं था, यह एक पिता का आत्मबलिदान था।

राजू घर आने से पहले अपना रंग मिटा देता। बच्चे पूछते, “पापा, आज भी मीटिंग थी क्या?”
वह मुस्कुरा देता। सीमा कुछ नहीं कहती, पर उसकी आँखें बहुत कुछ पूछतीं।

एक दिन गुड़िया ने अपनी नोटबुक में जोकर की तस्वीर बनाई थी- हाथ में दिल था और नीचे लिखा था- “मेरा हीरो”

राजू ने वह पन्ना देखा और फूट-फूटकर रो पड़ा।

एक दिन उसका बेटा आरव बोला, “पापा, टीचर ने कहा कि जो सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है, वो सबसे बहादुर होता है। मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूँ।”

राजू ने कहा, “बनेगा बेटा, मुझसे बड़ा।”

आरव ने धीरे से कहा, “पापा, कल मैंने आपको देखा था। आप जोकर थे… लेकिन मेरे लिए, आप सबसे महान इंसान हो। आपने अपनी इज़्ज़त, अपनी खुशी, अपना स्वाभिमान सब कुछ हमारे लिए छोड़ दिया। लोग आपको 10 रुपये का जोकर समझते हैं, पर मेरे लिए आप सबसे कीमती इंसान हो।”

उस दिन राजू पहली बार रंगों के बिना मुस्कुराया—एक सच्ची, आत्मा से निकली मुस्कान। उसने बेटे को गले से लगाया और कहा, “तेरा पिता जोकर नहीं, एक योद्धा है- जो बच्चों के भविष्य की लड़ाई मैदान में उतरकर लड़ता है।”



                                                 - विकास बिश्नोई




स्नेहा की मेडिटेशन डायरी से...

जीवन को भौतिक अस्तित्व में लाने के लिए दो बिंदु या दो सिरों का होना अनिवार्य है। जब ये दो सिरे नही तो केवल अथाह अनन्त शून्य होता है, जैसे अंतरिक्ष।





आत्मा की जीवन को महसूस करने की वासना।
आत्मा ने देह को वस्त्र की तरह ओढ़ा।
इंद्रियों के साथ देह बनी उपकरण एवं माध्यम।
शुरू हुई एक यात्रा।


इन दो सिरों के बहुत से नाम हो सकते हैं।
अच्छा, बुरा/अंधेरा, उजाला/सुख, दुख/झूठा, सच्चा (कल्पना,यथार्थ)/जन्म, मृत्यु/सूक्ष्म, विकराल आदि आदि.. याद रहे ये सब मनुष्य द्वारा दिए गए "नाम" भर हैं भाषा के शब्द स्वर।

आत्मा का निजी अनुभव ही आभास है, कामना है, वासना है और ध्येय।
निजी अनुभव को भी जिस स्थिति में मनुष्य है, उस सिरे के आसपास का अनुपात अर्थात बुरा, कम बुरा और अच्छा, ज़्यादा अच्छा इत्यादि ही तय करेगा।

इन्हीं दो सिरों के बीच की यात्रा 'जीवन' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच सारे 'अनुभव आभास' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच कहीं 'अवसर और चुनाव' हैं।
इन्हीं दो सिरों के बीच हरपल झूलता, जूझता मनुष्य है।

देह रूपी मनुष्य के पास इन सिरों के आसपास के अनुपात मात्र हैं, जिसमें से यथा शक्ति, बुद्धि, सद्बुद्धि, वृत्ति और परिस्थिति अनुरूप वह चुनाव करता है। चुनाव करना उसकी नियति है, क्योंकि चुनाव न करना भी जड़वत खड़े हो रुक जाना है। यात्रा घड़ी के कांटों सी चलती रहती है मनुष्य चले या न चले।

इन दो सिरों के बीच हम तिनके मात्र भाग कर, नाच कर, रो कर, हँस कर, दुखी होकर या हार मान कर जैसे भी चलना चाहे, चल लें। सृष्टि को कोई फ़र्क नही पड़ता।

इतना बड़ा ब्रह्मांड और हम तिनका मात्र। तिनका यदि अहाँकारी हो स्वयं को चट्टान समझ यदि विरोध में उतरे भी तो, उस चट्टान रूपी अहँकार से न केवल स्वयं को भारी करेगा, बल्कि स्वयं को आहत ही करेगा। अनवरत यात्रा में किसी सिरे के पास वो चट्टान बना पड़ा रहेगा और समय समाप्ति पर बन जाएगा धूल का कण।

तो धूल के कण के समान हल्के हो उड़ना और हवा की गति में, उसके वेग में स्वयं को समर्पित कर उड़ते रहना कहीं ज़्यादा शांति दायक व आंनद दायक हो सकता है।

या फिर करना सीख ले उस भीतर बैठे आत्म से वार्तालाप। जो लाया है तुम्हें अपनी किसी लालसा, मंशा और कार्मिक फल के अंतर्गत।

और अच्छे बुरे जो केवल शब्द और अनुपात हैं, उसके फेर में पड़ने से बचना ही मुक्ति है। मैं हूँ इस यात्रा में क्या केवल एक आकस्मिक राही या सुनियोजित राही ?

मौन में बैठ कभी जाँचना और कभी संवाद करना आत्मा से...



- स्नेहा देव


03 December 2024

रंग-बिरंगे...

रास्ता दौड़ रहा है, किसी सरपट दौड़ती ट्रेन की तरह, और मैं ठहर गई हूँ। सब कुछ आगे बढ़ता जा रहा है। मैं भी जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगी हूँ, पर रास्ते की रफ़्तार का साथ नहीं दे पा रही। बस गिरने ही वाली हूँ, लेकिन मैं गिरना नहीं चाहती। लड़खड़ाते हुए, भागने लगी हूँ।

मेरी धड़कनें तेज हो चुकी हैं। मन घबरा रहा है कि कहीं गिर न जाऊँ। दौड़ते-दौड़ते आसपास देखा तो पाया, और भी लोग दौड़ रहे हैं। कुछ मेरी ओर देखते हुए आगे निकल गए। मैं रोना चाहती हूँ ज़ोर से चीखना चाहती हू लेकिन वक़्त नहीं है। मैं रेस में हूँ। रेस छोड़ नहीं सकती।





क्या यह सच में रेस है ? मेरी शू-लेस ढीली हो चुकी है, खुलने को है। पर इसे बाँधने का भी वक़्त नहीं। क्या सच में वक़्त नहीं है ? आँखों के आँसू अब पसीने में बदल चुके हैं। मैं दौड़ रही हूँ। मेरा शरीर तरबतर हो गया है।

बाकी धावक उस रेस के अंत में, उस लाल झंडे पर निगाहें टिकाए हुए हैं। पर मैं... मैं दौड़ते हुए सोच रही हूँ—अगर वह झंडा मिल भी गया, तो उसके बाद क्या करना है ? अब मेरा ध्यान दौड़ पर नहीं, सोच पर है। मेरे पैर थके नहीं हैं, पर उनकी रफ़्तार धीमी हो गई है। सब कुछ अचानक और तेज़ हो गया है। जैसे कोई तीव्र गति से चलता पंखा हो, जिसकी पंखुड़ियों की गिनती करना मुश्किल हो।

मेरा सिर चकरा रहा है।
शोर है—बहुत तेज़ शोर। लोग चीख रहे हैं।
मेरी धड़कने अब मेरे कानों को ज़ोर ज़ोर से पुकार रही है।
मेरी दौड़ अब चाल में बदल रही है।

फिर अचानक, एक ज़ोर की आवाज़ आई-
"रुको!"
"रुक जाओ!"
"रुको!"
मैं रुक गई।
कहाँ जा रही हो?
वह लाल झंडा तुम्हारे लिए नहीं है।
यह रास्ता तुम्हारे लिए है।
तुम्हें इस पर चलना है, अपनी चुनी हुई गति से।

मैं ठहरते ठहरते वापस दौड़ने लगी, मैं रास्ते की ओर देख मुस्कुराई,रास्ता मुझे देखकर मुस्कुराया। अब कोई शोर सुनाई नहीं दे रहा है,अब कोई एक झंडा नहीं है। हज़ारों झंडे हैं।

रंग-बिरंगे।
मैं उन्हें पार करते हुए दौड़ रही हूँ।
हाँ, अब मैं दौड़ रही हूँ।
अपनी चुनी हुई गति से।


02 December 2024

आइंस्टीन एक नए नजरिए से


अल्बर्ट आइंस्टीन की पत्नी अक्सर उन्हें सलाह देती थीं कि वह काम पर जाते समय अधिक प्रोफेशनल तरीके से कपड़े पहनें। आइंस्टीन हमेशा कहते, "क्यों पहनूं? वहाँ सब मुझे जानते हैं।" लेकिन जब उन्हें पहली बार एक बड़े सम्मेलन में जाना था, तो उनकी पत्नी ने उनसे थोड़ा सज-धजकर जाने का अनुरोध किया। इस पर आइंस्टीन बोले, "क्यों पहनूं ? वहाँ तो मुझे कोई नहीं जानता!"

आइंस्टीन से अक्सर सापेक्षता के सिद्धांत को समझाने के लिए कहा जाता था। एक बार उन्होंने समझाया, "अपना हाथ एक गर्म चूल्हे पर एक मिनट के लिए रखो, तो वह एक घंटे जैसा महसूस होगा। एक खूबसूरत लड़की के साथ एक घंटे बैठो, तो वह एक मिनट जैसा लगेगा।





यही है सापेक्षता!"
जब अल्बर्ट आइंस्टीन प्रिंसटन विश्वविद्यालय में काम कर रहे थे, तो एक दिन घर जाते समय उन्हें अपना घर का पता भूल गया। टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें पहचाना नहीं। आइंस्टीन ने ड्राइवर से पूछा कि क्या वह आइंस्टीन का घर जानता है। ड्राइवर ने कहा, "आइंस्टीन का पता कौन नहीं जानता? प्रिंसटन में हर कोई जानता है। क्या आप उनसे मिलना चाहते हैं?" आइंस्टीन ने उत्तर दिया, "मैं ही आइंस्टीन हूं। मैं अपना घर का पता भूल गया हूँ, क्या आप मुझे वहाँ पहुँचा सकते हैं?" ड्राइवर ने उन्हें उनके घर पहुँचा दिया और उनसे किराया भी नहीं लिया।

एक बार आइंस्टीन प्रिंसटन से ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। जब टिकट चेक करने वाला कंडक्टर उनके पास आया, तो आइंस्टीन ने अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला, लेकिन टिकट नहीं मिला। फिर उन्होंने अपनी पैंट की जेबें देखीं, लेकिन वहाँ भी नहीं था। इसके बाद उन्होंने अपने ब्रीफकेस में देखा, लेकिन टिकट नहीं मिला। फिर उन्होंने अपनी सीट के पास देखा, लेकिन फिर भी टिकट नहीं मिला।

कंडक्टर ने कहा, "डॉ. आइंस्टीन, हम जानते हैं कि आप कौन हैं। मुझे यकीन है कि आपने टिकट खरीदा है। चिंता मत कीजिए।" आइंस्टीन ने प्रशंसा में सिर हिला दिया। कंडक्टर आगे बढ़ गया। जब उसने दूसरी तरफ देखा, तो उसने देखा कि महान वैज्ञानिक नीचे झुककर सीट के नीचे टिकट खोज रहे थे।

कंडक्टर तुरंत लौट आया और कहा, "डॉ. आइंस्टीन, चिंता मत कीजिए। मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं। आपको टिकट की आवश्यकता नहीं है। मुझे यकीन है कि आपने टिकट खरीदा है।" आइंस्टीन ने जवाब दिया, "युवा आदमी, मैं भी जानता हूँ कि मैं कौन हूँ। पर मैं ये नहीं जानता कि मैं कहाँ जा रहा हूँ।"

जब आइंस्टीन की मुलाकात चार्ली चैपलिन से हुई-

आइंस्टीन ने कहा- "आपकी कला में जो मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह उसकी सार्वभौमिकता है। आप एक शब्द नहीं कहते, फिर भी दुनिया आपको समझती है।"

इस पर चार्ली चैपलिन ने उत्तर दिया- "यह सच है, लेकिन आपकी प्रसिद्धि तो इससे भी बड़ी है।
दुनिया आपकी प्रशंसा करती है, जबकि कोई आपको समझता नहीं।"