साहित्य चक्र

22 August 2026

लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



*****



वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

*****


सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


*****


हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


*****

आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


*****


इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


*****



No comments:

Post a Comment