साहित्य चक्र
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18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


05 July 2026

योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

07 June 2026

उत्तराखंड की संस्कृति का सच्चा सिपाही: झुसिया दमाई


भारत के अधिकांश राज्यों की संस्कृति को बचाने का सबसे अधिक श्रेय उन लोगों को जाता है जो लोक संगीत, गायन आदि के माध्यम से संस्कृति और सभ्यता को जन-जन तक पहुंचा कर जिंदा रखते है। भारत में जिन लोगों ने संस्कृति और सभ्यता का बोझ अपने कंधों पर उठाया, उन लोगों के साथ भारतीय समाज ने कभी भी न्याय नहीं किया; बल्कि उन लोगों को भेदभाव, अपमान और अत्याचार का शिकार होना पड़ा।

आज भले ही कुछ लोग संगीत और गाना-बजाना इत्यादि के जरिए खूब शोहरत हासिल कर रहे हैं, मगर एक समय था जब इस काम को करने वालों के साथ समस्त समाज जातीय भेदभाव करता था। इसी भेदभाव के कारण देश के कई राज्यों की संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर आ गई है।





आज हम बात करेंगे उत्तराखंड की संस्कृति और सभ्यता को जिंदा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले झुसिया दमाई की। झुसिया दमाई का जन्म 1910 में बस्कोट, नेपाल में हुआ था। यह क्षेत्र उत्तराखंड के कुमाऊं से जुड़ा हुआ है। इसलिए झुसिया दमाई को आधा नेपाली आधा (भारतीय) कुमाऊनी कहा जाता है। दमाई उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल क्षेत्र में पाए जाने वाली जाति है।

सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के कारण भारत सरकार ने इस जाति को अनुसूचित जाति में रखा है। दमाई जाति का इतिहास बताता है कि ये मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में देवताओं को अवतरित करने का काम यानी जागर लगाने का काम करते थे। झुसिया दमाई भी इसी जाति से आते थे। अनपढ़ होने के बाद भी झुसिया दमाई देवताओं का श्रुति गान, वीरगाथाएं, भड़गाथा, श्रुति गीत, देव श्रुति, भगनौल, हुड़का और ढोल वादन आदि कला में परिपूर्ण थे।





उत्तराखंड में जब भी संस्कृति, सभ्यता और संगीत की बात होती है तो झुसिया दमाई का नाम जरूर लिया जाता है। झुसिया दमाई को यह काम उसके पिता रानुवां दमाई के द्वारा आर्थिक मजबूरी व गरीबी में मिला था। कहते हैं ना आर्थिक मजबूरी और गरीबी इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

कभी-कभी मुझे हैरान होती है यह जानकारी कि भारतीय समाज में एक समाज के साथ पूरा समाज भेदभाव करता है और जिस समाज के साथ भेदभाव होता है, वह समाज देवताओं का आह्वान करता यानी देवताओं को बुलाता है। मेरा प्रश्न है- जिस समाज के आह्वान से देवता आ जाते हैं, वह समाज कैसे अपवित्र और अछूत हो सकता है ?


- दीपक कोहली



27 April 2026

बुनियादी कौशल

आज का युग, ज्ञान का नहीं, विज्ञान का युग बन गया है। बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ लेकर लौट रहे हैं परंतु जीवन के बुनियादी कौशलों से कोसों दूर हैं। वे ‘कक्षा ज्ञान’ में पारंगत हैं, लेकिन ‘ज़िंदगी के सबक़’ से अनजान।

मेरी छोटी बहन की कैंसर की कीमो थेरेपी के दौरान मैं उसके भावनात्मक सहयोग के लिए कुछ दिन उसके पास रही।

एक रात्रि, जब घरेलू सहायिका जा चुकी थी… मैं अपने भांजे को, जो प्रशासनिक अधिकारी है, दो महीने पहले ही भारतीय सिविल सेवा का प्रशिक्षण लेकर लौटा था... रात्रि का भोजन गर्म करके दे रही थी।






तभी मैंने महसूस किया कि किचिन सिंक का पानी रुक रहा है। किचिन में जो भी साधन, नुस्खे- पेचकस, सिरका, नींबू रस, चक्कू आदि मिला- उनसे मैंने सिंक के छिद्रों को खोलने की नाकाम कोशिश की।

अब तक बेटा भी भोजन समाप्त कर, किचिन में आ गया... मुझे सिक में सटर पटर करते देख पूछने लगा- मौसी क्या हुआ? मैंने तुरंत कहा- बेटा कोई मोटा मजबूत तार मिलेगा... लगता है सिंक के छिद्रों में कचरा फंसा है... पानी बह नहीं रहा।”

बेटा अपनी मासूम सी अनभिज्ञता जताते धीरे से बोला- “मौसी तार-वार तो मुझे कुछ पता नहीं...”

“ठीक है, तुम अपने कपड़ों की अलमारी से एक एल्यूमिनियम वाला या जिसका तार सख्त न हो... हैंगर ला दो।”

“ठीक है।” बेटा तुरंत हैंगर ले आया। मैंने हैंगर के हुक के नीचे जुड़े दोनों सिरों को प्लास व पेचकस की मदद से खोल, तार को सीधा

कर सिंक के छिद्रों में बारी-बारी घुमाया- जिससे सारा कचरा पाइप से होता हुआ, नीचे जाली पर इकट्ठा होने लगा। कुछ ही मिनटों में सारा पानी गड़-गड़ कर बह गया। बेटा ध्यान से मेरे सब उपक्रम देख रहा था।

वह चकित होकर बोला- “मौसी, आपने तो कमाल कर दिया! मौसी आज आप नहीं होती तो मैं क्या करता; मुझे तो ऐसे काम बिल्कुल नहीं आते।”

मैंने सहजता से कहा- बेटा जिंदगी की रोजमर्रा की जरूरतें किताबें नहीं, हमारे अनुभव ही हमें सिखाते हैं। उसके चेहरे पर संकोच और भीतर एक अजीब-सी आत्म-स्वीकृति थी- किताबी ज्ञान के बावजूद वह जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियों से निपटने में असहाय है।

यही आज के शिक्षित समाज की सच्चाई है। हमारे बच्चे तकनीकी, प्रबंधन और प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में दक्ष हैं, उनके पास डिग्री है, ज्ञान है, पर अनुभव नहीं। असल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं होता बल्कि जीवन जीने की समझ विकसित करना होता है।




परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘जीवन कौशल’ (Life Skills) के लिए कोई स्थान नहीं है। हम बच्चों को हर विषय की थ्योरी सिखा रहे हैं लेकिन प्रयोग नहीं। कभी-कभी लगता है- हमने बच्चों को इतना ‘स्मार्ट’ बना दिया कि वे अब किसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए गूगल सर्च करते हैं।

हर ज्ञान का असली मूल्य तभी है, जब वह जीवन को आसान बनाए। आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल बुद्धिमान नहीं, व्यवहारिक भी बनाएं क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी डिग्री- ‘अनुभव’ होती है, जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती, बस व्यवहार में लाने से मिलती है।


- नील मणि





28 March 2026

लेखः जल है तो कल है

'जलमेव जीवनम्' (जल ही जीवन है) संस्कृत की प्रचलित सूक्ति जल के महत्त्व को दर्शाती है। प्राचीन ऋषियों ने जल के महत्त्व को स्वीकार करते हुए हजारों वर्षों पूर्व ही घोषणा कर दी थी-


'जलं हि जीवनस्य मूलं, नित्यं पातव्यं सुविशुद्धम्।
विना जले न तिष्ठेतु जगत्सर्वं सजीवनम्'।"


जिसका अर्थ है कि जल ही जीवन का मूल है, हमें हमेशा शुद्ध जल पीना चाहिए। जल के बिना यह संपूर्ण संसार नहीं टिक सकता।

और भी संस्कृत श्लोक में बताया गया है-

"पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम् सुभाषितं।
मूढ़ै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।"






पृथ्वी पर तीन रत्न पाए जाते हैं: जल, अन्न और सुंदर वचन। पुराणों में जल को रत्न के रूप में अभिहित किया गया है। पृथ्वी पर सीमित मात्रा में पेयजल उपलब्ध है। पृथ्वी का स्थलीय भाग 30% है जबकि जल की उपलब्धता 70% से अधिक है; लेकिन इस 70% जल में से पीने योग्य जल महज 3% है। जबकि 97% जल महासागरों में है, जो खारा व अपेय है।

जल के स्रोत-

(i) जल के प्राकृतिक स्रोत: जल के प्राकृतिक स्रोत में नदियाँ, हिमनद, झीलें, तालाब, झरने, समुद्र और महासागर हैं। जिनमें ताजा जल के स्रोत- नदियाँ, झीलें व हिमनद हैं। खारे जल के स्रोत - समुद्र और महासागर हैं।

(ii) मानव निर्मित जल स्रोत: जल मानव निर्मित जल स्रोतों में कुएँ, ट्यूबवेल, बाँध, जलाशय, नहरें, चैक डैम आदि हैं।

3% पीने योग्य जल में 68.7% ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ से उपलब्ध होता है, 30.1% भूजल (Ground Water) और 1.2% सतही जल (नदियों, झीलों) के रूप में उपलब्ध है।

जल की वर्तमान स्थिति-

UN-INWEH (United Nations University Institute for Water, Environment and Health) के द्वारा जारी वैश्विक जल दिवालियापन रिपोर्ट के अनुसार संपूर्ण विश्व जल दिवालियापन की ओर अग्रसर है तथा वैश्विक कृषि के लिए संकटोत्तर युग का संकेत दिया गया है।

जल दिवालियापन एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी क्षेत्र का जल उपयोग उसकी नवीकरणीय आपूर्ति (बारिश, नदियों) से लगातार अधिक होता है, जिससे भूजल भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय नुकसान होता है। दुनिया की आधी से ज्यादा झीलें 1990 के दशक से सिकुड़ रही हैं। कई नदियाँ अब समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं।

1970 के बाद से 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) नष्ट हो चुकी हैं। विश्व की प्रमुख नदियां - सालवीन नदी, गंगा नदी ( दुनिया की 8% आबादी की जीवनरेखा), सिंधु नदी, मेकांग नदी, यांगत्से नदी, डेन्यूब नदी, रियो दे ला प्लाटा बेसिन, रियो ग्रांडे नदी, नील नदी और मरे- डार्लिंग बेसिन ये विश्व की प्रमुख नदियां आज खतरे में है।

हाल ही में 'विक्टोरिया झील' जो अफ्रीका की सबसे बड़ी व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है , इसके पानी में सायनोबैक्टीरिया के अत्यधिक प्रसार के कारण झील का पानी जहरीला हो रहा है जिससे लोगों के पेयजल और मछली उद्योग के लिए संकट खड़ा हो गया है। 2025 में भारत के सबसे स्वच्छ शहर 'इंदौर' (मध्य प्रदेश) में पेयजल के संदूषित होने के कारण स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो गया।






चिंताएँ और मुद्दे:- जल दिवालियापन के पैटर्न

(i) प्रणालीगत वैश्विक जल असुरक्षा- 4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष कम से कम एक माह के लिए गंभीर जल अभाव का सामना करते हैं।

(ii) घटती जल भंडारण क्षमता और कृषि तनाव- वैश्विक कृषि भूमि का 50% से अधिक भाग मध्यम या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है जिससे मृदा की आर्द्रता धारण क्षमता घट रही है और मरुस्थलीकरण तीव्र हो रहा है।


(iii) दृश्यमान वैश्विक परिणाम:- नदियाँ महासागर तक पहुँचने से पहले ही सूख जाती हैं। झीलें और हिमनद संकुचित हो रहे हैं। अत्यधिक पंपिंग के कारण भूमि धँस रही है और भूजल स्रोत लवणीय हो रहे हैं। शहर 'डे ज़ीरो' परिदृश्य का सामना कर रहे हैं।

जल संकट के आर्थिक और मानवीय प्रभाव:- जल संकट के कारण सालाना 307 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। लगभग 2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। भारत पर प्रभाव :- लगभग 60 करोड़ भारतीय 'उच्च जल तनाव' (Water Stress) का सामना कर रहे हैं। भारत के पास विश्व की 18% आबादी है, लेकिन केवल 4% मीठे जल के संसाधन हैं।

भारतीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने "गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2025" जारी की है- गतिशील भौमजल ( Dynamic Ground Water ) संसाधन का आकलन केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (cgwb)तथा राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्र द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है






रिपोर्ट एक नज़र:- वार्षिक भौमजल का पुनर्भरण (Recharge): कुल वार्षिक भौमजल पुनर्भरण 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंका गया है। यह वर्ष 2024 के 446.9 BCM की तुलना में आंशिक वृद्धि दर्शाता है।

भौमजल का दोहन:- दोहन योग्य वार्षिक भौमजल संसाधन बढ़कर 407.75 BCM हो गए हैं। वर्ष 2024 में इसकी मात्रा 406.19 BCM थी। वर्ष 2025 के लिए देश भर में कुल वार्षिक भौमजल दोहन की मात्रा 247.22 BCM आकलित की गई है। भौमजल दोहन का स्तर: देश में दोहन योग्य उपलब्ध कुल भौमजल संसाधन में से लगभग 60.63% भौमजल का प्रत्येक वर्ष उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी क्षेत्रों में उपयोग शामिल है।

आकलन इकाइयों का वर्गीकरण:- देश में कुल 6746 आकलन इकाइयाँ हैं। इनका वर्गीकरण निम्न प्रकार है:-

73.4% इकाइयाँ - सुरक्षित (SAFE)
10.5% इकाइयाँ - अर्ध संकटग्रस्त (SEMI CRITICAL)
3.05% इकाइयाँ - संकटग्रस्त (CRITICAL)
11.1% इकाइयाँ - अत्यधिक दोहित (OVER-EXPLOITED)


अत्यधिक दोहित इकाइयों का क्षेत्रीय संकेंद्रण:-

उत्तर-पश्चिम भारत: (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश)
पश्चिम भारत: (राजस्थान, गुजरात)
दक्षिण भारत: (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश)
1.8% इकाइयाँ- लवणीय (Saline)

रिपोर्ट में भूजल आकलन श्रेणियों की परिभाषा:- अत्यधिक दोहित (Over-Exploited): जहाँ भूजल का दोहन स्तर वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) से अधिक है। अर्ध संकटग्रस्त (Semi-Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70-90% उपयोग (दोहन) कर लिया जाता है।

संकटग्रस्त (Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 90-100% उपयोग कर लिया जाता है। सुरक्षित (Safe): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70% से कम उपयोग किया जाता है।

भूजल दोहन में राजस्थान की स्थिति (कुल 302 ब्लॉक):-
अति दोहित ब्लॉक- 214
संवेदनशील / संकटग्रस्त- 27
अर्ध संवेदनशील- 21
सुरक्षित ब्लॉक- 37
लवणीय ब्लॉक- 3






जल संकट का समाधान व मुख्य सुझावः- जो अमूल्य और सीमित थाती हमें हमारे पूर्वजों से मिली (जल, वन, वनस्पति) उसे हमारी भावी पीढ़ियों को सौंपना हमारा दायित्व भी बनता है और धर्म भी। उक्त रिपोर्ट के अनुसार आज विश्व 'भयंकर जल संकट' का सामना कर रहा है। अब हमें 'संकट प्रतिक्रिया' के बजाय 'जल प्रबंधन' पर ध्यान देना होगा। उपलब्ध जल का उचित उपयोग ही करना होगा, अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब समूचा विश्व 'जल युद्ध' लड़ रहा होगा।

भूजल को सामूहिक धरोहर मानना होगा। इस पर केवल अपना ही अधिकार नहीं है, यह धरोहर उनके लिए भी सुरक्षित रखनी होगी जो अभी मौजूद ही नहीं हैं। पानी के पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ाना होगा। वैश्विक स्तर पर काम कर रही संस्थाओं को न केवल रिपोर्ट जारी कर 'इतिश्री' कर लेनी होगी; बल्कि जल संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने होंगे, सरकारों को कड़े फैसले लेने होंगे।

हर व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनकर जल का अनुचित प्रयोग न करके उसका सदुपयोग करना होगा। जिसमें उसके दैनिक दिनचर्या के समस्त क्रियाकलापों से लेकर अपने दायित्व के रूप में अत्यधिक पौधारोपण, जल स्रोतों के रखरखाव संबंधी आदतों को जीवन में अनुस्यूत करना होगा। राजस्थान द्वारा जल शक्ति अभियान: कैच द रेन,रिज टू वैली जैसे जल संरक्षण प्रयासों को मॉडल के तौर पर अपनाकर जल संरक्षण किया जा सकेगा। वरना रहीम जी के अनुसार 'बिन पानी सब सून' ही रह जाएगा।


" यूं तो धरा पर जल ही जल है,
पर उसमें भी 'अपेय' प्रबल है।
बिन जल सब जीव विकल है,
सनद रहे -"जल है तो कल है।"



- वीरदत्त गुर्जर



23 March 2026

नारी सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों का संतुलन


नारी के बढ़ते आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता ने समाज में नई चेतना जगाई है, लेकिन इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठने लगा है कि बदलते समय में पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं का स्वरूप क्या होगा। जैसे-जैसे महिला शिक्षा का विस्तार हो रहा है और महिलाएँ आत्मनिर्भर बन रही हैं, मन में एक दुविधा और असमंजस बार-बार उठता है कि क्या आने वाले समय में हमारी पारिवारिक संस्था और वैवाहिक संस्था उसी प्रकार चल पाएँगी, जैसे अब तक चलती आ रही हैं।





क्योंकि महिलाओं में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं, लेकिन समाज-विशेषकर पुरुषों में- उतनी तेजी से बदलाव नहीं आ रहे। पुरुष की मानसिकता आज भी काफी हद तक यही है कि एक औरत पहले अपने घर को संभाले और उसके बाद यदि वह आत्मनिर्भर बनना चाहती है तो अपने परिवार को प्राथमिकता देते हुए ही अपने काम को संभाले।

लेकिन आज की महिला का तर्क है कि जब वह पुरुष के बराबर बाहर का काम करती है और जिम्मेदारियाँ निभाती है, तो घर में भी दोनों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। घर का काम किसी लिंग विशेष से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाना चाहिए। जब भोजन करना दोनों की समान आवश्यकता है, तो भोजन बनाना केवल स्त्री का ही काम कैसे माना जा सकता है ?




बड़े शहरों में इस सोच में कुछ बदलाव अवश्य दिखाई देता है, लेकिन यह कहना कि वहाँ इसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है, शायद सही नहीं होगा। इसी कारण आज की बहुत-सी लड़कियाँ विवाह और पारिवारिक बंधन में बंधने से हिचकती हैं। वे अपने बच्चों और घर की पूरी जिम्मेदारी अकेले नहीं संभालना चाहतीं। शायद इसी मानसिकता के चलते हमारी पुरातन वैवाहिक और पारिवारिक व्यवस्था भी कहीं-न-कहीं चुनौती के दौर से गुजर रही है।

वास्तव में प्रकृति ने नर और नारी दोनों को समान बनाया है। भेदभाव समाज की देन है, प्रकृति की नहीं। लंबे समय तक स्त्री के मन में यह धारणा स्थापित कर दी गई कि वह सहनशीलता की मूर्ति है- वह सहना जानती है, संघर्ष करना जानती है और पुरुष के अन्याय को भी चुप रहकर सहना जानती है। उसके मन में यह बात बैठा दी गई कि एक अच्छी महिला वही है जो अत्याचार सहकर भी अपने घर और परिवार को संभालकर रखे।




यदि उन तथाकथित अधिकारों की बात करें जो बाद में उसे मिलते हैं, तो अक्सर वे केवल इतने ही होते हैं कि उसे रहने के लिए एक घर और खाने के लिए रोटी मिल जाए। लेकिन समय के साथ दिशा भी बदली है और नारी की दशा भी बदली है। आज नारी आत्मनिर्भर हो गई है और वह किसी प्रकार की गुलामी सहन करने को तैयार नहीं है। लेकिन इस बदलती मानसिकता के चलते यह भी चिंता सामने आ रही है कि कहीं भारत की सुंदर वैवाहिक और
पारिवारिक परंपरा खतरे में न पड़ जाए।

एक ओर कुछ महिलाएँ विद्रोह की भावना से घर-परिवार की जिम्मेदारियों से दूरी बनाना चाहती हैं और अपने तरीके से जीवन जीना चाहती हैं। यदि हम पुरातन कथाओं की ओर देखें तो कहा जाता है कि स्वर्ग की अप्सराएँ किसी श्राप के कारण कुछ समय के लिए पृथ्वी पर आती थीं और समय पूरा होने पर बिना किसी मोह-माया के वापस चली जाती थीं। आज कहीं-न-कहीं ऐसी स्थिति बनती दिखाई देती है कि कुछ महिलाएँ अपने जीवन को केवल अपने ही तरीके से जीना चाहती हैं।




मुझे लगता है कि इस समाज और इसकी सुंदर परंपराओं को बचाने का एक ही उपाय है। जिस प्रकार पुरुषों ने धीरे-धीरे स्त्री के मन में यह विचार स्थापित किया कि वह सहनशीलता की मूर्ति है और घर को जोड़कर रखना उसी की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार अब स्त्रियों को भी अपने विचारों और अपनी सहनशीलता के माध्यम से पुरुषों के मन में समान जिम्मेदारी की भावना स्थापित करनी होगी। इसके लिए शुरुआत करनी होगी अपने ही घर से- अपने बेटों से। उन्हें यह सिखाना होगा कि घर की जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी है।

इसके साथ ही हमें अपनी बेटियों के मन में भी यह बात स्थापित करनी होगी कि घर का काम करना या पारंपरिक रूप से “महिलाओं के काम” माने जाने वाले कार्य करना किसी भी प्रकार से उन्हें छोटा नहीं बनाता। मनुष्य जीवन की यह सच्चाई है कि यदि वह इस संसार में आया है, तो जीवन के लिए अनेक प्रकार के कार्य करने ही पड़ते हैं और उनका किसी लिंग विशेष से कोई संबंध नहीं होता।




अपनी बेहतरी और जीवन के निर्वाह के लिए कुछ काम हमें स्वयं करने ही पड़ते हैं। यह आवश्यक नहीं कि पुरुषों के कार्यों को अपनाकर या पुरुषों की तरह व्यवहार करके ही हम श्रेष्ठ सिद्ध हों या हमें सम्मान मिले। हमें अपने मूल गुणों को त्यागना नहीं है, बल्कि अपने अच्छे संस्कारों और सकारात्मक गुणों को समाज में भी स्थापित करना है।

यदि स्त्री केवल विद्रोह का मार्ग अपनाएगी तो समाज का कल्याण नहीं होगा और इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों में देखने को मिल सकते हैं। आवश्यक है कि स्त्री और पुरुष दोनों प्रतिस्पर्धा या विद्रोह नहीं, बल्कि साझेदारी के भाव से जीवन जिएँ।

समाज की बेहतरी के लिए नारी को एक बार फिर अपने संयम और सहनशीलता के गुणों को सशक्त रूप में स्थापित करना होगा और इन्हीं मूल्यों को पुरुषों के मन में भी विकसित करना होगा। तभी आने वाली पीढ़ियाँ सम्मान, सहयोग और समानता के साथ जीवन जी सकेंगी और लिंगभेद से मुक्त एक संतुलित तथा सुखी समाज का निर्माण कर पाएँगी।


- कंचन चौहान



अमेरिका की ओछी हरकतें, विश्व में अशांति का कारण!

आज विश्व में चारों तरफ अशांति फैली हुई है। इस अशांति के कारण हजारों मासूम बच्चे, महिलाएं और आम नागरिक मौत के घाट उतर चुके हैं। यूरोप से लेकर एशिया और अफ्रीका तक इस अशांति का शिकार है। इस अशांति के कारण लगभग सभी देशों के नागरिकों को महंगाई और बेरोजगारी से लेकर तमाम तरह के प्रभावित होना पड़ रहा है।





विश्व में फैली अशांति का मुख्य दोषी अमेरिका है। अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए गरीब देशों के खनिज खजानों और प्राकृतिक संप्रदाय पर अधिकार जमाने के लिए इस तरह की ओछी हरकतों से वहां के नागरिकों को टारगेट बना रहा है। अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह हमेशा से अपने स्वार्थों को सबसे ऊपर रखता आया है।

चाहे वह सोवियत संघ को शीत युद्ध के जरिए से तोड़ना हो या फिर पाकिस्तान को हथियार देकर आतंकी गतिविधियों के जरिए भारत के विकास को प्रभावित करना हो। अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए इस तरह की ओछी हरकतें सदियों से करता आ रहा है, मगर अब अमेरिका की ओछी हरकतों को विश्व के लगभग हर देश समझ गया है।




अमेरिका खुद को सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश कहता है, मगर लोकतंत्र के गुण अमेरिका के पास ना के बराबर दिखाई देते हैं। लोकतंत्र कभी भी नहीं कहता कि दूसरे देश की प्राकृतिक संपदा को हड़पने के लिए उस देश पर हमला कर दो और वहां के राजनेताओं को मरवा दो।

अमेरिका का दोहरा चरित्र और काला चेहरा अब विश्व के सामने धीरे-धीरे आ रहा है।‌ चाहे वह दूसरे देशों के क्रीम मांइड बच्चों को अच्छी नौकरी और अच्छा सैलरी पैकेज देकर खरीदने की बात हो या फिर अल-कायदा जैसे संगठनों को फंडिंग और हथियार देकर अफगानिस्तान जैसे क‌ई देशों को बर्बाद करने की साजिश हो। ये सब अमेरिका की ओछी हरकतें आज विश्व के लिए अशांति का कारण बन गई है।

अमेरिका को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र जितना वहां के नागरिकों को अधिकार देता है, उतना ही अधिकार एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों के नागरिकों को भी देता है। वक्त रहते अमेरिका अगर अपनी सोच और हरकतें में सुधार नहीं करता है तो अमेरिका का आने वाला भविष्य कितना खतरनाक होगा कि इसकी कल्पना आप और हम नहीं कर सकते हैं।


- दीपक कोहली





11 March 2026

भारतीय रेलवे की दयनीय स्थित!



अक्सर मैं इधर-उधर जाने के लिए भारतीय रेलवे की सेवाओं का अधिक इस्तेमाल करता हूं। कुछ दिन पहले मैंने जयपुर से कोलकाता और कोलकाता से जयपुर आना-जाना किया। इस दौरान मुझे भारतीय रेलवे की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत ही दुःख हुआ। बतौर भारतीय नागरिक मेरे मन में कई विचार उत्पन्न हुए। जैसे- क्या हम भारतीयों में अभी शिक्षा की कमी है ? क्या हम भारतीय अपनी सरकारी संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति के मुकाबले सम्मान और उसके रखरखाव का ध्यान नहीं दे पाते हैं ? सरकारी संपत्ति के प्रति हम भारतीयों का इतना गंदा व्यवहार क्यों होता है ?






जयपुर से ट्रेन में बैठने के बाद दिल्ली जाने तक ट्रेन के शौचालय इतने गंदे हो गए थे कि शौचालय जाने तक का मन खत्म हो गया। लोग शौचालय जाते हैं और फ्लैश तक नहीं चलते हैं। आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं मेरी समझ से परे है। जो बात मैं कह रहा हूं यह कोई स्लीपर या जनरल बोगी की बात नहीं है, बल्कि 2 एसी और थर्ड एसी बोगी के अनुभव मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं। रेलवे के 2 एसी और थर्ड एसी में अधिकतर अपर मिडिल क्लास ज्यादा सफर करता है और इस क्लास को सबसे अधिक शिक्षित और एडवांस माना जाता है। उसके बावजूद भी सरकारी संपत्ति के प्रति इनका व्यवहार चिंतनीय है। ऐसी शिक्षा का क्या महत्व जब आपको मूलभूत सेवाओं का इस्तेमाल तक करना ही नहीं आता हो। ऐसी अमीरी का क्या जब आपको इतना भी नहीं पता कि शौचालय जाने के बाद फ्लैश चलाना होता है, जबकि यह काम आप और हम अपने घरों में हर रोज एक-दो टाइम करते ही हैं।

 इतना ही नहीं बल्कि लोग तो खाना खाकर या चाय कॉफी पी कर, नमकीन कुरकुरे खा कर, कोल्ड ड्रिंक पी कर कूड़े को सीट के नीचे या साइड में डाल देते हैं, जबकि रेलवे के हर बोगी के बाहर गेट पर डस्टबिन लगा रहता है। यह एक साधारण सी समझ है कि कूड़े को डस्टबिन में डालना है। मगर हम भारतीय जब भी सरकारी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, इतने गंदे तरीके का व्यवहार करते हैं कि मानो उस सेवा का दोबारा हमें इस्तेमाल ही नहीं करना हो। आखिर हम भारतीयों में सरकारी संपत्ति के प्रति प्रेम और अच्छे व्यवहार की जागरूकता कब आएगी ?





भारतीय रेलवे को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ट्रेनों के अंदर अच्छी क्वालिटी का खाद्य सामग्री उपलब्ध हो सके और ट्रेनों में काम करने वाले स्टाफ का व्यवहार थोड़ी नरम व अपने काम के प्रति ईमानदार हो। जिन कंपनियों को रेलवे ठेके पर सफाई या अन्य चीजों की जिम्मेदारी देता है, उन कंपनियों के व्यवहार पर भी रेलवे को पैनी नज़र रखनी चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि अगर संभव हो सके तो यात्रियों से कंपनी की सेवा (जिम्मेदार) के प्रति फीडबैक भी लिया जाना चाहिए। इससे रेलवे की सुविधाएं और बेहतर होंगी।

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी प्राप्त करना नहीं होता है, बल्कि आपके व्यवहार और बोली में शिक्षा की कुशलता झलकनी चाहिए। देशभक्ति और देश प्रेम सिर्फ सेना में जाना नहीं होता बल्कि देश की संपत्ति के प्रति प्रेम और आदर का भाव भी देश प्रेम की श्रेणी में आता है। आपकी गली में लगा सरकारी स्ट्रीट लाइट हो या रेलवे और परिवहन बस सेवाएं आदि सभी सरकारी सेवाओं व संपत्ति का बतौर नागरिक हमें सुरक्षा और देखभाल करनी होगी, तभी एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण हो पाएगा। हां! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी संपत्तियों व सेवाओं में हम सभी नागरिकों के टैक्स का ही पैसा लगता है।



                                                                - दीपक कोहली





लेख- परमात्मा का इंतज़ाम



रोज़ाना की तरह ही आज़ भी मैं कई बार पार्सल डिलीवरी के लिए घोड़ा बाबा मंदिर के पास से गुजरा। शाम से ही हल्का-सा ध्यान ज़रूर था कि मंदिर के पास सड़क पर तकरीबन 13-14 साल की उम्र के दो लड़के लगातार मौजूद रहकर कुछ कर रहे हैं। लेकिन मैंने इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था। शाम के करीब पौने आठ बजे होंगे। मैं आज़ की सातवीं पार्सल डिलीवरी लेकर तेज़ी से चित्रगुप्त कॉलोनी की ओर जा रहा था। चूंकि चित्रगुप्त कॉलोनी के लिए रॉन्ग साइड से होकर ही सर्विस लेन पर रास्ता कटता था सो मैं घोड़ा बाबा मंदिर की ओर बने सर्विस लेन पर ही जाना उचित समझा। अभी सरपट मंदिर के पास से गुजर ही रहा था कि अचानक आवाज़ आई-"भैया-भैया ! रुकिए !





चूंकि मैं जल्दबाजी में था इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया। कुछ ही दूर गया था कि मन में कुछ खटका। शाम से ही ये बच्चे आखिर यहां कर क्या रहे हैं ? क्या आते-जाते राहगीरों से कुछ मांग रहे हैं ? शाम से लेकर अबतक वहीं पर हैं तो क्या अबतक किसी राहगीर ने उनकी बात नहीं सुनी होगी ? क्या वे बच्चे भूखे हैं ? कौन हैं,क्या हैं एक क्षण में अनगिनत प्रश्न दिल में उमड़ पड़े। अचानक मैंने अपनी असमंजस तोड़ते हुए क्लीयर कट तय किया कि भले ही आज़ और डिलीवरी नहीं करूंगा। लेकिन अभी का पार्सल डिलीवर करने के बाद तुरंत लौटकर उन बच्चों से मिलकर बातें करूंगा। वैसे भी आज़ लगभग चार सौ रुपए आ चुके हैं तो और ना भी हो तो कोई बात नहीं।

घोड़ा बाबा मंदिर के पास ही एक छोटा-सा रेस्टोरेंट है-"बेरोजगार ढाबा"। मैं अक्सर वहां अपनी फैमिली के साथ आया करता हूं। पूरे शहर में सबसे अच्छी और सस्ती बिरयानी यहीं मिलती है। मैं फैसला कर चुका था कि आज़ की शाम,उन दो बच्चों के नाम। आज़ उन्हीं के साथ बिरयानी पार्टी होगी। पार्सल डिलीवर करने के बाद मैं उल्लासित होकर तेज़ी से घोड़ा बाबा मंदिर की ओर चल पड़ा। दिल के किसी कोने में यह भी बातें चल रही थीं कि क्या वे बच्चे सचमुच बेसहारा हैं ? क्या उनके मां-बाप गैर ज़िम्मेदार हैं इसलिए वे इतनी रात सड़क पर भटक रहे हैं ? या मां-बाप हैं भी या नहीं ?






फिर मन के अपराध को वहीं पर रोकते हुए अगले ही पल तय किया कि मुझे ये सब कुछ नहीं सोचना है। कौन,क्या, कैसे भाड़ में जाए। आज़ बिरयानी पार्टी होकर रहेगी उन बच्चों के साथ। महज़ 180 रुपए में तीनों खा लेंगे। इतने रुपए तो न जाने कितने उड़ जाते हैं अक्सर। इन्हीं ख्यालों में खोया जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुंचा, बच्चे नदारद। रात के लगभग नौ बज रहे थे।

उन बच्चों को न देखकर मेरा सारा उल्लास काफूर हो गया। मैं अंदर ही अंदर बेचैन हो उठा कि काश ! जाते वक्त ही थोड़ा-सा रुककर बातें कर लेता और उनसे दस मिनट वहीं इंतज़ार करने कहता। मुझे खुद पर बेतहाशा गुस्सा आ रहा था और दमभर खुद को कोस भी रहा था। ब्लॉक गेट से लेकर टीचर ट्रेनिंग मोड़ तक मैं उन बच्चों की तलाश में लगभग चार-पांच राउंड मारा। पर वो बच्चे कहीं नज़र नहीं आए।

शाय़द अपने घर चले गए होंगे या उनका जहां ठिकाना है वहीं चले गए होंगे। मैं भारी मन से वापस स्टोर की ओर चल पड़ा। मन में कसक ज़रूर थी कि उन बच्चों को कुछ खिला नहीं पाया। लेकिन मुझे हमेशा से एक तथ्य का भान है कि परमात्मा सबकुछ पहले से तय रखते हैं। वे सबके लिए ज़रूरत के हिसाब से इंतज़ाम करके रखते हैं। वो माध्यम क्या होगा ये बस वही जानते हैं और इसकी अनुभूति मैंने अपने जीवन में अनगिनत बार किया है।

मेरी भावना सकारात्मक ज़रूर थी लेकिन मुझे परमात्मा पर पूरा भरोसा है कि शायद वो आज़ उन बच्चों का इंतजाम मेरे हाथों नहीं कराना चाहते होंगे, कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मौका न चूकूं इसका ध्यान रखने की कोशिश करूंगा। लेकिन हां ! उनकी व्यवस्था किसी के हाथों ज़रूर करा दिए होंगे इतना मुझे परमात्मा के इंतज़ाम पर संपूर्ण विश्वास है। बस इसी तसल्ली के साथ वापस अपने काम पर लग गया।


-कुणाल




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18 February 2026

एपस्टीन फाइल्सः सच, सन्नाटा और समाज का आईना


Jeffrey Epstein का नाम आज केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है; वह एक ऐसे अंधेरे अध्याय का प्रतीक बन चुका है, जिसने मानवता, न्याय और नैतिकता- तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। “एपस्टीन फाइल्स” केवल कागज़ों का पुलिंदा नहीं हैं। वे उन अनसुनी आवाज़ों की प्रतिध्वनि हैं, जिन्हें कभी शक्ति, प्रभाव और धन के शोर में दबा दिया गया था।





जब यह मामला सामने आया, तो दुनिया ने देखा कि कैसे प्रभावशाली लोगों के बीच भी अपराध छिप सकते हैं। कैसे सत्ता और संपर्क कभी-कभी सच्चाई पर पर्दा डाल देते हैं। और कैसे पीड़ितों की चुप्पी को वर्षों तक अनसुना किया जाता है। इन फाइल्स में सिर्फ नाम नहीं हैं- इनमें विश्वासघात की कहानियाँ हैं, टूटे हुए बचपन हैं, और उस समाज का आईना है जो कभी-कभी सच जानकर भी चुप रह जाता है।

कई लोगों के लिए यह केवल एक “स्कैंडल” हो सकता है। पर जिनकी ज़िंदगियाँ प्रभावित हुईं, उनके लिए यह जीवन भर का घाव है। एपस्टीन की कहानी हमें यह सिखाती है कि न्याय में देर हो सकती है, पर सच को पूरी तरह दफन नहीं किया जा सकता। जब दस्तावेज़ खुलते हैं, तो केवल तथ्य नहीं निकलते- वे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी उजागर करते हैं।

यह आलेख किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि एक स्मरण के लिए है- कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके प्रभावशाली लोगों में नहीं, बल्कि उसके नैतिक साहस में होती है। जब भी “एपस्टीन फाइल्स” का नाम लिया जाएगा, वह हमें याद दिलाएगा- कि चुप्पी भी कभी-कभी अपराध की साझेदार बन जाती है। और सच बोलना, चाहे देर से ही सही, मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।


- प्रफुल्ल सिंह "संवेदन स्पर्श"


सादगी की रोशनी


शहर की चमक-दमक में पला-बढ़ा आरव हमेशा मानता था कि सफलता का मतलब बड़ा घर, महँगी गाड़ी और लोगों के बीच प्रसिद्धि है। कॉलेज से निकलते ही उसने एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। तनख्वाह अच्छी थी, जीवन तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा था, पर भीतर कहीं एक अजीब-सी खालीपन की धुंध छाई रहती।

एक दिन कंपनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसे पहाड़ों के एक छोटे-से गाँव जाना पड़ा। वहाँ इंटरनेट कम चलता था, सड़कें कच्ची थीं और बाजार भी छोटा था। आरव को लगा जैसे वह समय में पीछे आ गया हो। गाँव में उसकी मुलाकात हुई- एक बुज़ुर्ग शिक्षक, शंभूनाथ जी से।





वे एक छोटे-से कच्चे घर में रहते थे। पहनावा साधारण, भोजन सादा, लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति। गाँव के बच्चे उन्हें “गुरुजी” कहते और रोज़ शाम को उनके आँगन में पढ़ने आते।

आरव ने एक दिन उनसे पूछा, “गुरुजी, आपने शहर जाकर बड़ी नौकरी क्यों नहीं की? यहाँ तो सुविधाएँ भी नहीं हैं।”

शंभूनाथ जी मुस्कराए, “बेटा, सुविधा और सुख एक नहीं होते। सुविधा बाहर से मिलती है, सुख भीतर से उगता है। मैंने सादगी चुनी, क्योंकि सादगी मन को हल्का रखती है।”

आरव चुप हो गया। अगले कुछ दिनों में उसने देखा- गुरुजी बच्चों को पढ़ाने के बाद खेतों में किसानों की मदद करते, बीमारों के लिए जड़ी-बूटियाँ लाते और शाम को नदी किनारे बैठकर ध्यान करते। उनके पास धन नहीं था, पर सम्मान और स्नेह की संपदा अपार थी।

एक शाम आरव नदी किनारे उनके साथ बैठा था। पहाड़ों के पीछे सूरज ढल रहा था। गुरुजी बोले, “सादगी का अर्थ अभाव नहीं है। यह तो इच्छाओं का संयम है। जब मन अनावश्यक चाहतों से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची समृद्धि को पहचानता है।”

उनकी बातें आरव के मन में गूंजती रहीं। शहर लौटते समय उसने महसूस किया कि गाँव की शांति उसके भीतर कहीं बस गई है। शहर आकर उसने अपने जीवन की रफ्तार धीमी की। अनावश्यक खर्च कम किए, सप्ताहांत में झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और हर दिन कुछ समय स्वयं के लिए निकालने लगा। धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी वही संतोष झलकने लगा, जो उसने गुरुजी में देखा था।




कुछ महीनों बाद जब वह फिर गाँव गया, तो गुरुजी ने उसे देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें तुम्हारी सच्ची संपदा मिल गई।” आरव ने नम्रता से उत्तर दिया, “हाँ गुरुजी, अब समझ आया कि सादगी ही सच्ची संपदा है।”

उस दिन आरव ने जाना- धन से जीवन सजता है, पर सादगी से जीवन संवरता है। बाहरी वैभव क्षणिक है, पर सरलता और संतोष ही वह दीपक हैं जो जीवन भर प्रकाश देते हैं।


- रेखा चंदेल



मेरा और तुम्हारा ईश्वर!


तुम्हारे और मेरे धार्मिक होने में धरती और आसमान का फर्क है। तुम पंडित, मौलाना, पादरी और आदि धर्म गुरु के बताए गए मार्गों या कर्मों को ही धर्म समझ लेते हो। मगर मैं अन्याय के खिलाफ लड़ना, सच को सच व गलत को गलत कहना और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने को अपना धर्म मानता हूं। मेरे से नहीं होती काम चोरी, मेरे से नहीं बोला जाता झूठ, मैं इंसानों में नहीं कर पाता हूं भेद और मैं अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करता हूं, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा धार्मिक नहीं हूं। 





हां तुम करते होंगे दिन-रात पूजा-पाठ और पांच वक्त की नमाज़ अदा... मगर मैं नहीं करता। क्योंकि मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे किसी भी बंधन में नहीं बांधता है। तुम्हारे ईश्वर और अल्लाह ने तुम्हारे लिए नियमों की सूची बना रखी है। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे सभी जीव जंतुओं को बराबर मानने या देखने को कहता है। तुमने अपने ईश्वर और अल्लाह को कभी देखा नहीं होगा, मगर मैं अपने ईश्वर (प्रकृति) को हर रोज देखता और महसूस करता हूं। मेरा ईश्वर (प्रकृति)मुझ से हर रोज सूर्य की पहली किरण के साथ संवाद की शुरुआत करता हैं और शाम की संध्या के साथ संवाद को विराम देते हैं।




मुझे नहीं पता तुम्हारा ईश्वर और अल्लाह तुम्हारे सुख-दुख में शामिल होते हैं या नहीं, मगर मेरा ईश्वर (प्रकृति) मेरे साथ हमेशा खड़ा रहता हैं। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे अपना विकराल रूप भी दिखता है, डरता है, हंसना है और मेरे लिए लड़ता भी है। इतना ही नहीं बल्कि मुझे जिंदा रखने के लिए कई बार खुद बीमार भी पड़ जाता है। बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे ईश्वर में... इसलिए मैं तुमसे अलग हूं।


                                                           - दीपक कोहली




07 February 2026

बच्चों के लिए खतरनाक बनता मोबाइल!

मोबाइल के इस युग में आपको राह चलते लोगों की अखबार पढ़ती तस्वीरें जब दिख जाती है तो लगता है कि अखबार पढ़ना इस मोबाइल के युग में कितना जरूरी है, बहुत से लोग या फिर घर में बैठे बच्चे और उनके पेरेंट्स जब कोई काम में उलझ जाते हैं तो अपने बच्चों को शांत रखने के लिए तुरंत मोबाइल फोन थमा देते हैं लो बेटा थोड़ी देर फोन देख लो, अच्छा टीवी में कार्टून देख लो इससे बच्चे के दिमाग और शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जा रहा है।





बच्चे ज्यादा देर नजर गड़ाए फोन देखते हैं वो देखते-देखते तो कई बार इंस्टाग्राम रील भी देखने लगते हैं और कई रील्स ऐसे होते हैं या फिर उसके स्क्राल करने के बाद कुछ ऐप्स के ऐड ऐसे आते हैं जिसमें दिखाया जाता है कि आप इस ऐप पर बस वीडियो देखों और हजारों रूपए कमाओं यह कहीं ना कहीं बच्चों पर पूरी तरह हावी हो जाता है।

इसलिए बच्चे को मोबाइल देते समय सोच समझकर दें देखने के लिए या फिर पेरेंट्स मोबाइल देने के बजाय उन्हें उपन्यास, कहानी की किताबें पढ़ाए या बच्चे के लायक जो अखबार आ रहे हैं जैसे बाल भास्कर उसे दिखाएं जिससे बच्चे पढ़ने की ओर कदम बढ़ाएं।

आपने हाल ही में पढ़ा और सुना भी होगा कि हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में वहां की सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है यह इसलिए किया गया है क्योंकि बच्चा मोबाइल स्क्रीन पर नजर कम डालें और पढ़ने की आदत डालें हर दिन प्रार्थना के समय कम से कम 10 मिनट अखबार पढ़ना जरूरी है और हिंदी के साथ अंग्रेजी भाषा के अखबार को भी पढ़ने के लिए कहा गया है।





विधार्थियों में पढ़ने की रूची बढ़े और इसके साथ उनका करेंट अफेयर्स भी मजबूत हो और फेक न्यूज को पहचान सकें ऐसा नियम हर राज्य के सरकारी स्कूलों में लागू किया जाना चाहिए ताकि बच्चे मोबाइल फोन से दूरी बनाकर पूरी ध्यान पढ़ाई पर लगाएं अखबार पढ़ने उसमें चित्र देखकर बच्चे धीरे-धीरे प्रेरित होकर किताब पढ़ना भी सीख जाएंगे और मोबाइल स्क्रीन से उनकी दूरी बनती चली जाएगी। अखबार पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जनरल नॉलेज में भी सुधार होता है और भाषा के साथ शब्द पर भी पकड़ अच्छी हो जाती है।


- आशीष रंजन



19 January 2026

शिक्षा का बदलता स्वरूप



शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि व्यक्ति को विवेकशील, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बनाने की प्रक्रिया है। किंतु वर्तमान समय में शिक्षा अंकों, डिग्रियों और प्रतियोगिता की दौड़ में अपने मूल उद्देश्य से विमुख होती प्रतीत होती है। ऐसे में शिक्षा की दिशा, उसकी भूमिका और उससे जुड़े अंतर्विरोधों पर गंभीर विचार आवश्यक हो गया है।
पंक्तियाँ जो समय का सच कहती हैं

“खाकी खड़ी है, खादी बैठी है।
शिक्षा खड़ी है, अशिक्षा बैठी है।”

ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि समकालीन समाज का दर्पण हैं। इनमें वह विडंबना उभरकर आती है, जहाँ जिम्मेदारी निभाने वाली शक्तियाँ प्रतीक्षा में खड़ी हैं और निर्णय लेने वाली शक्तियाँ मौन साधे बैठी हैं।






खाकी और खादी: उत्तरदायित्व का असंतुलन

लोकतंत्र में खाकी अनुशासन, सुरक्षा और सेवा का प्रतीक है, जबकि खादी त्याग, नेतृत्व और जनकल्याण की भावना का प्रतिनिधित्व करती है। किंतु जब खाकी आदेशों की प्रतीक्षा में खड़ी रह जाए और खादी सत्ता के आसन पर निष्क्रिय बैठी रहे, तब शासन और जनता के बीच की दूरी बढ़ जाती है। निर्णयों का भार नीचे खड़े लोगों पर होता है, पर उत्तरदायित्व ऊपर बैठा रह जाता है।


शिक्षा बनाम अशिक्षा: एक गहरी विडंबना

शिक्षा आज भी समाज को दिशा देने के लिए खड़ी है- वह प्रश्न करती है, विवेक जगाती है और भविष्य का निर्माण करना चाहती है। परंतु अशिक्षा, जो केवल रटंत, डिग्रियों और संकीर्ण सोच तक सीमित है, व्यवस्था की कुर्सी पर बैठकर शासन कर रही है। परिणामस्वरूप ज्ञान का विस्तार तो हो रहा है, किंतु समझ और संवेदना का क्षरण निरंतर बढ़ रहा है।





प्रतिस्पर्धा की दौड़ और मूल्यों का पतन

आज की शिक्षा प्रणाली सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है। अंकों को सफलता का पैमाना बना दिया गया है, जबकि नैतिक मूल्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना हाशिए पर चले गए हैं। शिक्षक और विद्यार्थी- दोनों ही इस दबावग्रस्त व्यवस्था में अपनी रचनात्मकता खोते जा रहे हैं।


समाधान की दिशा: चेतना का पुनर्जागरण

समय की मांग है कि खादी कुर्सी से उठकर अपनी नैतिक और सामाजिक जवाबदेही निभाए तथा शिक्षा को उसका यथोचित और सम्मानजनक स्थान प्रदान किया जाए। जब शिक्षा बैठेगी और अशिक्षा खड़ी होगी, तभी समाज वास्तविक अर्थों में प्रगति करेगा। तब ये पंक्तियाँ व्यंग्य नहीं, बल्कि एक जाग्रत राष्ट्र की चेतना का उद्घोष बनेंगी।

अपने विचारों को विराम देते हुए बस इतना ही कहूँगी-

"जब कुर्सी से उठे उत्तरदायित्व का मान,
जब शिक्षा बने दीप, मिटे अज्ञान का घाम।
अंकों से ऊपर उठे मानवता का स्वर,
तब जागे राष्ट्र, बने सच का उजला घर।"



- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’