साहित्य चक्र

14 February 2026

प्रेम उत्सव विशेषः लेखिका सुतपा घोष जी का पत्र पढ़िए




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मेरे प्रिय साथी,

मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ। 

मेरे मन की सारी बातें, हमेशा से ही तुम्हें पता है। फिर भी प्रेम के इस ऋतु में यह पत्र तुम्हारे लिए लिख रही हूँ। तुम कैसे हो ? यह मैं नहीं पूछूंगी। तुम्हारा चेहरा अपने आप सब बयां करता है। जब तुम खुश होते हो, फूल खिलते हैं, तो मैं भी खुशी से झूम उठती हूं। जब तुम उदास होते हो, बारिश होती है, तो मेरा मन किसी भी काम में नहीं लगता है। और जब तुम्हें चोट लगती है, भूकंप आता है, मैं अंदर से टूट जाती हूं। मैं तुम से प्रेम करती हूं और तुम्हारी प्रतिबिंब हूँ।

तुम हर पल मेरे साथ मेरे पास होते हो। हमारी दूरी सिर्फ आंखों को दिखती है। मन दूर-दूर तक साथ होते हैं। हिमालय हो या सागर, पर्वत हो या पठार, झरनों की ताल से नदियों के लहरों तक, कश्मीर की वादियों से अरुणाचल के पहाड़ों तक, कच्छ के छोर से केरल की गलियों तक, सहयाद्रि हो या नीलगिरी, विंध्याचल हो या अरावली, जंगल हो या खेत खलिहान, उत्तर-दक्षिण पूर्व-पश्चिम, दिन-रात, हर ऋतु-हर मौसम तुम मेरे साथ हो। जैसे समय साथ है जन्म से मृत्यु तक, वैसे ही तुम साथ निभाते हो।

तुम हवा में, पानी में, फूल-पत्तियों और मिट्टी में भी हो। तुम धूप हो, मेघ हो, सुबह-शाम और भोर हो। तुम मेरे जीवन की अनमोल डोर हो। तुम प्रकृति और मैं तुम्हारी देन हूँ।  तुम मेरे प्रीत हो। तुम हो तो मैं हूं और यह रीत है।  मेरे खातिर तुम अपना ध्यान रखना।

हमेशा से तुम्हारी अनोखी अलबेली

- सुतपा घोष
दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


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