साहित्य चक्र

14 February 2026

प्रेम उत्सव विशेषः लेखक तौसीफ़ अहमद जी का पत्र पढ़िए





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मुहब्बत के हफ़्ते में एक ख़त रफ़ीका-ए-हयात के नाम


मेरी अज़ीज़ रफ़ीका-ए-हयात,


मुहब्बत का ये हफ़्ता जब कैलेंडर पर दस्तक देता है, तो एहसास होता है कि ये हफ़्ता रूह पर उतरती किसी नरम गुल की तरह है खूबसूरत, महकता और सुकून भरा। यूं तो इश्क़ किसी तारीख़ का मोहताज नहीं। पर हाँ, कुछ दिन ऐसे ज़रूर होते हैं जो इन लम्हों को और भी ख़ूबसूरत बना देते हैं।

सोचता हूँ, अगर गुलाब में ख़ुशबू न होती, चाँद में चाँदनी न होती और दुआओं में असर न होता, तो शायद हमें मोहब्बत की क़द्र यूँ महसूस न होती। जैसे बादल बरसकर अपने वजूद का सबूत देते हैं, वैसे ही इश्क़ भी एहसास बनकर रूह पर उतरता है।

कभी सोचता हूँ, अगर अल्फ़ाज़ में एहसास न होता, धड़कनों को नाम न मिलता तो मोहब्बत कैसी होती ?

तुम मेरे लिए मुकम्मल एहसास हो। तुम वो रिमझिम बारिश हो जो थकान धो देती है, वो ख़ामोश दुआ जो बिना आवाज़ असर कर जाती है। भीड़ में मेरी अचानक मुस्कान की वजह भी तुम ही हो।

इस हफ़्ते लोग गुलाब देते हैं, मैं तुम्हें अपना यक़ीन देना चाहता हूँ। लोग वादे करते हैं, मैं तुम्हें अपना सब्र और अपनी नीयत सौंपना चाहता हूँ। तुम सिर्फ़ हमसफ़र नहीं, मेरी सोच की रोशनी और हर फ़ैसले के पीछे की हिम्मत हो।

हमने एक-दूसरे की ज़िंदगी ओढ़नी है उसकी धूप भी, उसकी छाँव भी। तुम्हारा हर बार ख़ुद पर और हमारे रिश्ते पर लौट आने वाला यक़ीन मुझे सुकून और राहत देता है। यही एतमाद हमारे साथ की असली पूँजी है।

हम ज़िंदगी के आधे हिस्से के साझेदार नहीं, बल्कि एक ही दास्तान के दो सफ़्हे हैं जिन्हें साथ पढ़ा जाए तो मायने मुकम्मल होते हैं। मेरी दुआ है कि ये साझेदारी सिर्फ़ लम्हों की नहीं, उम्र भर की रफ़ाक़त बने।

अल्लाह से यही दुआ है कि हमारा ये साथ ता-दम-ए-हयात पुरसुकून, महफ़ूज़ और मुहब्बत से लबरेज़ रहे। आमीन।


तौसीफ़ अहमद
ब्रह्मपुर, बक्सर


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