साहित्य चक्र

10 February 2026

कहानी- प्रॉमिस डे


लेखक- मोहन मीना



शिवदासपुरा वाली सवारियाँ आगे निकलें, आपका स्टैंड आ गया है। कंडक्टर की आवाज़ पर बातचीत का सिलसिला तोड़कर मानसी ने अपना बैग उठाया और मनन को बाइ बोलकर बस की गैलेरी में आगे बढ़ने लगी। रोज का सफर होने सें दोनों में अच्छी समझ हो गयी थी।




मनन का ऑफिस अगले स्टॉप पर आने वाला है। जब हम अकेले सफर कर रहे होते हैं तो सबसें ज्यादा अपने करीबी इंसान को याद कर रहे होते हैं। यह स्मृति तब और भी साफ होती है, जब पसंदीदा शख़्स हाल ही में हमसें दूर हुआ हो। मनन के मस्तिष्क में मानसी की हँसी और अधूरी बातें घूमे जा रही थी।

ज़िन्दगी भी एक बस स्टॉप की तरह ही होती है ना जाने किस मोड़ पर किससें मिला दे और किस मोड़ पर किससें बिछुड़ा दे। ऑफिस सें छूटते ही मनन ने मानसी को व्हाट्सअप मैसेज किया। हैलो! ‘यूनिक गर्ल’, मैं निकल गया हूँ। मानसी तो जैसे मनन के मैसेज का ही इंतज़ार कर रही थी, तुरंत रिप्लाई दिया- हाँ, मैं भी आ ही रही हूँ।




कुछ ही देर में 16 नंबर बस शिवदासपुरा बस स्टैंड पर दूर सें आती हुई दिखाई देती है। खचाखच भरी बस में मानसी यूँ प्रवेश करती है जैसे आर्मी की दौड़ में किसी जवान ने फ़िनिशिंग लाइन पार कर ली हो। चाहत इंसान को स्वार्थी बना देती है। बगल वाली सीट मनन सबसे ये बोलकर बचा लेता है कि यहाँ बैठी सवारी टिकट लेने गयी है। अपनी सीट पकड़ते ही मानसी इस खूबसूरत धांधली पर मनन सें कहती है कि शुक्रिया जनाब, पर अच्छे इंसान को ऐसी झूठ शोभा नहीं देती।

मनन कहता है- जानता हूँ साहब! पर इस दिल के संविधान के नियम सबके लिये अलग अलग होते हैं। मानसी समझकर भी अनसुना कर देती है और मन में चल रहे सवाल का जवाब चाहती है। वो मैं ये पूछ रही थी कि तुमने मैसेज में ‘यूनिक गर्ल’ क्यों कहा? कुछ कॉम्प्लिमेंट अनायास ही ऑक्सीटॉक्सिन हार्मोन रिलीज़ कर देते हैं। इसमें कोई बड़ी बात है क्या? आपके सिद्धांत, आपका पहनावा, आपके बात करने का लहजा, आपका व्यक्तित्व….





मनन की बात को बीच में काटते हुए मानसी ने कहा- बस.. बस जनाब! इतना भी मत चढ़ाओ मुझे। तुम लड़कियों की यही तो कमी है, सच को स्वीकारना नहीं है पर यह तो मेरे मन की आवाज़ है। मनन ने जोर देते हुए कहा। अच्छा! तो ये बात कितनी लड़कियों को बोल चुके तुम। मानसी ने तफ़री ली। मनन के पास इसका कोई प्रत्युत्तर नहीं था। बस स्टॉप आ चुका था। दोनों बस सें उतरकर अपने अपने घर की तरफ़ जाने लगे। मानसी ने कहा- शुक्रिया मनन! बेहद प्यारा कॉम्प्लिमेण्ट है। आप अपना खयाल रखना। ठीक है, आप भी अपना खयाल रखना। शाम को व्हाट्सअप पर बात करते हैं। मनन ने भारी मन सें विदा लेते हुए कहा।

हैलो! खाना खाया आपने? मानसी ने मैसेज किया। मनन तो कब से फोन हाथ में लिए मानसी के मैसेज का इंतज़ार कर रहा था। नीली टिक होते ही तुरंत जवाब आया- हाँ खा लिया। ज़्यादा वक्त ना ज़ाया करते हुए मनन ने मैसेज किया- आज प्रॉमिस डे है, तुम मुझसे कोई प्रॉमिस करोगी? हाँ मनन, बताओ क्या प्रॉमिस करूँ- मानसी ने रिप्लाई दिया। मैं मन, कर्म, वचन सें तुम्हारा सम्मान करता हूँ। प्यार की परिभाषाएँ मुझे ज़्यादा नहीं आती।




बस जो आपकी पहचान है, मेरा मतलब ‘यूनिक गर्ल’ वाली, इसको हमेशा बनाये रखना मानसी। आपसे भी ज़्यादा आपकी इस पहचान ने मुझे आकर्षित किया है। मनन ने एक ही मैसेज में अपनी संपूर्ण भावनाएँ ज़ाहिर कर दी। बहुत गहराई सें दो-तीन बार मैसेज को पढ़ने के बाद मानसी ने जवाब दिया- मैं तुमसें वादा करती हूँ मनन! मैं हमेशा अपने सिद्धांत और तुम्हारे द्वारा दिये गये ‘यूनिक गर्ल’ के कॉम्प्लिमेंट को संजोकर रखूँगी।

बस मेरी भी एक गुज़ारिश है कि कुछ कहानियाँ इसलिए ख़ूबसूरत होती है क्योंकि वो कभी पूरी नहीं होती। तुम भी वादा करो कि मेरे साथ अधूरी ख़्वाहिशों के साथ जीना स्वीकार करोगे? प्रेम, आलिंगन और मुस्कान की ईमोजी के साथ मनन ने सांकेतिक हामी भर दी। दोनों की आँखों सें अनायास आँसू निकलकर मोबाइल की स्क्रीन पर टपक रहे थे।


- मोहन मीणा, विमलपुरा (जयपुर)


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