साहित्य चक्र

11 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 फरवरी 2026



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अनुभवों की उत्तर पुस्तिका

ज़िंदगी भी किसी परीक्षा से कम नहीं,
हर सुबह एक नया प्रश्न सामने रख देती है।
कहीं विकल्प होते हैं ,सही या सरल के बीच,
तो कहीं बिना विकल्प के उत्तर माँग लेती है।

यहाँ समय ही परीक्षक है,
जो न अतिरिक्त समय देता है, न दुबारा मौका।
गलतियाँ उत्तर-पुस्तिका में नहीं कटतीं,
सीधे अनुभव बनकर जीवन में जुड़ जाती हैं।

कुछ प्रश्न रिश्तों के होते हैं
जहाँ समझदारी से लिखना पड़ता है उत्तर।
कुछ प्रश्न संघर्ष के
जहाँ आँसू स्याही बन जाते हैं।

जो धैर्य से हर प्रश्न हल करता चलता है,
वही अंत में सफल कहलाता है।
क्योंकि इस प्रश्न-पत्र में अंकों से अधिक
इंसानियत और साहस का मूल्य आँका जाता है।

ज़िंदगी का प्रश्न-पत्र कठिन जरूर है,
पर उत्तर लिखने का साहस हमारे भीतर है।
जो सीखते हुए आगे बढ़ जाए,
वही जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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जीवन-सांझ

जीवन के अंतिम क्षणों में ,
हर कोई अपना-बेगाना लगने लगता है।
जैसे - जैसे उम्र ढलती जाती है,
आँखों से मोह का पर्दा उठने लगता है।

दिन के उजाले में जो संग चलते हैं,
शाम होते ही अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
सारी उम्र जिनके लिए दौड़ते रहे,
वही चेहरे अनजाने-से लगने लगते हैं।


- चेतना सिंह ‘चितेरी’


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जीवन में कुछ आप करें,
कुछ होने दें


कुछ राहें हम चुन लें खुद,
कुछ को छोड़ दें।

कुछ दीप जलें हमारे हाथों,
कुछ को हवा से मोड़ दें।

कुछ सपने मेहनत से गढ़ लें,
कुछ को समय पर छोड़ दें।

कुछ बोझ अपने मन के उतारें,
कुछ को मौन में तोड़ दें।

जहाँ प्रयास की सीमा टूटे,
वहाँ विश्वास को जोड़ दें।

जीवन तब सरल हो जाता है,
जब “मैं” कम, “वो” ज़्यादा हो जाए।


- नरेंद्र मंघनानी


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टेडी डे, दस फरवरी
फूल दिये, इज़हार किये
चॉकलेट लिये, प्यार किये
नये संसार का इरादे किये
संग संग चलना स्वीकार किये
एक-दूजे में विश्वास किये
लोगों में भी विश्वास दिलाये
फिर ये सुनहरा जीवन को
टेडी नहीं बनाना है
टेडी तो सिर्फ खिलौना है
हमें प्रेम से ही खेलना है
प्रेम देना है, प्रेम पाना है
ये बातें, ना भूलना है
दस फरवरी का ये दिवस
हो भले, टेडी दिवस
लेकिन टेडी-सा, ये जीवन
ना बिताये, कभी हम
जो सिर्फ मनोरंजन के है वास्ते
ये प्रेम नहीं है, सस्ते
हाँ, टेडी दिवस की बधाई
प्रेम मे ना करो, जग हंसाई


- चुन्नू साहा


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सच्चा जीवनसाथी

तुम्हारे लिए मेरा प्यार निःशर्त और अटूट है।
मैं तुम्हें हमेशा आश्वस्त करने का वादा करता हूँ।

मेरा प्रेम तुम्हारे लिए रक्षा करता है और सम्माननीय है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं हमेशा वफादार रहूँगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम समझ और भावुकता से भरा है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
मैं हमेशा तुम्हारे प्रति दयालु रहूँगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम गहरा और स्नेहपूर्ण है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
मैं हमेशा समर्पित और स्नेहपूर्ण रहूँगा।

तुम्हारे लिए मेरा प्यार धैर्यवान और दयालु है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
यह प्रेम अनंत काल तक बना रहेगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम निस्वार्थ और क्षमाशील है।
मैं तुमसे यह वादा करता हूँ, जीवन भर के लिए।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम अटूट और उत्साहवर्धक है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हारी बात
सुनूंगा और कभी भी भटकूंगा नहीं।

मैं वादा करता हूँ, मेरी पत्नी,
कि मैं अपने हर काम में तुम्हें अपना प्यार दिखाऊँगा।
मैं ये वादे इसलिए कर सकता हूँ क्योंकि
मैं तुम्हें पूरे दिल से प्यार करता हूँ।


- रवि कुमार वर्मा


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फैशन

अपने घर के बड़े बुजुर्ग को मारना
पीटना तथा अंत में वृद्धा
आश्रम में भेजने और कुत्तों को
घर में रखने का फैशन चल रहा है।
स्त्रियों द्वारा भाई- भाई में फूट
डालने तथा अलग थलग करने
का,फैशन चल रहा है।
बहुओं द्वारा घर के बुजुर्गों पर
अत्याचार करने का ,
फैशन चल रहा है।
अपनी से न लगाव रख…दूसरों
से ज्यादा लगाव रखने का ,
फैशन चल रहा है ।
अपने से बड़ों का पैर न छूना
तथा उनका सम्मान न करने का ,
फैशन चल रहा है
रिश्तेदारों के घर न जा कर
Whatapp से न्यौता भेजने का
फैशन चल रहा है।
किसी रिश्तेदार के घर खाली हाथ
जाने का फैशन चल रहा है
छोटी मोटी बात पर तलाक दे
देने का फैशन चल रहा है।
प्रेम मुहब्बत में धोखा देने का,
फैशन चल रहा है।
ज्यादा से ज्यादा दिखावा करने
का फैशन चल रहा है।
झूठ बोल बोल कर रिश्तों में
जहर घोलने का फैशन चल रहा है।
हर वक्त दूसरों को नीचा और अपने
को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का,
फैशन चल रहा है।
शादी समारोह में
पंगत में न बैठ कर,खड़े होकर
भिखारियों जैसे प्लेट में खाना
खाने का फैशन चल रहा है।
त्यौहारों में बहन बेटियों के घर
पाहुर पुरिया न ले कर जाना
फैशन चल रहा है।
बारात में खाना खाते ही तुरन्त
फुर्र हो जाने का ,
फैशन चल रहा है।
बिना दुपट्टा स्कूल,कॉलेज मार्केट
जाने का फैशन चल रहा है।


- सदानंद गाजीपुरी



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तेरे पन्नों में मैं!

अलमारी में सहेजी किताब हो,
जिसे रोज थोड़ा पलटू,
थोड़ा पढूं।
जब पूरी हो,
फिर वही से शुरू करूं।

हर पन्ने का हर्फ
समझूं जरूरी नहीं,
जरूरी है बस पढ़ता जाऊं।
कुछ को स्याही से रंग दूं, कुछ
को बस तह कर दूं।

किसी पन्ने में छुपा दूं
एक तस्वीर तेरी,
तेरी खुशबू पा लूं उसी
धवल पन्नों के साए में।

संग ले चलूं छत पर,
बाग बगीचे, चाय पर,
कभी मुशायरे, कभी खेत।
तेरे पन्नों पर मेरा नाम,
जो औरों को बताए,
मेरी पहचान।

तेरी जिल्द बदल दूं,
सिरहाने रख दूं।
छाती पर लगाए सो जाऊं,
फिर उठकर तुझे देखूं।

कभी ढूंढना हो खुद को,
तो तेरे पन्नों में खो
कर खुद को पा जाऊं।
छोड़कर मेज पर,
कभी अलमारी में सहेज लूं।


- रोशन कुमार झा


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एक रात
पढ़ रहा था
मुक्तिबोध की रचना
चांद का मुंह टेढ़ा है!
शीतल रात में
बाहर निकल कर
चांद का
किया अवलोकन
चांद था दूर!
न हो सका आंकलन!
मेंने ज्ञान चक्षु दौड़ाए
अद्भुत नज़ारा पाया
बाजार में
चाट पकौड़ी पुचकों के
ठेले नज़र आए
भीड़ का जमघट
गोलगप्पे गटक रहें फटाफट!
चाट कों भी
चाट रहे थे
लग रहा था
सबका मुंह टेढ़ा है।


- जितेंद्र बोयल


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इज़्ज़त

इज़्ज़त भी अजीब चीज़ है,
ख़ामोशी से दी जाए तो गहना बन जाती है,
और माँगी जाए तो
कर्ज़ जैसी लगने लगती है।

जिसने खुद को गिराकर
ऊँचाई पाई हो,
उसकी इज़्ज़त भी
अक्सर उधार की होती है।

इज़्ज़त शब्दों से नहीं,
नियत से झलकती है,
वरना हर ज़ालिम
“जनाब” कहलाना जानता है।

इज़्ज़त का सबसे बड़ा दुश्मन
अहंकार नहीं,
डर होता है-
सच बोल देने का डर।


- शशि धर कुमार


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क्रंदन से चंदन तक
संघर्ष की अनंत यात्रा:

मेरे जीवन के पन्नों में
हार के गीत लिखे हैं,
जो मेरे दिल को छूते हैं.
पीड़ा की छाया है,
जो मेरे मन को ढकती है.
कष्ट के आँसू हैं,
जो मेरे दिल को दर्द देते हैं.
क्रोध की ज्वाला है,
जो मेरे अंदर जलती है.
और क्रंदन की ध्वनि है
जो मेरे दिल को रोने पर
मजबूर करती है.

परन्तु मैं हार नहीं मानूंगा!
मैं लड़ूंगा, संघर्ष करूंगा,
डटकर मुकाबला करूंगा,
जीत का परचम लाऊंगा!

और जब मैं जीतूंगा,
मेरे हिस्से में चंदन होगा,
वंदन होगा, अभिनंदन होगा,
जीत की कहानी होगी,
सफलता की बयानी होगी।


- अर्जुन कोहली


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रविवार की सुबह 

मोबाइल में अलार्म बजता
पर उठने को मन नहीं करता।
अलार्म बंद करते
थोड़ी देर और सो लेते।
नींद फिर से करीब आती
उतने में चिड़िया की
चहचहाहट सुनाई देती।
जैसे ही नजर बाहर जाती
उतने में धूप खिली खिली नजर आती।
मन में डयूटी जाने की बात नहीं आती
भूख भी आज दूरी जताती।
आज  योग भी नहीं होता 
मन बस यूं ही हल्का हल्का लगता।
न चाय की याद आती 
न ही  नहाने  की वो चिंता सताती।
घर पर ही समय बीतता 
खेत खलिहान भी घूम आता।
खेतों की हरियाली मन मोहक लगती
ऐसे ही सुबह दिन में बदल जाती।


- विनोद वर्मा


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सूरत बदली, सीरत बदली, बदल गया आईने भी
शौहरत मिलते ही किरदार भी बदल गया।

घर बदला, गांव बदला, बदल गया शहर भी
सरकारी नौकरी मिलते ही  रुतबा भी बदल गया।

मंदिर बदले, मस्जिद बदली, बदल गये गुरुद्वारे भी
मज़हब नाम की चिनगारी से मुल्क भी बदल गया।

सबूत बदले,गवाह बदले, बदल गये वकील भी
गुहार लगायी इंसाफ की तो पैसे से कानून भी बदल गया।

भेष बदला, देश बदला, बदल गये इंसान भी
शादी के बाद तो औरत का घर भी बदल गया।

सास बदला,महबूब बदला, बदल गया ससुराल भी
जहेज ना मिलने पर शादी का दुपट्टा ही फंदे में बदल गया।

तालीम बदली,दोस्त बदले, बदल गये हमदर्द भी
चालबाजी ऐसी हुई पलभर में ख्वाब ही बदल गये।

तुम बदले, हम बदले, बदल गयी ख्वाहिशें भी
जिम्मेवारियों में घर का चिराग़ मुसाफ़िर में बदल गया।

अपने बदले, पराये बदले, बदल गये कनस्तर भी
फ़कीर-ए-आलम में हर तालुकदार भी बदल गया।

मकां जो था मेरा पुश्तैनी 'नूर'
वो खण्डहर हुआ तो लगा वाकई में "जमाना बदल गया"।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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प्रेम को कोई नहीं समझ सका,
प्रेम मुरझाने वाला फूल नहीं है।
यह शांत नदी है,
जो सदा मंद–मंद बहती है।
यह हवा का कोमल झोंका है,
जो हर मन को शीतल करता है।
प्रेम बारिश की बूंदें है,
जो तन–मन को भिगोती हैं।
प्रेम एक मीठा नशा है,
जो राधा को कृष्ण से था।
प्रेम है एक पवित्र मंदिर,
जहाँ एक है दिया और बाती।
प्रेम को समझना कठिन है,
प्रेम तो सभी करते हैं।
पर इसे निभाते बहुत कम,
यही इसकी सच्ची परीक्षा है।
प्रेम है गहरा समुंदर,
जिसकी थाह कोई न पाए।
प्रेम है ऐसी मधुर खुशबू,
जो हर दिल को महका जाए।


- गरिमा लखनवी


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दिल की एक पुकार

तुम आओ कभी नदी किनारे,
आकर बैठो थोड़ी देर साथ हमारे,
हो जाओ मेरी तो यह बात मै न कहूं,
अगर हो जाओ मेरी तो यह दर्द मै न सहूं।

इस लम्हे को ऐसे ज़ाया मत करो,
मैं तुम्हारे साथ हूं, तो फिर तुम न डरो,
तुम नहीं आई मेरे बाहो में,
पर, अब आ गई हो अफसानों में।


- प्रणव राज


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मुश्किलें

माना कि मुश्किलें बड़ी हैं,
पर मेरे होंसलों से तो बड़ी नहीं।
जिंदगी है तो मुश्किलें भी होंगी,
मुश्किलें नहीं तो जिंदगी नहीं।

मुश्किलें आज तक कहाँ, मुझे रोक पाई हैं।
क्योंकि मेरे होंसलों से जो उनकी लड़ाई है।।

कौन है अपना, कौन पराया,यही हमें बताती हैं।
जीवन का असली फ़लसफ़ा यही हमें सिखाती हैं।।

माना कि जीवन के अंधेरों ने मुझे बहुत सताया है।
पर सच यह भी है कि मुझे लड़ना भी सिखाया है।

खड़ा हूँ खुद पर यकीन लिए,इन मुश्किलों का असर हूँ।
तोड़ न पाए तूफ़ान जिसे, मैं ताड़ का वो शजर हूँ।


- मनोज कुमार भूपेश


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दोस्त क़िताबें

चीख़ती नहीं हैं,बोलती हैं क़िताबें
थोड़ा धीमे-धीमे बोलती हैं तो क्या हुआ
साफ़-साफ़ और सच-सच ही बोलती हैं
देखकर चेहरा बदल नहीं देती हैं बात
चापलूसी नहीं करती हैं
झुकती नहीं हैं सज़दे में ज़रा भी
सजने-संवरने से दूर ही रहती हैं मगन
बदलती नहीं हैं अपना रॅंग, रॅंगत अपनी
पवित्र हैं,क़ायम हैं आचरण में क़िताबें
ईश्वर अगर है कहीं भी पृथ्वी पर तो है यहीं
क़िताबों की शक़्ल में ही है वह हर कहीं
जैसे हद-बेहद-अनहद,निराकार-निरापद
वे परम पारदर्शी भी होती हैं हिम्मतों जैसी
क़िताबों में घनी गहरी छुपी होती है आग
आशय भी आग का समझाती हैं क़िताबें ही
आग नहीं बाग़ लगाती हैं दोस्त क़िताबें
और करती हैं मुक्त सभी को...


- राजकुमार कुम्भज


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वेलेंटाइन डे
सुनो सीधी सादी लड़कियों,
उसी से लेना प्रेम का ये फूल,
जो निकाल सके तुम्हारे जीवन पथ पर
आने वाला हर शूल।
जिसकी आंखों में विश्वास की गहराई हो,
तुम्हारा उदास चेहरा देखकर
जिसकी आंखें भर आई हो।
जो तुम्हारे मौन से भी संवाद करे,
सिर्फ एक दिन नहीं,
हर दिन तुमसे प्यार करे।
लड़के भी प्रेम का बस इतना सम्मान करें,
विश्वास ना टूटे कभी,
बस इतना ध्यान करें।
रिश्तों में अगर इस खूबसूरती का एहसास है,
यकीन मानिये,
हर दिन वेलेंटाइन डे से भी खास है।


- आकाश आरसी शर्मा


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चेहरा देखना चाहते थे करीब से
दिल में उमड़ रही थी चाहत,
चल रही थी बात सगाई की अभी
बिन चित्र दिल था आहत,
मधु मास का था ये पावन मास
कोई नहीं था अभी दिल के पास,
कैसा होगा रूप प्रिया का,
कैसा करती होगा श्रृंगार,
यक्ष प्रश्न ये मन में उठता
प्यार हमारे दिल में खटकता,

प्यार मुहब्बत की जब बातें चलतीं
कईयों के चेहरे पर कुछ ज्यादा फबती,
बातें प्यार की जब हम सुनते,
कभी लोट-पोट तो कभी शर्मिन्दा होते,
बजुर्गों की जब सुनते कहावतें,
प्यार का मतलब तब क्या ही समझते
उल-जलूल ये बातें लगती,
मन में हमारे बहुत खटकती,

बचपन गया, देखो जबानी आई
मधु मास की बेला आई,
प्यार का लड्डू फूटा मन में
कैडबरी के विज्ञापन की याद आई,
"शादी का लड्डू देखो बड़ा प्यारा"
"जो खाए वो भी पछताए,न खाए वो भी पछताए"
बात पक्की हुई सगाई की,
होने वाली प्रिया एक दिन पहले कॉल आई,
कैसे शुरुआत हो बातों की,आफत नई ये सामने आई,

डरते-डरते बातें करते,
मन की बातें होंठों पर आई
धुक-धुकी बढ़ी दिल में,
मिलन की जब बारी आई,
देखा जब एक-दूसरे को,
खुल कर बातें सामने आई
माता-पिता बने समधी,पक्की हुई देखो सगाई
मधु मास के मदन महीने में
आंगन में बजी शहनाई,
शादी के बंधन में बंधे एक-दूसरे से,
शक्ले फ़िर वही याद आई,
शक्ले फ़िर वही याद आई ।


- बाबू राम धीमान


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