साहित्य चक्र
Showing posts with label hindi lekh. Show all posts
Showing posts with label hindi lekh. Show all posts

18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


05 July 2026

योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

07 June 2026

उत्तराखंड की संस्कृति का सच्चा सिपाही: झुसिया दमाई


भारत के अधिकांश राज्यों की संस्कृति को बचाने का सबसे अधिक श्रेय उन लोगों को जाता है जो लोक संगीत, गायन आदि के माध्यम से संस्कृति और सभ्यता को जन-जन तक पहुंचा कर जिंदा रखते है। भारत में जिन लोगों ने संस्कृति और सभ्यता का बोझ अपने कंधों पर उठाया, उन लोगों के साथ भारतीय समाज ने कभी भी न्याय नहीं किया; बल्कि उन लोगों को भेदभाव, अपमान और अत्याचार का शिकार होना पड़ा।

आज भले ही कुछ लोग संगीत और गाना-बजाना इत्यादि के जरिए खूब शोहरत हासिल कर रहे हैं, मगर एक समय था जब इस काम को करने वालों के साथ समस्त समाज जातीय भेदभाव करता था। इसी भेदभाव के कारण देश के कई राज्यों की संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर आ गई है।





आज हम बात करेंगे उत्तराखंड की संस्कृति और सभ्यता को जिंदा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले झुसिया दमाई की। झुसिया दमाई का जन्म 1910 में बस्कोट, नेपाल में हुआ था। यह क्षेत्र उत्तराखंड के कुमाऊं से जुड़ा हुआ है। इसलिए झुसिया दमाई को आधा नेपाली आधा (भारतीय) कुमाऊनी कहा जाता है। दमाई उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल क्षेत्र में पाए जाने वाली जाति है।

सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के कारण भारत सरकार ने इस जाति को अनुसूचित जाति में रखा है। दमाई जाति का इतिहास बताता है कि ये मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में देवताओं को अवतरित करने का काम यानी जागर लगाने का काम करते थे। झुसिया दमाई भी इसी जाति से आते थे। अनपढ़ होने के बाद भी झुसिया दमाई देवताओं का श्रुति गान, वीरगाथाएं, भड़गाथा, श्रुति गीत, देव श्रुति, भगनौल, हुड़का और ढोल वादन आदि कला में परिपूर्ण थे।





उत्तराखंड में जब भी संस्कृति, सभ्यता और संगीत की बात होती है तो झुसिया दमाई का नाम जरूर लिया जाता है। झुसिया दमाई को यह काम उसके पिता रानुवां दमाई के द्वारा आर्थिक मजबूरी व गरीबी में मिला था। कहते हैं ना आर्थिक मजबूरी और गरीबी इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

कभी-कभी मुझे हैरान होती है यह जानकारी कि भारतीय समाज में एक समाज के साथ पूरा समाज भेदभाव करता है और जिस समाज के साथ भेदभाव होता है, वह समाज देवताओं का आह्वान करता यानी देवताओं को बुलाता है। मेरा प्रश्न है- जिस समाज के आह्वान से देवता आ जाते हैं, वह समाज कैसे अपवित्र और अछूत हो सकता है ?


- दीपक कोहली



28 April 2026

आत्म-सम्मान, स्वार्थ और संबंधों का बदलता स्वरूप- एक समग्र दृष्टिकोण


आज का समय विचारों के परिवर्तन का समय है, जहाँ एक ओर हमें बचपन से मिले संस्कार हैं और दूसरी ओर जीवन के अनुभवों से उपजी नई समझ। बचपन में हमने सीखा कि दूसरों की खुशी का ध्यान रखना चाहिए, परिवार को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए और हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। ये सिद्धांत हमारे व्यक्तित्व की नींव बनाते हैं और समाज को एकजुट रखते हैं।

किन्तु जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, अनुभव हमें यह भी सिखाते हैं कि केवल दूसरों के लिए जीना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति स्वयं के अस्तित्व, भावनाओं और आत्म-सम्मान की उपेक्षा करता है, तो वह भीतर से कमजोर होने लगता है। यहीं से एक नई समझ जन्म लेती है- स्वयं को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है जितना दूसरों को देना।





आत्म-सम्मान और स्वार्थ: असली अंतर

समाज में अक्सर “खुद को महत्व देना” स्वार्थ समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह आत्म-सम्मान है। स्वार्थ वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति केवल अपने हित के बारे में सोचता है, चाहे उससे दूसरों को नुकसान ही क्यों न हो। वहीं आत्म-सम्मान वह भावना है जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं, अपने अधिकारों और अपनी गरिमा को भी उतना ही महत्व देता है जितना वह दूसरों को देता है। अपनी खुशी का ध्यान रखना, अपनी सीमाएँ तय करना और अपनी ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग करना- ये सभी आत्म-सम्मान के संकेत हैं, न कि स्वार्थ के।

ऊर्जा और भावनाओं का सही उपयोग

हर व्यक्ति के भीतर एक सीमित लेकिन अत्यंत मूल्यवान भावनात्मक ऊर्जा होती है। यदि हम इसे उन लोगों पर खर्च करते हैं जो हमारे प्रेम, सम्मान और प्रयासों को महत्व नहीं देते, तो यह ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी भावनाओं और ऊर्जा का निवेश उन संबंधों में करें जहाँ हमें समझ, सम्मान और स्नेह प्राप्त हो। यह निर्णय कठिन अवश्य हो सकता है, किन्तु यह मानसिक और भावनात्मक संतुलन के लिए आवश्यक है।

रिश्तों का सच: पारस्परिकता का महत्व

एक स्वस्थ संबंध वही है जिसमें दोनों पक्षों से समान रूप से सम्मान, प्रेम और समझ हो। यदि कोई व्यक्ति लगातार अपने संस्कार, मेहनत, भावनाएँ और खुशियाँ किसी संबंध में देता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह बदले में भी वही अपेक्षा करे। यह अपेक्षा गलत नहीं है, बल्कि मानवीय संबंधों की बुनियाद है। किन्तु यदि बार-बार प्रयासों के बावजूद उपेक्षा, अनादर या असंतुलन बना रहता है, तो ऐसे संबंधों से दूरी बनाना आत्म-सम्मान की रक्षा का कदम होता है, न कि स्वार्थ का।





महिलाओं के संदर्भ में बदलती सोच

यह विषय महिलाओं के जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है। पारंपरिक समाज में महिलाओं को यह सिखाया गया कि उनका पहला कर्तव्य परिवार के प्रति है- चाहे इसके लिए उन्हें अपने आत्म-सम्मान तक का त्याग क्यों न करना पड़े। “इज्जत” और “समाज” के नाम पर उन्होंने अनेक बार अन्याय सहा। “मायका” और “ससुराल” के बीच उनकी पहचान सीमित कर दी गई, जैसे उनके लिए कोई तीसरी जगह हो ही नहीं सकती। किन्तु आज की महिला इस सोच को बदल रही है। वह यह समझ रही है कि सम्मान और प्रेम एकतरफा नहीं हो सकते। यदि उसे किसी संबंध में लगातार उपेक्षा या अपमान का सामना करना पड़ता है, तो उस संबंध से बाहर आना उसका अधिकार है।

दुर्भाग्यवश, इस आत्म-सम्मान को कई बार “अहंकार” या “जिद” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वास्तव में यह वर्षों से दबे हुए आत्म- सम्मान की पुनर्स्थापना है। आज की महिला अपने जीवन में ऐसे हालात स्वीकार नहीं करना चाहती, जिन्हें उसने अपनी पिछली पीढ़ियों की महिलाओं को सहते हुए देखा है।

स्वयं के लिए निर्णय लेना: स्वार्थ नहीं, समझदारी

जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसके प्रयासों, भावनाओं और सम्मान का मूल्य नहीं समझा जा रहा, तब उसे अपने लिए निर्णय लेने का अधिकार है। ऐसे लोगों और परिस्थितियों से दूरी बनाना, जो हमारे मानसिक और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करते हैं, एक आवश्यक कदम है। यह निर्णय समाज की पारंपरिक सोच के विपरीत लग सकता है, किन्तु यह आत्म-सम्मान और आत्म-सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।






निष्कर्ष: संतुलन ही समाधान है

जीवन हमें यह सिखाता है कि न तो पूर्ण रूप से दूसरों के लिए जीना सही है और न ही केवल अपने लिए। सही मार्ग वह है जहाँ हम दूसरों के प्रति संवेदनशील रहें, उनके लिए सम्मान और प्रेम बनाए रखें, लेकिन साथ ही अपने आत्म-सम्मान और गरिमा से कोई समझौता न करें।

यदि हम दूसरों को प्रेम, सम्मान और महत्व देते हैं, तो हम भी उसके अधिकारी हैं। जहाँ यह संतुलन बना रहता है, वहीं संबंध मजबूत और सार्थक बनते हैं। और जहाँ यह संतुलन बार-बार टूटता है, वहाँ अपने लिए सही निर्णय लेना ही सच्ची समझ और परिपक्वता का परिचायक है। अंततः, एक सशक्त समाज वही है जहाँ व्यक्ति अपने संस्कारों को संजोते हुए, अपने आत्म-सम्मान के साथ जीवन जी सके- और यही संतुलन हमें एक बेहतर और अधिक संवेदनशील समाज की ओर ले जाता है।


- कंचन चौहान


27 April 2026

हीट वेव की मार, क्या करें सरकार!



उफ्फ! ये गर्मी मार ही डालेगी। इन दिनों इस वाक्य को देश का हर नागरिक दोहरा रहा है। गर्मी ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरकार को हाई अलर्ट जारी करना पड़ रहा है। आम नागरिक जो रिक्शा चलाता है, मजदूरी करता है और कारखानों में काम करता है, उसके लिए एक और चुनौती पहाड़ की तरह खड़ी है। कड़ाके की ठंड और गर्मी की मार सिर्फ आम नागरिकों पर पड़ती है। इसलिए किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारा देश में आम नागरिकों की समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं होती है।




विकास के नाम पर कभी हम हसदेव के जंगलों को तो कभी उत्तराखंड और महाराष्ट्र के जंगलों को काट देते हैं। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 सालों में देश में वनों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। इतना ही नहीं विकास के लिए हम सड़कों के आसपास वाले जो पेड़ काटते हैं, उनके बदले में जो पौधे लगाने चाहिए, वह लगते तो है, मगर उनमें से एक या दो प्रतिशत पौधे ही पेड़ बन पाते हैं। इस विषय पर अब हमारी सरकारों, राजनेताओं और आम जनता को गंभीरता से सोचना होगा। नहीं तो वह बहुत समय दूर नहीं जब गर्मी के कारण लोग मरने लग जाएंगे और गर्मी एक आपात स्थिति पैदा कर सकती है।

बतौर नागरिक हमें अपने आसपास के पेड़ों को काटने से बचना होगा। इसके अलावा अपने समाज, अपने गांव, मोहल्ले में एक मुहिम चलानी होगी, जिसके तहत वृक्षारोपण हो और उन पौधों को संरक्षण प्रदान कर उन्हें समय पर खाद व पानी देकर पेड़ में बदलना होगा। इतना ही नहीं बल्कि विवाह, नामकरण जैसे शुभ कार्यों में भी वृक्षारोपण और वृक्ष दान देने की परंपरा शुरू करनी होगी। धार्मिक यात्रा, मूवी देखना इत्यादि फिजूल खर्च करने से बेहतर है कि उन पैसों से अपने गांव में रह रहे किसी रिश्तेदार या दोस्त से 10 पेड़ अपने परिवार के नाम से लगाने के लिए कहिए और उसको 3-5 साल तक हर महीने ₹200-300 भेजिए। और समय-समय पर उन पौधों की फोटो मंगवाए।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को पर्यावरण को लेकर विशेष योजना बनाने की जरूरत है। वक्त रहते अगर इस पर सरकारें काम नहीं करेगी तो हमारे पास विकास, संसाधन सब होगा, मगर सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और पर्यावरण नहीं होगा। आधुनिकता के इस दौड़ में कितना भागोगे और संसाधनों की खरीद कब तक करोगे ? कम से कम अपने क्षेत्र, राज्य, देश का पर्यावरण और प्रकृति को बेहतर बनाने के लिए हम सभी को साथ में आकर सोचा होगा। नहीं तो हीट वेव का शिकार हम सभी होंगे और इससे हमारा जीवन प्रभावित होगा।


                                                       - दीपक कोहली


28 March 2026

लेखः जल है तो कल है

'जलमेव जीवनम्' (जल ही जीवन है) संस्कृत की प्रचलित सूक्ति जल के महत्त्व को दर्शाती है। प्राचीन ऋषियों ने जल के महत्त्व को स्वीकार करते हुए हजारों वर्षों पूर्व ही घोषणा कर दी थी-


'जलं हि जीवनस्य मूलं, नित्यं पातव्यं सुविशुद्धम्।
विना जले न तिष्ठेतु जगत्सर्वं सजीवनम्'।"


जिसका अर्थ है कि जल ही जीवन का मूल है, हमें हमेशा शुद्ध जल पीना चाहिए। जल के बिना यह संपूर्ण संसार नहीं टिक सकता।

और भी संस्कृत श्लोक में बताया गया है-

"पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम् सुभाषितं।
मूढ़ै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।"






पृथ्वी पर तीन रत्न पाए जाते हैं: जल, अन्न और सुंदर वचन। पुराणों में जल को रत्न के रूप में अभिहित किया गया है। पृथ्वी पर सीमित मात्रा में पेयजल उपलब्ध है। पृथ्वी का स्थलीय भाग 30% है जबकि जल की उपलब्धता 70% से अधिक है; लेकिन इस 70% जल में से पीने योग्य जल महज 3% है। जबकि 97% जल महासागरों में है, जो खारा व अपेय है।

जल के स्रोत-

(i) जल के प्राकृतिक स्रोत: जल के प्राकृतिक स्रोत में नदियाँ, हिमनद, झीलें, तालाब, झरने, समुद्र और महासागर हैं। जिनमें ताजा जल के स्रोत- नदियाँ, झीलें व हिमनद हैं। खारे जल के स्रोत - समुद्र और महासागर हैं।

(ii) मानव निर्मित जल स्रोत: जल मानव निर्मित जल स्रोतों में कुएँ, ट्यूबवेल, बाँध, जलाशय, नहरें, चैक डैम आदि हैं।

3% पीने योग्य जल में 68.7% ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ से उपलब्ध होता है, 30.1% भूजल (Ground Water) और 1.2% सतही जल (नदियों, झीलों) के रूप में उपलब्ध है।

जल की वर्तमान स्थिति-

UN-INWEH (United Nations University Institute for Water, Environment and Health) के द्वारा जारी वैश्विक जल दिवालियापन रिपोर्ट के अनुसार संपूर्ण विश्व जल दिवालियापन की ओर अग्रसर है तथा वैश्विक कृषि के लिए संकटोत्तर युग का संकेत दिया गया है।

जल दिवालियापन एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी क्षेत्र का जल उपयोग उसकी नवीकरणीय आपूर्ति (बारिश, नदियों) से लगातार अधिक होता है, जिससे भूजल भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय नुकसान होता है। दुनिया की आधी से ज्यादा झीलें 1990 के दशक से सिकुड़ रही हैं। कई नदियाँ अब समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं।

1970 के बाद से 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) नष्ट हो चुकी हैं। विश्व की प्रमुख नदियां - सालवीन नदी, गंगा नदी ( दुनिया की 8% आबादी की जीवनरेखा), सिंधु नदी, मेकांग नदी, यांगत्से नदी, डेन्यूब नदी, रियो दे ला प्लाटा बेसिन, रियो ग्रांडे नदी, नील नदी और मरे- डार्लिंग बेसिन ये विश्व की प्रमुख नदियां आज खतरे में है।

हाल ही में 'विक्टोरिया झील' जो अफ्रीका की सबसे बड़ी व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है , इसके पानी में सायनोबैक्टीरिया के अत्यधिक प्रसार के कारण झील का पानी जहरीला हो रहा है जिससे लोगों के पेयजल और मछली उद्योग के लिए संकट खड़ा हो गया है। 2025 में भारत के सबसे स्वच्छ शहर 'इंदौर' (मध्य प्रदेश) में पेयजल के संदूषित होने के कारण स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो गया।






चिंताएँ और मुद्दे:- जल दिवालियापन के पैटर्न

(i) प्रणालीगत वैश्विक जल असुरक्षा- 4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष कम से कम एक माह के लिए गंभीर जल अभाव का सामना करते हैं।

(ii) घटती जल भंडारण क्षमता और कृषि तनाव- वैश्विक कृषि भूमि का 50% से अधिक भाग मध्यम या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है जिससे मृदा की आर्द्रता धारण क्षमता घट रही है और मरुस्थलीकरण तीव्र हो रहा है।


(iii) दृश्यमान वैश्विक परिणाम:- नदियाँ महासागर तक पहुँचने से पहले ही सूख जाती हैं। झीलें और हिमनद संकुचित हो रहे हैं। अत्यधिक पंपिंग के कारण भूमि धँस रही है और भूजल स्रोत लवणीय हो रहे हैं। शहर 'डे ज़ीरो' परिदृश्य का सामना कर रहे हैं।

जल संकट के आर्थिक और मानवीय प्रभाव:- जल संकट के कारण सालाना 307 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। लगभग 2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। भारत पर प्रभाव :- लगभग 60 करोड़ भारतीय 'उच्च जल तनाव' (Water Stress) का सामना कर रहे हैं। भारत के पास विश्व की 18% आबादी है, लेकिन केवल 4% मीठे जल के संसाधन हैं।

भारतीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने "गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2025" जारी की है- गतिशील भौमजल ( Dynamic Ground Water ) संसाधन का आकलन केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (cgwb)तथा राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्र द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है






रिपोर्ट एक नज़र:- वार्षिक भौमजल का पुनर्भरण (Recharge): कुल वार्षिक भौमजल पुनर्भरण 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंका गया है। यह वर्ष 2024 के 446.9 BCM की तुलना में आंशिक वृद्धि दर्शाता है।

भौमजल का दोहन:- दोहन योग्य वार्षिक भौमजल संसाधन बढ़कर 407.75 BCM हो गए हैं। वर्ष 2024 में इसकी मात्रा 406.19 BCM थी। वर्ष 2025 के लिए देश भर में कुल वार्षिक भौमजल दोहन की मात्रा 247.22 BCM आकलित की गई है। भौमजल दोहन का स्तर: देश में दोहन योग्य उपलब्ध कुल भौमजल संसाधन में से लगभग 60.63% भौमजल का प्रत्येक वर्ष उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी क्षेत्रों में उपयोग शामिल है।

आकलन इकाइयों का वर्गीकरण:- देश में कुल 6746 आकलन इकाइयाँ हैं। इनका वर्गीकरण निम्न प्रकार है:-

73.4% इकाइयाँ - सुरक्षित (SAFE)
10.5% इकाइयाँ - अर्ध संकटग्रस्त (SEMI CRITICAL)
3.05% इकाइयाँ - संकटग्रस्त (CRITICAL)
11.1% इकाइयाँ - अत्यधिक दोहित (OVER-EXPLOITED)


अत्यधिक दोहित इकाइयों का क्षेत्रीय संकेंद्रण:-

उत्तर-पश्चिम भारत: (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश)
पश्चिम भारत: (राजस्थान, गुजरात)
दक्षिण भारत: (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश)
1.8% इकाइयाँ- लवणीय (Saline)

रिपोर्ट में भूजल आकलन श्रेणियों की परिभाषा:- अत्यधिक दोहित (Over-Exploited): जहाँ भूजल का दोहन स्तर वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) से अधिक है। अर्ध संकटग्रस्त (Semi-Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70-90% उपयोग (दोहन) कर लिया जाता है।

संकटग्रस्त (Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 90-100% उपयोग कर लिया जाता है। सुरक्षित (Safe): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70% से कम उपयोग किया जाता है।

भूजल दोहन में राजस्थान की स्थिति (कुल 302 ब्लॉक):-
अति दोहित ब्लॉक- 214
संवेदनशील / संकटग्रस्त- 27
अर्ध संवेदनशील- 21
सुरक्षित ब्लॉक- 37
लवणीय ब्लॉक- 3






जल संकट का समाधान व मुख्य सुझावः- जो अमूल्य और सीमित थाती हमें हमारे पूर्वजों से मिली (जल, वन, वनस्पति) उसे हमारी भावी पीढ़ियों को सौंपना हमारा दायित्व भी बनता है और धर्म भी। उक्त रिपोर्ट के अनुसार आज विश्व 'भयंकर जल संकट' का सामना कर रहा है। अब हमें 'संकट प्रतिक्रिया' के बजाय 'जल प्रबंधन' पर ध्यान देना होगा। उपलब्ध जल का उचित उपयोग ही करना होगा, अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब समूचा विश्व 'जल युद्ध' लड़ रहा होगा।

भूजल को सामूहिक धरोहर मानना होगा। इस पर केवल अपना ही अधिकार नहीं है, यह धरोहर उनके लिए भी सुरक्षित रखनी होगी जो अभी मौजूद ही नहीं हैं। पानी के पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ाना होगा। वैश्विक स्तर पर काम कर रही संस्थाओं को न केवल रिपोर्ट जारी कर 'इतिश्री' कर लेनी होगी; बल्कि जल संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने होंगे, सरकारों को कड़े फैसले लेने होंगे।

हर व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनकर जल का अनुचित प्रयोग न करके उसका सदुपयोग करना होगा। जिसमें उसके दैनिक दिनचर्या के समस्त क्रियाकलापों से लेकर अपने दायित्व के रूप में अत्यधिक पौधारोपण, जल स्रोतों के रखरखाव संबंधी आदतों को जीवन में अनुस्यूत करना होगा। राजस्थान द्वारा जल शक्ति अभियान: कैच द रेन,रिज टू वैली जैसे जल संरक्षण प्रयासों को मॉडल के तौर पर अपनाकर जल संरक्षण किया जा सकेगा। वरना रहीम जी के अनुसार 'बिन पानी सब सून' ही रह जाएगा।


" यूं तो धरा पर जल ही जल है,
पर उसमें भी 'अपेय' प्रबल है।
बिन जल सब जीव विकल है,
सनद रहे -"जल है तो कल है।"



- वीरदत्त गुर्जर



23 March 2026

नारी सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों का संतुलन


नारी के बढ़ते आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता ने समाज में नई चेतना जगाई है, लेकिन इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठने लगा है कि बदलते समय में पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं का स्वरूप क्या होगा। जैसे-जैसे महिला शिक्षा का विस्तार हो रहा है और महिलाएँ आत्मनिर्भर बन रही हैं, मन में एक दुविधा और असमंजस बार-बार उठता है कि क्या आने वाले समय में हमारी पारिवारिक संस्था और वैवाहिक संस्था उसी प्रकार चल पाएँगी, जैसे अब तक चलती आ रही हैं।





क्योंकि महिलाओं में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं, लेकिन समाज-विशेषकर पुरुषों में- उतनी तेजी से बदलाव नहीं आ रहे। पुरुष की मानसिकता आज भी काफी हद तक यही है कि एक औरत पहले अपने घर को संभाले और उसके बाद यदि वह आत्मनिर्भर बनना चाहती है तो अपने परिवार को प्राथमिकता देते हुए ही अपने काम को संभाले।

लेकिन आज की महिला का तर्क है कि जब वह पुरुष के बराबर बाहर का काम करती है और जिम्मेदारियाँ निभाती है, तो घर में भी दोनों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। घर का काम किसी लिंग विशेष से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाना चाहिए। जब भोजन करना दोनों की समान आवश्यकता है, तो भोजन बनाना केवल स्त्री का ही काम कैसे माना जा सकता है ?




बड़े शहरों में इस सोच में कुछ बदलाव अवश्य दिखाई देता है, लेकिन यह कहना कि वहाँ इसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है, शायद सही नहीं होगा। इसी कारण आज की बहुत-सी लड़कियाँ विवाह और पारिवारिक बंधन में बंधने से हिचकती हैं। वे अपने बच्चों और घर की पूरी जिम्मेदारी अकेले नहीं संभालना चाहतीं। शायद इसी मानसिकता के चलते हमारी पुरातन वैवाहिक और पारिवारिक व्यवस्था भी कहीं-न-कहीं चुनौती के दौर से गुजर रही है।

वास्तव में प्रकृति ने नर और नारी दोनों को समान बनाया है। भेदभाव समाज की देन है, प्रकृति की नहीं। लंबे समय तक स्त्री के मन में यह धारणा स्थापित कर दी गई कि वह सहनशीलता की मूर्ति है- वह सहना जानती है, संघर्ष करना जानती है और पुरुष के अन्याय को भी चुप रहकर सहना जानती है। उसके मन में यह बात बैठा दी गई कि एक अच्छी महिला वही है जो अत्याचार सहकर भी अपने घर और परिवार को संभालकर रखे।




यदि उन तथाकथित अधिकारों की बात करें जो बाद में उसे मिलते हैं, तो अक्सर वे केवल इतने ही होते हैं कि उसे रहने के लिए एक घर और खाने के लिए रोटी मिल जाए। लेकिन समय के साथ दिशा भी बदली है और नारी की दशा भी बदली है। आज नारी आत्मनिर्भर हो गई है और वह किसी प्रकार की गुलामी सहन करने को तैयार नहीं है। लेकिन इस बदलती मानसिकता के चलते यह भी चिंता सामने आ रही है कि कहीं भारत की सुंदर वैवाहिक और
पारिवारिक परंपरा खतरे में न पड़ जाए।

एक ओर कुछ महिलाएँ विद्रोह की भावना से घर-परिवार की जिम्मेदारियों से दूरी बनाना चाहती हैं और अपने तरीके से जीवन जीना चाहती हैं। यदि हम पुरातन कथाओं की ओर देखें तो कहा जाता है कि स्वर्ग की अप्सराएँ किसी श्राप के कारण कुछ समय के लिए पृथ्वी पर आती थीं और समय पूरा होने पर बिना किसी मोह-माया के वापस चली जाती थीं। आज कहीं-न-कहीं ऐसी स्थिति बनती दिखाई देती है कि कुछ महिलाएँ अपने जीवन को केवल अपने ही तरीके से जीना चाहती हैं।




मुझे लगता है कि इस समाज और इसकी सुंदर परंपराओं को बचाने का एक ही उपाय है। जिस प्रकार पुरुषों ने धीरे-धीरे स्त्री के मन में यह विचार स्थापित किया कि वह सहनशीलता की मूर्ति है और घर को जोड़कर रखना उसी की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार अब स्त्रियों को भी अपने विचारों और अपनी सहनशीलता के माध्यम से पुरुषों के मन में समान जिम्मेदारी की भावना स्थापित करनी होगी। इसके लिए शुरुआत करनी होगी अपने ही घर से- अपने बेटों से। उन्हें यह सिखाना होगा कि घर की जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी है।

इसके साथ ही हमें अपनी बेटियों के मन में भी यह बात स्थापित करनी होगी कि घर का काम करना या पारंपरिक रूप से “महिलाओं के काम” माने जाने वाले कार्य करना किसी भी प्रकार से उन्हें छोटा नहीं बनाता। मनुष्य जीवन की यह सच्चाई है कि यदि वह इस संसार में आया है, तो जीवन के लिए अनेक प्रकार के कार्य करने ही पड़ते हैं और उनका किसी लिंग विशेष से कोई संबंध नहीं होता।




अपनी बेहतरी और जीवन के निर्वाह के लिए कुछ काम हमें स्वयं करने ही पड़ते हैं। यह आवश्यक नहीं कि पुरुषों के कार्यों को अपनाकर या पुरुषों की तरह व्यवहार करके ही हम श्रेष्ठ सिद्ध हों या हमें सम्मान मिले। हमें अपने मूल गुणों को त्यागना नहीं है, बल्कि अपने अच्छे संस्कारों और सकारात्मक गुणों को समाज में भी स्थापित करना है।

यदि स्त्री केवल विद्रोह का मार्ग अपनाएगी तो समाज का कल्याण नहीं होगा और इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों में देखने को मिल सकते हैं। आवश्यक है कि स्त्री और पुरुष दोनों प्रतिस्पर्धा या विद्रोह नहीं, बल्कि साझेदारी के भाव से जीवन जिएँ।

समाज की बेहतरी के लिए नारी को एक बार फिर अपने संयम और सहनशीलता के गुणों को सशक्त रूप में स्थापित करना होगा और इन्हीं मूल्यों को पुरुषों के मन में भी विकसित करना होगा। तभी आने वाली पीढ़ियाँ सम्मान, सहयोग और समानता के साथ जीवन जी सकेंगी और लिंगभेद से मुक्त एक संतुलित तथा सुखी समाज का निर्माण कर पाएँगी।


- कंचन चौहान



18 February 2026

एपस्टीन फाइल्सः सच, सन्नाटा और समाज का आईना


Jeffrey Epstein का नाम आज केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है; वह एक ऐसे अंधेरे अध्याय का प्रतीक बन चुका है, जिसने मानवता, न्याय और नैतिकता- तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। “एपस्टीन फाइल्स” केवल कागज़ों का पुलिंदा नहीं हैं। वे उन अनसुनी आवाज़ों की प्रतिध्वनि हैं, जिन्हें कभी शक्ति, प्रभाव और धन के शोर में दबा दिया गया था।





जब यह मामला सामने आया, तो दुनिया ने देखा कि कैसे प्रभावशाली लोगों के बीच भी अपराध छिप सकते हैं। कैसे सत्ता और संपर्क कभी-कभी सच्चाई पर पर्दा डाल देते हैं। और कैसे पीड़ितों की चुप्पी को वर्षों तक अनसुना किया जाता है। इन फाइल्स में सिर्फ नाम नहीं हैं- इनमें विश्वासघात की कहानियाँ हैं, टूटे हुए बचपन हैं, और उस समाज का आईना है जो कभी-कभी सच जानकर भी चुप रह जाता है।

कई लोगों के लिए यह केवल एक “स्कैंडल” हो सकता है। पर जिनकी ज़िंदगियाँ प्रभावित हुईं, उनके लिए यह जीवन भर का घाव है। एपस्टीन की कहानी हमें यह सिखाती है कि न्याय में देर हो सकती है, पर सच को पूरी तरह दफन नहीं किया जा सकता। जब दस्तावेज़ खुलते हैं, तो केवल तथ्य नहीं निकलते- वे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी उजागर करते हैं।

यह आलेख किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि एक स्मरण के लिए है- कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके प्रभावशाली लोगों में नहीं, बल्कि उसके नैतिक साहस में होती है। जब भी “एपस्टीन फाइल्स” का नाम लिया जाएगा, वह हमें याद दिलाएगा- कि चुप्पी भी कभी-कभी अपराध की साझेदार बन जाती है। और सच बोलना, चाहे देर से ही सही, मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।


- प्रफुल्ल सिंह "संवेदन स्पर्श"


सादगी की रोशनी


शहर की चमक-दमक में पला-बढ़ा आरव हमेशा मानता था कि सफलता का मतलब बड़ा घर, महँगी गाड़ी और लोगों के बीच प्रसिद्धि है। कॉलेज से निकलते ही उसने एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। तनख्वाह अच्छी थी, जीवन तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा था, पर भीतर कहीं एक अजीब-सी खालीपन की धुंध छाई रहती।

एक दिन कंपनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसे पहाड़ों के एक छोटे-से गाँव जाना पड़ा। वहाँ इंटरनेट कम चलता था, सड़कें कच्ची थीं और बाजार भी छोटा था। आरव को लगा जैसे वह समय में पीछे आ गया हो। गाँव में उसकी मुलाकात हुई- एक बुज़ुर्ग शिक्षक, शंभूनाथ जी से।





वे एक छोटे-से कच्चे घर में रहते थे। पहनावा साधारण, भोजन सादा, लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति। गाँव के बच्चे उन्हें “गुरुजी” कहते और रोज़ शाम को उनके आँगन में पढ़ने आते।

आरव ने एक दिन उनसे पूछा, “गुरुजी, आपने शहर जाकर बड़ी नौकरी क्यों नहीं की? यहाँ तो सुविधाएँ भी नहीं हैं।”

शंभूनाथ जी मुस्कराए, “बेटा, सुविधा और सुख एक नहीं होते। सुविधा बाहर से मिलती है, सुख भीतर से उगता है। मैंने सादगी चुनी, क्योंकि सादगी मन को हल्का रखती है।”

आरव चुप हो गया। अगले कुछ दिनों में उसने देखा- गुरुजी बच्चों को पढ़ाने के बाद खेतों में किसानों की मदद करते, बीमारों के लिए जड़ी-बूटियाँ लाते और शाम को नदी किनारे बैठकर ध्यान करते। उनके पास धन नहीं था, पर सम्मान और स्नेह की संपदा अपार थी।

एक शाम आरव नदी किनारे उनके साथ बैठा था। पहाड़ों के पीछे सूरज ढल रहा था। गुरुजी बोले, “सादगी का अर्थ अभाव नहीं है। यह तो इच्छाओं का संयम है। जब मन अनावश्यक चाहतों से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची समृद्धि को पहचानता है।”

उनकी बातें आरव के मन में गूंजती रहीं। शहर लौटते समय उसने महसूस किया कि गाँव की शांति उसके भीतर कहीं बस गई है। शहर आकर उसने अपने जीवन की रफ्तार धीमी की। अनावश्यक खर्च कम किए, सप्ताहांत में झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और हर दिन कुछ समय स्वयं के लिए निकालने लगा। धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी वही संतोष झलकने लगा, जो उसने गुरुजी में देखा था।




कुछ महीनों बाद जब वह फिर गाँव गया, तो गुरुजी ने उसे देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें तुम्हारी सच्ची संपदा मिल गई।” आरव ने नम्रता से उत्तर दिया, “हाँ गुरुजी, अब समझ आया कि सादगी ही सच्ची संपदा है।”

उस दिन आरव ने जाना- धन से जीवन सजता है, पर सादगी से जीवन संवरता है। बाहरी वैभव क्षणिक है, पर सरलता और संतोष ही वह दीपक हैं जो जीवन भर प्रकाश देते हैं।


- रेखा चंदेल



मेरा और तुम्हारा ईश्वर!


तुम्हारे और मेरे धार्मिक होने में धरती और आसमान का फर्क है। तुम पंडित, मौलाना, पादरी और आदि धर्म गुरु के बताए गए मार्गों या कर्मों को ही धर्म समझ लेते हो। मगर मैं अन्याय के खिलाफ लड़ना, सच को सच व गलत को गलत कहना और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने को अपना धर्म मानता हूं। मेरे से नहीं होती काम चोरी, मेरे से नहीं बोला जाता झूठ, मैं इंसानों में नहीं कर पाता हूं भेद और मैं अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करता हूं, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा धार्मिक नहीं हूं। 





हां तुम करते होंगे दिन-रात पूजा-पाठ और पांच वक्त की नमाज़ अदा... मगर मैं नहीं करता। क्योंकि मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे किसी भी बंधन में नहीं बांधता है। तुम्हारे ईश्वर और अल्लाह ने तुम्हारे लिए नियमों की सूची बना रखी है। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे सभी जीव जंतुओं को बराबर मानने या देखने को कहता है। तुमने अपने ईश्वर और अल्लाह को कभी देखा नहीं होगा, मगर मैं अपने ईश्वर (प्रकृति) को हर रोज देखता और महसूस करता हूं। मेरा ईश्वर (प्रकृति)मुझ से हर रोज सूर्य की पहली किरण के साथ संवाद की शुरुआत करता हैं और शाम की संध्या के साथ संवाद को विराम देते हैं।




मुझे नहीं पता तुम्हारा ईश्वर और अल्लाह तुम्हारे सुख-दुख में शामिल होते हैं या नहीं, मगर मेरा ईश्वर (प्रकृति) मेरे साथ हमेशा खड़ा रहता हैं। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे अपना विकराल रूप भी दिखता है, डरता है, हंसना है और मेरे लिए लड़ता भी है। इतना ही नहीं बल्कि मुझे जिंदा रखने के लिए कई बार खुद बीमार भी पड़ जाता है। बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे ईश्वर में... इसलिए मैं तुमसे अलग हूं।


                                                           - दीपक कोहली




07 February 2026

बच्चों के लिए खतरनाक बनता मोबाइल!

मोबाइल के इस युग में आपको राह चलते लोगों की अखबार पढ़ती तस्वीरें जब दिख जाती है तो लगता है कि अखबार पढ़ना इस मोबाइल के युग में कितना जरूरी है, बहुत से लोग या फिर घर में बैठे बच्चे और उनके पेरेंट्स जब कोई काम में उलझ जाते हैं तो अपने बच्चों को शांत रखने के लिए तुरंत मोबाइल फोन थमा देते हैं लो बेटा थोड़ी देर फोन देख लो, अच्छा टीवी में कार्टून देख लो इससे बच्चे के दिमाग और शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जा रहा है।





बच्चे ज्यादा देर नजर गड़ाए फोन देखते हैं वो देखते-देखते तो कई बार इंस्टाग्राम रील भी देखने लगते हैं और कई रील्स ऐसे होते हैं या फिर उसके स्क्राल करने के बाद कुछ ऐप्स के ऐड ऐसे आते हैं जिसमें दिखाया जाता है कि आप इस ऐप पर बस वीडियो देखों और हजारों रूपए कमाओं यह कहीं ना कहीं बच्चों पर पूरी तरह हावी हो जाता है।

इसलिए बच्चे को मोबाइल देते समय सोच समझकर दें देखने के लिए या फिर पेरेंट्स मोबाइल देने के बजाय उन्हें उपन्यास, कहानी की किताबें पढ़ाए या बच्चे के लायक जो अखबार आ रहे हैं जैसे बाल भास्कर उसे दिखाएं जिससे बच्चे पढ़ने की ओर कदम बढ़ाएं।

आपने हाल ही में पढ़ा और सुना भी होगा कि हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में वहां की सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है यह इसलिए किया गया है क्योंकि बच्चा मोबाइल स्क्रीन पर नजर कम डालें और पढ़ने की आदत डालें हर दिन प्रार्थना के समय कम से कम 10 मिनट अखबार पढ़ना जरूरी है और हिंदी के साथ अंग्रेजी भाषा के अखबार को भी पढ़ने के लिए कहा गया है।





विधार्थियों में पढ़ने की रूची बढ़े और इसके साथ उनका करेंट अफेयर्स भी मजबूत हो और फेक न्यूज को पहचान सकें ऐसा नियम हर राज्य के सरकारी स्कूलों में लागू किया जाना चाहिए ताकि बच्चे मोबाइल फोन से दूरी बनाकर पूरी ध्यान पढ़ाई पर लगाएं अखबार पढ़ने उसमें चित्र देखकर बच्चे धीरे-धीरे प्रेरित होकर किताब पढ़ना भी सीख जाएंगे और मोबाइल स्क्रीन से उनकी दूरी बनती चली जाएगी। अखबार पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जनरल नॉलेज में भी सुधार होता है और भाषा के साथ शब्द पर भी पकड़ अच्छी हो जाती है।


- आशीष रंजन



एपीस्टीन फाइल्स ने दिखा दी हकीकत


नैतिकता और कानून एपीस्टीन फाइल्स






एपीस्टीन फाइल्स केवल एक अंतर्राष्ट्रीय अपराध कथा नहीं है, यह सत्ता मोह का वैश्विक दस्तावेज है। यह बताती है कि जब सत्ता सेवा नहीं, भोग बन जाती है, जब पद उत्तरदायित्व नहीं, सुरक्षा कवच बन जाता है,तब अपराध केवल होता नहीं, छिपाया भी जाता है। भारतीय परम्परा में सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया, इतिहास साक्षी है कि जब मर्यादा टूटी, तो सत्ता छोड़ी गई, राम का वन गमन हो या महाभारत का युद्ध,हर कथा यही कहती है, कि पद से बड़ा धर्म होता है।

आधुनिक भारत में भी लंबे समय तक यही परंपरा रही, दो दशक पहले सरकारों के दौर में ऐसे उदाहरण मिलते है, जब सिर्फ नाम आने मात्र से मंत्रियों को पद त्याग करना पड़ा। आरोप सिद्ध हुए या नहीं, यह बाद की बात थी, नैतिक जिम्मेदारी तय होती थी। अब पद छोड़ना नही,पद बचाना प्राथमिकता बन गया है। आरोपों को राजनीतिक साजिश कह कर खारिज कर देना, नैतिकता को कानूनी तकनीक में उलझा देना, और कुर्सी से चिपके रहना, सब सत्ता मोह के लक्षण है।





एपीसटीन प्रकरण इसी मानसिकता का चरम रूप है, वह सत्ता, धन और प्रभाव ने कानून को भी बंधक बना लिया। वर्षों तक गंभीर आरोपों के बावजूद प्रभावशाली लोग सुरक्षित रहे।यह केवल न्याय की विफलता नहीं, बल्कि उस व्यस्था का नैतिक दिवालीपियन है जहां मोह सर्वोपरि हो चुका है।

भारत के लिए यह चेतावनी है। लोकतन्त्र केवल चुनाव से नहीं चलता, वह त्याग से जीवित रहता है। पद छोड़ने की क्षमता ही सत्ता को वैध बनाती है। सत्ता साधन है,साध्य नहीं। पद सेवा का माध्यम है,ढाल नहीं। यदि सत्ता मोह पर नियंत्रण नहीं हुआ,तो कानून बचेगा, लेकिन न्याय नहीं, संस्थाएं रहेंगी, लेकिन विश्वास नहीं, शरीर रहेगा लेकिन आत्मा नहीं बचेगी।


- रोशन कुमार झा



*****


जेफरी एपस्टीन


एक अमेरिकी अरबपति फाइनेंशियर जो बहुत प्रभावशाली लोगों से जुड़ा था- राजनेता, व्यवसायी, रॉयल फैमिली के सदस्य, और सेलिब्रिटीज। उसके पास कैरेबियन में एक निजी द्वीप था! यंहा नाबालिग लड़कियों की सेक्स ट्रैफिकिंग और यौन शोषण का एक संगठित नेटवर्क चलता था। एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंशियर था जो 2019 में सेक्स ट्रैफिकिंग और नाबालिगों के यौन शोषण के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।




एपस्टीन के मामले में कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के नाम सामने आए, जिनमें राजनेता, व्यवसायी और सेलिब्रिटीज शामिल थे। एपस्टीन फाइल्स एक विस्तृत, विवादास्पद और बेहद गहरी जांच का हिस्सा हैं जो दुनिया भर में शक्तियों, अपराधों और नेटवर्क के संबंधों पर बहस जगा रहे हैं। एपस्टीन की मृत्यु हो गई, जिसे आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया, हालांकि इस पर कई षड्यंत्र के सिद्धांत भी सामने आए।


- नरेंद्र मंघनानी


*****





30 January 2026

सारंडा की वादियों में...


बात 2022 की है उस दिन शनिवार था लेकिन मैं पहले ही स्कूल से छुट्टी लिया हुआ था। कारण कि उसके अगले दिन रविवार को सुबह आठ बजे राउरकेला में रेलवे की परीक्षा में शामिल होना था। चूंकि राउरकेला मेरे निवास स्थान जमशेदपुर से तकरीबन 200 किलोमीटर की दूरी पर है अतः निश्चित रूप से एक दिन पहले ही पहुंचना जरूरी था। मैं काफ़ी परेशान था क्योंकि उस शनिवार को पूरे झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में कुड़मी समुदाय का रेल टेका आंदोलन प्रस्तावित होने के कारण जमशेदपुर से न कोई ट्रेन राउरकेला के लिए थी और न ही बस। मेरे पास दो ही रास्ते बचे थे। या तो एग्जाम छोड़ दूं या बाइक से सड़क मार्ग द्वारा राउरकेला जाऊं।





मुझे सड़क मार्ग का रूट भी मालूम नहीं था फ़िर भी लोगों से जानकारी जुटाकर लगभग रूट समझ चुका था। पापा सुबह सात बजे जैसे ही नाइट ड्यूटी से लौटे मैं सीधे उनके कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने चेंज करते हुए ही मुझसे पूछा - "क्या हुआ ? परेशान लग रहे हो ?" यहां मैं बताते चलूं कि राउरकेला जाने के लिए मेरे पास अपनी पल्सर बाइक ज़रूर थी लेकिन वो इस हालत में नहीं थी कि इतनी लंबी और वो भी अनजाने रास्तों के सफ़र में ले जा सकूं। मेरे पापा हमेशा से ही हैवी बाइक्स के शौक़ीन रहे हैं और इस लिहाज़ से उनकी नई रॉयल एनफील्ड क्लासिक 350 बाइक उनकी जान थी जिसे वो किसी को चलाना तो दूर की बात,छूने तक नहीं देते थे। इसलिए उनकी बात सुनकर भी पहले तो झेंप गया।




फ़िर भी हिम्मत जुटाकर मैं एक सांस में अपनी बात कह गया - "पापा ! कल सुबह आठ बजे एग्जाम है राउरकेला में ! रेल टेका आंदोलन की वजह से कोई ट्रेन या बस नहीं चल रही है,तो मुझे आपकी बाइक चाहिए ! मुझे आज़ दोपहर को ही बाइ रोड निकलना है।" पापा बिस्तर पर लेटते हुए अप्रत्याशित रूप से सहमति जताते हुए बोले - "ठीक है ! चले जाओ। लेकिन रूट पता है ना ?" मैं ख़ुशी और रोमांच से अंदर ही अंदर चहक उठा कि एक तो नई बाइक और अकेले इतना लंबा सफ़र ! मैं ओवर एक्साइटेड होते हुए कहा - "सब पता कर लिया हूं पापा ! मेरे पारा टीचर दोस्त जगह-जगह पर रास्ते में मिलेंगे और मनोहरपुर तक मुझे सहयोग करेंगे। वहां से ज्यादा दूर नहीं है।" पापा आश्वस्त भाव से सर हिलाने के बाद बेड पर पसर गए।




दोपहर बारह बजे तक मैं अपनी पैकिंग वगैरह संपन्न कर तैयार होकर खाने बैठ गया। अचानक देखा कि पापा भी बैग पैक कर तैयार होकर वे भी मेरे साथ ही खाने के लिए बगल में बैठ गए। मैं जिज्ञासा और अचंभित भाव से उनसे पूछा - "पापा ! आप भी कहीं जा रहे हैं क्या ?" पापा मुस्कुराते हुए बोले - "मैं भी तेरे साथ चल रहा हूं। इतने लंबे सफर और अनजान रास्ते में अकेले जाना ठीक नहीं रहेगा।"

मेरी सारी एक्साइटमेंट काफूर हो गई और थोड़ा-सा मायूस हो गया क्योंकि मैं जगह-जगह दोस्तों से मिलते हुए जाने का प्लान बना चुका था। सिर्फ़ यही नहीं ! मेरे एक दोस्त सोनू सरदार के जरिए फ़ोन पर कांटैक्ट कर राउरकेला में रहने वाले उनके एक जीजाजी के माध्यम से वहां रुकने तक की व्यवस्था कर चुका था। मैं उतरा हुआ चेहरा लेकर बोला - "कुछ नहीं होगा पापा ! जगह-जगह पर मेरे दोस्त हैं ना ! मैं पहुंच जाऊंगा सही-सलामत !" पापा ने कड़े शब्दों में कहा - "मैं साथ जाऊंगा तो बस जाऊंगा। और हां ! टेंशन मत लो सारा खर्च मेरा रहेगा। तुम्हें वहां पहुंच कर जहां रुकना है रुक जाना मैं डिस्टर्ब नहीं करूंगा।" इससे आगे मैं और कुछ बोल नहीं पाया।






तकरीबन एक बजे दोपहर को मैं अपनी पत्नी से कुछ बातें कर विदा लेकर पापा के पीछे बाइक पर चुपचाप बैठकर निकल पड़ा। क़रीब ढाई बजे हमलोग चक्रधरपुर पहुंच चुके थे। यह वही चक्रधरपुर है जिसका वर्णन मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी झारखण्ड यात्रा के वृतांत में भी किया है। वहां चाय पीने के बाद चूंकि पापा को भी रूट की पूरी जानकारी नहीं थी तो उन्होंने चायवाले से आगे का रास्ता पूछा और वहां से हमलोग निकल चले। अजनबी रास्ते और विशुद्ध आदिवासी संस्कृति वाले इलाके होने के कारण कौतूहल और रोमांच का मिश्रण साथ-साथ दिमाग में चल रहा था। सोनुवा पार करने के बाद गोइलकेरा आने वाला था और गोइलकेरा से ही शुरू होने वाला था सारंडा की खूबसूरत पहाड़ियों,हसीन वादियों और घने जंगलों से पटा क़रीब चालीस किलोमीटर का बीहड़ रास्ता। जब हम घर से निकले थे तब भी हम दोनों को पता नहीं था कि रास्ते में सारंडा भी आएगा।

लोगों से सुना था कि अफ्रीका के अमेज़न जंगल के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जंगली वादी है। इसलिए थोड़ी-सी डर के साथ रोमांच सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। गोइलकेरा के ठीक बाद एक छोटा-सा रेलवे हॉल्ट मिलता है महादेवशाल हॉल्ट ! बस यहीं से शुरू होता है घनघोर, डरावना, खुबसूरत और ऐतिहासिक सारंडा जंगल। अकूत लौह अयस्क भंडार, जंगली पशु-पक्षी, जड़ी-बूटियों, करोड़ों वृक्षों के साथ ही आदिवासी जन-जीवन को अपनी गोद में समेटा सारंडा आज़ भी अपने-आप में कई रहस्य दबा रखा है।





लेकिन जिस तरह से इस विशाल जंगल का ओर-छोर पाना कठिन है उसी प्रकार इसके सारे रहस्यों को भी जान पाना पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों, सैलानियों यहां तक कि किसी सरकार के लिए भी टेढ़ी खीर है। महादेवशाल से ही शुरू होता है गोइलकेरा से मनोहरपुर तक सारंडा जंगल से होकर महज़ चार फीट संकरी सड़क। कहा जाता है कि यह चार फीट की सड़क भी पहले नहीं थी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश के कार्यकाल में उनके बारंबार सारंडा दौरे और उनके प्रयासों के फलस्वरूप यह पतली-सी सड़क बिछ पाई। खैर जो भी हो हम जब सारंडा के रास्ते पर दाखिल हुए तो तकरीबन चार बज चुके थे। पतली-सी सड़क और वो भी झबरैले पेड़ों से ढंके बिल्कुल ही डरावने लग रहे थे। आगे बढ़े तो टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे और घुमावदार रास्ते जंगली जानवरों और पक्षियों की अजीब सी आवाजें सफ़र को और भी डरावना बना रहे थे।

क़रीब दस किलोमीटर हमलोग जंगल में दाखिल हो चुके थे। इस बीच महज़ दो-तीन ही छोटी बस्तियां मिलीं जहां बस्ती होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन रास्ते में एकाध बाइक्स को देखकर थोड़ी-सी तसल्ली मिलती रही कि चलो ! इंसान तो कम से कम आते-जाते हैं ही इन रास्तों पर। दस किलोमीटर अंदर आने के बाद एक थोड़ी-सी चहल-पहल वाला गांव नज़र आया। हम लोगों ने सोचा कि पता नहीं आगे कुछ मिले या नहीं। भूख भी लग रही थी तो उसी गांव में एक छोटी-सी परचून की दुकान पर रुककर हमने कुछ बिस्कुट ले लिया। तबतक अचानक से घनघोर काली घटाएं घिरकर बारिश भी शुरू हो गई थी। हम लोगों ने कुछ देर उसी दुकान पर रुकने का निर्णय लिया। क़रीब आधा घंटा गुजर चुका था और बारिश रुकने के बजाय और विकराल रूप ले रही थी। मैंने बिस्किट चबाते हुए दुकानदार से पूछा कि मनोहरपुर यहां से और कितनी दूर है। तो उसने तीस किलोमीटर बताया।






पापा बोले - "शाम के पांच बज चुके हैं और हमने जंगल आधा भी पारा नहीं किया है। ऊपर से बारिश की वज़ह से और अंधेरा हो रहा है। भींगकर ही निकला जाए वरना बारिश नहीं रुकी तो फंस जाएंगे यहीं।" घर से निकलते वक्त बादल का नामोनिशान नहीं था और धूप खिली हुई थी सो हम लोगों ने रेनकोट भी नहीं पकड़ा था। हमलोग करीब पांच बजे शाम भींगते हुए ही निकल पड़े। रास्ते में जगह-जगह पर पहाड़ों से पानी की तेज़ धार आ रही थी और सड़क पर ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने की वजह से पहाड़ों का पानी कुछ जगहों पर सड़क के ऊपर से ही नदी-नाले की शक्ल में बह रही थी। उन पानी की धार के अलावा सचमुच के नदी-नालों का पानी भी बिल्कुल लाल नज़र आ रहा था कारण पूरे इलाके की मिट्टी में लौह अयस्क समाया हुआ है, इसलिए यहां के नदी-नाले,कुएं-बाड़ी हर जगह का पानी लौह अयस्क मिला हुआ लाल नज़र आता है।एक तो शाम,ऊपर से बादल-बारिश और अंधेरा जंगल। सड़कों पर से बहते पानी में भी अंदाजा लगा-लगा कर गुजरना काफ़ी दुष्कर लग रहा था।





मनोहरपुर रेलवे फाटक पहुंचने तक हमलोग भींगकर सराबोर और ठंड से हालत बिना पंख के भींगे मुर्गों की तरह हो गईं थीं। ठंड बर्दाश्त से बाहर हो गई तो हमलोग मनोहरपुर रेलवे फाटक के इस पार एक हंड़िया की झोंपड़ीनुमा दुकान पर शरण ली। महादेवशाल से यहां तक पूरे रास्ते में एक चाय की दुकान तक नहीं मिली। बस जगह-जगह पर झोंपड़ीनुमा हंड़िया और महुआ की दुकानें दिखीं जहां खाने के लिए भींगे चने और गुलगुले छोड़कर कुछ नहीं था। इस दुकान में भी वही सब उपलब्ध था। दुकान वाले ने बताया कि मनोहरपुर शहर यहां से भी लगभग दस-बारह किलोमीटर है।

फाटक पार करने के बाद भी पापा ही बाइक ड्राइव कर रहे थे लेकिन कुछ ही दूर चले थे कि पापा ठंड से इतना कांपने लगे कि बाइक मैं उनसे ले लिया और उन्हें पीछे बिठाकर खुद चलाने लगा। बारिश और बीहड़ रास्तों की वज़ह से मनोहरपुर शहर के बीचोंबीच स्थित रेलवे स्टेशन बाज़ार पहुंचने तक साढ़े सात बज चुके थे।





ठंड और भूख के कारण हमलोग पस्त हो चुके थे। मनोहरपुर मार्केट में हमने थोड़ी-सी चाउमिन वगैरह खाया और चाय पिया। ठंड के चलते मन तो कर रहा था कि आज़ पिता-पुत्र की मर्यादा को किनारे रखकर उनसे कह डालूं कि चलिए अलग-अलग जगह बैठकर एक-एक रम की क्वार्टर मारते हैं फिर आगे चलते हैं। लेकिन मर्यादा के दायरे में ही ख़ुद को दबाकर आस-पास के लोगों से राउरकेला की दूरी और रास्ता पूछा और फ़िर वहां से आठ बजे निकल चले। राउरकेला तक की दूरी लगभग 50 किलोमीटर थी।

रात नौ बजे वहां पहुंचने के बाद पापा बोले कि जहां मेरे रुकने का प्लान था वहां मैं जा सकता हूं। यहां पहुंचने तक मेरे मन में वही प्लान था लेकिन मेरे अंतर्मन ने मुझे झिंझोड़ कर कहा कि मेरे पिता ने अपनी केयर दर्शाते हुए इतने दुर्गम सफ़र में मुझे अकेले आने नहीं दिया। मेरे साथ-साथ ख़ुद भी थकावट,तनाव और ठंड झेला। शाय़द पापा नहीं होते तो मैं थोड़ा सा जंगल के अंदर घुसते ही उल्टे पांव वापस भाग जाता। भाड़ में गई परीक्षा कहकर ! यही सब सोचकर मन बना लिया कि पापा जहां रुकेंगे मैं भी वहीं रहूंगा वरना उन्हें बुरा लगेगा। फ़िर मैंने फ़ोन कर सोनू दा के जीजा को मना कर दिया। फिर पापा के दोस्त के वहीं रात्रि भोजन और विश्राम किया।अगली सुबह परीक्षा लिखकर दस बजे हमलोग राउरकेला से घर के लिए रवाना हो गए। उस दिन धूप खिली हुई थी। दिन के उजाले में सारंडा जंगल उस दिन जाने वक्त की अपेक्षा थोड़ी-सी ज़्यादा चहल-पहल लग रही थी।






इक्के-दुक्के आटो, बसें और चार पहिया वाहन भी उसी संकीर्ण रास्ते से आते-जाते दिखे। उस दिन पूरे जंगल के रास्तों में घुमावदार, ऊंचे-नीचे बीहड़ रास्तों, घाटियों, नदी-नालों, गांव-कस्बों और अनुपम आदिवासी जन-जीवन की छटा का आनन्द लेते हुए आए। पूरे रास्ते अलग-अलग जगहों पर क़रीब बीसियों बार रुककर हमने मोबाइल से काफ़ी फ़ोटो भी शूटकर इस यादगार सफ़र को अपने संग्रह में कैद करने की कोशिश की। लगभग बारह बजे तक हमलोग जंगल को पार कर वापस महादेवशाल हॉल्ट पहुंच चुके थे। वहां उस झबरैले झाड़ीनुमा पेड़ों से आच्छादित टनल की तरह दिख रहे सारंडा के एंट्री मार्ग पर रुककर काफ़ी देर तक उसके रोमांच और खुबसूरती को निहार कर दिल में संजोने की तसल्ली की कोशिश की।

फिर कुछ फोटो शूट करके थोड़े से भारी मन से अपने अंतर्मन में कहा - "अलविदा सारंडा! शुक्रिया एक अभूतपूर्व रोमांचक सफ़र प्रदान करने के लिए ! फ़िर मिलेंगे!"

फिर हमलोग वापस लौट चले।


- कुणाल