साहित्य चक्र

15 February 2026

वर्तमान में बाजार की समस्याओं से जूझता मानव!


आज जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं और हमारे बाजारों की हालत उतनी ही खराब और चिंताजनक होती जा रही है। एक वक्त था जब खाद्य पदार्थों के मूल्य इतनी जल्दी उतार-चढ़ाव नहीं करते थे, मगर आज 1 घंटे बाद खाद्य पदार्थों के मूल्य बदल जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि मिलावट और गुणवत्ता की कमी खाद्य पदार्थों के सेवन में हमें चिंतित कर रही है। बाजार की दिखावे वाली अर्थव्यवस्था ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है।





आइए इस दिखावे की अर्थव्यवस्था ने हमें कैसे घेर कर रखा है इस पर प्रकाश डालते हैं-

आज बाजारों से मानवीय स्पर्शिता यानी आपसी व्यक्तिगत रिश्ते धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जा रही है। पहले हम सभी अपने आस-पास की दुकानों में जाकर सामान खरीदते थे। आज हम ऑनलाइन ऑर्डर कर रहे हैं, जिसके कारण हमारा लोगों से संवाद धीरे-धीरे कम हो रहा है। ई-कॉमर्स यानी ऑनलाइन खरीदारी से न सिर्फ स्थानीय दुकानदारों की आय पर असर पड़ रहा है, बल्कि पैकेजिंग यानी बड़ी मात्रा में कचरा भी इकट्ठा हो रहा है। इसका सीधा असर हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है।




बाजार के दिखावे के कारण आज हम सभी का गैर जरूरी खर्चा बढ़ गया है। सोचिए ऑनलाइन खरीदारी में चप्पल भी EMI पर उपलब्ध है। विज्ञापनों ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है। चाहे वह फेसबुक हो, इंस्टाग्राम हो, गूगल हो या फिर न्यूज़ पेपर, न्यूज़ चैनल और सड़कों पर लगे बड़े-बड़े बैनर हो। हम हर समय खरीदारी के ही मूड में रहते हैं या खरीदारी के बारे में ही सोचते रहते हैं। सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए हमारा डाटा चोरी हो रहा है। इतना ही नहीं बल्कि अगर आप अपने मोबाइल का डेटा ऑन करके किसी वस्तु की जरूरत के बारे में बातचीत करेंगे तो आपको आपके सोशल प्लेटफॉर्म पर वही विज्ञापन देखने शुरू हो जाते हैं।




आज हर चीज की मंथली सब्सक्रिप्शन की प्रणाली लगातार बढ़ती जा रही है यानी पहले हम सीडी कैसेट के माध्यम से कोई सॉफ्टवेयर या फिल्म हमेशा के लिए खरीद सकते थे। मगर आज आप पैसा दुगना दे रहे हैं और वह वस्तु आपको सिर्फ एक महीने के लिए मिल रही है। इतना ही नहीं बल्कि बाजार में ऐसे प्रोडक्ट्स लाएं जा रहे हैं, जिनकी लाइफ बहुत छोटी है या फिर उनकी लाइफ छोटी बनाई जा रही है। पैसा देकर भी सही वस्तु नहीं मिल पा रही है यानी बाजार में नकली वस्तु या फर्स्ट कॉपी की भरमार है। बाजार के इस मकड़ जाल से बाहर निकलना हमारे लिए मुश्किल नहीं बल्कि नामुमकिन हो चुका है।





बाजार के इस दिखावे की धारा में इनफ्लुएंसर मार्केटिंग का ऐसा भ्रम जाल फैला रहे हैं कि लोग गैर जरूरी वस्तुओं को इनफ्लुएंसर के दबाव में खरीद रहे हैं। बाजार से लॉयल्टी लगातार कम होती जा रही है। ग्राहकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर डार्क पैटर्न्स यानी ऑनलाइन चालबाजी से धोखाधड़ी की जा रही है। बाजार के प्रभाव ने लोगों में इंपल्स बाइंग यानी बिना सोचे समझे वस्तु खरीदने की आदत डाल दी है। बाजारों से स्थानीय स्वाद और विविधता लगातार गायब हो रही है यानी हमारे बाजार ग्लोबल होने के चक्कर में लोकल को खो रहे हैं।




हम लोग बाजार के दिखावे में इतनी बुरी तरीके से फंस गए हैं कि अपनी प्राइवेसी को लग्जरी मानने लग गए हैं। बाजार ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है और हम चाह कर भी बाजार के इस जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। आज हमें इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन यानी तात्कालिक संतुष्टि की लत लग चुकी है। सामाजिक मान व मर्यादाओं का हमने अचार बना डाला है। इसलिए सोशल मीडिया पर फेमस होने के लिए शारीरिक अंगों का प्रदर्शन और गाली गलौज की हरकतें आम होती जा रही है। हमारे युवा सोशल मीडिया में ऐसा खोया है कि उसे अपने भविष्य की जरा सी भी चिंता नहीं है।




बाजार की ये समस्याएं ऐसी ही चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी चांद अमीर लोगों के गुलाम बन जाएंगे। आप और हम सिर्फ नौकरी व दो वक्त के खाने को ही जीवन समझने लग जाएंगे। इसलिए वक्त रहते हम सभी को बाजार के इस प्रभाव को समझना होगा और इस पर लगाम लगानी होगी अन्यथा यह समस्या हम सभी को अपना शिकार बना लेगी और हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।



- दीपक कोहली


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