साहित्य चक्र

07 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 07 फरवरी 2026





*****





गुलाब के फूल

अक्सर खूबसूरती की
पहचान है गुलाब
गुलाब मासूम है
गुलाब महरूम है
गुलाब सभ्यता का प्रतीक है
गुलाब प्यार का एहसास है
गुलाब सजीवता का परिचायक है
गुलाब का कोई दिन नहीं होता
गुलाब हर पल हर समय
मौजूद है इस जहां में..!


- मनोज कौशल


*****





लबों सें जो बोला तो चुप था जमाना,
उठाई कलम तो मचलने लगे हो

ख्वाबों में सोता खयालों में उठता,
मुझे तुम बदलकर बदलने लगे हो

सफ़र सें सफ़र का था वादा हमारा,
पथ में बैठाकर क्यूँ चलने लगे हो

मिशालें दिया करते मेरी उड़ानों की,
क्यूँ तुम गिराकर संभलने लगे हो

”मोहन” अँधेरों में शम्मा जलाओ,
क्यों शामों के सूरज सा ढलने लगे हो


- मोहन मीणा


*****





मुश्किलें

माना कि मुश्किलें बड़ी हैं,
पर मेरे हौसलों से तो बड़ी नहीं।
जिंदगी है तो मुश्किलें भी होंगी,
मुश्किलें नहीं तो जिंदगी नहीं।

मुश्किलें आज तक कहाँ, मुझे रोक पाई हैं।
क्योंकि मेरे हौसलों से जो उनकी लड़ाई है।

कौन है अपना, कौन पराया, यही हमें बताती हैं।
जीवन का असली फ़लसफ़ा यही हमें सिखाती हैं।

माना कि जीवन के अंधेरों ने मुझे बहुत सताया है।
पर सच यह भी है कि मुझे लड़ना भी सिखाया है।

खड़ा हूँ खुद पर यकीन लिए, इन मुश्किलों का असर हूँ।
तोड़ न पाए तूफ़ान जिसे, मैं ताड़ का वो शजर हूँ।


- मनोज कुमार भूपेश


*****





मेरी सुकून- ए- कल्ब

सुनो मेरी सुकून- ए- कल्ब
तुम गुलाब की तरह खिलते रहना सदा
अपनी मुहब्बत भरी बातों से
हरसू खुश्बू बिखेरती रहना।

चलो माना संभाल लूंगा सदा
मैं प्रोपोज, चॉकलेट
की मिठास के संग ,
टेडी को बस तुम देख लेना।

आओ करें मिलकर एक अहद
गर वादा कभी मैं भूल जाऊं ,
अपनी बातों से कभी मैं मुकर जाऊं ,
दिल कभी मैं तुम्हारा दुखा जाऊं,
देना एक हल्की सी मुस्कान भरी
बोसा ( kiss) पेशानी पर
हम-आग़ोशी ( Hug) को मैं क़दम बढ़ा लूंगा ।

बस है एक 'अज़्म (ख्वाहिश)
मुझे इतनी देर तक गले लगाए रखना ,
जब तक पिछली तमाम तर
अजीयतों की तकलीफ मेरे
रग रग से निकल न  जाए।

कुछ इस तरह तुम मुझे संभाले रखना
कुछ इस तरह मैं तुम्हें संभाले रखूंगा
बस तुम अपना यकीं बनाए रखना
मैं तुम्हारे कदम से कदम मिलाकर चलूंगा ।

सिर्फ़ ये उल्फत (valentine) वाले
हफ्ता भर नहीं,
सदा के लिए मु'आशक़ा(love)
मौसम-ए-बहार कि तरह
कभी मैं कभी तुम सजाए रखना,
कभी मैं कभी तुम सजाए रखना।

सुनो मेरी सुकून- ए- कल्ब
तुम गुलाब की तरह खिलते रहना सदा
अपनी मुहब्बत भरी बातों से
हरसू खुश्बू बिखेरती रहना,
हरसू खुश्बू बिखेरती रहना।


- तौसीफ़ अहमद


*****




न्यारा मेरा गांव

मेरी शान जुड़ी है जिससे
वही है मेरा प्यारा गांव,
रहता हूं पचपन सालों से जहां,
कैसे भुलाऊं मैं वह गांव,
स्वर्ग से बढ़कर है मेरी जन्मभूमि
उसको कैसे बिसराऊं मैं,
स्वच्छ हरित और आत्मनिर्भर,
मन को भाता मेरा गांव

पला बढ़ा मैं जिसकी गोद में
हरदम खेला जिसकी छांव,
कमी नहीं बिजली, पानी की
सुविधाजनक है मेरा गांव,
दोनों ओर बसा सड़क के
आकर्षित सबको करता गांव
शश्य श्यामला सदा भरपूर
सभी को दे अन्न मेरा गांव,

रंग बिरंगे घर और आंगन
प्यारा लगता मेरा गांव,
मेरी पहचान, मेरा गौरव ,
जीवन साथी मेरा गांव,
सुख-दुःख में है साथ सभी का
सबसे अनोखा मेरा गांव,
मेरी शान जुड़ी है जिससे
वही है मेरा प्यारा गांव

- बाबू राम धीमान


*****




कैसे न तुम्हें मैं प्यार करूँ

पावन प्रीत सुरभि का दान,
तुमने जो दिया मुझे प्रतिदान
शुभ्र चॉदनी सा निर्मल,
आच्छादित जिससे है जलथल,
कैसे उसे न अंगीकार करूँ
कैसे तुम्हें न प्यार करूँ

मेरे गीत के स्वर मुखर,
कहते हैं मुझको हर पल,
मुश्किल से मिलता प्यार दान,
ठुकरा न इसको अरे नादान
मन की झंकृत बीना को मैं
कैसे न मैं एक तार करूँ
कैसे न तुम्हें मै प्यार करूँ

उपालंभ जग का क्यो मानू,
काया की महता क्या जानू,
अन्तरात्मा का मिलन अमोल,
पकड़े रहता है जो डोर
कैसे उसे मैं बेजार करूँ
कैसे तुम्हें न प्यार करूँ

पाप पुण्य की परिधि से,
मिला मुझे जो विधि से,
उसे किया मैने स्वीकार,
समझ ईश का उपहार
कैसे उसे बहिष्कार करूँ,
कैसे न तुम्हें मैं प्यार करूँ

यह जग सुन्दर लगता तब,
प्रीत का बीज उफनता जब
मादक उर के मदिरालय में,
नैन मदिरा का अभिसार भरूँ
कैसे न तुम्हें मैं प्यार करूँ

स्वार्थी जग के इस बयार में,
संभव है तुम बह जाओ,
पर मेरा प्यार अक्षुण्य है,
बस इतना ही कह जाओ,
इसी शब्द की गरिमा से,
मै जीवन भर ऋंगार करूँ
कैसे न तुम्हें मैं प्यार करूँ।


- रत्ना बापुली


*****





गुलाब के लिए
रोज डे पर रोज के लिए

ए गुलाब बस तुम मुस्कुराते रहो
खिलखिलाते रहो तुम सदा ही
महकाते रहो,घर आंगन बगिया को,
जितने दिवस इस जीवन में रहो।

छीनकर प्राण ,करना पड़े मुझे
अपने प्रेम को प्रमाणिक यदि,
तो मैं करलूं, चयन इन काटो का
मुझे "तोड़ना " तुझे स्वीकार नहीं।

तुझे तोड़कर मैं दर्शाऊ,
मेरे मन की प्रीत यदि,
ऐसे भाव नहीं हैं, प्रिय गुलाब मेरे !
ऐसी कटु, मेरे ह्रदय की प्रीत नहीं।


- आशी प्रतिभा


*****




ओ खामोश नजरें,
ढूंढती जो उसे हैं!
उसकी खुशबू घूली,
इन हवाओं में क्यों है?
ओ सांसों की गरमाहट,
जैसे उसकी आहट!
न चाहते हुए भी,
कमबख्त, महसूस क्यों है?
मेरे दिल की बहार,
मैं उसका ग़म-ख़्वार!
दिल के कोने से उसे,
सदा ही दुआ-सलाम है।
है बसंती बयार,
या चढ़ा उसका खुमार!
हर हिचकी में भी,
मुझको उसी की याद क्यों है?


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


*****





जैसी तेरी मर्जी
ना मिलने की खुशी
ना बिछुड़ने की उदासी
ना भय है, तुमसे दूरी
ना रहे पास ऐसा है जरूरी
सब छोड़ा अब, मैं मर्जी तेरी
फैसला तेरी, सब है मुझे मंजूरी
रखो, रहो, छोड़ो, जाओ
बोलो, सुनाओ, पकड़ो, आओ
शिकायत नहीं, अब कुछ तुझसे
आजादी चाहिये... आजादी लो मुझसे
हाँ! कहता हूँ, जरूर एक बात
आओ! लौटकर, तो है स्वागत


- चुन्नू साहा


*****





स्मृति-शेष

मेरी आंँखें भीग जाती हैं

अँखियों से आँसू बहते रहे,
चुपचाप ही हम रोते रहे।

अब कोई ऐसा नहीं कहनेवाला
जो कह सके-
“चुप हो जाओ, मैं हूँ ना...

याद आते ही,
आंँखें भर जाती हैं।
सबसे नजरें छुपाता हूंँ,
फिर भी,
छलक कर बह जाती हैं।

दर्द-ए-दिल सुनाऊँ किसे ?
छोड़ निशा,
दूर देश चली गई हो,
काश,
जाते-जाते मुड़कर,
एक बार देखा होता।

आयांश, निशांत को लिए,
मैं एकांत एक कोने में,
बिलख-बिलख रो पड़ा‌।

अब कोई यह न कहने वाला
जो कह सके-
“चुप हो जाओ, मैं हूँ ना...

तुम्हारी स्मृतियों में,
मेरी आंँखें भीग जाती हैं।


- चेतना सिंह 'चितेरी'


*****





ख़ामोशी का प्रेम

प्रेम की निशानी भी गढ़ दी गई,
उसके लिए जिसने
इस संगमरमर के आशियाने में
क्षण भर कभी
थकी हुई साँस भी नहीं ली…

जिसके इश्क़ ने
आँसुओं को
वास्तुशिल्प बना दिया,
और पीड़ा को
सफ़ेद पत्थरों में
अमर कर दिया।

वह प्रेम
जो कहा नहीं गया,
बस सहा गया-
हर क़दम पर,
हर रात की तन्हाई में।

इन मीनारों ने
देखी हैं उसकी जागती आँखें,
इन दीवारों ने
सुनी है उसकी चुप चीख़।

यह इमारत नहीं,
एक इंतज़ार है-
जो सदियों से खड़ा है,
उसके नाम
जो प्रेम में जिया
और प्रेम में ही
ख़ामोश हो गया…


- आरती कुशवाहा


*****





स्याले रियाँ शंदालीं

रहियाँ नी उण स्यो पहले साईं, स्याले रियाँ संदालीं,
शकलां कालियां हुई जाईं थी, आगी जो सेकी कने बाळी।

अठ्ठ-अठ्ठ दिन चुकदी नी थी, बरखा लगां थी मोळधार,
निकली नी हुंदा था बाहर, परदेश हुई जाएँ थे आँगन द्वार।

चुल्ही री आग नी बुज्दी थी, चफेरा जो बैठा था पूरा परिवार,
न्याणे- सयाने इत्थी दसां थे, अपने दिला रा गुस्सा कने प्यार।

हांडूये च चुल्ही पर बनां थे, दाल, साग ओर बेजुआं री कड़ी,
खाने जो कोई आनाकानी करदा, ताँ बोटन जाईं थी फेरी रड़ी।

बच्चे स्कूला जो भेजने जियां-कियां, पट्टूआँ रे बन्नी कने गिद्दु,
सग्गी ने ली औवें थे कपड़े ओर किताबां, पाणी च खेल्दे फिडडू।

छल्लियाँ रे भोगड़े, बाथुये री खिल्लां ओर चनेयाँ रा चबीना,
नानियाँ-दादियाँ री बांकियाँ कथा, मुक्दी नी थी महीना-महीना।

कई-कई ध्याड़े नी नौंणा, सुक-मांज करी ने ही कम्म चलाणा,
हरा घा डंगरेयाँ जो नी औणा, सुक्का सरलू, भू संजा-ब्यागा पाणा।

दुखी हुई जाणा तजे अन्दरो-अंदर, मथेयाँ टेकी-टेकी करनी गुजारिश,
हे परमात्मा हुण दसी दे सूरज, करीदे उण बंद ये संदाली री बारिश।

खूब पौणा ह्युं तजे फेरी, चिट्टे हुई जाणे सब ग्वाड़े-पच्छवाड़े,
ताहीं फेरी से सूरज निकला था ,ताहें औने भी निम्बले ध्याड़े।

उण मौसमा री चाल भी बदली गी, लगी री माणु साईं काळी,
इक्की ध्याड़े सब कुछ हुई लयां, ऐनी रही स्यो पहले रियाँ संदालीं।


- धर्म चंद धीमान


*****





मैं और मेरा बचपन

पापा की मैं राजकुमारी, चाचा की हूँ जान,
दादी की आँखों का तारा, घर की मैं मुस्कान।
बचपन की वो गलियां मुझको, आज भी याद आती हैं,
खट्टी-मीठी यादें दिल में, हलचल सी कर जाती हैं।

कक्षा नौ की दहलीज पर, अब कदम मैंने रखा है,
पर बचपन का वो बचपन, अब भी दिल में चखा है।
पापा का कंधे पर बिठाना, चाचा का वो चिढ़ाना,
दादी का अपनी गोदी में, छुपकर मुझे सुलाना।

मैं थोड़ी गोल-मटोल सी, सबको प्यारी लगती हूँ,
अपनी मासूम खुशियों से, मैं हर पल सजती हूँ।
मम्मी की हल्की सी डांट, और फिर सबका बचाव,
यही तो है मेरे घर का, सबसे सुंदर भाव।

वो गुड़ियों वाला खेल मेरा, वो कागज की नाव,
वो नंगे पैरों दौड़ना, और मिट्टी का लगाव।
मेरी हंसी से गूंजता था, घर का कोना-कोना,
रूठ के फिर मान जाना, और मजे से सोना।

वक्त बढ़ रहा आगे पर, ये यादें पास रहेंगी,
मेरे बचपन की ये बातें, सदा साथ चलेंगी।
अपनों के इस प्यार ने ही, मुझको गढ़ा है ऐसा,
नहीं मिलेगा दुनिया में, मेरे परिवार जैसा।


- अंजली यादव


*****





कांपते हाथों की गरिमा

देखो, उनके कपड़ों पर लगे दाग,
मेहनत कर उगाते जो टमाटर, आलू और साग,
शांत करते है हमारे पेट की आग,
इन नेताओं ने, बढ़ा दिया इनके अंदर की आग।

देखो, वह गरीब नहीं है,
उनके जैसा भला कही नहीं है,
सूरज की गर्मी झेलकर भी जो सहमा नहीं है,
उनके जैसा वीर नहीं है।

कांपते हाथों से जो कुदाल चला सकता है,
अपनी प्रार्थना से जो बादल कपा सकता है,
अपनी हिम्मत से जो बंजर जमीन से भी लड़ सकता है,
अपने पसीने की बंद से फूल, पौधे खिला सकता है।

परमात्मा ने तो हमे जन्म दिया,
इस किसान ने हमे अन्न दिया,
बारिश की बूंदों से उसे चैन दिया,
प्रकृति को जिसने वापस जन्म दिया।


- प्रणव राज


*****





भाँति-भाँति के चेहरे

हैरान हूँ सोच-सोच कर कि कैसे गढ़े हैं उसने
भांति-भाँति के चेहरे और भाँति-भाँति के रँग..
सबसे जुदा सबसे अलग हैं सबके नयन नक्श
कुछ है सबसे हटकर, कुछ है सबसे जुदा...

लाखों में होते है कुछ एक जैसे फिर भी सब हैं अलग
समझ से परे है मेरे कि आते तो सब ही खाली हाथ हैं
फिर भी क्यों कोई महलों में है और कोई फुटपाथ पर
कोई भिन्न-भिन्न पकवान खाएँ, और कोई सूखी रोटी

किसी के तो ज़मीन पर भी पाँव ना पड़ते,
और कई एड़ियां रगड़ते-रगड़ते ही मर जाते
मैं उसके कारनामों को नमन करती हूँ और
ये विनती करती हूँ कि सबके हिस्से में सुख आएं

बस अपनी कारीगरी करते रहना ऐ मेरे खुदा...
थोड़ी सी रहम और सबकी दुआएँ कबुल कर लेना
चाहे तू गोरा, काला और बदसूरत बना देना...
मगर सबके हिस्से में सुख-शांति अवश्य देना


- सुमन डोभाल


*****





एक दलित

एक दलित!
जब पढ़ लिखकर क़ाबिल बना,
हमारे गाँव ने ख़ुशियाँ मनाईं
एक दलित!
जब अफ़सर और सिपाही बना,
पूरे मुहल्ले ने जश्न मनाया
एक दलित!
जब ज़िला कलेक्टर
व मुख्य सचिव बना,
पूरे इलाक़े में
भव्य कार्यक्रम हुआ
एक दलित!
जब चुनाव में प्रत्याशी बना,
पूरे दलित समाज ने भीड़ बढ़ायी
एक दलित!
जब चुनाव जीता,
दलित युवकों ने
जय भीम का नारा लगाया
एक दलित!
कभी अभिनेता,
कभी खिलाड़ी,
कभी बिज़नेस मैन,
कभी साइंटिस्ट,
कभी बुद्धिजीवी बना
इस ख़ुशी में हमने
सोशल मीडिया पर
स्टेटस लगाया
एक दलित!
जब ग़रीबी, प्रताड़ना
और हिंसक घटना का शिकार बना
उसके दुःख को कोई नहीं समझा
वह पढ़ा-लिखा दलित,
सामने नहीं आया
जिसके लिए ख़ुशियाँ मनाई थीं
उस दलित अफ़सर
और सिपाही ने,
मुँह फेर लिया
जिसके लिए जश्न मनाया था
वह दलित ज़िला कलेक्टर
और मुख्य सचिव ने,
पहचानने से इंकार कर दिया
जिसके लिए कार्यक्रम में शरीक हुए थे
उस दलित नेता ने,
उजड़े घर को बसाने से
इनकार कर दिया
जिसके लिए भीड़ बढ़ाई थी
और जय भीम के नारे लगाए थे
ख़ैर उन अभिनेता, खिलाड़ी,
बिज़नेस मैन, साइंटिस्ट और
बुद्धिजीवियों का क्या ?
वे तो वर्चुअल थे
असल ज़िन्दगी में उन दलितों ने,
मुझ जैसे दलितों का सिर्फ़ फ़ायदा लिया
आवेग में आने के लिए
अब मैं ना कोई जश्न मनाता हूँ
ना कोई भीड़ तंत्र का पात्र बनता हूँ
और ना ही कोई उनके जलसे-जुलूस में
शरीक होता हूँ
बस बहुत हो चुका!
यह सब देखकर अब औरों की तरह,
चुपचाप आगे बढ़ जाता हूँ...


- आनंद दास


*****





एपस्टीन अंक

एपस्टीन अंक ने मचा रखा हडकंप
गूगल सर्च की ट्रेंड में लगा रहा है जंप।
लगा रहा है जंप देखना दुनियां चाहती
दोषी हैं जो लोग फट रही उनकी छाती।

सर्वोच्च शिखर पर बैठे नेता या हों राजघराने के।
नई नवेली कलियों से हंस हंस कर खेला करते थे।
फरमाना आराम जिन्हें था उन्होंने रास रचाया था।
दिखा सादगी निजता की अश्लील चक्र चलाया था।

हर बार की भांति नम्बर फिर राग उजागर का आया।
जेफरी एपस्टीन ने मिलकर उल्टा सब पर दांव चलाया।
उल्टा चल कर दांव जेफरी ने कीमत बड़ी चुकाई है।
सत्य उजागर हो उससे पहले जान गवाई है।

- करन सिंह "करुण"


*****






No comments:

Post a Comment