साहित्य चक्र

14 February 2026

प्रेम उत्सव विशेषः लेखक रोशन झा जी का पत्र पढ़िए






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एक अनकहा बसन्त


 मेरी प्रिय संगिनी,

आज फ़रवरी का महीना है। बाहर फिर से बसन्त उतर आया है। पेड़ों पर नई कोपले हैं, हवा में एक मधुर हलचल है। इस मौसम को देखते हुए मन अनायास ही उन दिनों की ओर लौट गया, जब हम ने अपने जीवन का पहला बसन्त साथ देखा था।
 
वह पहले नजरें छुपाना, मिलने के लिए हफ्तों इंतजार, रोज नए बहाने और कितने तिकड़म, न जाने क्या-क्या, वही पहला मीठा एहसास, शायद हमारा अपना बसन्त था। उसके बाद तो हम दोनों ने बिना रुके जीवन की गाड़ी को हांकना ही सीखा।

जिम्मेदारियां आई, समय आगे बढ़ता गया और हम जीवन धारा में बहते रहे।इसी यात्रा के बीच जब बच्चों को बढ़ते देखा और पढ़ते देखा तो उनकी मुस्कान में, उनकी उपलब्धियों में, उनके छोटे-छोटे सपनों में हमने बसंत को फ़िर से महसूस किया।

शायद हम दोनों ने अपने हिस्से का वसन्त उन्हीं में खोज लिया। हम बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर अक्सर मौन ही रहे, जैसे समझ ही हमारा संवाद बन गया हो। लेकिन आज न जाने क्यों मन में एक इच्छा जागी है, क्या हम जीवन की इस गाड़ी को कुछ क्षणों के लिए रिवर्स गियर में डाल सकते हैं ? क्या हम समय की धारा को चीरते हुए नौ वर्ष पीछे लौट सकते हैं ? उस क्षण तक, जहां दो अलग-अलग बिंदु मिले थे और एक सरल व सीधी रेखा में बदल गए थे। उसी क्षण, जहां मैं और तुम से हम बन गए।

आज फिर वही बसन्त बहार है, पर मैं उसे तुम्हारी आंखों में ढूंढना चाहता हूं। बिना किसी जल्दबाजी, बिना किसी जिम्मेदारी और बोझ के, बस हम दोनों जैसे शुरुआत में थे।

तुम्हारा रोशन


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