साहित्य चक्र

03 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 03 फरवरी 2026







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मैं किसान हूं
मैं मजदूर हूं
मैं वनवासी हूं
मैं धरतीपुत्र हूं
धरती मेरी मां हैं
मैं इसका वारिस हूं
मेरी मां का आंचल
सच में विराट हैं
वो मुझे पालती है
पोषती हैं
धरती मेरा बिछोना हैं
उसके आंचल में सुकून है
मैं निमित्त हूं
मेरी मां अन्नपूर्णा है
मेरा क्या?
मेरी मां का आंचल
महकता रहें
बस यही कामना
करता हूं।


- जितेंद्र बोयल


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अखबार की क्रांति

एक बड़ा कागज़ का टुकड़ा,
समाया है जिसमें समाज का मुखड़ा,
सबके विचारों को साथ लेकर चलती है,
बुराइयों को ढेर कर देती है।

यह लोगो के भीतर आग को सुलगाती है,
क्रांति का अमर गीत गाती है,
क्रांति रूपी कलम को स्थान दे कर,
नया इतिहास लिखती है, दुनिया बदल कर।

खबरों के साथ धमकियों का बोझ भी है,
खबरों के साथ बदलना लोगों की सोच भी है,
नेता, समाज द्रोही, सब रहते भयभीत हैं,
अंत में सत्यन्वेषीं कलमकारों की ही जीत है।

रोज अखबार छपते हैं,
समाज की असलियत लोग देखते हैं,
इस कागज में क्रांति की आग छिपी है,
अमरगीत की राग छीपी है।


- प्रणव राज


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दौड़

क्यों दौड़ रहे,
फिर तो दौड़
कर ठहरना ही है।

मत दौड़,
चल तू आपने साथ,
सुस्ता जरा,
मंजिल को राहों में
आना ही है।

अपने भीतर
खुद को मत रख,
सब कुछ
बिन बताए भी दिख जाना है।
समय को पहचान,
खुद को जान,
प्यार कर...
जरूरी नहीं कि जताना है।

मुश्किल लगती है
ज़िन्दगी, फिर भी
जीने को हजार बहाना है।
सबकुछ हासिल हो भी जाए,
सुख मिलेगा सुकून नहीं...
रहेगा दो पल ही,
फिर खो जाना है।


- रोशन कुमार झा


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जल

जल है जीवन का आधार
जल से चलता है संसार।
जल को गंदा करने वालों
कुछ तो खुद में करो विचार

नीरज भी है जल में पलता
नीर बिना नही एक पल टलता।
जल है पृथ्वी का आधार
जल से चलता है संसार ।

यह कसम आज हम खायेंगे
जल स्त्रोत स्वच्छ बनायेंगे ।
स्वच्छ जल है जीवन का सार
इससे चलता है संसार

जल ही दे पौधों को भोजन
जल ही है पौधों का जीवन।
मूल को सींचे हर प्रकार
इससे चलता है संसार।

जल से ही तो जन्मे बादल
टिप टिप करके बरसे बादल।
यही तो है इस जग का सार
जल से चलता है संसार।


- आरजू सिंह "अभिज्ञान"


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आग

पंच तत्वों में शामिल है आग
जला कर सब राख करे वो है आग

इसे हल्के में ना ले कोई
सावधानी इससे रहना जरूरी है भाई
नहीं तो जल कर हो जाओगे स्वाहा
थोड़ी भी झूलसे तो करोगे आहा

आग लगे मन में, विचार में या दिमाग में
नष्ट तो होगा ही होगा, तेरे खुद में
न लगने दो आग, अपने में, ना सपने में

शांति, दया, क्षमा का जल
डालते रहो सदा इसमें...
बचे रहोगे, रहेगा सुखी संसार
खुशियों की होगी हर तरफ से बौछार


- चुन्नू साहा


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रिश्तों की पीर

कहानियां किस्से सुनाने को आतुर दादा दादी,
पर बचपन मशरूफ है मोबाइल फोन में,
पर वो अनमोल कहानियां किस्से सुने कौन?

गांव शहर हो या खेत खलिहान,
अब कम ही आते है बच्चे खेलने,
फोन से फुरसत नहीं तो फिर खेले कौन?

दादा दादी पड़े अकेले घर में,
बच्चों की कलोल देखने को तरसे,
बच्चे व्यस्त फोन में,अकेलापन देखे कौन?

तरसी अखियां सूखा नयन नीर,
अकेले पड़ गई अब बूढ़ी सांसे,
किसका बालपन बंधाए उन्हें धीर।

ये फोन कर रहा पीढ़ियों को संस्कार हीन,
दया मोह प्यार से होंगे सब रिश्ते कोसों दूर,
लेन देन ही होगा सर्वोपरि,भूलेंगे रिश्तों की पीर।


- राज कुमार कौंडल


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कुत्तों की दशा 

कुत्तों का आंतक हर जगह बढ़ गया 
सड़क, मुहल्ले में देखो कुत्तों ने कहर है ढाया।
टोलियों में हर समय घूमते नजर आते
मनुष्य इन्हें देख जरूर घबराते।
दो पहिया वाहन चालक इन्हें देख हड़बड़ाए 
पीछे दौड़ते नजर भी ये आए‌।
पैदल राहगीर थोड़ा  बचकर चलते 
पर फिर भी किसी को ये काट कर निकलते।
बच्चे, बूढ़े तो रहते हर पल घबराए 
कहीं कोई कुता पास न आ जाए।
सड़कों पर कभी मरा हुआ कुता नजर आए
उसके मृत शरीर से कोई हाथ न लगा पाए।
अक्सर लंगड़े कुत्ते भी नजर आते हैं अब
शायद हमारी लापरवाही से ही होता है ये सब।
दुर्दशा देख इनकी मन बड़ा हताश होता 
एक घरों में पलता तो एक एक सड़कों पर आवारा घूमता।
खाना बनाते समय सबसे पहले खाना इन्हें ही रखा जाता
पर दशा देख इनकी कभी किसी का मन रहम नहीं खाता।


- विनोद वर्मा



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पिता

मेरी ताकत मेरा साहस मेरी पूंजी है पिता।
मेरी हिम्मत मेरी धड़कन मेरा अभिमान है पिता।
मां की शान हमारे चेहरे की मुस्कान है पिता।
बुआ की जान चाचा का मान है पिता।

जब लोगों ने दिया था धोखा तब पिता ने थामा था हाथ मेरा।
मेरी आखिरी उम्मीद हैं पिता, परिवार की हिम्मत विश्वास हैं पिता।
बच्चों का सपना परिवार की पूंजी हैं पिता।
मेरी हिम्मत मेरी धड़कन मेरा अभिमान हैं पिता।

अपनों का प्यार घर की दीवार हैं पिता।
दुश्मनों का वार मेरा हथियार हैं पिता।
आपने ही तो मुझे मां की मार से बचाया है पिता।
आपने ही तो सही और गलत बताया है पिता।

आपने पढ़ाया हौसलों को बढ़ाया है पिता।
जब-जब रुक मेरे कदम तब तक चलना सिखाया है पिता।
किसी की बेटी को अपनी बेटी बनाया है पिता।
मेरी हिम्मत मेरी धड़कन मेरा अभिमान है पिता।


- आरुषी सिंह "औरुष"


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हुंकार: स्वयं बनो रणचंडी

सभा मौन थी, न्याय सुप्त था, घिरे हुए अभिमानी थे,
खड़ी सभा के बीच अकेली, यज्ञसेनी कल्याणी थी।
दुर्योधन का अट्टहास था, दुशासन का हाथ बढ़ा,
मर्यादा की अर्थी पर तब, दुष्टों का उन्माद चढ़ा।
भीष्म मौन थे, द्रोण मौन थे, झुकी हुई सबकी पलकें,
पांडव भी लाचार खड़े थे, बहा रहे आँखों से सिसकें।
जब रक्षक ही भक्षक बन गए, धर्म हुआ था लहूलुहान,
तब कृष्णा ने करबद्ध पुकारा, "कहाँ छिपे हो भगवन? आन!"
तब आया था भाई बनकर, वह द्वारका का गिरधारी,
खींच रहे थे दुष्ट चीर को, बढ़ती जाती थी साड़ी।
थक हारा दुशासन खींचत, साड़ी का ना अंत हुआ,
भाई की ममता के आगे, रावण सा सुमंत हुआ।
पर सुन नारी! अब तू जागो, युग ने ली अंगड़ाई है,
हर गली खड़ा दुशासन है, क्या हर बार कृष्ण की बारी है?
भरो भरोसा अपनी भुजा पर, खुद को ही फौलाद करो,
द्रौपदी जैसा साहस लेकर, खुद ही अपना उद्धार करो।
मत बाट जोहना किसी सखा की, मत करना अब इंतज़ार,
अपनी कोमल उँगलियों को, तुम खुद बना लो तीक्ष्ण तलवार।
जब कोई न आए रक्षण को, तब काली बन जाना तुम,
अपनी रक्षा के खातिर खुद, रणचंडी बन जाना तुम।
अब न झुकाना अपनी पलकें, अब न करना हाहाकार,
शक्ति तुम्हारे भीतर सोई, खुद को कर लो तुम तैयार।
भाई आएगा, कृष्ण आएगा, यह विश्वास रहे पर याद रहे-
जो खुद की ढाल स्वयं बनती, दुनिया उसको ही नमन करे।


- देवेश चतुर्वेदी


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आ गया बजट


आखिर आ गया बजट सुनो
भाई आ गया बजट।
हुआ क्या ? सस्ता और महंगा
देख लो सूची को सरपट।
आ गया बजट सुनो
भाई आ गया बजट।

जो शिक्षा देते हैं शिक्षक
रील वो अब बनायेंगे।
कलम को छोड़कर करि से
कैमरा को घुमायेंगे।
बजट में जिक्र है मेरे
GDP कैसे? बढ़ायेंगे
किताबें छोड़कर बच्चे
रील वो अब बनायेंगे।

जिन्हें थी मार्क्स की चिंता
वो अब व्यूज बढ़ायेंगे।
पिता को आस थी जिनसे
उन्हें वे ही सतायेंगे।
रुपये 10 वाली भी पुस्तक
दिलाना जिनको था भारी।
पिता बेबस वो बच्चों को
महंगा फोन दिलायेंगे।

न झंझट बैग की होगी
कटर न पेन्सिल होगी।
कैमरा हाथ में सबके
सेल्फी फेस पर होगी।
कौन ? लेता है कितने
अच्छे से फोटो।
परीक्षा रेस की फिर
हिंद में इनकी होगी।

बनेगा विश्वगुरु हिंद
फिर से मैं बताता हूं।
युवा डिजिटल के साथी हैं
आईना मैं दिखाता हूं।
पहले गुरु देता था
सबको गुणों की सीख वो भारी।
गुरु के करि में होगी
शिक्षा रील की सारी।

आ गई है रील सुनो
भाई आ गई है रील
रमण से मैं निवेदन कर रहा
हूं युवा को दो जरा सी ढील
तुम्हारी रेशमी साड़ी का
मैंने लगा रखी है रट ।
आ गया बज ट सुनो भाई
आ गया बजट ।


- करन सिंह "करुण"


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जोर सेआई बारिश ने दस्तक दी
मेरे दरवाज़े पर,
कलम, कॉपी हाथ में लेकर मैं अभी
चिन्तन की सोच ही रहा था,
दहलीज पर कदमों की आहट सुनकर
मैं अपनी कुर्सी से उठा ही था,
मेज़ ने कहा- मुझे दे दो ये कॉपी
ज़रा मिल लो बेचारी से,

मैंने उससे पूछा-क्यों कह रही हो ऐसा ?
ज़बाब कोई दिया ही नहीं
दाग दिया-अपना दूसरा प्रश्न,
मिल लो बेचारी से दरवाजे तक आई है,
उसने दोबारा कहा जाओ ज़रा मिल लो।
मैंने दोबारा चिन्तन किया-
क्या करना चाहिए मुझे ?

मन के अंदर से आवाज़ आई
"बात में अगर दम हो तो
दुश्मन की भी माननी चाहिए,"
मेरा माथा ठनका और मैं उससे मिलने
दहलीज पर चला,
अभी तपाक से दरवाजा खोला ही था
कि बेचारी बोलने लगीं-
"मैं कभी किसी से मिलने नहीं जाती
पर आपसे मिलने जरूर आई हूँ ? "
मैंने उसकी तरफ़ देखा ही था
जलराशि की बूंदें मेरी गंजी खोपड़ी से
फिसल कर मेरे गालों से नीचे टपकने लगी
ठंडी-ठंडी निश्छल बूंदें उसी बारिश की
मेरे अंतरमन को शान्त कर गई
मेरी जमीन और फसल को तो
अपनी फुहारों की संजीवनी दे गई
साथ ही साथ
मुझे बरसात की पिछली याद
ताज़ा करवा गई
जोर सेआई बारिश मेरे दरवाज़े पर
दस्तक दे गई और जाते-जाते
अपना मधुर राग मुझे सुना गई।


- बाबू राम धीमान


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माँ

माँ ही मंदिर, माँ ही मस्जिद और चर्च गुरुद्वारा है।
जिस ने करी है माँ की सेवा, भव सागर से पारा है।।

माँ है आदि, माँ ही अनंत है, नन्हें परिंदों का आसमाँ है।
माँ ने जानी है धरती सारी, माँ से ही तो सारा जहाँ है।

माँ से धरती, माँ से अम्बर दुनिया सारी अपनी है।
माँ ही नहीं तो दुनिया सारी, दुश्वारी सी लगती है।।

माँ ने ही तो बीज को अपने, पल-पल खून से सींचा है।
जब भी पड़ा है तू मुश्किल में, हर मुश्किल से खींचा है।

खुद गीले में माँ सोयी है, और सूखे में तुझको सुलाया।
खुद भूखी ही रहती है पर, तुझको सबसे पहले खिलाया।।
माँ है रोली, माँ है मोली, गोद में जिसकी आँख है खोली।
दुनिया ने माँ से ही सुनकर, बोली है मीठी प्यारी बोली।।

माँ के दिल से निकली दुआ ही, अपनों को सब दे देती है।
अपनों के सपने जीने में, अपने सपने खो देती है।।

जीत यदि मिलती है तुझको, ममता माँ की मुसकाती है।
चोट यदि लगती है तुझको, ममता माँ की रो पड़ती है।।

माँ थकती है, हमको कहाँ वो कहती है।
दुःखड़े सारे, अपनों के वो मुस्कुका कर सह लेती है।।


- मनोज कुमार भूपेश


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वो दिन

शायद तुम्हें अब भी याद हो
वो दिन-
जब तुमने
मेरे हाथों में
जीवन का वचन रखा था।
तुमसे मिलना
मेरे लिए
एक नए जीवन की
शुरुआत थी।

- सुभाष “अथर्व”



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