साहित्य चक्र

01 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 01 फरवरी 2026






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मेरे जीवन पथ के पथप्रदर्शक

कुछ व्यक्तित्व शब्दों की सीमा से परे होते हैं
वे केवल पढ़ाते नहीं,
जीवन को दिशा देते हैं।
वे समय की धूल में नहीं खोते,
स्मृतियों में अमिट बनकर बस जाते हैं।

वे जो कभी मेरे गुरु थे
वास्तव में मेरे संस्कारों के शिल्पकार थे।
आदरपूर्वक स्मरण आता है
वह सरल व्यक्तित्व, जिसमें कठोर अनुशासन के भीतर
कोमल स्नेह की धारा प्रवाहित होती थी।

वाणी में गंभीरता, दृष्टि में आत्मविश्वास,
और आचरण में एक आदर्श शिक्षक की गरिमा
वही तो थे वो, जिन्होंने मेरी सोच को दिशा दी,
मेरे सपनों को संबल दिया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो पग-पग पर उन्हीं की छाया दिखाई देती है
कभी प्रेरणा बनकर ,कभी आत्मबल बनकर,
तो कभी मौन आशीर्वाद बनकर।

वे कक्षा में केवल विषय नहीं समझाते थे,
बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते थे।
उनकी उपस्थिति ही संस्कारों का पाठ हुआ करती थी।
अब वे हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं,
परंतु हमारी सोच, कार्यशैली और आत्मा में
उनकी उपस्थिति अमर है।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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माखनलाल चतुर्वेदी

धधकी जिनके शब्दों से आज़ादी की चिंगारी,
“पुष्प की अभिलाषा“ में दिखी मानवता की झलक प्यारी,
पद की कभी लालसा न की, माँगा नहीं किसी से आदर
मां भारती की सेवा में कर दिया जीवन न्यौछावर।

कलम तलवार थी बनी, विचार बारूद समान,
राष्ट्रधर्म के पथ पर चलकर, रहा अडिग स्वाभिमान,
केवल कवि नहीं थे, वो तो थे एक युग प्रणेता,
साहस का दीपक जलाने वाले, थे जन-जन के नेता।

त्याग, तपस्या और सत्य से था जिनका सरोकार,
शब्दों की नदी से था होता, संस्कारी जल का संचार,
काव्य ही नहीं, चिंगारी क्रांति की थी हर पंक्ति,
दिल में लौ जलाने वाली थी उनकी शब्द शक्ति।

अश्रुपूर्ण और श्रदा भाव से, आज पुण्यतिथि पर नमन,
कर रहा प्रणाम हृदय से, आज तुम्हें भारत का हर जन,
रहेगी अमर लेखनी तुम्हारी, राष्ट्रधर्म की राह दिखाती,
मद्धम पड़ती चिंगारियों को, देकर हवा रहेगी सुलगाती।


- धरम चंद धीमान


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बलिदानी सिक्ख

सिक्ख बलिदानी रहे हरदम
ये उनके जीवन का हिस्सा है।
रण- चण्डी का स्वागत करना
सिक्ख जनों का किस्सा है।
लहू उबलता लावा- सा
जब रण में चुनौती मिलती है।
सिक्ख बलिदानी के सम्मुख
न एक किसी की चलती है।

एक सिक्ख सौ- सौ पर भारी
ये कहावत नहीं हकीकत है।
वैरी के सम्मुख आज के युग में
बस दो ही बनीं मुसीबत हैं।
उनमें से एक गोरखा है
जो पलक झपकते अन्त करे।
दूसरे सिक्ख बलिदानी हैं
जो वैरी का विध्वंस करें।

ये शिष्य महा गुरुओं के हैं
जो मुगलों के सम्मुख झुके नहीं।
धर्म के खातिर शीश कटाया
पर मारग से वह हिले नहीं।
हर जतन किया हर कष्ट दिया
पर गुरु ने धर्म न त्यागा था।
बलिदानी सिक्ख के सम्मुख
वह मुंह की खाकर भागा था।

गुरु तेग बहादुर शहीद हुए
गुरु गोबिंद ने तख्त संभाला था।
खालसा पंथ बनाकर के
साहस का भरा उजाला था।
साहस के इसी उजाले से
रणजीत ने सत्ता पायी थी।
बलिदानी सिक्ख के सम्मुख
मुगलों की हुई हंसाई थी।

सिक्खों की इस नीति ने
हैरत में सबको डाल दिया।
लोंगेवाला के युद्ध में हिंद को
चांदपुरी-सा लाल दिया।
मुट्ठी भर सैनिक ले लाल ने
पाक पर करी चढ़ाई थी।
इस सिक्ख बलिदानी योद्धा ने
मीर की करी कुटाई थी।


- करन सिंह "करुण"


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औरों की राह में कांटे बिछा कर
आख़िर क्या मिला है किसी को ?
ज़रा दिल सेअपने पूछ कर तो देख
तेरे किरदार से ज़्यादा तेरे अवगुण ही
कचोटेंगे तुम्हें, आज़मा कर तो देख
औरों की राह में कांटे बिछा कर
आख़िर क्या मिला है किसी को ?

बदलते ज़माने में दिखावा करते हैं लोग
अपने को सर्वश्रेष्ठ बनाने में कोई
कोर कसर छोड़ते नहीं हैं लोग,
बिछाते हैं षड़यंत्र की बिसात,
नए-नए पैंतरे रच कर आज भी,
अंजाम अपनी खुली आंखों से तो देख
औरों की राह में कांटे बिछा कर
आख़िर क्या मिला है किसी को ?

सफ़ेदपोश बन कर ऐसे घूमते हैं लोग
जैसे किसी महत्वपूर्ण से कम नहीं,
गोटियां फिट कर अपनों-अपनों की
खुद की कुर्सी बचा लेते हैं लोग,
इनामात के लिए भी आज तलवे तक
चाट लेते हैं लोग,
"धीमान" सांस का एक पल भरोसा नहीं
फ़िर भी अंजाम से बेखबर है लोग,
खुद का हसर क्या होगा ?
आते हुए वक्त की खनक को तो देख
औरों की राह में कांटे बिछा कर
आख़िर क्या मिला है किसी को ?


- बाबू राम धीमान


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संत रविदास जयंती

संत रविदास जी थे, बड़े महान
वे थे, एक साफ दिल के इंसान
वो जात-पात को न मानते थे
समानता की बाते, वे करते थे
अपने कर्मो को ही, पूजा मानते थे
मन लगाकर,नित्य कार्य करते थे
जूते, चप्पल, खडाऊं, वो बनाते थे
उचित मूल्य ही, वो लेते थे
ना किसी से बैर भाव रखते थे
प्रेम भाव सबो से बनाये रखे थे
सभी जनो के प्रति आदर था उनका
देवी-देवताओं में, विश्वास था उनका
कहना उनका, यही था बस
गलत न रखो, किसी से भूलवश
समस्त इंसान है एक समान
रखो सबो से, तुम मान सम्मान
क्या राजा, क्या फकीर ?
एक जैसा है, सबों का शरीर
मन यदि है, तेरा चंगा
तो, तेरे कटोरी मे भी बसी है, माँ गंगा
और इस बात को साबित भी किये
जब बात उनके, स्वच्छ मन में आये
सबो के बीच मे ही आवाज लगाई
हे माँ गंगा, दर्शन दो कि बारी, तेरी है आई
भला माँ गंगा, कैसे बात नकारते
संत रविदास को,
सबों के सामने क्यों झूठलाते?
अपने भक्त की लाज बचाने
माँ गंगा को था ही, आना सामने
फिर क्या था ?
जैसे संत रविदास की आवाज आई
आओ पधारो माँ, आज हमारे द्वारे
भक्त रविदासै, तुझे पुकारे
माँ गंगा, पल भर मे प्रकट हुई
धन्य हुए, संत रविदास
लोग चकित थे,हो गया विश्वास
मन यदि, है तेरा चंगा
तो,कठौती मे भी है गंगा
सभी जन नत मस्तक होकर
संत रविदास को प्रणाम किये हाथ जोडकर
सबने लगाये जोर जोर से नारा
मन स्वच्छ हो, अवश्य हमारा
आज संत रविदास की जयंती पर
चुन्नू कवि सह सब याद करते है,
हाथ जोड़कर


- चुन्नू साहा


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भास्कर

दिनकर से सीखो अनुशासन
कैसे ? करता सब पर शासन।
आखिर ऐसा क्या ? है उसमें
पूजा जाता सारे जग में।

बिना थके प्रति क्षण चला
परि उपकार हेतु वह जलता।
अपनी रश्मि से अवनी के
तम को हर लेता।

संकल्पी भीष्म पिता सा
प्रभावशील हो जाता है।
अपने तीव्र तेज से वह
आलस दूर भगाता है।

नन्हे- नन्हे पौधों को वह
जीवनदान दिलाता है।
फिर हांथ पकड़ मां सा
चलना वही सिखाता है।

जिसकी किरणें पड़ते ही
हर रोग नष्ट हो जाता है।
वो वही तेज और वही शक्ति है
जो सबकुछ पिछला देता है।


- अराध्या सिंह "अगम"


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नहीं है

नहीं उससे कोई अनबन नहीं है,
बस इतना है कि अब मन नहीं है।

सुलझने दे ज़रा मेरी भी ज़िंदगी,
तुम्हारी वजह से कोई उलझन नहीं है।

ख़्वाहिशों को अपनी खरीद सकूँ मैं,
इतना मेरे पास धन नहीं है।

उदासियों से ज़रा दूर ही रहना तुम,
पहले जैसा मेरा जीवन नहीं है।

शुष्क ज़मीं को तर कर सके जो,
ऐसा बरसता हुआ सावन नहीं है।

किसी के मन को भी दिखला सके,
दुनिया में कहीं ऐसा दरपन नहीं है।

साँसों का मेरी नहीं रहा भरोसा,
दिल तो है पर धड़कन नहीं है।


- आनन्द कुमार


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हृदय से उतरे शब्द

मैं न तौलूँ शब्दों की मात्रा,
न छंदों का हिसाब रखूँ।
जो मन बोझिल हो जाए थोड़ा,
उसे काग़ज़ पर उतार रखूँ।

ना सीख सका मैं शिल्प सजाना,
ना विद्या का व्यापार लिखूँ,
जो आँख भिगो दे, भीतर हँसा दे,
बस वही विचार लिखूँ।

कविता जब मौन साध लेती है,
तब उसकी सिसकी सुन लेता हूँ,
जो कह न पाए होंठों से,
मैं वही बात बुन लेता हूँ।

ना पुरस्कारों की चाह मुझे है,
ना सम्मान की भीख लिखूँ,
जो आत्मा को सच लगे अपना,
मैं वही हर सीख लिखूँ।

तुम सँभालो रीति-नीति को,
शब्दों की मर्यादा सारी,
मैं तो हर उस दिल की बात कहूँ,
जो रह जाए दुनिया से हारी।

मेरा लेखन मेरा आवारापन,
मेरी सबसे सच्ची पहचान,
मैं विद्वान नहीं, बस प्रेमी हूँ,
लिखता हूँ… क्योंकि है प्राण।


- नरेंद्र मंघनानी


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वीर सपूत

आज जो हम आजाद घूम रहे
जो भी है आज हमारी शान
अज़ादी के लिए जिन्होंने दे दी जान
ऐसे थे वो वीर सपूत महान

लूटी थी जिन्होंने सोने की चिड़िया
ले गए थे लूट कर सब समान
बेड़ियों में जकड़ी थी भारतमाता
ज़ख्मी था दिल पांव थे लहूलुहान

आज भी सरहद पर खड़े हैं सीना तान
मेघ हों या बिजली कड़के होते नहीं परेशान
दुश्मन पर रहती है निगाह जैसे बाज की
कर देते है मिनटों में दुश्मन का काम तमाम

अमर हो जाते हैं वह जो हो जाते देश पर कुर्बान
इन्हीं वीर सपूतों से है आज मेरा भारत महान
दुनियां में बज रहा है डंका भारत के नाम का
झुकेगा नहीं बनी रहेगी इसकी शान


- रवींद्र कुमार शर्मा


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एक दिन
जब मेरी देह छोड़ देगी प्राण
तो छूट जाएंगे सारे बंधन
सारे रिश्ते
लोक लाज की सारी बातें

छूट जाएगी जीवन की कठिन यंत्रणाएं
जिन्होंने जीवन भर मुझे घेरे रहा
खत्म हो जाएगी वे तमाम चुनौतियां
जो सदैव मेरे सामने मुहबाए खड़ी रही

मेरी आत्मा जन्म-पुनर्जन्म के चक्रव्यहु मे उलझी
लगाएगी ब्रह्मांड के कई-कई चक्कर
मेरे जाने के बाद
यदि इस धरती पर कुछ बचा
तो वो होगा मेरा प्रेम
मैं चाहता हूं
मेरे चले जाने के बाद
बचा रहे मेरा प्रेम
ताकि वह मार्ग प्रशस्त कर सके
नए प्रेमियों का।


- मेवा राम गुर्जर


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क्या है कविता
कविता जिसमें बहती है भावनाओं की सरिता,
जिससे बनती है भावों की अस्मिता।
कविता ख़ुद कुछ नहीं बोलती,
पर दिल के अनगिनत राज है खोलती।
बुनती रहती है कुछ ऐसे शब्द,
जिन्हें पढ़ लोग हो जाते हैं नि:शब्द।
इसमें अमावस का अंधियारा है,
पूर्णिमा का दिखता इसी में हसीन नज़ारा है।
इसमें लय, तुक और छंद है,
इसमें रहती फूलों की सुगन्ध है।
कहीं भौंरा मकरंद के लिए प्यासा है,
कहीं तितली को कंटकों में भी दिखती एक आशा है।
इसमें चमकता ज्ञान का प्रकाश है,
इसी में दिखते सूर्य , चन्द्र और आकाश है।
इसमें होती खेत खलिहान की बातें है,
इसी में होती सर्दी, गर्मी और बरसातें हैं।
कविता जिसमें बहती है भावनाओं की सरिता,
जिससे बनती है भावों की अस्मिता।
कविता ख़ुद कुछ नहीं बोलती,
पर दिल के अनगिनत राज है खोलती।


- भुवनेश मालव


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जल का महत्व

जल ही जीवन का आधार है,
इसके बिना जग सारा बेकार है।
जल के बिना खेती न हो पाए,
सूनी धरती, जीवन लाचार है।
जल बिना धरती भी सूखी है,
जल धरती की पहचान है।
जल है तो हरियाली मुस्काए,
जल ही जीवन की शान है।
जल है तो जीवन है जग में,
इसके बिना सब वीरान है।
जल व्यर्थ नहीं बहाना है,
हर हाल में इसे बचाना है।
नदियों में जल को बढ़ाना है,
धरती पर हरियाली लाना है।
खेतों में फसल लहलहाती है,
जल की बूंदें जीवन बचाती हैं।
जल है तो जीवन का सार है,
इसके बिना सब निराधार है।


- गरिमा


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स्नेह

कुछ स्नेह रखा था
झोले में
जीवन की पूंजी,श्रद्धा भी
कुछ लोग दिए थे
अपने भी
हाँ कुछ जीवित सपने भी
बहुत सहेजा,बहुत संभाला
गले लगाकर,बचा-बचा कर
छिपा-छिपाकर अपने जन से
उसे बचाया
फिर झोले में छेद हो गया
जीवन से मतभेद हो गया
सब स्नेह गिर गये जहाँ-तहाँ
तन खड़ा रहा डगमग-डगमग
बस बिना हृदय के
अब स्नेह शून्य है,शक्ति नहीं है
प्रेम धरा पर कहीं नहीं है
अब बस केवल याद बची है
यादों की फरियाद बची है
कुछ नेह रखा था झोले में
कुछ स्नेह रखा था
झोले में।


- अनिल कुमार मिश्र


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हे तमाम विद्वानो,
भक्तो-देवताओ और
ऋषियो-मुनियो, सुर-असुरो!
ये जात-पात,
किस मादर 'जात' ने बनाई ?
बनाई तो फिर क्यों बनाई ?
क्या मिल गया इसे बनाने से...
जब सबका खून एक जैसा
शरीर के सारे अंग एक जैसे
फिर ये जात-पात क्यों ?
इतनी गहरी साजिश क्यों ?
मानव को मानव से लड़ाने की।
जब तुम सभी इतने विद्वान थे
तो फिर सामानता से कैसा डर ?
कभी एकलव्य का अंगूठा मांगा
तो कभी शंबूक की हत्या...
इस जात ने न जाने कितने
मासूम और निहत्थों की बलि ली।
मैं कैसे मान‌ लूं
कि तुम न्याय करते हो ?
तुम्हारे कितने अवतार हुए,
मगर एक भी अवतार ने
समानता की बात नहीं की।
कोई कहता है वर्ण व्यवस्था थी
तो फिर पालन क्यों नहीं करते हो ?
कोई कहता है मुगलों ने बनाई
कोई कहता है अंग्रेजों ने बनाई
तो भाई तुम क्यों ढो रहे हो ?
क्या तुम अंग्रेजों और मुगलों की
गुलामी और मार भूल गए हो ?
तो फिर बताओ किस
मादर 'जात' ने ये जात बनाई ?


- दीपक कोहली


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कुछ तो कहो

मैं शब्द चुनूँ,
तुम मौन रहो
भली लगे न यह रीत।
कुछ तो कह दो,
कुछ तो गह लो,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।
मैं भी इठलाऊँ,
मैं भी इतराऊँ,
झूम-झूम लज जाऊँ।
गढ़ लो मुझ पर,
सखे, कुछ गीत।
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

रक्तिम आनन,
खनके कंगन,
पायल छन-छन,
दृग में अंजन,
काया कंचन
तब बनो प्रिये मीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

मन हार चुकी,
सब वार चुकी,
कर-कर श्रृंगार
सँवार चुकी।
हरकर मुझको
तुम लेना जीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

कुछ तो कहो,
मेरे मनमीत-
भली लगे न रीत!
उफ़्फ़! कैसी
तेरी प्रीत…!


- सविता सिंह ‘मीरा’


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एक बात

एक बात है जो
साझा करनी है आपसे
लेकिन मिलने पर
दो दिन... दो दिल...
कुछ अल्फाज़ और
कुछ अहसास
वक्त मिले तो जरूर बताना
कोई भी बहाना न बनाना
इंतजार में हैं हम...
भावनाओं में बेशक
हमारी मत बहना हमें
तो बस अपने दबे हुए
जज़्बात है कहना
मिलना अपनी व्यस्त जिंदगी से
निकाल कर कुछ समय
हमारे लिए...
ताकि पूरी हो सके
शायद एक अधूरी दास्तान...


- डॉ. विजय पंडित


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दीवानगी

तुम्हारी जुल्फों के हम हो गए दीवाने,
तुम्हारी दीवानगी के आगे,
सब फीका सा लगा है।
थोड़ी देर और रुकों जरा ,
चाय की चुस्कियां तो लेते जाओ।
ये नशीने लवों की खुशबू तो लेने दो।
मुझे थोड़ा सा आगोश में रहने दो,
सिमट जानें दो मुझे अब बाहों में तुम्हारी।
कभी तो आओ हमारे पास में
कही तों हमें भी घूमाने ले चलों
खूबसूरत वादियों में।
कोई ना हो वहां हमारे और तुम्हारे सिवा,
बस उन गहरी सांसों का एहसास होने दो,
कभी ताकिया ना हो तों,
तुम्ही को अब ताकिया बना डालूं।
अब आखिरी मुलाकात को भी रंगीन होने दो,
ना जो दूर जाओ हमसे
थोड़ा पास में रहने दो।


- रामदेवी करौठिया


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