बात 2022 की है उस दिन शनिवार था लेकिन मैं पहले ही स्कूल से छुट्टी लिया हुआ था। कारण कि उसके अगले दिन रविवार को सुबह आठ बजे राउरकेला में रेलवे की परीक्षा में शामिल होना था। चूंकि राउरकेला मेरे निवास स्थान जमशेदपुर से तकरीबन 200 किलोमीटर की दूरी पर है अतः निश्चित रूप से एक दिन पहले ही पहुंचना जरूरी था। मैं काफ़ी परेशान था क्योंकि उस शनिवार को पूरे झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में कुड़मी समुदाय का रेल टेका आंदोलन प्रस्तावित होने के कारण जमशेदपुर से न कोई ट्रेन राउरकेला के लिए थी और न ही बस। मेरे पास दो ही रास्ते बचे थे। या तो एग्जाम छोड़ दूं या बाइक से सड़क मार्ग द्वारा राउरकेला जाऊं।
मुझे सड़क मार्ग का रूट भी मालूम नहीं था फ़िर भी लोगों से जानकारी जुटाकर लगभग रूट समझ चुका था। पापा सुबह सात बजे जैसे ही नाइट ड्यूटी से लौटे मैं सीधे उनके कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने चेंज करते हुए ही मुझसे पूछा - "क्या हुआ ? परेशान लग रहे हो ?" यहां मैं बताते चलूं कि राउरकेला जाने के लिए मेरे पास अपनी पल्सर बाइक ज़रूर थी लेकिन वो इस हालत में नहीं थी कि इतनी लंबी और वो भी अनजाने रास्तों के सफ़र में ले जा सकूं। मेरे पापा हमेशा से ही हैवी बाइक्स के शौक़ीन रहे हैं और इस लिहाज़ से उनकी नई रॉयल एनफील्ड क्लासिक 350 बाइक उनकी जान थी जिसे वो किसी को चलाना तो दूर की बात,छूने तक नहीं देते थे। इसलिए उनकी बात सुनकर भी पहले तो झेंप गया।
फ़िर भी हिम्मत जुटाकर मैं एक सांस में अपनी बात कह गया - "पापा ! कल सुबह आठ बजे एग्जाम है राउरकेला में ! रेल टेका आंदोलन की वजह से कोई ट्रेन या बस नहीं चल रही है,तो मुझे आपकी बाइक चाहिए ! मुझे आज़ दोपहर को ही बाइ रोड निकलना है।" पापा बिस्तर पर लेटते हुए अप्रत्याशित रूप से सहमति जताते हुए बोले - "ठीक है ! चले जाओ। लेकिन रूट पता है ना ?" मैं ख़ुशी और रोमांच से अंदर ही अंदर चहक उठा कि एक तो नई बाइक और अकेले इतना लंबा सफ़र ! मैं ओवर एक्साइटेड होते हुए कहा - "सब पता कर लिया हूं पापा ! मेरे पारा टीचर दोस्त जगह-जगह पर रास्ते में मिलेंगे और मनोहरपुर तक मुझे सहयोग करेंगे। वहां से ज्यादा दूर नहीं है।" पापा आश्वस्त भाव से सर हिलाने के बाद बेड पर पसर गए।
दोपहर बारह बजे तक मैं अपनी पैकिंग वगैरह संपन्न कर तैयार होकर खाने बैठ गया। अचानक देखा कि पापा भी बैग पैक कर तैयार होकर वे भी मेरे साथ ही खाने के लिए बगल में बैठ गए। मैं जिज्ञासा और अचंभित भाव से उनसे पूछा - "पापा ! आप भी कहीं जा रहे हैं क्या ?" पापा मुस्कुराते हुए बोले - "मैं भी तेरे साथ चल रहा हूं। इतने लंबे सफर और अनजान रास्ते में अकेले जाना ठीक नहीं रहेगा।"
मेरी सारी एक्साइटमेंट काफूर हो गई और थोड़ा-सा मायूस हो गया क्योंकि मैं जगह-जगह दोस्तों से मिलते हुए जाने का प्लान बना चुका था। सिर्फ़ यही नहीं ! मेरे एक दोस्त सोनू सरदार के जरिए फ़ोन पर कांटैक्ट कर राउरकेला में रहने वाले उनके एक जीजाजी के माध्यम से वहां रुकने तक की व्यवस्था कर चुका था। मैं उतरा हुआ चेहरा लेकर बोला - "कुछ नहीं होगा पापा ! जगह-जगह पर मेरे दोस्त हैं ना ! मैं पहुंच जाऊंगा सही-सलामत !" पापा ने कड़े शब्दों में कहा - "मैं साथ जाऊंगा तो बस जाऊंगा। और हां ! टेंशन मत लो सारा खर्च मेरा रहेगा। तुम्हें वहां पहुंच कर जहां रुकना है रुक जाना मैं डिस्टर्ब नहीं करूंगा।" इससे आगे मैं और कुछ बोल नहीं पाया।
तकरीबन एक बजे दोपहर को मैं अपनी पत्नी से कुछ बातें कर विदा लेकर पापा के पीछे बाइक पर चुपचाप बैठकर निकल पड़ा। क़रीब ढाई बजे हमलोग चक्रधरपुर पहुंच चुके थे। यह वही चक्रधरपुर है जिसका वर्णन मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी झारखण्ड यात्रा के वृतांत में भी किया है। वहां चाय पीने के बाद चूंकि पापा को भी रूट की पूरी जानकारी नहीं थी तो उन्होंने चायवाले से आगे का रास्ता पूछा और वहां से हमलोग निकल चले। अजनबी रास्ते और विशुद्ध आदिवासी संस्कृति वाले इलाके होने के कारण कौतूहल और रोमांच का मिश्रण साथ-साथ दिमाग में चल रहा था। सोनुवा पार करने के बाद गोइलकेरा आने वाला था और गोइलकेरा से ही शुरू होने वाला था सारंडा की खूबसूरत पहाड़ियों,हसीन वादियों और घने जंगलों से पटा क़रीब चालीस किलोमीटर का बीहड़ रास्ता। जब हम घर से निकले थे तब भी हम दोनों को पता नहीं था कि रास्ते में सारंडा भी आएगा।
लोगों से सुना था कि अफ्रीका के अमेज़न जंगल के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जंगली वादी है। इसलिए थोड़ी-सी डर के साथ रोमांच सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। गोइलकेरा के ठीक बाद एक छोटा-सा रेलवे हॉल्ट मिलता है महादेवशाल हॉल्ट ! बस यहीं से शुरू होता है घनघोर, डरावना, खुबसूरत और ऐतिहासिक सारंडा जंगल। अकूत लौह अयस्क भंडार, जंगली पशु-पक्षी, जड़ी-बूटियों, करोड़ों वृक्षों के साथ ही आदिवासी जन-जीवन को अपनी गोद में समेटा सारंडा आज़ भी अपने-आप में कई रहस्य दबा रखा है।
लेकिन जिस तरह से इस विशाल जंगल का ओर-छोर पाना कठिन है उसी प्रकार इसके सारे रहस्यों को भी जान पाना पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों, सैलानियों यहां तक कि किसी सरकार के लिए भी टेढ़ी खीर है। महादेवशाल से ही शुरू होता है गोइलकेरा से मनोहरपुर तक सारंडा जंगल से होकर महज़ चार फीट संकरी सड़क। कहा जाता है कि यह चार फीट की सड़क भी पहले नहीं थी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश के कार्यकाल में उनके बारंबार सारंडा दौरे और उनके प्रयासों के फलस्वरूप यह पतली-सी सड़क बिछ पाई। खैर जो भी हो हम जब सारंडा के रास्ते पर दाखिल हुए तो तकरीबन चार बज चुके थे। पतली-सी सड़क और वो भी झबरैले पेड़ों से ढंके बिल्कुल ही डरावने लग रहे थे। आगे बढ़े तो टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे और घुमावदार रास्ते जंगली जानवरों और पक्षियों की अजीब सी आवाजें सफ़र को और भी डरावना बना रहे थे।
क़रीब दस किलोमीटर हमलोग जंगल में दाखिल हो चुके थे। इस बीच महज़ दो-तीन ही छोटी बस्तियां मिलीं जहां बस्ती होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन रास्ते में एकाध बाइक्स को देखकर थोड़ी-सी तसल्ली मिलती रही कि चलो ! इंसान तो कम से कम आते-जाते हैं ही इन रास्तों पर। दस किलोमीटर अंदर आने के बाद एक थोड़ी-सी चहल-पहल वाला गांव नज़र आया। हम लोगों ने सोचा कि पता नहीं आगे कुछ मिले या नहीं। भूख भी लग रही थी तो उसी गांव में एक छोटी-सी परचून की दुकान पर रुककर हमने कुछ बिस्कुट ले लिया। तबतक अचानक से घनघोर काली घटाएं घिरकर बारिश भी शुरू हो गई थी। हम लोगों ने कुछ देर उसी दुकान पर रुकने का निर्णय लिया। क़रीब आधा घंटा गुजर चुका था और बारिश रुकने के बजाय और विकराल रूप ले रही थी। मैंने बिस्किट चबाते हुए दुकानदार से पूछा कि मनोहरपुर यहां से और कितनी दूर है। तो उसने तीस किलोमीटर बताया।
पापा बोले - "शाम के पांच बज चुके हैं और हमने जंगल आधा भी पारा नहीं किया है। ऊपर से बारिश की वज़ह से और अंधेरा हो रहा है। भींगकर ही निकला जाए वरना बारिश नहीं रुकी तो फंस जाएंगे यहीं।" घर से निकलते वक्त बादल का नामोनिशान नहीं था और धूप खिली हुई थी सो हम लोगों ने रेनकोट भी नहीं पकड़ा था। हमलोग करीब पांच बजे शाम भींगते हुए ही निकल पड़े। रास्ते में जगह-जगह पर पहाड़ों से पानी की तेज़ धार आ रही थी और सड़क पर ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने की वजह से पहाड़ों का पानी कुछ जगहों पर सड़क के ऊपर से ही नदी-नाले की शक्ल में बह रही थी। उन पानी की धार के अलावा सचमुच के नदी-नालों का पानी भी बिल्कुल लाल नज़र आ रहा था कारण पूरे इलाके की मिट्टी में लौह अयस्क समाया हुआ है, इसलिए यहां के नदी-नाले,कुएं-बाड़ी हर जगह का पानी लौह अयस्क मिला हुआ लाल नज़र आता है।एक तो शाम,ऊपर से बादल-बारिश और अंधेरा जंगल। सड़कों पर से बहते पानी में भी अंदाजा लगा-लगा कर गुजरना काफ़ी दुष्कर लग रहा था।
मनोहरपुर रेलवे फाटक पहुंचने तक हमलोग भींगकर सराबोर और ठंड से हालत बिना पंख के भींगे मुर्गों की तरह हो गईं थीं। ठंड बर्दाश्त से बाहर हो गई तो हमलोग मनोहरपुर रेलवे फाटक के इस पार एक हंड़िया की झोंपड़ीनुमा दुकान पर शरण ली। महादेवशाल से यहां तक पूरे रास्ते में एक चाय की दुकान तक नहीं मिली। बस जगह-जगह पर झोंपड़ीनुमा हंड़िया और महुआ की दुकानें दिखीं जहां खाने के लिए भींगे चने और गुलगुले छोड़कर कुछ नहीं था। इस दुकान में भी वही सब उपलब्ध था। दुकान वाले ने बताया कि मनोहरपुर शहर यहां से भी लगभग दस-बारह किलोमीटर है।
फाटक पार करने के बाद भी पापा ही बाइक ड्राइव कर रहे थे लेकिन कुछ ही दूर चले थे कि पापा ठंड से इतना कांपने लगे कि बाइक मैं उनसे ले लिया और उन्हें पीछे बिठाकर खुद चलाने लगा। बारिश और बीहड़ रास्तों की वज़ह से मनोहरपुर शहर के बीचोंबीच स्थित रेलवे स्टेशन बाज़ार पहुंचने तक साढ़े सात बज चुके थे।
ठंड और भूख के कारण हमलोग पस्त हो चुके थे। मनोहरपुर मार्केट में हमने थोड़ी-सी चाउमिन वगैरह खाया और चाय पिया। ठंड के चलते मन तो कर रहा था कि आज़ पिता-पुत्र की मर्यादा को किनारे रखकर उनसे कह डालूं कि चलिए अलग-अलग जगह बैठकर एक-एक रम की क्वार्टर मारते हैं फिर आगे चलते हैं। लेकिन मर्यादा के दायरे में ही ख़ुद को दबाकर आस-पास के लोगों से राउरकेला की दूरी और रास्ता पूछा और फ़िर वहां से आठ बजे निकल चले। राउरकेला तक की दूरी लगभग 50 किलोमीटर थी।
रात नौ बजे वहां पहुंचने के बाद पापा बोले कि जहां मेरे रुकने का प्लान था वहां मैं जा सकता हूं। यहां पहुंचने तक मेरे मन में वही प्लान था लेकिन मेरे अंतर्मन ने मुझे झिंझोड़ कर कहा कि मेरे पिता ने अपनी केयर दर्शाते हुए इतने दुर्गम सफ़र में मुझे अकेले आने नहीं दिया। मेरे साथ-साथ ख़ुद भी थकावट,तनाव और ठंड झेला। शाय़द पापा नहीं होते तो मैं थोड़ा सा जंगल के अंदर घुसते ही उल्टे पांव वापस भाग जाता। भाड़ में गई परीक्षा कहकर ! यही सब सोचकर मन बना लिया कि पापा जहां रुकेंगे मैं भी वहीं रहूंगा वरना उन्हें बुरा लगेगा। फ़िर मैंने फ़ोन कर सोनू दा के जीजा को मना कर दिया। फिर पापा के दोस्त के वहीं रात्रि भोजन और विश्राम किया।अगली सुबह परीक्षा लिखकर दस बजे हमलोग राउरकेला से घर के लिए रवाना हो गए। उस दिन धूप खिली हुई थी। दिन के उजाले में सारंडा जंगल उस दिन जाने वक्त की अपेक्षा थोड़ी-सी ज़्यादा चहल-पहल लग रही थी।
इक्के-दुक्के आटो, बसें और चार पहिया वाहन भी उसी संकीर्ण रास्ते से आते-जाते दिखे। उस दिन पूरे जंगल के रास्तों में घुमावदार, ऊंचे-नीचे बीहड़ रास्तों, घाटियों, नदी-नालों, गांव-कस्बों और अनुपम आदिवासी जन-जीवन की छटा का आनन्द लेते हुए आए। पूरे रास्ते अलग-अलग जगहों पर क़रीब बीसियों बार रुककर हमने मोबाइल से काफ़ी फ़ोटो भी शूटकर इस यादगार सफ़र को अपने संग्रह में कैद करने की कोशिश की। लगभग बारह बजे तक हमलोग जंगल को पार कर वापस महादेवशाल हॉल्ट पहुंच चुके थे। वहां उस झबरैले झाड़ीनुमा पेड़ों से आच्छादित टनल की तरह दिख रहे सारंडा के एंट्री मार्ग पर रुककर काफ़ी देर तक उसके रोमांच और खुबसूरती को निहार कर दिल में संजोने की तसल्ली की कोशिश की।
फिर कुछ फोटो शूट करके थोड़े से भारी मन से अपने अंतर्मन में कहा - "अलविदा सारंडा! शुक्रिया एक अभूतपूर्व रोमांचक सफ़र प्रदान करने के लिए ! फ़िर मिलेंगे!"
फिर हमलोग वापस लौट चले।
- कुणाल







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