साहित्य चक्र

30 January 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 30 जनवरी 2026





*****






यादें बोलती हैं
कभी मौसम की तरह,
कभी ख़ुशबू की तरह,
कभी किसी अजनबी की आवाज़ में,
जिसमें तेरा लहजा छुपा हो।

अब मैं तुझे
तेरी यादों की ज़बान में समझता हूँ।
तेरे लफ़्ज़ नहीं,
तेरे एहसास पढ़ता हूँ
जैसे कोई सूफ़ी
किसी किताब के बग़ैर
सच की तिलावत करता हो।


- तौसीफ़ अहमद


*****






कुंभ रौ न्हाण

बात बाळपण री है
म्हं टाबर हो
पोह अर माघ रै माह
जाडो घणों पड़तो
नाक चालतो दांत बाजता
धरती धौळी होंवती
आकड़ा तक बळज्यांवतां
न्हावण रै नावं सूं धूजता
फुरसत अर अदितवार रै दिन
न्हावण रौ ओपतो मुहुर्त होंवतों
भींत री ओट मां पाटों झलाती
म्हें धूळ माटी सूं खेलता
अघोरी बाबा बण्यां फिरता
मां पकड़ जट पाट'अ पटकती
म्हाने नंग धडंग
बाखळ बिचाळें
मां न्हावंती
म्हें नागा साधु बरगा लागता
बळबळता पाणीं सूं
मां न्हावंती
भाटा री टिकड़ी सूं
काया रौ दाळद(मेल) उतारती
मां म्हारें तेल रौ चौपड़ करती
ठोडी पकड़ पटा बाती
जट्टा रौ बुगो करती
माथा माथे काळों टिकों करतीं
आपरै हाथ दूध पिलावंती
रोटी रौ चुरमों बणाय खिलावंती
मां रै हाथ त्रिवेणी बैंवती
आजै जद बाळपण याद करूं
मां रै हाथ रौ न्हाण
आज रै महाकुम्भ सूं सवायो लागै।


- जितेन्द्र कुमार बोयल


*****




ये कैसा बसंत

खेतों में न सरसों फूली,
हुई नहीं अभी वो पीली,
पेड़ों पर न आये नव पल्लव,
पुष्प भी अभी हैं दुर्लभ,
परिवेश भी नहीं है महका,
फूलों की खुशबू से न चहका,
आम बौर भी भूला आना,
कहाँ गया कोयल का गाना,
नहीं कहीं है भंवरों की गुंजन,
तितलियों का भी नहीं है दर्शन,
उद्यानों में है सुस्ती छाई,
ली नहीं जीव जगत ने अंगड़ाई,
रंगबिरंगी कुसुमी छटा न बिखरी,
रंगहीन घाटियाँ न निखरी,
पवन न छोड़े अपनी सिरहन,
बदला सा लग रहा ऋतु मन,
बसंत पंचमी आ गई कर शिशिर का अंत,
कैलेंडर तो तिथि बता रहा,
पर है ये कैसा अब का बसंत ?


- धरम चंद धीमान


*****





सिर्फ दिल से ही आसमान छूते हैं
हम सिर्फ दिल ही जानता है
ऊँचाई का अर्थ,
वरना आँखें तो
दूरी ही नापती हैं।

हाथ थामते हैं संसार को,
बुद्धि तौलती है लाभ–हानि,
पर जो उड़ना सिखा दे-
वह केवल दिल होता है।

आसमान कोई छत नहीं
जिसे लांघा जाए,
वह तो एक मौन विस्तार है
जो हृदय के खुलते ही
अपने आप पास आ जाता है।

जहाँ तर्क थक जाता है,
वहीं प्रेम आरम्भ होता है,
और उसी क्षण
मनुष्य ईश्वर की ऊँचाई छू लेता है।
इसलिए दिल को छाती में नहीं,
अनन्तता में रखा है-
ताकि हम सीमाओं में रहकर भी
असीम को छू सकें।


- नरेंद्र मंघनानी


*****




गुरु जी
कठिन आसान जो कर दे
वही पहचान है उनकी ।
दिवाकर सी खिले शोभा
कुसुम सी शान है उनकी ।
रटाना है नहीं उद्देश्य
जिनका मैं बताता हूँ ।
उन्ही शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं।


जिनकी वाणी सें कण- कण
ज्ञान का तादाम्य स्थापित ।
बिखर जाता तिमिर लेकिन
नहीं है ओज विस्थापित ।
नही धूमिल हुआ है तेज
रवि .का मैं बताता हूँ ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं ।


जहां प र वक्ता बनकर वे
खड़े हो जाते हैं यारा ।
तिमिर को चीर कर सर्वत्र
दिखाई देता उजियारा ।
अलौकिक इल्म के वो पुंज हैं
यह मैं तुमको बताता हूँ ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं ।


जिन्होंने की मोहबत मादर
- ए वतन से इन्तहा ।
कहानी है छपी जिनकी बनी
ये आज सुर्खियां ।
ये छोटी सी झलक उनकी
जिसे मैं तुमको . दिखाता हूं ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाती हूं ।


जिसकी नीति सदा शतमान
सी प्रतीत होती है ।
उनकी अमृत . सी वाणी जो
कभी आपा न .खोती है।
धैर्य का है ये अनुबंध
ऐसा किस्सा सुनाता हूं ।
ऐसे शिक्षा के नायक
की कहानी मैं सुनाता हूं।


वो कर करि से रहम के
बीज निज उपल पे बोते हैं ।
अश्म पर पंक में हरदम वो
अम्बुज को खिलाते हैं ।
भविष्यत् हिन्द का नवहिन्द
में परिणत कराते हैं ।
ऐसे शिक्षा के नायक
की कहानी हम सुनाते हैं ।


- करन सिंह "करुण"


*****




बापू की पुण्यतिथि

बापू की पुण्यतिथि है आज
शोक संतप्त है, पूरे समाज
आज को वो तारीख,याद है
बापू, अब नही हमारे साथ है
ऐसी ही एक खबर, फैली
और देश, शोक लहर मे फैली
ये क्या हो गया और कैसे ?
शहीद हुए या शहादत हुए जैसे ?
जो भी हो,लेकिन बापू अब न रहे
सच है ये बाते, सबने कहे
दुखद अंत था, बापू का हमारे
जन जन के थे, वे प्यारे
गुलामी के जंजीरे तोड़ने वाले
सबो के लेकर, साथ थे चले
जिधर चल पड़ा था, उनके कदम
उधर ही उमड़ा था, लोगो का हुजूम
बापू के साहसी का सरहाना
लोगो के मुँह मे था, ही आना
कोई उसे महात्मा कहते
तो,कोई राष्ट्रपिता कहते
देखते ही देखते वो
मोहनदास कर्मचंद
सबके हुए आवाज, बुलंद
आजादी के बिगुल बजाकर
सबको दिया एकत्रित कर
अंततः चलाया असहयोग आन्दोलन
और चलाया सविनय अवज्ञा संगठन
डांडी यात्रा से लेकर,
करो या मरो का नारा
देकर सबका बना, बापू प्यारा
सबो के सहयोग,सबो के साथ से
हरेक लोगो ने थामे हाथ को हाथ से
और एकजुटता की बनी मिशाल
देश हुए आजाद,
हुए सब खुशी से निहाल
फिर क्या था ? होनी तो तय था
भला-बुरा तो सब जगह ही था
और एक शाम, कुछ ऐसा हुआ
जिसकी अंदाजा किसी को न हुआ
हे राम;; आखिरी शब्द बापू के निकले
और हमसब को छोड़, सदा को गये,चले
30 जनवरी वो तारीख ही है
जो इतिहास मे,पुण्यतिथि के रूप मे दर्ज है
पुनः चुन्नू कवि करते है सबो से निवेदन
पुण्यतिथि पर बापू को करे नमन।


- चुन्नू साहा


*****




सफ़ेद चादर

सफ़ेद चादर ओढ़कर, धरा हुई निहाल,
कण-कण उजला हुआ, चमका धरा का भाल।
चमका धरा का भाल, नयन मुस्काए,
पेड़ –पहाड़ शांत हैं, प्रकृति गीत गाए।
प्रकृति गीत गाए, मन हर्षित हो जाए,
देख सफ़ेद चादर, मन माल-माल हुआ जाए।

बर्फ गिरी अंबर से, संग मधुर तान,
ठिठुरन है गा रही, सौन्दर्य का सुरीला गान।
सौन्दर्य का गान सुन, मादकता है छाई,
कण-कण पवित्र हुआ, चांदनी है छाई।
चांदनी है छाई, मन को खूब भाये,
बर्फ गिरी अम्बर से, मन मद मस्त हुआ जाए।

निश्छल ये बर्फ हमें, सिखलाती व्यवहार,
शीतल रहना सीख लो, छोड़ क्रोध–विकार।
छोड़ क्रोध-विकार, पवित्र बनो मन से,
पिघल जाओ बर्फ सा, प्रेम की अगन से।
प्रेम की अगन से, जीवन खिल सा जाए,
निश्छल ये बर्फ हमें, सन्देश यही दे जाए।

सूरज किरण जब छुए, बर्फ बने जलधार,
बलिदान का ये रूप ही, है जीवन का आधार।
है जीवन का आधार, परिवर्तन को अपनाना,
कठोर बाहर से दिखना, भीतर करुण हो जाना।
भीतर करुण हो जाना, यही है सच्चा सार,
बर्फ की किरण छुए, बर्फ बने जलधार।


- धरम चंद धीमान


*****




पुरुषार्थ

जिस दिन भी सूरज ढल जाएगा,
तुम अपनी चमक बचा लेना,
इतिहासों के पन्नों में अपनी धमक बचा लेना।

मरने के डर से जो अपने ही घर में छुप जाते हैं,
इतिहासों के कूड़ेदानों में वो अक्सर फेंके जाते हैं।

पुरुषार्थ पुरुष का गहना है, कायरता विष का प्याला है,
जो तूफ़ानों से टकराए, वही तो हिम्मत वाला है।

बैठ किनारे सोच न पगले, गहराई की बातों को,
लहरों से जो लड़ जाता है, वही तो पावन ज्वाला है।

अंगद का पैर जमा देना, लक्ष्मण का मेघनाद संहार,
मर्यादा में रहकर भी जो, कर दे अधर्म पर प्रहार।

कठिन समय में राम सरीखा, धीरज जिसने धार लिया,
सच्चा पुरुषार्थी वही, जिसने निज भय को मार दिया।

रण-कौशल अर्जुन सा रखना, दानवीरता कर्ण जैसी,
लक्ष्य भेद दे जो मछली का, एकाग्रता हो बस वैसी।

मिट जाना पर झुकना मत तुम, यही धर्म का नारा है,
पुरुषार्थ की गाथा से ही, महका विश्व-सहारा है।


- देवेश चतुर्वेदी


*****




वसंत नहीं सच दूसरा

सच है आग-पानी-हवा
पृथ्वी और आकाश की ही तरह
सच है जीवन-मृत्यु भी सच-सच
इनका होना ही है सबूत मेरा होना
मेरे होने का सबूत सिर्फ़ हूॅं मैं ही
नहीं कुछ और,नहीं कहीं कुछ और
दूसरा-तीसरा भी होता नहीं कोई
सिर्फ़ एक अकेला विकल्पहीन
वसंत भी होता है एक अकेला ही
वसंत नहीं सच दूसरा।

*****

एकांत की पुकार है वसंत

जहाॅं-जहाॅं लिखना चाहता हूॅं प्रेम
वहाॅं-वहाॅं लिखता चला जाता हूॅं वसंत
पहले वसंत लिखता है मुझे,फिर मैं
वह जगाता है मुझे,जागता हूॅं मैं
सुलगने से पहले की आहट हैं कुछेक
और हैं कुछेक वे मद्धम ध्वनियाॅं भी
जिनमें इसी पृथ्वी,इसी पृष्ठभूमि के
सुख-दु;ख भी शामिल तमाम-तमाम
कई-कई बंदिशों के बाद भी आवरणहीन
अनेकांत के एकांत की पुकार है वसंत
जैसे रोशनियाॅं अनेकानेक।


*****


कितने दिन कितने वसंत और?

मुक्त है और मुक्त करता है सब
घटता है ठीक-ठीक घटनाओं की तरह
घटाता नहीं है कहीं कुछ भी ज़रा नहीं
पता भी किसी से कुछ पूछता नहीं
देता है मार्ग और दर्शन सभी-सभी को
मगर करे तो करे ही क्या उन लोगों का
जिनके शैतानी दिमाग़ों में शैतानियाॅं ढ़ेरों
और घर शरीफ़ों के ख़ाली नहीं
शराफ़त की लगातार रेंग रही चींटियों से
सब देखते हैं और देखता हूॅं मैं भी
बहुत कुछ,बहुत कुछ पूछते हुए यहीं कहीं
कितनी तारीख़ें,कितने दिन वसंत और
जब अपने हों,सपने हों सच सब ?


- राजकुमार कुम्भज


*****




प्रेम

प्रेम की कीमत प्रेम करने वाले जानते हैं,
जहां पर हृदय का स्पर्श हो जाए,
वहां पर फिर कोई कीमत नहीं
हर पल महसूस होने की एक झलक दिखाई देती है।
जब बनाती हो मीठी-मीठी गर्मा गर्म चाय,
जब मेरे हाथों में हाथ से होकर आती है।
और लबों को छूती है तो मीठा
एहसास ही कुछ अलग सा लगता है।
एक ख्वाब नहीं हकीकत है,
तेरे होने का एहसास मैंने महसूस करके देखा है।
जब तुम मुस्कुराती हो तो और भी प्यारी लगती हो,
मेरा हर दिन सुनहरा हो जाता है।
जब मैं खिली हुई मुस्कान को मैं हर पल निहरता हूं।


- रामदेवी करौठिया


*****




उम्मीद

न पास कुछ है, देने के लिए,
न बचा ही कुछ, लेने के लिए।

पास है तो बस उम्मीद रखा हूं,
जो करना था,अब कर चुके,
बहुत चले पथरीले राहों पर,
अब अपनी किस्मत से ताकीद रखा हूं।

क्यों न हो उम्मीद इसपर तो दुनिया
चलकर थमी है,
मैं भी चातक बन गया हूं,बस
स्वाति के पहली बूंद की कमी है।

दीए सब टिमटिमा रहे,दिन में
तारे नजर आ रहे।
फिर भी दिए को मंद हवाओं
से भी बचा रखा हूं।
उसी तारे से अपने किस्मत
के सितारे की उम्मीद रखा हूं।


- रोशन कुमार झा


*****





दर्द-ए-बयां

ठोकर जब देती है दर्द हमें
मरहम देता दर्द को बुझाय
दिल पे जब चोट लगती है
मरहम ना पाये उसे समुझाय
क्रोध जब धधके आग में
ङाल दो इसपर ठंडा पानी
ना जलायेगी क्रोध की आग
बुझ जायेगी गुस्से की कहानी
शांत सागर है तुफां का द्योतक
ना समझो मौन को कमजोर
जब आनी होती है यहाँ सुनामी
सब कुछ पल में हो जाता है दूर
आलस्य मानव का बना है बैरी
ना दो इन्हें तन मन में वास
टाल देती है कामों को अक्सर
जब हो जाती है जालिम निवास
अनपढ़ पूत है जग का यमदूत
कहती थी मेरी नानी अपनी जुबानी
अनपढ़ से ना करना कभी प्रीत
खत्म कर देगी जीवन की तेरी कहानी
सलाह सदैव लिजीये साधु जन से
भले ही दुश्मन हो बना घर के आगे
सज्जन देते है भलाई की सलाह
भले ही तुमको मन में ना जागे
धन दौलत है रिपु के समान
चोर डकैत को देता है आमत्रंण
कभी ना बनना धन्नामल
छीन लेता है नींद जड़ चेतन

 
- उदय किशोर साह


*****




उठो उठो हे स्त्री

अभी तो उसने फिर से
जीना शुरू किया था
पति के वियोग के बाद।
धीरे-धीरे साँसों में लौटने
लगी थी धड़कन,
वजह था उसका एकमात्र पुत्र,
जिसने अभी एक वर्ष पहले ही
इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था।
पर ऐसा कौन-सा पाप था
जिसकी इतनी बड़ी कीमत
उसे चुकानी पड़ी?
अब तो उसके पास कोई
वजह भी नहीं बची।
कैसे जिए वह?
और उसे कौन समझाए
कि अब जीने की वजह क्या है?
पति के आकस्मिक निधन के बाद
वह जीना छोड़ चुकी थी।
लोग बार-बार उसकी एकमात्र संतान को
उसके सामने बैठाकर कहते थे
“अब तुम्हें इसके लिए जीना है।”
अब… वह भी नहीं।
मात्र पैंतालीस बसंतों में
जीवन ने उसे ऐसे-ऐसे थपेड़े दिए
माँ, पति और बेटा…
सब एक-एक कर छिन गए।
हृदय विदारक था वह चीत्कार
“अरे मेरा बाबू, मेरा लल्ला!
कहाँ गया तू?
काहे धोखा दिए बाबू?
क्या पाप किए थे हमने?
अब हमें नहीं जीना”
क्या सचमुच
किसी के कर्मों में ही कोई
कमी रह जाती है?
फिर भी
तुम्हें जीना होगा।
उठो… उठो हे देवी!
तुम धरती हो।
हर पीड़ा, हर दुख
हृदय में संजोकर भी
तुम जियो।
भगवान ने तुम्हें यूँ ही नहीं रचा-
उठो, जियो।
और हाँ,
जब तुम थोड़ा अपने
लिए जीने लगोगी,
जब माथे पर बिंदी सजेगी,
अच्छे वस्त्र पहनोगी,
किसी से दो शब्द बोल लोगी
तो वही लोग,
जो आज रुदाली बने हैं,
कल ताने देंगे।
किन्तु अब!!!
अब चुप नहीं रहना।
अब जीवन से माफी नहीं माँगनी।
अब जीना अपराध नहीं
एक साहस होगा।


- सविता सिंह मीरा


*****

No comments:

Post a Comment