साहित्य चक्र

25 January 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 25 जनवरी 2026






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ख़ामोशी का मौक़ा

ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी
देश-दुनिया में ताज़ा-ताज़ा क़ब्ज़ा करता
राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करता
सीने पर बंदूक तानता,भीख माॅंगता
नोबेल दे दो, नोबेल दे दो
है बली बहुत मगर छली अद्वितीय
बिना बुलाये कहीं भी घुस जाता
भटकता-भटकाता... उलझता-उलझाता
हा हा करता,हाथ हिलाता,ऑंखें दिखाता
ख़ुद को अकेला पाता,सुरक्षा-घेरों में
मटक-मटककर सुरक्षित मचलता
ख़ुद ही ख़ुद के प्रिय-अप्रिय नारे लगवाता
अन्नदाता-अन्नदाता, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद
वह जो तन-मन-जीवन से यौनरोगी
वैश्यागामी,कपटी,विश्व-गुंडा कौन है
बोले ढक्कनछाप विश्व-गुरू असत्यश्री
काका मेरा काका अमेरिका
ट्रम्पम् शरणम् गच्छामि
बम्बम् शरणम् गच्छामि
मौक़ा भी,मुनादी भी, ख़ामोशी भी
ओम् शांति...


- राजकुमार कुम्भज


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जीना भी हुआ है यूं दुश्वार आजकल
महंगा हुआ किस कदर बाजार आजकल

अब तो हद हो गई इंतजार आजकल
बंद हो चली सहरे गुलजार आजकल

थोड़ी सी ही तो बात थी हम दोनो के बीच
क्यों रह गयी दूरी बीच बरकरार आजकल

जिन्दगी करती रही तुम्हारे आने की प्रतीक्षा
खतम है तुम्हारे आने के आसार आजकल

यदि खुदा की मर्जी यही तो कोई बात नहीं
रहेगा सदा यह दिल तुम्हारा तलबगार आजकल

"रत्न" बनी है ऐसे ही पत्थर को तराश कर
कि मिटती नही मिटाने पर संसार आजकल


- रत्ना बापुली


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आया है बसंत,
छाया है मंगल।
मां शारदे वीणा वादिनी,
आराधना में तुम्हारी करूं।

ज्ञान से मुझे भर दे,
मां विधा रुपी धन दे।
स्रोत बहें रग रग में,
ऐसी निर्मल वाणी कर दें।

पीली पीली सरसों में,
चारों तरफ़ बसंत आया।
मन में कष्ट कभी न रहता,
जब मां ह्रदय में रहती।

उज्जवल भविष्य मेरा कर दो,
सहियम साहस सब भर दो।
मां वाणी में मधुरता भर दो,
छल कपट से दूर रहूं,
मेरा जीवन धन्य कर दो।


- रामदेवी करौठिया


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हॉफ प्लेट- जिंदगी

बचपन में ही जी ली,
पूरी जिंदगी,
अब खुदा की करनी है,
इबादत और बंदगी।

अब हॉफ प्लेट सी,
हो गई है जिन्दगी।
अब थक चुका हूं,
देख दुनिया की दरिंदगी।

रंग ना रहा कोई,
ना सपने सतरंगी।
रिश्ते तो दूर ही रहे,
इनमें भी छाई है तंगी।

पहले लोग सरल थे,
मिठास भरा जैसे नारंगी।
अब तो मिलते ऐसे डर लगे,
जैसे हाथों में थामे तलवार नंगी।

तृष्णा बढ़ती रही,
चाहिए सब कुछ महंगी।
गंजे की भी चाहे,
रहे उनके पास कंघी।


- रोशन कुमार झा


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ये दर्द उससे कम है....

तन-बदन लहर रहा,
सांसें तेज गर्म हैं।
फ़िर भी तेरी गैर-मौजूदगी का,
वो सालता जो गम है....
ये दर्द उससे कम है....

दिन गुज़रते सन्नाटे में,
रात तपते जिस्म से टूटता दम है।
तू नहीं है फिर भी जो,
तेरे होने का वहम है....
ये दर्द उससे कम है....

दुखती रगों से सिससकते हुए,
जलता ये बदन है।
तेरी दूरियों पर भी,
तुम हो बांहों में जो भरम है....
ये दर्द उससे कम है....

कब छूटेगी सांसें पता नहीं,
अब-तब टूटे लगता ये दम है।
परवाह फ़िर भी नहीं इसकी मुझे,
बस तेरी याद में जो आंखें नम हैं....
ये दर्द उससे कम है....
ये दर्द उससे कम है....


- कुणाल


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ये गलियाँ, ये चौराहे, कब से बुलाते रहे मुझे
शौक से, जहां से, मैं गुजरा करता था कभी,
दौड़ता हुआ, तो कभी हांफता हुआ,
कभी सलीके से चलता हुआ,
गुजरा करता था कभी
ये गलियाँ, ये चौराहे, कब से बुलाते रहे मुझे
शौक से, जहां से, मैं गुजरा करता था कभी...

याद आते हैं मुझे आज भी, मेरे अज़ीज़ दोस्त
ताहने मार-मार कर मेरे सीने को छलनी कर
अजीब सी खुशियाँ मनाया करते थे कभी ,
ज़िगर के कर टुकड़े-टुकड़े, कलेजे में
मेरे सुईयां चुभोया करते थे कभी,
ये गलियाँ, ये चौराहे, कब से बुलाते रहे मुझे
शौक से, जहां से, मैं गुजरा करता था कभी...

खासमखास हैं, ये तो बाबू राम धीमान के
कुछ मित्र, हमें ऐसे कहा करते थे कभी,
बीरबल की चाय की गर्म चुस्कियाँ
मन्द-मन्द मुस्कराहट हमें उसकी,
हमें भुलाए भूलती नहीं कभी,
ये गलियाँ, ये चौराहे, कब से बुलाते रहे मुझे
शौक से, जहां से, मैं गुजरा करता था कभी...


- बाबू राम धीमान


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सच क्या है ?

हर कोई ?
ज़ज बना हुआ है,
देखा-देखी के ?
इस दौर में,
आखिर ?
सच क्या है ?
क्या झूठ है ?
थोड़ा सा तो!
जान लो इस संसार में?
कभी ?
आंखों देखा और कानों सुना भी!
गलत हो सकता?
इस बिन सोची समझी भाग दौड़ में!
इतनी तल्खी भी ठीक नहीं मेरे दोस्त!
क्यों ? जबरदस्ती!
मशहूर होना चाहते हो ?
आभासी संसार के इस मायाजाल में।


- कै. डॉ. जय महलवाल अनजान


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मेरी मां

तूने ममता का आंचल बिछाया था।
मुझे उसमें तूने सुलाया था।
खुद गीले में सोई है तू मां
मुझे सूखे में तूने सुलाया था।
कदम-कदम पर मैं गिरती थी
तूने संभलना सिखाया था।
एक तेरे सिवाय ओ मां
दिल मेरा सबने दुखाया था।

सारी दुनिया से अलग है तू मां
एक मुझ पर ही तेरा साया था।
जब अकेली थी दुनिया में मैं
तब तूने ही साथ निभाया था।
मुझ पर आई मुसीबत जो कोई
मां तूने उससे मुझको बचाया था।
बड़ा मुझको बनाने को ओ
मां तूने छोटा खुद को बताया था।

गलती हुई जब मुझसे मां तूने
प्यार से तूने जिसको बताया था।
जब कभी नींद आंखों में थी न मां
तूने सीने से मुझको लगाया था।
जब भी रूठी थी तुझसे ओ मां
मुझे खुद ही तूने बनाया था।
हार मानी कभी जो मैंने मां
तूने हौसला मेरा बढ़ाया था।


- मानवी सिंह 'मनसा'


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तेरी याद

कुछ बात है कि!
तेरी याद मिटती नहीं,
जो साथ तूने दे दिया।

कुछ बात है कि!
तेरी बात भूलती नहीं,
जो शब्द तूने गढ़ दिया।

कुछ बात है कि!
तेरी कमी खलती रही,
जो वक्त तूने दे दिया।

कुछ बात है कि!
तेरी छवि दिखती रही,
जो वेवक्त तूने पढ़ने दिया।

कुछ बात है कि!
तेरी प्यारी मुस्कान कहीं,
जो नजर से उतरती नहीं।

कुछ बात है कि!
तेरी ओ मीठी जुबान,
जो ढूंढता फिरता कहीं।

कुछ बात है कि!
तेरी बिखरे लट कहीं,
जो बिन हवा नाचती रही।

कुछ बात है कि!
तेरी अखियां चमकती कहीं,
जो बिन कजरा कजरारी रही।

कुछ बात है कि!
तेरी होंठ की लाली कहीं,
जो गुलाब सी गुलाबी रही।

कुछ बात है कि!
तेरी याद मैं ग़मजदा,
जो जिंदा हो बस जी रहा
बस जी रहा।


- राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु'


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पहाड़ों की व्यथा 

बर्फ की चादर ओढ़े पहाड़ 
अब उदास से लग रहे
लिपटी हुई सफेद चादर
अब पतली सी हो रही 
क्योंकि बर्फ अब के वर्ष
उतनी नहीं पड़ रही 
दशा देख यह नदिया
भी सूख रही
पानी का बहाव हो रहा
है कम
देख हाल इनका
भविष्य की चिंता लगी सताने
बादल कभी-कभार तो आते
पर बहुत ऊंचे पहाड़ बर्फ
पाते हम फिर भी रह जाते 
कहीं हमारी बर्फ पूर्णरूपेण 
पिघल गई तो अच्छा नहीं होगा 
वातावरण परिवर्तन का असर
अब साफ नजर आने लगा
हम पर भी अब तो हल्की 
वनस्पति उगने आई।
मौसम भी अब सर्दी का कम
गर्मी का ज्यादा लगता 
आखिर हमारा अस्तित्व दाव
पर लग गया
अब हम बर्फ से लदे 
कम समय तक नजर आएंगे 
तो परिणाम भी अच्छे नहीं पाएंगे।


- विनोद वर्मा


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कुर्सी ऊँची हो या साधारण,
वह मनुष्य को नहीं,
मनुष्य के संस्कारों को उजागर करती है।
कुर्सी पर बैठकर आवाज़ ऊँची करना आसान है,
पर नीचे खड़े व्यक्ति को सम्मान देना कठिन।
कुर्सी मिली है तो यह न समझो कि
हम बड़े हो गए,
समझो कि ज़िम्मेदारी बढ़ गई है।
कुर्सी सेवा के लिए हो तो पूजा बन जाती है,
और अहंकार के लिए हो तो पतन का कारण।
जो कुर्सी पर बैठकर भी झुकना जानता है,
वही वास्तव में ऊँचा कहलाता है।


- नरेंद्र मंघनानी


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खुशी से मनाओ बसंत पंचमी का त्यौहार

आरंभ हो गया है प्रकृति में नवसंचार,
खुशी से मनाओ बसंत पंचमी का त्यौहार,
पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं में मानो
खुशी की एक नई लहर आई है,
पीली सरसों की चादर ओढ़
मौसम ने भी ली अंगड़ाई है,

कण-कण खिल उठा प्रकृति का अब ऋतुराज पधारे हैं,
सरस्वती वंदन के साथ करें बसंत का स्वागत,
यही संस्कार हमारे हैं,

तितलियां और भंवरे कर रहे हैं फूलों संग आलिंगन,
देखकर प्रफुल्लित हो रहा है आज "माही" का भी मन,
'बसंत' केवल एक ऋतु नहीं है यह संदेश है नव निर्माण का,
आपस में हो मेलजोल स्नेह,
वंदन-अभिनंदन, अर्पण और तर्पण का।


- रचना चंदेल 'माही'


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आ गया ऋतुराज बसंत

रही न हवाओं में अब वो वैसी सिरहन,
परिवेश में हो रहे सुबह शाम परिवर्तन।
कोमल नव पल्लवों से, हुए तरु श्रृंगारित,
आ गया मनभावन अब ऋतुराज बसंत।

आ गया आम्रतरू पर, है स्वर्णमयी बौर,
पीत वर्ण पुष्पों से हैं, खेत सरसों के सराबोर।
नव उर्जा, उत्साह से हो उठी प्रकृति जीवंत,
आ गया है मनभावन अब ऋतुराज बसंत।

रंग विरंगी तितलियाँ फूलों पर मंडराए,
नूतन स्वरूप पा तरु डालियाँ मंद-मंद मुस्काए।
कोयल मधुर कूक दे, आसक्त प्रिय को करे तुरंत,
आ गया है मनभावन अब ऋतुराज बसंत।

उड़-उड़, आए-जाए, अनंत विहग टोलियाँ,
सरोवर किनारे मधुर कलरव में कर रहे अठखेलियाँ।
फूलों की भीनी महक से, भंवरे भी हो गये चलंत,
आ गया है मनभावन अब ऋतुराज बसंत।

नव जोश, नव संकल्प, जीव-जन्तु में हुए संचारित,
धीरे-धीरे हो रही प्रकृति भी, दुल्हन सी श्रृंगारित।
ठिठुरन भगाती दौड़ी आई, बासंती समीर हुई बलबंत,
आ गया मनभावन अब ऋतु राज बसंत।


- लता कुमारी धीमान


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वासन्ती समीर

मौसम ने है करवट बदली,
फटा कुहासा ना अब बदली।
वासन्ती समीर है बोला,
फेंको तन से सर्दी चोला।

रोज दे रहा सूरज दस्तक,
मानो तिलक लगा नभ मस्तक।
पेड़ों ने पत्तों को पहना,
नया-नया यौवन का गहना।

गेहूं की बाली भर आयी,
कृषक हृदय को है अति भायी।
अलसी की कलशी जब डोले,
नैन जुराए मन अति फूले।

आमों में मंजर अब दीखे,
धरती अंबर से कुछ सीखें।
मोर-पपीहा-कोयल बोले,
कानो में मिश्री-सी घोले।

धरती ने दिनचर्या बदली,
निशा बराबर दिवस हो चली।
धानी-धरा धाम-सी होती,
एक को धारे सौ धर देती।

अंक में बीज धरा ने धारा,
ठंडक का तब हुआ फुहारा।
सृजन-साक्षी सूर्य रहा है,
खेत हरा, मन भरा-भरा है।

सबकी शक्ति, सबका साथ,
चारों तरफ खुशी हो व्याप्त।
तन-मन में हो अति आनंद,
झूमें धरा पड़े न मन्द।


- प्रीतम कुमार पाठक



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मेरी पुकार

मैं जब पुकारू मां,
तुम मेरी सुन लेना,
मां मंजिल के रास्ते पर चले,
जब मैं गिरु तुम संभाल लेना मां,
जब मैं कुछ बुरा करूं,
तुम मुझे डांट देना मां,
कोई और मुझे अनसुने शब्द कहे,
तो मुझे अपनी,
स्वर्ग सी गोद में छुपा लेना मां,
जब मैं पुकारू मां,
तुम मेरी सुन लेना।


- सुनीता बिश्नोई


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बेटिया

नन्हीं सी, प्यारी सी,
होती है बेटियां...
घर के आंगन में खेलती-कूदती बड़ी हो जाती है बेटियां,
अपने सपनो के साथ-साथ हर काम कर लेती है बेटियां,
अपने घर परिवार को संभाल ती है बेटियां ,
सभी का ख्याल रखती है बेटियां,
घर के चूल्हे- चोके तक ही सीमित नहीं होती बेटियां ,
वो सीमित है हर उस मंजिल तक,
जहां बेटियां आज हर उड़ान के साथ उड़ती है,
नन्हीं सी, प्यारी सी,
होती है बेटियां....
चंचल भाव से भरपूर होती है बेटियां।


- पूनम बिश्नोई


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सुनो,
तन्हाई का बोझ भारी है,
चलो,
साथ क़दम मिलाओ,
नए सफ़र की ओर बढ़ो,
चलो,
बना के साथी चलो।

कहीं हवा गुनगुनाए,
कोई फूल महके,
कोई साज़ बजे
दिल की तन्हाई पर।
चलो,
अपने भीतर उजाला करो,
चलो,
बना के साथी चलो।

चलो,
कुछ क़दम साथ तय करो,
कुछ सवालों को
मुस्कराकर छोड़ दो।
जो अधूरे हैं,
उन्हें साथ पूरा करो।
जो छूटे हैं,
उन्हें साथ जोड़ लो।
चलो,
बना के साथी चलो।

चलो,
क़दम से क़दम मिलाओ,
डर की परछाइयों को
पीछे छोड़ आओ।
ठहरे हुए क़दम को
चलने का बहाना दो,
नए सफ़र की ओर
नए यक़ीन के साथ बढ़ो,
चलो,
बना के साथी चलो।


- तौसीफ़ अहमद


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गज़ल कही उसे लगा अजीब मैं
जहाँ में शेर कह बना हबीब मैं

किसी ग़ज़ल में था कभी रदीफ़ मैं
उसी ग़ज़ल में हूँ अभी रक़ीब मैं

लुटा कटा मरा हुआ था इश्क़ में
लगा उसे शुरू से हूँ गरीब मैं

हुआ जुदा नहीं खफा किसी से अब
रिहा हुँ कैद से हूँ खुश-नसीब मैं

उड़ान ना भरूँ कहा गया मुझे
ले देख आसमान के करीब मैं


- अंकुश


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मतदाता दिवस

है भारत दुनियां का सब से बड़ा लोकतंत्र,
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस को था हुआ जो स्वतंत्र,
स्वतन्त्र भारत में पहली बार जब हुए थे आम चुनाव,
मतदाताओं ने मत दान कर पूरा किया था लोकतंत्र का ख्वाव।

मतदाता दिवस मनाने की दो हजार ग्यारह में थी हुई शुरुआत,
रख सामने मतदाताओं को जागरूक करने की बात,
भेद -भाव सब भूल कर छोड़ सारे जज्बात,
मत डालने की बात को सब मतदाता करें आत्मसात।

मत डालना है हर उस भारत वासी का हक,
उम्र जिसकी हो बर्ष अठारह या उससे अधिक,
लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत हमें बनाना है,
बालिग होते ही हर नागरिक को मतदाता सूची में लाना है।

निरक्षर हो या साक्षर हो मतदाता ,
नाम जिसका भी मतदाता सूची में है आता ,
चुनाव में जागरूक मतदाता जब भाग है लेता ,
चुनता वो कर्णधार देश का और अपनी पसंद का नेता।

जो न पसंद हो कोई भी नेता प्रतिभागी,
दबा सकता है मतदाता फिर बटन नोटा का भी,
मतदान करके ही मतदाता अपना विरोध जताएं,
मतदान केंद्र पर जाकर जरूर उपस्थिति अपनी दर्ज कराएं।

आओ हम अपने मत का समझ महत्व,
करके मतदान लोकतंत्र का मजबूत बनाएं अस्तित्व,
हर नागरिक जब भारत का होगा जागरूक,
देश अपना तभी बनेगा विकसित और अटूट।


- लता कुमारी धीमान


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मैं हूँ एक मतदाता
25 जनवरी मतदाता दिवस को समर्पित
मैं हूँ एक मतदाता
मैं ही हूँ भारत भाग्य विधाता
मैं निर्माण करता हूँ संविधान रचियता
मैं हूँ एक जागरूक मतदाता
मैं हूँ एक मतदाता
मतदान करने का अधिकार है उसे
उम्र हो गया है अठारह वर्ष जिसे
वो बन गया है एक मतदाता
वो अपना मत किसी को भी है दे सकता
लेकिन चुन्नू कवि का है एक आह्वान
सोच समझकर ही किजिये मतदान
हरेक कोई अपने मत का करे प्रयोग
लेकिन उम्मीदवार हो सुयोग्य
लोभ में आकर न करें मतदान
उम्मीदवार को पहले ही ले जान
जाति भाषा धर्म लिंग मे न बंटे
मतदान करने से पीछे कभी न हटे
बहुमूल्य है आपका एक भी मत
इसे ना जाने दे व्यर्थ
एक मत से भी होता है जीत हार
सोच समझकर ही चुने सही उम्मीदवार
मैं हूँ एक मतदाता
मैं ही हूँ भारत भाग्य विधाता
चुन्नू कवि सहित जन जन पुकारे
वोट देने हेतु मतदान केन्द्र अवश्य पधारें


- चुन्नू साहा


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क्रांति सूर्य सुभाष

त्याग दिया सुख-वैभव सारा, वह क्रांति का मतवाला था,
गोरी सत्ता को भस्म करे, वह प्रलय-रूप की ज्वाला था।

छोड़ आई.सी.एस. की कुर्सी, मातृभूमि को चुना उसने,
आज़ादी के महास्वप्न का, ताना-बाना बुना उसने।

नज़रबंद की जंजीरें भी, उसको रोक न पायी थीं,
वेश बदल कर निकल पड़ा, जब काल-घड़ी मुस्काई थी।

पेशावर से बर्लिन तक, जिसने तूफानी पथ नापा था,
देख सुभाष का साहस तब, पूरा लंदन ही कांपा था।

विश्व-पटल पर खड़ा हुआ, वह सिंह सा गर्जन करता था,
दुश्मन के ही घर में जाकर, हुंकारें अपनी भरता था।

सिंगापुर में गूँज उठी फिर, महाशक्ति की परिभाषा,
'आजाद हिन्द' की फौज बनी, भारत की अंतिम अभिलाषा।

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा"- मंत्र दिया,
सोई हुई रगों में उसने, पौरुष का नया वसंत दिया।

'दिल्ली चलो' के नारों से, भारत का कोना डोल उठा,
हिंद फौज का हर सैनिक, 'जय हिंद-जय हिंद' बोल उठा।

झांसी वाली रानी सी, नारी शक्ति भी साथ चली,
विजय पताका लिए हाथ में, वीरों की वो बारात चली।

शत्रु का मद चूर किया, जिसने रण के मैदानों में,
अमर रहेगा नाम सुभाष, भारत के गौरव गानों में।

आज गणतंत्र के उत्सव पर, हम वंदन करने आए हैं,
'वंदे मातरम' के नारों से, अंबर भरने आए हैं।

जब तक सूरज-चाँद रहेगा, याद रहेगा वो बलिदानी,
जिसने अपने लहू से लिखी, हिंदुस्तान की अमर कहानी।


- देवेश चतुर्वेदी


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दान बड़ा- मतदान

“सर्वप्रथम मुबारक उनको,
मिल रहा आज मतदान का अधिकार है जिनको“
सब दानों में दान बड़ा, होता है मतदान,
मतदाता बनने से मिलती, एक अलग पहचान,
समाज में बढ़ती भागीदारी, और बढ़ता हैं ज्ञान,
खुशी मिलती अथाह पाकर, ये अनोखा सम्मान,
मतदाता बन गर्व है होता, होकर लोकतंत्र में भागीदार,
आवाज उठाने का हक मिलता, वोट का मिलता जब अधिकार,
जरूर हमें मतदान है करना, एक सजग नागरिक है बनना,
युवा होते देश का भविष्य, और भविष्य का आधार,
गर्व करो बन गए मतदाता, मतदान को हो जाओ तैयार,
युवा मिलकर आगे जब बढ़ेगे, देखता रह जाएगा संसार,
मतदान “बजूद” का है देता एहसास,
मौका पाकर होता है स्व अस्तित्व का आभास,
लिंग,जाति ,धरम,वर्ण का न करता ये भेद,
ऐसा एक अधिकार अनोखा करता सबको एक,
आओ मिलकर सब युवा ये उल्लास मनाएँ,
मतदाता खुद बनें ,औरों को ये रह दिखाएँ,
सार्थक तभी पावन ये दिन बन पाएगा,
अठारह बर्ष का हर नागरिक मतदाता बन जाएगा,
मौका मिलने पर फिर, मतदान भी करने जाएगा,
मतदाता दिवस की हर वर्ष, रहेगी यूं ही शान,
लाखों युवाओं को मिलती रहेगी, जिम्मेदारी और पहचान,
जब भी आए चुनाब रूपी, लोकतंत्र के ये त्योहार,
माँ भारती को मिलते रहें, ताकि कुशल खेवनहार,
आदर्श बनें लोकतंत्र हमारा, अनुसरण करता रहे ये संसार,
अनुसरण करता रहे ये संसार...


- धरम चंद धीमान


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