साहित्य चक्र

11 January 2026

बढ़ती आधुनिकता में संसाधनों की पूर्ति कैसे होगी!


आज के इस आधुनिक युग में हमारा मानव समाज संसाधनों से भरता जा रहा है। मोबाइल के साथ पावर बैंक और कंप्यूटर के साथ लैपटॉप व टैबलेट की भी जरूरत पड़ रही है। सवाल है- इन संसाधनों की पूर्ति कैसे होगी ?




हम सभी जब किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते हैं तो कई बार टिशू पेपर हम यूं ही इस्तेमाल कर लेते हैं यानी बिना जरूरत का, जबकि टिशू पेपर बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल होता है यानी जंगलों का। और हाल ही में हम अरावली पर्वतमाला के लिए सोशल मीडिया पर आवाज़ उठा रहे थे। क्या हम एक जागरूक नागरिक हैं जो ऊर्जा, पानी और पर्यावरण आदि को प्रदूषित किए बिना अपना जीवन जी रहे हैं ? शायद नहीं!

विश्व में जितने भी बड़े और विकसित देश हैं उन्होंने अपनी खेती और जंगल बचा के रखे हैं। कारण वह देश जानते हैं कि भविष्य में खेती और जंगल ही मानव सभ्यता को जिंदा रख सकते हैं। आज हमारे सभी बड़े शहर बिना एसी, RO Water, Air Purifier, Heater आदि के इस्तेमाल के बगैर रहने लायक नहीं है।

सवाल- आखिर हमारे बड़े शहरों के हालात ऐसे क्यों हुई है ?

भारत को एक कृषि प्रधान, प्रकृति पूजक और धार्मिक देश माना जाता है। इसके बावजूद भी हमारे देश की बहुत कम नदियों का पानी पीने लायक है। हम नदियों की पूजा तो करते हैं, मगर नदियों की हालत इतनी गंदी है कि उस नदी का पानी हम पी नहीं सकते और अगर पियेंगे तो जरूर हम बीमार पड़ जाएंगे। हम सभी अपने धर्म ग्रंथो और परंपरा को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, मगर अपने देश की नदियों व शहरों की हालत को देखकर हमें स्वयं सोचना चाहिए; क्या हम अपनी संस्कृति व धर्म ग्रंथों का मान रख रहे हैं या नहीं।




आज हमारा देश लगभग 95% यूरोप बन चुका है। चाहे हमारा पहनावा हो, खानपान हो या घर बनाने की कला हो या फिर रहन-सहन और सामाजिक स्थिति सब कुछ यूरोप की तरह हो चुका है या होने जा रहा है। एक समय था जब हमारे देश के लगभग सभी गांव की अर्थव्यवस्था गांव पर निर्भर हुआ करती थी, मगर आज ऐसा नहीं है। आज हमारे देश के सैकड़ों गांव विरान पड़ चुके हैं और पलायन के कारण गांव धीरे-धीरे खत्म या प्रभावित हो रहे हैं। इस स्थिति को हमें समय से पहले बदलने का प्रयास करना होगा अन्यथा हम एक बड़े संकट की ओर जा सकते हैं।

आज जिस हिसाब से संसाधनों की जरूरतें लगातार बढ़ती जा रही है; उसको देखते हुए सरकारों के पास जंगल काटने, अवैध खनन व नदियों में खनन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा जिससे संसाधनों की पूर्ति की जाए। हां! आपको लग रहा होगा कि मैं अजीब सी बात कर रहा हूं। मगर मैं भविष्य की चिंता को आपके समक्ष रख रहा हूं।

सत्ता किसी की हो; सरकार के पास संसाधनों की पूर्ति करने के लिए जंगलों को काटना, पहाड़ों व नदियों का खनन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। आपको क्या लगता है जो टेक्नोलॉजी आप अपने घरों के अंदर बैठकर इस्तेमाल कर रहे हैं उसका हमारे पर्यावरण पर कोई नुकसान नहीं होता ? ओ भाई साहब और बहनजी! हर टेक्नोलॉजी का असर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पर्यावरण पर पड़ता है।


- दीपक कोहली



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