साहित्य चक्र

20 January 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जनवरी 2026



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बुलंद हौसले
जो पल जी लिए वही हकीकत है
बाकी सब बेवजह, क्योंकि
ख्यालों के कोई दायरे नहीं होते
न कुछ पीछे छूटने का मलाल
जो आज है वही मेरा वजूद है
बुलंद हौसले, ऊंची उड़ान
कौन कहता है इंसानों के पंख नहीं होते
अगर उड़ने की चाह हो तो
पंखों के बिना ऊंची उड़ान
इंसान से बेहतर कोई नहीं भर सकता
कायनात में गूंजती हुई सदा के लिए
मैं और मेरी हंसी, मैं और मेरी पहचान
हाँ यही वो जन्नत है, हाँ यही वो जन्नत है।


- डॉ. छवि कालरा


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मुलाकातें करते रहो





आदमी जब मर जाता
घर उसके बैठने हर कोई आता।
प्रसंशा के पुल इतने लम्बे लम्बे बांधते
कि बुराई के शब्द नजर नहीं आते।
आदमी  जब जीवित  होता
एक छोटी मुलाकात तो क्या
फोन करने तक का समय नहीं होता।
प्रसंशा कम बुराई ज्यादा होती 
हर पल निंदा, द्वेष, लड़ाई न जाने 
क्या क्या बातें मन में आती
मरने पर न जाने ये सारी कैसे गुम हो जाती।
रिश्ते की कद्र तो जीते जी होती
मरने पर तो दुश्मनों की आंखें भी भर जाती।
अपनों से मिलते रहिए 
उनसे अपनापन जताने में कसर नहीं छोड़िए।
मरने पर अपनापन जताने से कोई फायदा नहीं 
 हंसते खिलते मुलाकातें करते रहो यहीं कहीं।


- विनोद वर्मा


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जब कभी तुम जाती हो घर से बाहर,
तो अपने बैग में डाल ले जाती हो मेरी खुशियां।
मुझे छोड़ जाती हो कमरे में अकेले इस कदर,
जैसे किसी बंजारे के खेत में ठूठ को छोड़ दिया हो।
हँसती हुई दीवारों पर खामोशी फेल जाती हैं,
तुम्हारी पायजेब से छम-छम करता आंगन,
एक लम्बी बेचैनी की नींद सो जाती हैं।
तुम साथ ले जाती अपने पल्लू में अपनी महक
जब से तुम गयी हो... मैं मौन हो गया हूं,
और हमारा ये कमरा मायूस हो गया है।


- दीपक बारूपाल


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समझाने की ठानी है





ये उकसावे की नीति नही तो इसे बताओ क्या बोलें ?
मानवता के दुश्मन को हम दैत्य नही तो क्या बोलें ?
अरे कितनी बार चेताया हमने एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बार बार समझाने पर भी मर्यादा को तोड़ दिया
भारत जैसी महाशक्ति से टकराने का मन जोड़ लिया।
आतंक के आका आसिम और शहवाज तनिक तुम धैर्य धरो,
मोदी जी यह सही समय है
इनका तुम उद्धार करो।
अग्नि नही आकाश नही ब्रह्मोस इसी का उत्तर है।
जब- जब संधान किया हमने
तब- तब पाक निरुत्तर है।
हर आतंकी की घटना पर हम उसके मौन को क्या बोलें ?
खुली पोल उन जालिम की अब और बताओ क्या खोलें?
हर बार दलीलें दी हमने पर एक न उसने मानी है।
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
ब्रेन वॉश कर भारत में नफरत को फैलाया है
भारत मां के अमन चैन पर पाक ग्रहण सा छाया है ,
प्रभाव ग्रहण का बढ़े उससे पहले उसका उपचार करो
प्रकाश निगलने से पहले उस पर तीखा प्रहार करो ।
जैश मुहम्मद लश्कर तैय्यबा सबने की मनमानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
हर बार करी गद्दारी हमको दिया हमेशा धोखा है।
अस्त-व्यस्त भारत करने को सबकुछ उसने झोका है।
सबकुछ उसने झोंक दिया पर बाल न बांका कर पाया
जब रक्तचूर्ण अभियान चला
तब वैरी भी था थर्राया।
सीख न लेकर कोई अपितु एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बहुत हो चुकी लुका छिपी अब आकर इसको बन्द करो
यदि मां का दूध पिया तुमने तो आकर सीधे द्वन्द करो।
युद्ध धर्म की सभी विद्या द्धन्द में तुम्हे सिखा देंगे
जन्नत वाली हूरों से किये देरी बिना मिला देंगें ।
वसुन्धरा से जन्नत की हूरों की रची कहानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।


- करन सिंह ''करुण"


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क्या पता जीवन का सच क्या होता है ?
खिलते फूलों पर यहाँ सब हँसे,
पर मुरझाये फूलों पर कौन रोता है ?
क्या पता जीवन का सच क्या होता है

समय पर सराबोर हो हर सरोवर विहँसा।
सुखा जो सरोवर बन गया फिर वही कहकसा।
कोई पीकर मरा कोई मरा बिन पिये,
पथिक सा बस पथ गहने का बचा नशा।

क्या पता जीवन का सच क्या होता है ?

कितने तोड़े गए कितने सजोए गए प्याले।
टूटे या बच्चे सब बने मलंग मतवाले।
आसमान की अपनी मस्ती यहां सदा हंसती,
टूट गए कितने तारे पर कहाँ की विधन डालें।

क्या पता जीवन का सच क्या होता है ?

कभी दूर तो कभी उपवास होता है।
यहां हर कली में कहां सुवास होता है ?
झरते पीत पत्तों की खातिर भला कहां,
कब , कोई सदाबहार मधुमास रोता है ?

क्या पता जीवन का सच क्या होता है ?

पूरब, पश्चिम,उत्तर,दक्षिण क्या-क्या ढोता है?
ऊंचा होकर भी सागर सा हिमालय रोता है?
भेद भला प्रकृति क्यों करती प्रिय!
सुख के आलिंगन में दुख कांटों सा सोता है।

क्या पता जीवन का सच क्या होता है।

निर्विकार बन खेल तू प्रकृति की गोद में ?
व्यर्थ ही जीवन गवा रहा तू झूठे मोद में।
जिस पथ का पथिक तू है पहचान जरा,
केवल मानवता ही बसती है प्रकृति की अनुमोद में।

क्या पता जीवन का सच क्या होता है ?


- राधेश विकास


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लगाव

हमसब एक-दूसरे से जुड़े रहने का
सबसे उत्तम संबंध लगाव का होता है
लगाव के बिना,जीवन का कल्पना तो,
हमारे संभव नही होता है
हमारे दैनिक जरूरतों को पूरा करने हेतु
लगाव तो बहुत ही आवश्यक होता है
और ये लगाव
जीवन मे भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है
किसी के साथ उतना बैठना तो
किही के साथ खान पान का होता है
कही एक दुसरे के रहन सहन तो
कही कही कार्यो का होता है
साथ आने जाने, पढ़ने-लिखने में भी
लगाव ही सही होता है
एक प्रकार से
जीवन की सारी गतिविधियों में,
लगाव ही रहता है
जिसका, जिससे लगाव हो जाता है
भले वो रिश्ते मे नहीं आता है
फिर भी उनसे एक नया रिश्ता नाम ले लेता है
और उसके बिना हरेक काम अधूरा सा लगता है
उनसे बाते करना, उठना बैठना,
साथ रहना, सब अच्छा लगता है
वो न दिखे, न मिले, न आये तो,
जीवन सूना सूना लगता है
लगाव एक प्रकार से हमारे नशा सा हो जाता है
बस ये उसके बिना न चढता है न उतरता है
कुछ भी तो न रहते हुए वो, अलग ही दिखता है
जिससे लगाव हमारा होता है
चुन्नू कवि को भी लगाव हो गया है,
ऐसे ही किसे से ?
जिनसे न मिले, न बाते करे,
न देखे और न याद करे तो
मन, सुना-सुना, कुछ खोने सा लगता है
खुशियों के पल में भी
मायूसी चेहरे में घिरा होता है।


- चुन्नू साहा


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अगर तुम खाली हो और
तुम्हारे पास पर्याप्त समय है, तो
अपने विचारों को लिख डालिए।

अगर लिख नहीं सकते हो तो
किताबें उठाकर पढ़ डालिए।

एक बार तुम्हें!
लिखने-पढ़ने का नशा हो जाए,
तो फिर इस नशे का-
हर किसी को दीवाना बना डालिए।


- दीपक कोहली


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मेरे अपने कुछ पल
मेरे जीवन के कुछ क्षण,
हो जाती हूँ तुझमें मगन,
खो जाती हूँ इस कदर
कि तू ही बन जाता है
मेरा अभिन्न अंग।
पँछियों का यूँ चहचहाना,
मेरी देहरी तक आ जाना,
जैसे मेरे मन की थकन
पहचान कर
चले आते हों।
मन की अनकही अवस्थाएँ,
मौन में सिमटी भावनाएँ,
वे जैसे सब समझ लेते हों
बिना प्रश्न किए
सिर्फ़ बोलते हों।
उनकी मीठी वाणी सुन
मन का बोझ
किसी अनदेखे स्पर्श सा
हल्का हो जाता है।
कुछ पल के लिए
मैं स्वयं से दूर,
उनकी ध्वनि में
पूरी तरह खो जाती हूँ।
तब लगता है कि
वे जीने का संदेश लेकर आए हैं,
कहते हैं धीमे स्वर में
“मत होना कभी उदास,
हम हैं न,
यहीं कहीं आसपास।”

सुन चिरैया,
तू यूँ ही चहचहाती रहना,
ताकि जीवित रहे संवेदना।
शायद तू
किसी अदृश्य शक्ति की
सशक्त चेतना हो।


- सविता सिंह मीरा


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रिश्ते

यह रिश्ता है बेनाम सा तो क्या हुआ,
दर्दे रिश्ता जो नाम सा तो क्या हुआ ।
जिन्दगी यू ही ढूँढेगी अपने ठिकाने,
जीने का हक है सबको, सभी जाने ।

अपनो के चौखटे तंग जब होने लगे
प्रेम बेस्वाद बन जुवाँ पर चढ़ने लगे ।
तब आकर कोई जो संवल देता है
समझो खुदा तेरी नैया खुद खेता है ।

ऐसे रिश्तों का कोई परिमाप नही होता
दिल के रिश्ते का कोई नाप नही होता ।
दुनिया जो भी कहे कहने दो उसको,
यह रिश्ता कभी भी भाप नही होता ।

चंचल मन से कभी रिश्ता, बनाया न करो,
आज इधर, कल उधर कभी जाया न करो ।
गॉठ बॉध लो रिश्तों की उन डोरियो को ,
अपेक्षा जिसमे कभी किसी से किया न करो ।

बदलती है दुनिया बदलते हैं रिश्ते भी,
स्वार्थ का पलड़ा होता है सबसे भारी जी,
अपने स्वार्थ से बस एक बार बगावत कर दो।
हर रिश्तो की आंचल में मोहब्बत भर दो।


- रत्ना बापुली


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मैं शिक्षक हूँ

रणभेरी हूँ अज्ञान के विरुद्ध, मैं क्रांति का उद्घोष हूँ,
मैं सत्य की वो ज्वाला हूँ, जिसमें प्रचंड आक्रोश हूँ।
न झुका कभी सत्ता के आगे, न चापलूसी का दास हूँ,
मैं शून्य मिटाकर भाग्य गढ़ूँ, मैं जीत का विश्वास हूँ।

ये चाक नहीं, ये वज्र मेरा, जो हर बाधा को तोड़ेगा,
मेरा ज्ञान-प्रहार अधर्मियों का, मस्तक गर्व से मरोड़ेगा।
गणित की भीषण गर्जना से, मैं काल का चक्र घुमाता हूँ,
अंकों को मैं अस्त्र बनाकर, सोई नियति जगाता हूँ।

नहीं चाहिए महल-अटारी, न वैभव का अभिमान मुझे,
उन फटे हुए पैरों का छाला, देता है प्रतिमान मुझे।
मैं स्वर हूँ उन लाचारों का, जो श्रम की रोटी खाते हैं,
जिनके चूल्हे जलने से पहले, पसीने की धार बहाते हैं।

उन मजदूर पिताओं के माथे की, लकीर बदलने आया हूँ,
उस माँ की आँखों की वेदना, मशाल बनाने आया हूँ।
प्रबंधन के ऊँचे मद को, अपनी ठोकर पर रखता हूँ,
मैं छात्र-हित की खातिर ही, अपनी रग-रग में लहू चखता हूँ।

मेरी कक्षा ही मेरा कुरुक्षेत्र, मेरा ज्ञान ही गांडीव है,
मेरा हर बच्चा अर्जुन है, जिसकी सफलता सजीव है।
जब तक लहू शेष है तन में, ये धर्म-युद्ध मैं लड़ूँगा,
मैं कलम की नोक से मिट्टी पर, नया इतिहास ही गढ़ूँगा।


- देवेश कुमार चतुर्वेदी


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जिंदगी की हक़ीक़त से रूबरू होके आए हैं।
जवानी में जवानी की हसरतों को छोड़ आए हैं।
जिन हालातों में लोग जीना छोड़ देते हैं,
उन्हीं हालातों से लड़कर हम यहाँ आए हैं।।

कुछ सपने हैं मेरे अपनों के लिए,
हर हद से गुजरना है उन सपनों के लिए
हम मर जाने को तैयार हैं उनके लिए
बस तमन्ना है कि वो हर हाल में जिएं

हम न भूलेंगे तेरी रहमतों का सिला,
मत पूछ कि उन रहमतों से क्या मिला।
जो मिला उसका नहीं है कोई गिला,
तुझसे ख़ुलूस करने का मुझे तोहफा जो मिला।

सुना है जिंदगी सबको सब कुछ देती है,
सुख, दुःख, दर्द, प्यार, दोस्ती, दुश्मनी तक देती है।
मुझे तो इसने सिर्फ दुःख ही दुःख दिए,
लगता है जिंदगी सिर्फ इम्तिहान लेती है।


- मनोज कुमार भूपेश


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यूं ही कट गया सफर चलते-चलते
और आगे भी कटेगा यूं हीं चलते-चलते
आसान नहीं था सफर ए-जिंदगी...
अपनों के साथ और दुनियाँ की बातों ने
आसान बना दिया चलते-चलते...

कांटों से ज़ख्मी हो कर हम चलते-चलते,
छल के रिश्ते, लहू के निशान जख्म पैरों में
भूल गए हम सारे निशान वर्षों से चलते-चलते
आज अडिग खड़े है अपनी राहों में चलते-चलते

जिन दरख़्तों को पाला था अपने लहू से,
आज वही दरख़्त अपनी छांव देते हैं चलते-चलते
उन दरख़्तों की बाजुओं को चूमते हैं,
जो अब हमारे साथ खड़े हैं शान से चलते-चलते

वो अपनी छांव से हमें संभालते है,
हर रोज बाहों में भर लेते है चलते-चलते
जिंदगी के गमों को छुपाना मुश्किल है,
मगर ये सफर यूहीं कटता है चलते-चलते


- सुमन डोभाल काला


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ठंड में आग को जल जाना चाहिए,
शाम हुआ है,तो ढल जाना चाहिए।

फूल, शज़र धूप की इल्तेजा कर रहे हैं,
अब खुर्शीद को निकल जाना चाहिए।

शबनम की बूंदे बरसात लग रही है,
अब मौसम को बदल जाना चाहिए।

जहां पर मौसम सितमगर हो जाए,
दयार से परिंदों को कही चल जाना चाहिए।

चारों तरफ हरा,पीला कारपेट बिछा है,
किसानों को खुशी से उछल जाना चाहिए।

गुलों के ओस के बूंदों में इत्र स्प्रे कर रहे हैं,
मौजे हवा को, शहर में गुज़र जाना चाहिए।


- सदानंद गाजीपुरी


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रूह कहां ले जाओगी ?

दिल तेरा, जिस्म तेरा,
जब चाहो रुसवा कर जाओगी।
कल तक तो थी मेरी बस,
हक़ है अब तुम दामन छुड़ाओगी।
अपनी रूह कहां ले जाओगी ?

देखोगी सीधी नज़र तो,
बेशक गुनहगार मुझे पाओगी।
गर देखोगी दिल की निगाहों से,
सज़ा देकर भी पछताओगी।
अपनी रूह कहां ले जाओगी ?

कैसे यक़ीन करूं यूं बेदर्द हो जाओगी,
भूल सारी यादें एकतरफा फैसले सुनाओगी।
महसूस करो आंखें बंद कर,
क्या दिल से निकाल पाओगी ?
अपनी रूह कहां ले जाओगी ?

बेइंतहा दर्द में हूं तुम बिन,
जो यूं मुझे ठुकराओगी।
मर जाऊंगा जो रो भी न पाओगी,
ना रहूं तो भी क़ैद में
मेरे ख़ुद को तुम पाओगी।
अपनी रूह कहां ले जाओगी ?


- कुणाल


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लास्ट वाली बेंच

कक्षा की सबसे पीछे रखी
वह लास्ट वाली बेंच
सिर्फ़ लकड़ी का टुकड़ा नहीं थी,
वह हमारे बचपन का ठिकाना थी।

वहाँ बैठने वालों की अलग ही पहचान थी,
न ज़्यादा होशियार कहलाने की मजबूरी,
न आदर्श बनने का दबाव।
ब्लैकबोर्ड से थोड़ी दूर,
पर ज़िंदगी के सबसे क़रीब
हम वहीं बैठा करते थे।

टीचर की नज़र से बचकर
कॉपी के पन्नों पर कविताएँ,
चित्र और सपने उग आते थे।
कभी चुपके से हँसी फिसल जाती,
कभी डाँट सीधे वहीं आ गिरती
और पूरी बेंच अपराधी की तरह
एक-दूसरे को देख मुस्कुरा उठती।

इम्तिहान के दिनों में भी
वही बेंच हमारी शरण थी,
जहाँ जवाब याद न आए तो
दोस्ती काम आ जाती थी।
वह बेंच गवाह है
कई अधूरे सवालों की,
और उनसे भी ज़्यादा
पूरे होते रिश्तों की।

आज जब ज़िंदगी की कक्षा में
सब अपनी-अपनी जगह पर बैठे हैं,
तो दिल बार-बार लौट जाता है
उसी लास्ट वाली बेंच पर
जहाँ गलतियाँ माफ़ थीं,
हँसी बेबाक थी,और भविष्य एक
मुस्कुराता हुआ सपना लगता था।
वह लास्ट वाली बेंच
आज भी यादों की कक्षा में
सबसे पीछे नहीं, सबसे आगे बैठी है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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याद

हम प्रेम में डूबे थे,
और समय
हमारे सीने में
दर्द लिखता रहा।
तुमने कहा नहीं,
और मैं
हर रात
नींद से लड़ता रहा।
पर जब पहला आलिंगन हुआ,
तो समाज की सारी दीवारें
क्षण भर में
ढह गईं।


- सुभाष “अथर्व”



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