मुझे ठीक से याद नहीं है, मगर इतना जरूरी याद है कि रक्षाबंधन के त्यौहार वाला समय था। रक्षाबंधन के एक-दो दिन आगे या एक-दो दिन बाद की बात है। उस दिन मैंने पहली बार स्कूल नहीं जाने का फैसला किया था। यह फैसला मैंने बिना किसी से पूछे किया था। ना मम्मी से पूछा था, ना पापा से और ना ही दादा जी से... मुझे रक्षाबंधन के मेले में जाना था। कुछ स्कूल के दोस्त और कुछ अगल-बगल के साथी थे। मम्मी को पता नहीं था कि मैंने स्कूल की छुट्टी की है। जब सब स्कूल चले गए और मैं मेले के लिए तैयार हो रहा था, तब मम्मी को पता चला कि मैं स्कूल नहीं गया हूं।
मम्मी ने पूछा- आज स्कूल क्यों नहीं गया ?
मैंने कहा- मुझे मेले में जाना है।
मम्मी ने कहा- स्कूल तेरा बाप जाएगा ?
मैंने कहा- वो मुझे नहीं पता।
मम्मी ने कहा- तूने स्कूल की छुट्टी की ठीक है, मगर तू मेला नहीं जाएगा।
मैंने कहा- क्यों नहीं जाऊंगा ?
मम्मी ने कहा- अगर हिम्मत है तो जाकर देख ले।
मैंने कहा- ठीक है।
मैं कपड़े पहन तैयार होकर दोस्तों का इंतजार करने लगा। तब एक दोस्त आया ही था कि मम्मी ने चप्पल घूमा के मेरे सिर पर खींच दिया। मैं भागने वाला ही था कि दूसरा भी पड़ गया। इतने में मैं जोर से चिल्लाया और रोने लगा। करीब दो-ढाई सौ मीटर मैं भागा ही होगा रोते-रोते कि मम्मी ने मुझे पकड़ लिया। उसके बाद जो हुआ मत पूछो!
करीब 20 से 25 मिनट मुझे मम्मी ने इतना मारा और पीटा कि मैं बेहोश हो गया। उसके बाद मम्मी ने मेरे मुंह में पानी के छीटे मारे और मुझे पानी पिलाया। मैं होश में आ गया मतलब आज तक होश में ही हूं। पहले बचपन में भाई के कारण मैं मां का दूध सही से नहीं पी पाया और उसके बाद इस मार ने मुझे मम्मी से काफी दूर कर दिया।
मगर कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर मम्मी की वह मार नहीं पड़ी होती तो क्या मैं इतनी बुराइयों से बच पाता! शायद वह मार नहीं पड़ी होती तो मैं एक बिगड़ैल बच्चा बन जाता जो नशा, चोरी, बदमाशी और मारपीट से ग्रस्त हो चुका होता और किताबों से मेरा दूर-दूर तक का वास्ता खत्म हो चुका होता। और शायद आज मैं आपको यह किस्सा नहीं सुन रहा होता।
मेरा व्यक्तिगत मानना है- बच्चों को बचपन में ही गलत और सही का ज्ञान सीखाना जरूरी है। चाहे उसके लिए अभिभावकों को उन्हें डांट-फटकार और मारपीट करने ही क्यों ना पड़े, सभी अभिभावकों को करनी चाहिए।
- दीपक कोहली


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