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तेरे आने की खुशी में नूतन
मैं आधी रात तक जगता रहा,
घड़ी घड़ी पल पल बीतता रहा
पदचाप कदमों की आती रही,
पत्थरा गई आंखें इंतजार करते करते
अक्ष आपका चक्फेरी देता रहा
तेरे आने की खुशी में नूतन
मैं आधी रात तक जगता रहा...
आपके आने की आहट में मैं नूतन
बहुत सावधान रहा,
कालीन पलकों की स्वागत में
मैं बिछाता रहा,
बुक्का हाथ में लेकर फूलों का
तेरा इंतजार करता रहा,
अर्पित कर फूलों का बुक्का तुम्हें
मैं आपका शुक्रिया करता रहा,
आप आए, साथ में समृद्धि लाए,
आहट समाप्त हुई आपके आने की
कैसे कहूं ? नूतन कितनी खुशी मिली मुझे
आधी रात तक उस खुशी को छुपाता रहा
तेरे आने की खुशी में नूतन
मैं आधी रात तक जगता रहा...
आप भी किसी वी आई पी से कम नहीं
आधी रात तक इंतज़ार करवाते रहे,
चन्दन, कुमकुम, अगर, पुष्प हाथ में लेकर
तेरी आरती उतरता रहा,
ध्यान आगामी लक्ष्य पर रख कर
प्राथमिकता तय करता रहा,
सुन! नूतन, खुशियां देना सभी को
मुराद सभी की पूरी करना,
कोई खाली न जाए तुम्हारी दहलीज से
झोल्लियां सभी की भरते जाना,
नव रंग, नव रस, नव उमंग, नव प्रेम
नव जोश, नई स्फूर्ति, सब में भरते जाना,
ख़त्म हो गई है इंतजार की घड़ियां अब
मेरी भी, स्वागत में पलकें झपकता रहा,
मुबारिक हो नया साल सभी को
धीमान भी अन्त में यही कहता रहा,
खुशियां मिले सभी को,
नूतन से थी गुज़ारिश करता रहा,
तेरे आने की खुशी में नूतन
मैं आधी रात तक जगता रहा...
- बाबू राम धीमान
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हमारे अटल जी
जो अटल रहा,अटल है उसका क्या बखान लिखूं,
जिसे अमरत्व प्राप्त हो उसका जीवनदान लिखूं।
जिसने भारतीय भाषाओं को जग में मान देकर,
प्रति करूं खुद को समर्पित थोड़ा सा ज्ञान लिखूं।।
अटल जी की प्रतिभाओं को सारा जग जानता है,
कोई ऐसा लाल नहीं,जो इस लाल को न पहचानता है।
जिसने पूरे ब्रह्मांड को अपना ही परिवार समझा हो,
अब सच बताओ, मैं उसके बारे में क्या ज्ञान लिखूं।।
हमारे अटल जी आराध्या राम के लिए हनुमान हुए,
हमारे रोगी सनातन धर्म उद्धार के लिए महान हुए।
हमें अज्ञानी बनाए रखने वाले जो इस जग के लोग थे,
उनको अज्ञानी बनाया अटल जी ने क्या हानि लिखूं।।
अटल जी के शब्द अटल होने का प्रमाण देते हैं,
लोकतंत्र भी अटल जी के शब्दों से सजल होते हैं।
देश की कुछ जनता ने हराया हमारे अटल जी को,
जो अटल थे, अटल रहें, क्या देश की शान लिखूं।
- प्रभात सनातनी "राज" गोंडवी
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बात समझ में आयी,
पर देर से जरा...
उसने कहा-
रुक जा, ठहर जा, थम जा जरा
बहुत दौड़ लगा ली, संभल जा जरा
कर लिया बहुत अर्पण-समर्पण
अपना भी समर्थन कर ले जरा
कुछ वादे किये थे कभी अपने आप से
इक बार मेरे सामने दोहरा ले जरा
माना कि बचपन और
जवानी ने छोड़ दिया साथ
पर तुम अपना साथ निभा लो जरा
बिखरी पड़ी हो जगह-जगह तुम
चलो उठो! समेटो अपने आप को
बैठो मेरे पास संवार दूं जरा
जिंदगी का सफर चलता रहेगा
जो होना है वो होकर रहेगा
मैंने उसे बीच में टोका-
तुम कौन ?
मेरे सामने तो आओ जरा
वो बोला-
मैं आइना हूँ, झूठ नहीं बोलूँगा
जो मैंने कहा वो कोई और नहीं कहेगा
तुम क्या थीं, क्या हो, क्या हो सकती हो
बस इतना मंथन कर लो जरा
इक आइना ही आइना दिखा सकता है
ये बात समझ में आयी पर देर से जरा
- गुरदीप कौर
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नदी!
तुम यूँ ही मुस्कुराते हुए
हँसते-लहराते हुए
मेरे गाँव जाना
मेरे पिता जो वृद्ध हैं
उनके ख्वाब सब
मेरे लिए अब तक युवा हैं
मेरी राह तकते हुए
होंगे द्वार पर अब तक खड़े
वहीं बिखरी बालों वाली सभी उजले
चिड़चिड़ी सी,क्रोध वाली
दुआओं से सींचने को तैयार प्रतिपल
मेरी माँ भी मिलेगी
व्यस्त होगी वह रसोई में
डुभकी बनाती
मेरे लिए उम्मीद के सपने संजोती
बहती हुई उस देहरी पर जाना
छूना उनके पाँव
मेरा हाल कहना
फिर तुम लौट आना
उस जल से अपने सिर को धोकर
धन्य हो जाऊँगा मैं
शहर की इन बेचैन गलियों में
मुझे सब याद आते हैं
दिन बुरे अच्छे सभी
खुद को जताते हैं
अस्तित्त्व का हर पल कराकर बोध मुझको
जी भर सताते हैं
नदी!
अपने साथ ठंडी हवाओं को ले जाना
शीतलता से अवगत कराना
सभी 'अपनों' को
पल भर बैठना उस आँगन में
जहाँ मैं बैठा करता था
सबका कुशल क्षेम जानना
चाय की चुस्कियों का आनंद भी लेना
भूलना मत,ना मत कहना
सबकी बातों के साथ चाय का स्वाद
ऐसा लगेगा जिसे कभी भूलना
संभव नहीं होगा।
मिलना सबसे हृदय से
लौटना फिर शहर में बसे
कृत्रिम गाँव की ओर
उन मधुर अनुभवों को जीते हुए
झूमते हुए आना
मुझसे मिलना, बताना अनुभव सारे
जिन्हें लम्बे अरसे से मैं
चाहकर भी
जी नहीं पाया।
- अनिल कुमार मिश्र
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जवाब दो साहेब अब सवाल का, पूछता है भारत
मसनद नशी क्यूँ हुए पर्दा नशी काफूर हुई महारत
शिक्षा चिकित्सा सुरक्षा शून्य के निशान पर
हिँसा है बड़ी उफान पर देश भारी नुक़सान पर
युवा सारे सड़कों में है उग्र हुए क्यूँ भड़के से है
बहन बेटी की अस्मत अब हर घड़ी खतरे में है
ओ गुरुओं के गुरु राष्ट्र निर्माता कब लाल आँख दिखाओगे
हैं सवालों पे सवाल आप जवाब कब देनें हमको आओगे
हैं सवालों पे सवाल आप जवाब कब देनें हमको.....
- नरेन्द्र सोनकर बरेली
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घर की लक्ष्मी या नौकरानी ?
कहते हैं-
"बहू तो घर की लक्ष्मी होती है!"
लेकिन पूछो ज़रा-
क्या लक्ष्मी रोज़ 5 बजे उठकर
सबका टिफ़िन बनाती है ?
क्या लक्ष्मी
बिना थके, बिना रुके
किचन से लेकर कमरे तक
झाड़ू-पोंछा,
बर्तन-कपड़े सब संभालती है ?
क्या लक्ष्मी को
अपनी पसंद का खाना
बिना तानों के मिल पाता है ?
क्यों नहीं
वो 'लक्ष्मी' बैठ सकती
सोफ़े पर चाय लेकर ?
क्यों उसे
छुट्टी नहीं मिलती-
ना बीमारी में, ना पीड़ा में,
ना ही त्योहारों में ?
सच कहें तो-
उस "घर की लक्ष्मी" का सम्मान
सिर्फ़ शब्दों तक सीमित है।
असल में वो
बिना वेतन की पूर्णकालिक नौकरानी है,
जिसे न तो ‘काम’ माना जाता है,
और न ही ‘थकान’ समझी जाती है।
जब कोई महिला
अपने हक़ की बात करती है,
तो सुनने को मिलता है-
"इतना सब करने के बाद भी
ये क्या कम पड़ रहा है ?"
कम पड़ रही है-
इज़्ज़त.. बराबरी..!
और अपनी मर्ज़ी से जीने की आज़ादी।
तो अगली बार
किसी महिला को
"घर की लक्ष्मी" कहने से पहले
सुनिश्चित कर लेना-
कि वो घर में देवी की
तरह पूजी जा रही है
या बस कामवाली की
तरह इस्तेमाल की जा रही है।
- प्रीती जायसवाल
सर्दियाॅं पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं
अभी ठिठुर रहे हैं शब्द
अपने भीतर अपने ताप के लिए
तंबू तने हैं घने-सूने जॅंगलों में
पीने के पानी की कमी है चहूॅं-ओर
सरकारें सेंक रही हैं मुर्गे और
भेड़ेंऔर तीतर वग़ैरह
बकरियाॅं मिमिया रही हैं समर्थन में
चूहे लिख रहे हैं प्रशस्तियाॅं और प्रार्थना-पत्र
खेतों में लहलहा रहा है
अकाल जैसा ही कुछ-कुछ
नालियों में विचार और व्यवहारिकताऍं
सभी दुबके हैं अभी ओढ़कर कंबल
जाग रही हैं, झाॅंक रही हैं बहते जल में
झिलमिल-झिलमिल
गिलहरियाॅं, तितलियाॅं और चींटियाॅं
शेरों को, मगरमच्छों को,हो रहा है अजीर्ण
सर्दियाॅं पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं
साॅंसत में हैं प्राण प्रायः...
- राजकुमार कुम्भज
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खामोशियां
न सूखे पत्तो की सरसराहट होगा
न बर्फ की चट्टाने होगी
न ही ठंड से ठिठुरेंगे।
न सूर्य की तपती लौ होगी
जिससे शरीर झुलसेगा।
न बारिश की बूंदे होगी
जिससे कपड़े भीगेंगे।
न पेड़ होंगे न पंछी होगी
जिसकी जिसकी कलरव सुनेंगे।
न समंदर होगा न लहरे होंगी
जिसमें डूबेगी जहाज।
न फूल खिलेंगे न देखेंगे
जिसकी खुशबू महसूस करेंगे।
न चंद्रमा होगा न रात होगी
जिसकी शीतलता बिस्तर तक
पहुंचेगी।
न जंगल होगा न झाड़ियां होगी
जिसमें भूलने और जानवरों से
डरने की कोई खौफ होगा।
न कोई लाइब्रेरी होगी
न विश्वविद्यालय होगा
जहां पर विज्ञान , दर्शनशास्र
न खगोलीय तारा मंडल होगा
जिसका शोध करेंगे।
हर तरफ अंधेरा होगा
हर तरफ खंडहर होगा।
चैन की नीद में सोएंगे
न मधुर संगीत होगी
न कही अज़ान होगा
न कही मंदिर की घंटियां
सुनाई देंगी।
बोलना चाहेंगे पर बोल न पाएंगे
नीद से उतना चाहेगी पर उठ न पाएंगे
भागना चाहेगी पर भाग नहीं पाएंगे।
- सदानंद गाजीपुरी
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परचम
बेटियां सिर्फ आज ही आसमान नहीं छू सकती,
सदियों से उन्होंने योग्यता का परचम लहराया है।
बेटों से चलता है गर वंश का नाम,
बेटियों बिना भला क्या ये संभव हो पाया है ?
बेटों ने गर किया कुल का नाम रोशन,
बेटियों ने भी दो पीढ़ियों को चमकाया है।
वीर राणा प्रताप ने दुश्मन को धूल चटाई थी,
तो मनु ने भी रानी लक्ष्मी बाई बन मान बढ़ाया है।
प्रभु राम ने निभाया गर वचन पिता का,
अग्निपरीक्षा दे सीता ने गर्व से शीश उठाया है।
जब संकट पड़ा दशरथ पर देवासुर युद्ध में,
कैकई ने रथ चला दशरथ का साथ निभाया है।
नरेंद्र ने विवेकानंद बन धर्म ध्वज को लहराया है,
स्त्री जागृति प्रतीक सावित्री बाई फुले ने पाया है।
ए पी जे अब्दुल कलाम थे मिसाइल मैन,
मिसाइल वूमेन का दर्ज़ा टेसी थॉमस ने पाया है।
बेटियां बेटे हैं एक दूजे की पूरक जगत में,
बिन राखी सूने हाथ ने भला क्या मान पाया है।
मां बाप,भाई बहन,पति पत्नी,साम्य है सृष्टि का,
बिन इक दूजे भला क्या ये जगत चल पाया है ?
- राज कुमार कौंडल
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दिल नहीं लगाना चाहिए
दिलजलों की महफ़िल में भी जाना चाहिए,
उन्हें अपना भी किस्सा सुनाना चाहिए।
जुदा होने पर कैसे जीना है आगे,
ये राज़ भी तो ज़रा बताना चाहिए।
तकलीफें ही देती हैं हर बेईमान मोहब्बत,
किसी से इतना दिल नहीं लगाना चाहिए।
ग़मों के साये में कोई साकी ना बन जाए,
बस इसी बात को उन्हें समझाना चाहिए।
कतरा-कतरा आँखों का होता है अनमोल,
इन्हें ऐसे ही नहीं किसी पर बहाना चाहिए।
माशुकाएँ तो और भी मिलेंगी इस जहां में,
ख़ुद को किसी क़ाबिल तो बनाना चाहिए।
माना कि उदास है वो यादों के साये में,
देकर हौसला उन्हें गले से लगाना चाहिए।
पास हैं अभी और ज़िंदा रहने के ज़रिया,
बस ज़िंदगी जीने का हुनर आना चाहिए।
- आनन्द कुमार
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दोहे
सीधे सांच से सब लडैं
निकृष्ट से लडैं न कोय।
जो निकृष्ट से लड़ पड़ै
तब दुःख काहे को होय।
राजनीति में हिंद की
मचा रखी दुर्गंध।
टिड्डी मधु का पान करै
ताक रहे मकरन्द।
सुरभि ठण्ड में ठिठुर रही
पक-डण्डी पर बिन काऊ।
श्वान लेत आनंद हैं
घर में तुम्हें बताऊं।
- रेखा शर्मा
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उत्कर्ष का सृजन
अपने उत्कर्ष की गाथा,
हमें ही लिखनी होती है।
श्रेष्ठ जनों की छाया से
सफलता नहीं मिलती है।
पुरुषार्थ की अग्नि जला,
स्वयं को तपाना होता है।
जो पाना है इस जीवन में,
वह खुद ही पाना होता है।
यह क्षण है- इसी पल कर्म कर,
कल की आस न बाँधो तुम।
जो हाथ लगे वह काम पकड़,
पूरा मन उसमें साधो तुम।
लोग क्या सोचें, छोड़ो यह,
यह बोझ न मन में रखो।
प्रशंसा-निंदा, मान-अपमान,
इनसे आगे बढ़कर चलो।
अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रह,
नज़रों की चिंता त्यागो।
सम्मान मिलेगा या न मिले,
इस गणना से मन भागो।
विचार, साधन, अवसर जो मिले,
उनका पूर्ण उपयोग करो।
जीवन का अर्थ उतना ही है,
जितना तुम खुद सृजन करो।
- नरेंद्र मंघनानी
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हाँ ऐसी ही हूँ मैं!
नहीं आता मुझे बनावटीपन दिखाना
उल्टे-सीधे किस्से-कहानियां बनाना
झूठी बातों को सुनकर ताली बजाना
पाने को वाहवाही गलत करना कराना
शहद में शब्द लपेटकर तंज कस जाना
फिर भी, जिसकी जैसी समझ में आये
कभी उलझी और कभी सुलझी सी
हाँ ऐसी ही हूँ मैं!
नहीं आता मुझे बनावटीपन दिखाना
उल्टे-सीधे किस्से-कहानियां बनाना
झूठी बातों को सुनकर ताली बजाना
पाने को वाहवाही गलत करना कराना
शहद में शब्द लपेटकर तंज कस जाना
फिर भी, जिसकी जैसी समझ में आये
कभी उलझी और कभी सुलझी सी
हाँ ऐसी ही हूँ मैं!
- गीता सरीन
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दिल की आरजू
मचल रहा है मेरे दिल की आरजू
गीत मिलन की गाओ री कलियाँ
अय चंचल अल्हड़ उड़ती हवा
पैरों में बाँध छनकाओ पायलिया
अमुवा की डाली पे कोयलिया काली
कुहू कूहू गाती है प्रीत की पिरितिया
चकोर भी पूनम की चाँद की चाँदनी में
भूला गई सुध बुध सारी बीती वो रतिया.
रे पपीहा तुँ भी बात कर मना ले अपनी
रूठा जो तेरा मन की प्रेमी पड़ोसिया
कहो आवाज लगाओ तुँ उनको अब
कहाँ छुपा है गुमनाम बैरी रंग रसिया
गिले शिकवे को कह दो आज अलविदा
मेरे दर पे ना कभी आने वो कभी पाये
मेरी पर्ण कुटी रूपी आशियाना में
गम की जादू ना दिखला कर अब जाये
ना जाने कौन सा पल हो जाये कयामत
ना जाने कौन सी आनी है कोई आफत
चलो भूल जाये जो कल तक बीता था
खो जाना है एक दूजै में दिखा कर शराफत
मचल रहा है मेरे दिल की आरजू
गीत मिलन की गाओ री कलियाँ
अय चंचल अल्हड़ उड़ती हवा
पैरों में बाँध छनकाओ पायलिया
अमुवा की डाली पे कोयलिया काली
कुहू कूहू गाती है प्रीत की पिरितिया
चकोर भी पूनम की चाँद की चाँदनी में
भूला गई सुध बुध सारी बीती वो रतिया.
रे पपीहा तुँ भी बात कर मना ले अपनी
रूठा जो तेरा मन की प्रेमी पड़ोसिया
कहो आवाज लगाओ तुँ उनको अब
कहाँ छुपा है गुमनाम बैरी रंग रसिया
गिले शिकवे को कह दो आज अलविदा
मेरे दर पे ना कभी आने वो कभी पाये
मेरी पर्ण कुटी रूपी आशियाना में
गम की जादू ना दिखला कर अब जाये
ना जाने कौन सा पल हो जाये कयामत
ना जाने कौन सी आनी है कोई आफत
चलो भूल जाये जो कल तक बीता था
खो जाना है एक दूजै में दिखा कर शराफत
- उदय किशोर साह
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