साहित्य चक्र

18 January 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 19 जनवरी 2026






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श्रम का स्वेद बहाया मैंने,
सींचा ज्ञान का उपवन,
एक सौ बीस दियों से रोशन,
मेरा पावन मधुबन।

जला सके ना मुझको कोई,
ऐसी मेरी ज्वाला है,
मेरे साथ खड़ा 'श्रीराम',
मेरा रखवाला है।

तुच्छ स्वार्थ में खोकर तुमने,
षड्यंत्रों का जाल बुना,
पाँच सौ का छल करके तुमने,
अपना ही पतन चुना।

तुम तो तिनका बीन न पाए,
मैं अंबर तक आया हूँ,
प्रभु कृपा से वैभव और,
खुशियों की छाया पाया हूँ।

मेरी मेहनत, मेरी बरकत,
देख तुम्हारी आँखें जलतीं,
सत्य की नौका बाधाओं के,
लहरों पर भी है चलती।

मैं संपन्न हुआ आशीषों से,
तुम वहीं खड़े रह जाओगे,
बिना शुद्ध मन के तुम जग में,
क्या सम्मान कमाओगे ?


- देवेश कुमार चतुर्वेदी


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ज़रा सोचो! पुरस्कार ही सब कुछ नहीं
व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए,
पुरस्कार तो जुगाड़ से, खुशामद से
गिड़गिड़ाने से, दांत निपोरने से,
तलवे चाटने से भी मिल जाता है
पर व्यक्ति का सम्मान नहीं,
इसलिए पुरस्कार ही सब कुछ नहीं
व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए...

पुरस्कारों का ज़िक्र करें तो आज
धन का रोब दिखाकर, दादागिरी करके,
लॉबिंग करके भी जुगाड़ कर लेते हैं,
यहां तक की लोग नोबल शांति के लिए
अपने पाले में लाने के लिए राष्ट्रों को भी
जोर आजमाइस कर रहे हैं लोग,
हाल आज उनका किसी से छुपा नहीं है
इसलिए पुरस्कार ही सब कुछ नहीं
व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए...
एक दो पुरस्कार मिल जाए तो इतराए नहीं
न भी मिले तो घबराए नहीं,
सफ़लता असफलता के बीच झूलिए मत
ये जीवन के अनुभव सिखाती है,
कर्म करने की प्रेरणा देती है और कर्मभूमि में
पूरी ताक़त झोंकने का शंखनाद करती है,
विस्तारवादी नीतियों को मरोड़ कर
आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती है,
श्रम एव जयते का नारा बुलन्द करते हुए
दृढ़संकल्प से अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिए,
इज्ज़त दीजिए इज्ज़त लीजिए, और कहा भी है-
पुरस्कार ही सब कुछ नहीं
व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए...

- बाबू राम धीमान


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सफलता आती जाती रहती है





इस लिए!
ज्यादा खुशी में इतराए मत;
ज्यादा गम में घबराइए मत।
आज आप की बारी है तो;
कल किसी और की बारी है।
जो ज्यादा सुखी है उस पर
कम ध्यान देगे या नहीं देंगे
तो भी काम चल जाएगा
परंतु!
अगर आप दुखी लोगो को
ज्यादा ध्यान देंगे तो भगवान भी
आप से प्रसन्न रहेंगे ;
क्योंकि सफल लोगे की हर कोई
ध्यान रखता है,वही गरीब,असहाय
मजबूर की कोई हाल चाल तक
नहीं पूछने आते है।
ये हमारे समाज की गजब की
विडंबना है।
जो सफल हैं उसको सफल
बनाए या न बनाए,
पर जो असफल है,उसे
सफल जरूर बनाए ,
ऐसे कार्य खुदा की सेवा के
बराबर है।
समंदर में नदी को
मिलाने से क्या फायदा है।
जहां रेगिस्तान है वहां पर
समंदर दीजिए,
जहां कड़ाके की ठंड है
वहां धूप दीजिए,
जहां फुटपाथ है वहां भोजन
दीजिए यही असली मानवता है।


- सदानंद गाजीपुरी


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मकर संक्रान्ति




चलो मिलकर उड़ाते हैं पतंग प्रिय।
आज हम-तुम हैं संग प्रिय।
हर छड़ तुम्हारी याद आती रही प्रिय ।
मकर संक्रान्ति हमको तड़पाती रही प्रिय।

पोंगल पर तुमने आने की
दिलासा दी प्रिय।
बीचों पर हमने मुलाकात
करने की कोशिश की प्रिय।
आखें मिलन को हैं तम प्रिय।
तुम्हें खोना न चाहते हम प्रिय।
आओ प्रेम को निभाते चलें प्रिय।
चलो मिलकर उड़ाते हैं पतंग प्रिय।

तिलकुट के लड्डू बनाओ प्रिय।
खाओ खुद और सबको खिलाओ प्रिय ।
क्या? गलती हुई है हमसे बताओ प्रिय।
गर खिलाना है हमको तो
दही-चूड़ा खिलाओ प्रिय।
जो भी दूरी बनी थीं उनको मिटाओ प्रिय।
आओ मिलकर पतंग तुम उड़ाओ प्रिय।
दही- चूड़ा को संग संग खाओ प्रिय।


- करन सिंह "करुण"



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प्रेम बिन





जीवन सबका अधूरा है यहां प्रेम बिन,
जीवन सबका बेरंग है यहां प्रेम बिन।

हर शय जगत की बेज़ान है प्रेम बिन,
कलियों की कोमलता भी गायब है प्रेम बिन।

जानवर भी कहां जिंदा रह पाते है प्रेम बिन,
फिर इंसान कैसे हो सकता है इंसान प्रेम बिन?

चकोर भी बेचैन रहता है चंदा के प्रेम बिन,
भंवरा भी कहां जी पाता है फूलों के प्रेम बिन?

आबोहवा भी जहाँ की जहरीली है प्रेम बिन,
ये हसीन दुनिया भी दोज़ख लगती है प्रेम बिन।

बीज अंकुरित होता नहीं कभी धरा से प्रेम बिन,
तरु दे आश्रय पंछियों को,रह नहीं पाता प्रेम बिन।

कोई भी रिश्ता मज़बूत नहीं हो सकता प्रेम बिन,
भगवान भक्त नहीं बंधते इक दूजे से प्रेम बिन।

कृष्ण के प्रेम में मीरा भी न नाचती प्रेम बिन,
कृष्ण भी कैसे बख्शते सुख सुदामा को प्रेम बिन।

न खाते प्रभु राम झूठे बेर सबरी के प्रेम बिन,
कहां पार उतारा है भवसागर से प्रभु प्रेम बिन।

अद्भुत शक्ति है प्रेम,कुछ भी संभव नहीं प्रेम बिन,
प्रेम है तो प्रभु है वरन कुछ भी नहीं है प्रेम बिन।


- राज कुमार कौंडल


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टूटन का उजास




जब जीवन
अपने ही भार से चुपचाप टूटता है,
और शब्द, तर्क, सहारे
सब एक-एक कर मौन हो जाते हैं,
तब हम पहली बार
स्वयं से मिलते हैं।

टूटते हैं मुखौटे,
बिखरती हैं मान्यताएँ,
अहं की दीवारों में
दरारें पड़ती हैं-
उन्हीं दरारों से
प्रकाश भीतर उतरता है।

जिस क्षण सब
छिनता प्रतीत होता है,
वही क्षण
सब कुछ समझा देता है;
क्योंकि यथार्थ
शोर में नहीं,
शून्य में प्रकट होता है।

वेदनाएँ तब गुरु बन जाती हैं,
आँसू प्रार्थना बन जाते हैं,
और मन-
जो कल तक भटकता था।
चेतना के
उच्च शिखर की ओर
निशब्द बढ़ने लगता है।

टूटना अंत नहीं,
यह तो यात्रा का वह मोड़ है
जहाँ मनुष्य नहीं,
साक्षी जन्म लेता है।


- नरेंद्र मंघनानी


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वो चल दिए





सुनाकर बस अपनी बात, हमें बिन सुने वो चल दिए,
दलील न कोई हमारी सुनी, फैसला सुनाकर चल दिए।
सुकून हमें अपना थे कहते, आज बेचैन कर चल दिए,
थोप हम पर कसूर कई, कसूरवार ठहरा कर चल दिए।
दिल की हर बात थे बताते, बिन किये ही बात चल दिए,
वक्त ने बदली करवट कैसी, हमें रुला सता कर चल दिए।
आँखों से ओझल तो हुए, ख्वावों से सरक कर चल दिए,
सहारे बस यादों के हैं, वो यादों को भुलाकर चल दिए।
तारीफें उनकी करते रहे, वो कमियां बता कर चल दिए,
माफ़ उनको करते रहे हम, वो सज़ा सुनाकर चल दिए।
खता कोई की नहीं हमने, गुनाह लाख बता कर चल दिए,
दगाबाजी और दिखावटीपन के, धब्बे लगाकर चल दिए।
संग देखे थे सपने जिनके, वो नींदें उड़ा कर चल दिए,
आगोश में जिनके सो जाते थे, वो दामन छुड़ा चल दिए।
शिद्दत से निभा रहे थे दोस्ती, धोखे बाज बता चल दिए,
करते रहे मान हम जिनका, बेईमान बताकर चल दिए।
लिखते रहे प्यार की इबारतें, शिकायतें थमाकर चल दिए,
हम फूल बिछाते रह गये, वो राह बदल कर चल दिए।


- लता कुमारी धीमान



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प्रतिकूलता ही जीवन है
प्रतिकूल समय
इंसान को निखारता है
इंसान के जीवन को संवारता है
इंसान को बनाता है सयाना
दोस्तों ! प्रतिकूलता में
कभी मत घबराना
चाह रखना सीखने की
बस सीखते ही जाना
आखिर प्रतिकूलता ही जीवन है
अनुकूलता नहीं
वास्तव में प्रतिकूलता कराती है
जीवन में सफलता का सूत्रपात
पहन काँटों का लिबास ही
मिलती है पुष्पों की महक
गहरे पानी में उतरकर
ही मिलते हैं मोती
बिन छैनी की चोट के
तराशे नहीं जाते पत्थर
आग में तप कर ही
कुंदन बनता है सोना
आखिर प्रतिकूलता ही जीवन है
जीवन में वही सफल होता है
जिसने संघर्षों को झेला हो
प्रतिकूलता जीवन को पूर्ण बनाती हैं
यही है जो खुशी का, सफलता का
वास्तविक एहसास कराती है
सच कहें तो
प्रतिकूलता ही जीवन है।


- प्रवीण कुमार


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मैं भी सही, तू भी सही
फिर गलत कौन ?
मेरे शब्द या तेरा मौन।

मुझे ये अच्छा नहीं लगा,
तुम्हे वो अच्छा नहीं लगा।
मैं ये नहीं सह सकता,
तुम वो नहीं सुन सकते।
जो दोनों को भाए,
ऐसी बातें बनाए कौन।
मैं भी सही तू भी सही,
फिर गलत कौन।
मेरे शब्द या तेरा मौन।

मुझे तू ही चाहिए,
तुझे भी में पसंद हूं।
मैं बहुत खराब हूं,
सीधे तुम भी नहीं।
जो हो एकदम अनूठा,
ऐसा हमें बनाए कौन।
मैं भी सही तू भी सही
फिर गलत कौन।
मेरे शब्द या तेरा मौन।

एक को नींद नहीं आएगी,
दूसरा सो नहीं पाएगा।
तूने मेरा चैन गवाया,
मैने तेरी नीद उड़ाई।
कौन संभालेगा हमें,
हमें सुलाएगा कौन।
मैं भी सही तू भी सही,
फिर गलत कौन!
मेरे शब्द या तेरा मौन।

मेरा छोटा सा प्रश्न,
तेरा बड़ा सा जवाब।
मैने मांगा प्रमाण,
तूने दे दिया हिसाब।
जिंदगी बन गई पहेली,
इसे सुलझाए कौन।
मैं भी सही तू भी सही,
फिर गलत कौन!
मेरे शब्द या तेरा मौन।

प्यार तुझे भी है,
प्यार मुझे भी है
तूने बोला मर जाऊं,
मैने सोचा मर के दिखाऊं।
दो जिंदा लाशें बन गई,
इन को अब जलाए कौन।
मैं भी सही तू भी सही,
फिर गलत कौन!
मेरे शब्द या तेरा मौन।


- अशोक कुमार शर्मा


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ख़ास हो तुम

हर वक़्त दिल के पास हो तुम,
जैसी भी हो बेहद ख़ास हो तुम।

मुस्कुराना भूल जाता हूँ मैं भी,
जब लगता है कि उदास हो तुम।

हाँ माँगी है सिर्फ़ खुशियाँ तुम्हारी,
मेरी हर दुआ हर अरदास हो तुम।

मैं तो हूँ धड़कन तुम्हारे दिल की,
और इसमें बसी हर साँस हो तुम।

ढूँढती रहतीं हैं जिसको दूर तलक,
इन बेचैन नज़रों की तलाश हो तुम।

मिट ना सकी जो भीगे सावन में भी,
इस ख़ुश्क जीवन की प्यास हो तुम।

ये चाहतें कभी ख़त्म नहीं होंगी,
ऐसा सच्चा-अटल विश्वास हो तुम।


- आनन्द कुमार


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मुद्दतें गुज़रीं

​मुद्दतें गुजरीं एक लम्हा नहीं गुज़रा।
चला गया वो रेत पर घरौंदे बनाकर।

वो बिछड़ा तो मैं किसी दर का न रहा।
चला गया मुझे ख़्वाब झूठे दिखा कर।

पतझड़ की तरह बना देते हैं मौसम।
चले जाते हैं दरख्तों को हिला कर।

दर्द की शिद्दत में छिपी होती है मुहब्बत।
दिल धड़कता रहता है उनकी अदा पर।

तुम कहीं भी रहो निगाहों में ही रहोगे।
हम जी नहीं सकते हैं कि को भुला कर।

ख़ुशबू जैसे लोग कहां मिलते हैं बताओ।
एक ख़त रखा है मुश्ताक़ मैंने छुपा कर।


​- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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हर स्वाद
हर किसी से
बखान नहीं होते।
जो चख लिया
एकबार फिर औरों
पर मेहरबान नहीं होते।
प्रेम की परिपाटी,
प्रीति की परिभाषा
कोई कोई समझता है,
गर पीते ना प्रेम की हाला
तो खान भी
रसखान नहीं होते।


- राधेश विकास


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ये नूतन मुझे नहीं भाता




ये नूतन वर्ष नहीं भाता मुझे, जहां ठिठुरती सांसे हो,
रूह कांपती सर्द हवा से, जाने कितनी जाती हो।
भला ऐसी सर्द घनी रातों में कोई निष्ठुर ही होगा,
जो उत्साहित होकर आंग्ल नव वर्ष को मनाता होगा।

जरा शरीर जहां सिकुड़े हो घर की खाट के कौने में,
पसरा हुआ है जहां ठंड ,चारों ओर जिसका पहरा हो।
ये रीत नहीं है अपनों की जो दुख में जश्न मनाए,
नव वर्ष हमारा चैत्र माह जो खुशियां लेकर आए।

जहां सुगंधित खिलते पुष्प,बसंत दूत बनकर आता,
नए साल में नई उमंग अर खुशी का संदेशा जो लाता।
जहां सजी वसुधा दुल्हन सी, यौवन रूप झलकता हो,
वो नव वर्ष ही प्यारा मुझको,जो समृद्धि को लेकर आता हो।

जहां अर्क उत्साहित दिखता,वन उपवन भी प्रफुल्लित हो,
मंद मंद जहां पुष्प मुस्काए ,उनपर भौंरे भी आनंदित हो।
जहां शरद से राहत पाए ,तेज से तन नव संचारित हो,
ऐसा नूतन वर्ष मनाओ,जिससे सारा जगत हर्षित हो।


- कैलाश उप्रेती "कोमल"


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शाश्वत प्रेम

तुम वो फूल हो
जिसको मैं बिना स्पर्श के
खिलता हुआ
और महकता हुआ
देखना चाहता हूं।

तुम मेरी वो
अधूरी ख्वाहिश हो
जिसके पूरे होने का
इंतजार मैंने कई
युगों तक किया है।

तुम मेरे जीवन का
वो अंतिम अध्याय हो
जिसके पूरा होने पर
शाश्वत आनंद
मुझे स्पर्श कर जाएगा।


- डॉ. राजीव डोगरा


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पतंग की बातें

आओ ऐसी पतंग बनाएँ,
जो चारों दिशाओं में लहराए।
विश्व शांति का पाठ पढ़ाए,
प्यार का संदेश फैलाए।
तिल के लड्डू सबमें बाँटें,
खिचड़ी मिलकर साथ में खाएँ।
अपनापन हर दिल में जगाएँ,
भाईचारे को और बढ़ाएँ।
पतंग उड़े जब आसमान में,
सुख-शांति के रंग बिखरें।
हर ओर खुशबू फैल जाए,
तिल-गुड़ जैसे रिश्ते निखरें।
मकर संक्रांति के पावन दिन,
सूरज नई रोशनी लाए।
हर कली मुस्कान बिखेरे,
नई उम्मीदें जग जाएँ।
आओ ऐसी पतंग बनाएँ,
जो दिल से दिल को जोड़ जाए।


- गरिमा लखनवी


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तेरी अदालत

फिर हाज़िर हूं,तेरी अदालत में,
पेशी है मेरी,
ये लोग तेरे, वकील तेरा,
हर दलील भी तेरी।

अर्जी इतनी बस, छिलके
कुछ ऐसे न उतारना प्याज के,
की सिर्फ छिलके ही बचे,
और प्याज ना रहे।

शक करो बेशक,ये शौक रहा
है तुम्हारा।
लेकिन रखना थोड़ी नजर,
कही बिछड़ न जाए,
ये परछाई तुम्हारा।

आंखों देखी ,कानों सुनी,
हर वक्त होती ,नहीं सही,
नहीं कहता बंद रखो साब
क्या तुमने सुना कभा,
अपने दिल की कही।

मेरा क्या,मुकदमा जो हार जाऊं,
पासमोपस में रहोगे, सदा तुम,
की रहूं मैं जिंदा की, मर जाऊं।


- रोशन कुमार झा


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इस रिश्ते को क्या नाम दूं ?
मौसम सुहाना था, पल भी अच्छा था,
वक्त भी अनुकूल था मन मे भी सुकुन था,
खुशीया चेहरे मे था, मायुसी तो कुछ नही था,
सुनसान जगह था, कमरे मे एक दुजे ही थे,
कुछ सवाल मन मे मेरे थे, उसके भी मन मा थे,
खामोश दोनो ही थे, न वो कुछ कह रहे थे,
न मै कुछ कह पा रहा था, भय मन मे कुछ था,
कि कुछ गलत न हो जाय, वर्षो से एक साथ थे,
हरेक जरूरतों को पूरी करते थे, न गिला,
न शिकवा था, बस खामोशी से सबके नजरों से चुराते हुए,
जिंदगी की सफर मे चल रहे थे,
बेझिझक बिना कुछ नाम दिये इस रिश्ते को,
और एक दिन मन मे कुछ ऐसा ही सवाल आ गया कि
इस रिश्ते को क्या नाम दूँ ?
जो अनचाहे मे ही एक दुसरे के साथ हूँ
और वो दिन बस,इसी बात को मन मे दबायें
खामोश सा, कमरे मे था कि
आज नाम तो अब कुछ देना ही पड़ेगा
अब न रह सकता हूँ, बिना नाम का,
कर्तव्य की सारी सीमाओं को तो सुरक्षित तरीके से
सजा कर ही रखा हूं उससे यही सोचते सोचते
अचानक होठ कंपकपाते हुए मेरे ही खुले
और कह दिये कि जानूं, इस रिश्ते को क्या नाम दूँ ?
जो तेरे मेरे बीच मे है वर्षो से
मैं तो अब थक सा गया हूँ, जिंदगी से कि
किस किस को क्या जवाब देता रहूँ ?
अब विराम सा लगा देता हूँ, इस रिश्ते को यही
बातें पूरी होने से पहले ही, उसने भी
शायद मन को मेरा, पढ़ लिया था
और गले लगते हुए, बस इतना ही कह दी
कि जो तेरा जी चाहे, वो ही नाम दे
मुझे तो सब स्वीकार है अब मै भी चाहता हूँ कि,
इस रिश्ते को एक नया नाम मिल जाये
जहाँ मैं भी न किसी की रखैल कहलाओ
और न तू रखैल का आशिक,
रूआसी गलेसे बोली फिर क्या था,
वो ही सन्नाटा कमरा, बना गवाह हमारा
चुटकी भर सिन्दुर से माँग उसका मैंने भर दिया
और पति-पत्नी का रिश्ता बन गया
समाज का, परिवार का कुटुम्ब जनों के सामने
खुद को उसके साथ खड़ा कर लिया मैंने
इस रिश्ते को एक नाम मिल गया
चलो अच्छा हुआ कि पति-पत्नी बन गया
हंसते हुए वो दोनों मिले जब हमसे
तो कहा ऐसे कहो चुन्नू कवि कैसे लगे हमारे किससे ?
आशीर्वाद दिया मैंने भी सदैव खुश रहो अब से...


- चुन्नू साहा


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बुद्धि व तर्क





बुद्धि व तर्क की आज फसल लहलहा रही।
कट रहे न्याय बीज, दानवता मुस्कुरा रही।
शान्ति को बेँधता, आज खड़ा जो तन्त्र है,
वह ही कसौटी पर कसा हुआ राज तन्त्र है
सहज सरल उक्ति को, तर्क ने बिगाड़ा है।
आज हर दिशा मे बज, रहा यह नगाड़ा है।
शोर अट्टहास कर रहा, शब्द शून्य हो रही।
बुद्धि व तर्क की आज फसल लहलहा रही।

सत् बुद्धि भी इस दौर में, तर्क से हारा है।
बुद्ध शुद्ध रूप को इसने ही बिगाड़ा है।
अतिरेक बुद्धि ने मानवता को हराया है।
विध्वंसक वम ने दानवता को जिताया है
अलभ्य को पाने की चाह आज मुस्कुरा रही
बुद्धि व तर्क की आज फसल लहलहा रही।

चाह हो जिस चीज की बरबस छिना जा रहा।
निज इच्छा पूर्ती ही श्रेष्ठ गिना जा रहा।
तर्क दे रहा भाषण, पाप क्या पुण्य क्या ?
जायज तो बस युद्ध है, सही व गलत क्या ?
मानवता की हर विधा, अब यहाँ हार रही।
बुद्धि व तर्क की आज फसल लहलहा रही।

तर्क ने किया आज मानव के मष्तिक पे राज।
बुद्धि ने स्वार्थ का ही, पहना है सर पर ताज।
जीजि विषा के सम्मुख, हर धर्म नगण्य है।
इसलिए ही आजकल भ्रष्टाचार गण्य है।
तर्क मानव के मन मे युद्ध बीज बो रही
बुद्धि व तर्क की आज फसल लहलहा रही।


- रत्ना बापुली


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पुरुष





पुरुष अक्सर
संकट काल में
हो जाते कठोर,
प्रस्तर सम
झेलते सारी मार
अपनी सशक्त छाती पर,
बाहुपाश में कसकर
रखते अपनी जिम्मेदारियांँ ,
वक्त के अंधड़ को
गुजर जाने देते,
सारे थपेड़े स्वयं
सह लेते,
हिमाद्रि से बन
रोक लेते सारी बाधाएँ,
विभिन्न रूपों में
कभी पिता बन
बच्चों का हाथ थाम,
कभी भाई बन
कभी पति के रूप में
दुश्मन समक्ष सीना तान,
ईट पत्थर के
मकान को घर बनाते,
स्वप्न को साकार करते,
संतति को पंख देकर
खुला आसमान बनाते,
जब जब तूफान आते
स्वयं पर चोट खाकर,
छत बनकर छा जाते
परिवार को दुःखवृष्टि से
बचा ले जाते।


- सीमा वर्णिका


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कोट धार की दूर वाली कलोल

वह भी दिन थे जब पिछड़ी हुई थी कोटधार
दूर इतनी थी जैसे जाना हो सात समुंदर पार
घुमारवीं से झंडूता मांडवा होकर जाती थी बस
बादल दिखते ही ड्राइवर उतार देता था बीच मंझधार

सड़क नहीं होती थी पैदल ही होता था सफर
झंडूता मांडवा मलारी या तलाई से आते थे लोग अपने घर
बियाबान जंगल होते थे डरावना होता था सारा रास्ता
अकेले आ जाते थे घर जो पहुंचना लगता नहीं था डर

दूर वाली कलोल के नाम से जानते थे कलोल को
समय बहुत लगता था पहुंचने में क्योंकि थी बहुत दूर
कभी पैदल कभी ट्रक ट्रैक्टर पर कटता था सफर
था पिछड़ा बहुत क्षेत्र लोग थे बहुत मजबूर

सब्जी नहीं मिलती थी अनाज भी नहीं था भरपूर
सड़कें नहीं थी लोग पैदल चलने को थे मजबूर
पढ़ाई करना भी था कठिन क्योंकि स्कूल थे दूर
बहुत साधारण थे कोटधार के लोग नहीं था कोई गरूर

भैंसें बहुत पालते थे करते थे इनका व्यापार
इसीलिए तो नाम पड़ा था कोट की धार
दूध घी बहुत खाते थे होते थे बहुत बलवान
कोटधार के तभी तो बहुत मशहूर थे पहलवान

समय ने करवट बदली टल गई काली छाया
बाघछाल पुल बना सबको फोरलेन पर पहुंचाया
सड़कों का बिछा जाल पुलों की लगी भरमार
कोटधार नहीं रहा पिछड़ा अब तरक्की की राह पर आया


- रवींद्र कुमार शर्मा


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तिथि



कुछ तिथियाँ कैलेंडर में नहीं होतीं,
वे हृदय में दर्ज होती हैं।
उन दिनों मन उदास नहीं होता,
बस उनके पास चला जाता है।
जनवरी फिर आ गया है।
कैलेंडर में तारीखें वही हैं,
पर मन हर साल इन्हीं दिनों
आपके पास चला जाता है।
दस तारीख से ही
कुछ भीतर खिसकने लगता है
जैसे कोई चीज़ अपनी जगह से
धीरे-धीरे हट रही हो।
हँसती हूँ, बात करती हूँ,
पर मन कहीं ठहरता नहीं।
सत्रह जनवरी…
उस दिन को याद नहीं करना चाहती,
फिर भी हर पल वही सामने आता है
क्या कहा था,
क्या सुन न पाई,
क्या कर सकती थी
और क्या नहीं कर पाई।
आप गए नहीं हैं ,
यह बात मैं जानती हूँ।
आप मेरी सोच में हैं,
मेरे शब्दों में हैं,
मेरी चुप्पियों में हैं।
पर फिर भी,
इन दिनों आपकी कमी
हवा की तरह महसूस होती है।
दिखती नहीं,
पर साँस लेने में
कुछ भारी-सी हो जाती है।
अगर कभी मन बहुत अजीब लगे,
तो समझ लीजिएगा
आपकी यादों ने
मुझे फिर से
अपने पास बुला लिया है।
कभी-कभी
घटना घटित नहीं होती,
बस कोई तिथि
मन के भीतर उतर जाती है।
वह तिथि
या तो अह्लाद से भर देती है
कि जीवन उजास हो उठे,
या फिर
इतना व्यथित कर जाती है
कि मन
ताउम्र
उसे भूल नहीं पाता।
कभी एक तिथि ही
पूरे जीवन का भाव तय कर देती है-
या उल्लास बनकर,
या आजीवन पीड़ा।


- सविता सिंह मीरा


*****




मकर संक्रांति

जब सूर्य उत्तरायण पथ पर
नव तेजस से बढ़ता है,
तम की दीर्घ छायाएँ सिमटें,
जीवन आलोक से भरता है।

शिशिर की नीरव गोद छोड़
धरा नव स्वप्न संवारती है,
स्वर्णिम बालियों की मुस्कान
किसानों की आशा धारती है।

तिल-गुड़ की मधुरिमा में घुल
स्नेह-संबंध नव आकार पाते,
कटुता की गाँठें स्वतः खुलें
हृदय सरलता अपनाते।

नील गगन में मुक्त पतंगें
मानव आकांक्षा कहलातीं,
डोर थामे संयम का बोध
मर्यादा का पाठ पढ़ातीं।

मकर संक्रांति केवल पर्व नहीं,
यह काल-परिवर्तन का बोध कराए,
अंधकार से प्रकाश की यात्रा
जीवन-पथ का अर्थ समझाए।


- डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"



*****


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