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अरावली
अरावली के आँचल में, है इतिहास समाया,
कण-कण इसका पूछे, क्या वक्त ये आया ?
बांध मरू को बाँहों में, बनकर जीवन डोर,
धड़कती हूँ भारत के लिए, फिर कैसा ये शोर ?
वन-उपवन की छाया, नदियों का हूँ आधार,
हरियाली धरा को देती, लुटाती अपना प्यार,
रेतीली आँधियों को, देती न आगे की राह,
हूँ मौन प्रहरी युगों से, हो गया अब क्या गुनाह ?
घाव बहुत हैं तन पर, फिर भी हूँ मौन खड़ी,
पीड़ा मेरे मन की, नहीं किसी ने कभी पढ़ी,
सुन नहीं रहा क्यूँ, कोई मेरी करुण पुकार,
मेरे आधार में है छिपा, मानव तेरा भी आधार।
है अरावली से ही, जीवन अस्तित्व, विस्तार,
रक्षक के भक्षण में लालायित, ये कैसा व्यवहार ?
पाल रही पुत्र सा, पर कर बैठे तुम अधिकार,
बहुत शौक है चढ़ा, तो पाँव अपने को कुल्हाड़ी मार।
- धरम चंद धीमान
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अरावली
सोच रहे हो..
या फिर साजिशन निर्णय दे रहे हो!
घटते जंगलों, पेड़, पहाड़ों पर,
क्यों नहीं तुम कुछ बोल रहे हो।
भारतवर्ष की वसुधा का श्रृंगार,
आरावली पर्वतमाला तोड़ रहे हो।।
छोटे-छोटे पर्वतों की पुष्पों से,
पर्वतमाला अरावली है बनी।
उन पुष्प रूपी पर्वतों से,
तुम क्यों भला मुँह मोड़ रहे हो।।
अरे तनिक तो ख्याल करो,
प्राकृतिक ढाल तो ना खत्म करों।
जानवर बेजुबा कितने मारोगे,
आधार आजीविका ना ख़त्म करों।।
धूल भरी आंधी से तुम,
दिल्ली को कैसे बचाओगे।
खत्म हो गई नदिया अगर तो,
प्यास किस किसकी बुझाओगे।।
फिर ना कोई कभी किसी,
इंसानों को भी बचा पाएगा।
हवा भी होगी जहरीली,
यूं भूख प्यास भी सताएगा।।
काम ना आएगी तेरी तरक्की,
बेसुध होकर सब मारे जाएंगे।
काम ना आएगा तेरा विस्तार,
पाप के भागी हम ही कहलाएंगे।।
ऐसी तरक्की की क्या जरूरत,
जो अरावली से करें छेड़छाड़।
अगर छू भी दिया तूने अगर,
होगा तुझ पर भी कड़ा प्रहार।।
सोच रहे हो..
या फिर साजिशन निर्णय दे रहे हो!
- राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु'
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हाँ मैं पर्वत अरावली हूँ।
प्रथम गिरि का मैं चारण हूँ,
मैं प्राकृतिक उच्चारण हूँ।
सदियों को चलते देखा है,
भारत को बनते देखा है।
ऊँचाई मेरी किंचित है,
आज पहाड़ी भी चिंतित है।
सबको लगता यही वहम
लगता हूँ ऊँचा कुछ कम।
खोल कर्ण को सुनो जरा
मुझमें है इतिहास भरा।
मैं प्रताप गाथा गायक हूँ,
राणा का सेनानायक हूँ।
अरि के रक्तओं को चाटी हूँ,
याद करो हल्दीघाटी हूँ।
दुश्मन को भी तौल लिया था,
हरहर बमबम बोल दिया था।
मेरी काया पर मत जाओ,
बस मेरे कर्मो को गाओ।
राजस्थल बनते देखा हूँ,
भौगोलिक लक्ष्मण-रेखा हूँ।
मैं सदियों तक तुम्हें दिया है,
क्या बदले में तनिक लिया है।
मुझको तुमने शाप कह दिया,
किस मन से है पाप कह दिया।
मर्यादा को ताख रख दिया,
सीने पर अब लात रख दिया।
राह भटक कर रह जायेगी,
श्वास अटक कर रह जायेगी।
मत कर अपने मन से भूल,
उड़ेगी दिल्ली तक यह धूल।
सोच समझकर कदम बढ़ाना,
पाछे जाकर मत पछताना।
सदियों से मैं यही खड़ी हूँ।
बस जड़वत चुपचाप पड़ी हूँ।
मत छेड़ो मैं ठीक-सही हूँ।
हाँ मैं पर्वत अरावली हूँ।
- प्रीतम कुमार पाठक
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अरावली की पीड़ा
परिपत्र को तुम छांट रहे संकेत
नही यह अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में
ये प्रकृति को सीधा गच्चा है।
जब- जब नर ने प्रकृति को छेड़ा
तब- तब मची तबाही है।
निज संकट को आमंत्रित
करने वालों तुम्हें बधाई है।
ये अरावली पर्वत जिसने
विस्तार थार का रोका है।
नर मानव और जीव-जन्तु की
रक्षा को सबकुछ झोंका है।
करना था रक्षण जिसका
न भक्षण उसका अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
पेड़ लगाकर प्रकृति के
रक्षक का फर्ज निभाते हो।
व्यक्ति विशेष के हित में फिर क्यों ?
अरावली कटवाते हो।
अरे अवशेषी तुंग के कारण
परिवेश यहां का अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है। .
यदि क्षति पहुंचेगी अद्रि को
तब रौद्र रूप प्रकृति लेगी।
प्रेम बांटने वाली प्रकृति
चोट हमें भीषण देगी।
प्रकृति का वैरी बनना
ये किंचित भी न अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
हस्तक्षेप यदि रुका नही
तो थार बहुत हर्षित होगा।
पूरब से लेकर उत्तर तक वह
निज भ्रमण की दस्तक देगा।
मरू मिल जाये सरिता से
तब अंजाम न इसका अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
मिले थार यदि सरिता से
निज प्रेम से रंजित कर देगा।
नीर सुखाकर सरिता का
सैकत से सुसज्जित कर देगा।
सीख " करुण" की तुम मानों
कुदरत से तर्क न अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
परिपत्र को तुम छांट रहे संकेत
नही यह अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में
ये प्रकृति को सीधा गच्चा है।
जब- जब नर ने प्रकृति को छेड़ा
तब- तब मची तबाही है।
निज संकट को आमंत्रित
करने वालों तुम्हें बधाई है।
ये अरावली पर्वत जिसने
विस्तार थार का रोका है।
नर मानव और जीव-जन्तु की
रक्षा को सबकुछ झोंका है।
करना था रक्षण जिसका
न भक्षण उसका अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
पेड़ लगाकर प्रकृति के
रक्षक का फर्ज निभाते हो।
व्यक्ति विशेष के हित में फिर क्यों ?
अरावली कटवाते हो।
अरे अवशेषी तुंग के कारण
परिवेश यहां का अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है। .
यदि क्षति पहुंचेगी अद्रि को
तब रौद्र रूप प्रकृति लेगी।
प्रेम बांटने वाली प्रकृति
चोट हमें भीषण देगी।
प्रकृति का वैरी बनना
ये किंचित भी न अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
हस्तक्षेप यदि रुका नही
तो थार बहुत हर्षित होगा।
पूरब से लेकर उत्तर तक वह
निज भ्रमण की दस्तक देगा।
मरू मिल जाये सरिता से
तब अंजाम न इसका अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
मिले थार यदि सरिता से
निज प्रेम से रंजित कर देगा।
नीर सुखाकर सरिता का
सैकत से सुसज्जित कर देगा।
सीख " करुण" की तुम मानों
कुदरत से तर्क न अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।
- करन सिंह "करुण"
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