आज फिर ख़ामोशी ने
तुम्हारा नाम लिया है,
बातें तो रुक गई हैं,
पर एहसास अब भी ज़िंदा हैं।
तुम्हारी हँसी की गूँज
आज भी कानों में रहती है,
वो छोटी-छोटी बातें
अब भी दिल से कहती हैं।
न जाने किस मोड़ पर
हमारे रास्ते अलग हुए,
पर मेरी हर दुआ में
आज भी तुम शामिल हो।
तुम से बात नहीं होती,
इसका ग़म तो बहुत है,
पर दोस्ती की वो यादें
मेरे लिए आज भी अनमोल हैं।
अगर कभी वक़्त मिले तुम्हें,
तो बस इतना याद रखना,
कोई आज भी चुपचाप
तुम्हें बहुत याद करता है।
- रेखा चंदेल
*****
असमान गुज़र गया जीवन
बीत गया बहुत कुछ बीत गया
मौसम भी बदलते गए तमाम धीरे-धीरे
शेष मुखौटे भी बचे नहीं शेष फिर कहीं
सच कहते शेष रह गईं ज़ुबानें सबकी शेष
झूठ सुनते-सुनते पत्थर हो गये कान तक
ऊॅंचाइयों पर टॅंगा रह गया आसमान
असमान गुज़र गया जीवन।
समय हुआ मैं सो गया
सोचा था कभी ये भी था सोचा
कि जीवन में जीवन की निरंतरता होगी
और उस निरंतरता में थोड़ी कविता होगी
कविता में फिर कविता जैसा जीवन होगा
और जीवन में जीवन जैसी कविता होगी
जो था सब कुछ उलट-पलट हो गया
समय हुआ मैं सो गया।
- राजकुमार कुम्भज
*****
पूर्णता
कितना अबोध प्रश्न था तुम्हारा,
कि चलो हम दोनों मिल,
प्रेम की पूर्णता को पा लें।
प्रेम में पूर्णता जहां
वहीं आ जाती है शून्यता
प्रेम अधूरा ही शाश्वत है
अमर है,
सुभाषित है
फलित है
मन में कशिश न हो तो प्रेम कैसा
मुझे पाने के बाद
वह कशिश
वह इंतजार
वह लगन
तुम कहां से लाओगे
मीरा का प्रेम अमर क्यों है
क्योंकि वह अधूरा है
राधा का प्रेम शाश्वत क्यों है
क्योकि वह कभी मिला ही नहीं
प्रेम पूर्णता नहीं
विस्तारता है
बिखर जाना चाहता है
पंखुरियो की तरह
ताकि सुभाषित हो सके
शब्दों में,
भावों में
गीतो में
परिणय बंधन एक ठहराव है
और वहीं
प्रेम का अंत है।
इसलिए प्रेम अपूर्ण है
अपूर्व है
प्रेम में मिलन पूर्णता नहीं
अपूर्णता है।
तुम कितने भोले हो
तुमने प्रेम को दो शरीरों की उपाधि दे डाली है
जबकि प्रेम आत्मा है
शरीर उसकी काया
जो अभिन्न हैं
प्रेम एकाकार हो
सृष्टि की रचना कर सकता है
पर उस पूर्णता को नहीं पा सकता
जो वह स्वयं है।
- रत्ना बापुली
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मेरी प्यारी माँ
सुबह-सवेरे उठ जाती है
घर के छोटे-मोटे काम निपटाती है
नहा-धोकर फिर करती है पूजा
सूर्य देवता को जल अर्पित कर
पंछियों के लिए चूरी बनाती
धुले कपड़े सलीके से सुखाती
तब जाकर कहीं खाना खाती
बैठ खाट पर फिर पीती है चाय
सुनहरे फ्रेम के चश्मे से झांकती आंखों से
देखती है टी.वी. के प्रोग्राम
साथ ही मन में ये सोचती रहती-
कहीं छुट तो नहीं गया कोई काम...
- निशी सहरावत
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पावर के लिए लोगो को
मैंने छटपटाते हुए देखा है
पावर तो मिली नहींअसल में
फ़िर भी हाथ मलते देखा है
क्या क्या जुगाड़ करते हैं लोग ?
पावर प्राप्ति के लिए
ज़ोर अजमाइश करते-करते
और लड़ते झगड़ते देखा है
पावर के लिए लोगो को
मैंने छटपटाते हुए देखा है...
संसद से लेकर सड़क तक
शक्ति प्रदर्शन करते देखा है,
अलग-अलग बना कर गुट अपना
भड़ास निकालते देखा है,
संघों संगठनों की तो बात ही क्या ?
पंचायतों में भी पंचो को लड़ते देखा है ,
बहस बसाई होती चौहट्टे चौबारों में,
खुन्नस दिलों में रखते देखा है,
पावर के लिए लोगो को
मैंने छटपटाते हुए देखा है...
भागम भाग भरी दुनियां में
लोगों को जलते हुए देखा है,
लोगों के सुख की बात तो छोड़ो
अपनी नींद और चैन गंवाते देखा है,
कोई मेरे से आगे न निकल जाए
खुद पर ही चिढ़ते देखा है,
नकली पावर ही क्यों न आ जाए हाथ में
फिर भी अकड़ते देखा है,
"धीमान" क्या कहने ऐसी पावर के
लोगों को तलवे चाटते देखा है...
- बाबू राम धीमान
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रेवड़ी की मिठास
लोहड़ी का पावन त्योहार आता है,
घर घर में खुशियों का मेला लाता है।
प्यार और मिठास का शुभ संदेश ,
सबके मनों को खूब भरमाता है।
गिद्दा और ढोल की थाप पर,
नाचते गाते भांगड़ा लोग पाते हैं।
मुबारक हो लोहड़ी का त्योहार,
जिसमें सबके चेहरे खुशियाँ पाते हैं।
गुड़, मूंगफली, और रेवड़ी की मिठास,
लोहड़ी की खुशियों को बढ़ाते हैं।
लोहड़ी की रात गीठा जलाकर,
सब लोग खुशियाँ मनाते हैं।
लोहड़ी का त्योहार तिल चौली का त्योहार,
बच्चे घर घर जाकर लोहड़ी गाते हैं।
सबको लोहड़ी की शुभकामनाएं देकर,
दूल्हा भट्टी वाले की गाथा खूब सुनाते हैं।
- कै. डॉ. जय महलवाल अनजान
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प्रेम की पीड़ा
वे मुझसे सुलह करना चाहती हैं।
कहा कुछ मुझसे ऐसा न
जिसको बताना चाहती हैं।
आकर चुपचाप पास मेरे बैठ जाती हैं।
वे मुझसे सुलह करना चाहती हैं।
उन्होंने बोले थे कुछ अप्रिय लफ्ज ऐसे।
मानों चुभे थे मानस में सायक् के जैसे।
मेरे अन्तर की पीड़ा को समझना चाहती हैं।
वे मुझसे सुलह करना चाहती हैं।
अन्तर्मन में उनके द्वंद चल रहा है।
उनको निज बर्ताव ही छल रहा है।
मिलने को जी मचल रहा है।
इसीलिए वे चुपके से मिस्ड कॉल कर जाती हैं।
वे मुझसे सुलह करना चाहती हैं।
मैं उनकी जहनियत को सलाम करना चाहता हूं।
छटपटाते मानस में शीतलता का आभास कराना चाहता हूं।
जब से अनबन हुई मुझसे उन्हे मेरी जुदाई दिन-रात सताती है।
इसीलिए वे मुझसे सुलह करना चाहती हैं।
- करन सिंह 'करुण'
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हर अँधेरा किसी उजास की तैयारी में है
टूटती रात, उगते भोर की जिम्मेदारी में है।
जो अभी थक गया है, वह हार गया-यह सत्य नहीं,
हर ठहराव किसी नई गति की पहरेदारी में है।
आँसू भी व्यर्थ नहीं जाते
हर वेदना करुणा की एक इकाई में है।
जो अभी मौन है, वह शून्य नहीं है मित्र,
हर मौन किसी दिव्य पुकार की तैयारी में है।
निश्चिंत रहिए- अँधेरा स्थायी नहीं होता,
पर उजास शाश्वत होता है।
- नरेंद्र मंघनानी
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स्कूल जाना कैसे भूलें
सूरज दादा अब और न छुपा छुपी खेलों,
नन्हे मुन्हें ठिठुर रहे हैं अब तो सुध ले लो।
नज़र नहीं कुछ आता धुंध छाई इतनी गहरी,
सूरज दादा अब तो धूप की पोटली खोलो।
सफेद पाले ने भी खूब अफरातफरी मचाई,
वाष्प बना दो पाले को,अपनी किरणों को बोलो।
बच्चे बूढ़े जवान सब दुबके पड़े है घरों में,
अब तो जल्दी अपना धूप वाला दांव खेलो।
बेशक ठंड से कांप रहे हाथ पांव हमारे,
रोज जाना है स्कूल उसकी राह कभी न भूलें।
जिस तरह आप नहीं भूलते सुबह आना रोज,
सर्दी गर्मी कुछ भी हो हम स्कूल जाना कैसे भूलें ?
- राज कुमार कौंडल
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गांव का सूना पनघट
सूना हो गया गांव का वो पनघट
जहां पानी भरने आती हर एक नारी।
बैठ पनघट किनारे समय बिताती
सुख दुःख सांझा कर मन हल्का कर जाती।
मिट्टी का घड़ा संग लाती
पानी भरते घड़े की आवाजें मन को शांति दे जाती।
अब न घड़ा रहा न कोई पानी भरने आती
बस सूनापन और खामोशी नजर आती।
पनघट अपने अस्तित्व का राग है रोते
हम भी कभी मशहूर थे, याद जरूर ये करवाते।
हम से चैन व आराम थे पाते सभी
महीने में एक बार साफ सफाई होती थी कभी।
अब तो कंटीली झाड़ियां होती हमारे चारों ओर
कोई तरस नहीं खाता बस आधुनिकता की पकड़े हैं डोर।
योग व कसरत भी हमसे थे मशहूर
क्योंकि हम होते थे गांव से थोड़े दूर।
आज हमें संरक्षण की आवश्यकता है पड़ी
जल था हमारा शुद्ध, याद करो जरा वो घड़ी।
- विनोद वर्मा
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खै़रो ख़बर नहीं
भूल जा मुहब्बत की दास्तानों को।
फ़िक्र अब न रही ज़मीं की आसमानों को।
मरीजे़ इश्क़ का इलाज मुमकिन ही नहीं।
कौन समझा सका है कहो इन दीवानों को।
एक मुद्दत हुई तेरी। खै़रो ख़बर। नहीं।
क्या हुआ अब तेरे,जानम उन इरादों को।
ख़ुश्क पत्तों की तरह उड़ता हूँ यहाँ वहाँ।
क्या करूँगा बतां, बता इन आशियानों को।
मैं भी एक। चिराग़ था। रोशन रहा। कभी।
मुश्ताक़- क्या दूँ इल्ज़ाम इन हवाओं को।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
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निर्वस्त्र रिश्ते
जब अपने ही, अपनो का साथ
छोड़े तो क्या कहना।
पास रह के भी दूर हुए,
तो क्या कहना।
सिंचा गुलाब को तो फिर,
काटें चुभे तो रहिए, चुप चाप है सहना।
जीने के लिए ,
मछली सा होना होता है,
मगर से बचके दूर
हर धारा के उलट बहना।
गर फिसल गए तो गलती हमारी,
टेढ़े,मेढे राहों के रही हम।
हमसफर छोड़ साथ,बढ़ गए आगे,
अब हाथ थामने के लिए किसे कहना।
धागे नहीं वस्त्र के नाम तन पर,
लदा है हीरा,मोती और नगीना।
फिर भी तो निर्वस्त्र ही हुए,
क्या ओढ़ा और क्या पहना।
साथ रहे साथ जिए,
फिर भी इशारे नहीं समझते,
सब कुछ होता है,
जुबा से कहना।
शायद हम ही नासमझ रहे,
उलझते रहे वहां, जहां था सुलझना।
समझदारों ने समझा उतना
जितना उनको था समझना।
कोई दिल से खेले, दिल बना
अब हरदिल खिलौना।
ऊपर ऊपर सब लगे कोमल,
शीतल, निर्मल।
पर अंदर चल रहा,सब खेल घिनौना।
किसी को जेल,
लगता घर,
घर लगता किसी को,
पागल खाना।
बस जिए जाते सभी,जैसे
जीता है,जमना।
कोई पुण्य करे की कोई पाप
कमाए, जिसे जो है कमाना।
- रोशन कुमार झा
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जीवनसंगिनी
मेरा अर्द स्वरुप हो तुम
मेरी आधारशिला हो तुम
जीवन कहते हैं जिसको
जिसका एक पहिया में और दूसरा हो तुम
खुशहाल जीवन का प्रतीक हो तुम
गृहस्थी की नीव और बच्चों का भविष्य हो तुम
में तुम्हे आज भी उतना ही चाहता हूं
जितना पहले दिन चाहता था
मेरा पहला प्यार हो तुम
जीवन का सही मार्गदर्शक हो तुम
मस्ती में गुनगुनाउ ऐसा गीत हो तुम
बिन शब्दों की किताब हो तुम
हर बुरा वक्त टल जाता है यू कहकर कि मेरे साथ हो तुम
जवानी कट जाए वो जरिया नहीं तुम
पर बुढ़ापे के सच्चे भरोसे लाठी हो तुम
मुझसे पहले ना चले जाना इस दुनिया से तुम
जीवन के हर शाम के साथ
जीवनसंगिनी हो तुम
- मुकेश कुमार धोधावत
*****
संक्रांति की पतंग
आसमान में उड़ती पतंग,
सपनों जैसी रंग-बिरंगी उमंग।
धागे से बंधी, पर उड़ान में स्वतंत्र,
जीवन का यही है सुंदर मंत्र।
सिखाती है पतंग – लक्ष्य को थामो,
धैर्य से हर मुश्किल को साधो।
हवा के संग झूमो, पर दिशा न खोना,
संयम और संतुलन से आगे बढ़ना।
कटती पतंग कहती है ये बात,
अति उत्साह से टूट जाते हैं साथ।
डोर थामे रहो, पर मन को उड़ने दो,
बंधन में रहकर भी सपनों को चुनने दो।
सूरज की किरणें देती उजियारा,
संक्रांति का पर्व है सबको प्यारा।
पतंग की सीख हमें समझाए,
जीवन में संतुलन ही सुख दिलाए।
- अंशिता त्रिपाठी
*****
भेद
नहीं करते
अपने पराये में,
बदलकर भेष खा जाते हैं।
अगर मगर
लेकिन वेकिन
कुछ नहीं हर खुशी
हर आवेश खा जाते हैं।
लकड़ी
के कीड़े सिर्फ
कुर्सियां ही खाते हैं,
मगर
कुर्सी के कीड़े
तो पूरा देश खा जाते हैं।
- राधेश विकास
*****















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