साहित्य चक्र

30 January 2026

कथा संस्मरण- बरसात की पहली बूंद

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।।

मध्य काल के महाकवि रहीम ने पानी का महत्व बताया है क्योंकि पानी के बिना संसार सूना हो जाता है। इसलिए जीवन से पहले जल पृथ्वी पर आया है। यही नहीं पानी की बूंद सीपी में मोती का निर्माण करती है वहीं पानी मनुष्य के लिए अति आवश्यक होता है और पानी से चूना उपयोगी बन जाता है।

वैसे तो पृथ्वी पर 71% भूभाग पर जल पाया जाता है। वर्षा से 800 करोड़ मानव को जल प्राप्त होता है। इसलिए नदियां, तालाब, झील और कूप पाये जाते हैं। जल हमें द्रव्य और ठोस ( हिम या बर्फ) रूप में प्राप्त होता है।





मनमोहनी प्रकृति के अनेक रूप हैं। अपने इन रूपों से यह मानव -मन को हर्षित करती है उसमें उमंग भर देती है और उसे नवीन स्फूर्ति से प्रेरित करती है। प्रकृति के इन रूपों में वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा को चौमासा भी कहा जाता है। क्योंकि इसका आरंभ आषाढ़ मास में हो जाता है। और अश्विन तक रहती है। जिस प्रकार कठिन तपस्या, कठोर संयम तथा त्याग से किसी व्यक्ति को महत्ता गौरव और श्री प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार वसुंधरा ग्रीष्म सूर्य के असह्य आतप को सहन करके ही ' वर्षा के वरदान ' को प्राप्त करती है।

वर्षा ऋतु की भूमिका हमारे जीवन में महत्वपूर्ण मानी जाती है इसलिए महाकवि कालिदास ने लिखा है-

"रजः प्रशांतं स हिमो ऽद्य वायुः नभः प्रकीर्णाऽम्बुधरो विभाति।"


उसी प्रकार महाकवि तुलसीदास ने भी वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है-

वर्षा काल में नभ छाये, गरजत लागत परम सुहाये।
दामिनी दमक रही घन माही, खेल की प्रीति यथा थिर नाही।





बरसात की बूंदें मानव को विकास के लिए प्रेरित करती है। भारत कृषि प्रधान देश है यहां वर्षा ऋतु विशेष महत्व रखती है। अच्छी वर्षा हो जाती है तो वासंती और शारदीय दोनों फसलें अच्छी हो जाती हैं ।इस प्रकार इस भूखंड की समृद्धि, स्वास्थ्य और प्रसन्नता इसी ऋतु के कारण हैं। वर्षा के कारण पशुओं के लिए चारा मिल जाता है। तालाब, नदी नालों में पानी भर जाता है जो सारे वर्ष मनुष्यों के काम आता है।

ग्रीष्म ऋतु का प्रचंड ताप दूर हो जाता है ऋतु सुखद और स्वास्थ्यवर्धक हो जाती है। गांवों का जीवन वर्षा द्वारा बहुत प्रभावित होता है। वर्षा के कारण प्रकृति का रूप निखर जाता है और आकाश में इन्द्रधनुष की सतरंगी आभा मन को लुभा देती है। यह ऋतु प्रत्येक के हृदय में मस्ती, उमंग, आनंदमयी स्फूर्ति का संचार कर देती है।






बसंत ऋतु यदि ऋतुओं का राजा है तो वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा को चौमासा भी कहते हैं क्योंकि इसका आरंभ आषाढ़ मास में हो जाता है और वह अश्विन तक रहती है।जिस प्रकार कठिन तपस्या, कठोर संयम तथा त्याग से किसी व्यक्ति को महत्ता गौरव और श्री आदि प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वसुंधरा ग्रीष्म सूर्य के असह्य ताप को सहन करके ही वर्षा के वरदान को प्राप्त करती है।

हमारा देश दक्षिण एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुख रूप से स्थित है। यहां पर मुख्यतः वर्षा संपूर्ण भारत में मानसून से ही होती है। यह मानसून दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनों को उत्तरी गोलार्द्ध में मानसून कहा जाता है। यह वर्षा ग्रीष्मकालीन कहलाती है। यही नहीं शीतकाल में उत्तर पूर्व व्यापारिक पवनों से थोड़ी बहुत बर्षा दक्षिण पूर्व के तटीय राज्यों में ही होती है। थोड़ी बहुत वर्षा पश्चिमी विक्षोभ से भी देश में होती है। मानसून वर्षा का भारतीय जलवायु में बहुत महत्व है।

इसलिए उत्तर भारत में सभी प्रमुख नदियों में अति वर्षा से बाढ़ आ जाती है। नेपाल से निकलने वाली कोसी नदी को तो बिहार की शोकग्रस्त नदी कहा जाता था। मानसून द्वारा जून से लेकर सितंबर माह तक प्रत्येक वर्ष भीषण वर्षा होती है। इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप में गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मानसून वर्षा का जल लाभ प्राप्त करती हैं और वर्ष भर बहा करती हैं जबकि दक्षिण भारत में नदियां जैसे नर्मदा, तापी, महानदी, कृष्णा, कावेरी और गोदावरी ऋतुवत मानी जाती हैं। इसलिए करोड़ों भारतीयों का भविष्य मानसून की वर्षा निश्चित करता है।





बचपन से ही मेरा प्रिय ऋतु वर्षा ही रही है। जब बरसात होती थी तब फुटबॉल खेलने में बहुत मजा आता था। भले ही अक्सर घर में डांट पड़ती थी फिर भी मौका मिलने पर खेलना नहीं भूलता था। प्रिय ऋतु होने के कारण रेनकोट और छाता से परहेज़ रखता हूं सदैव इसलिए अक्सर लापरवाही से भींग जाता था।

कई बार भीगने के कारण बुखार भी आ गया और स्कूल और नौकरी में व्यवधान उपस्थित हो जाता था। उसके बाद अपने बच्चे को वर्षा से भीगने पर ठीक से नहीं डांट पाता हूं। वर्षाकाल में स्कूल, कालेज, आफिस और बाजार जाने में असुविधा हो जाती है। तब बच्चे, बुजुर्ग, युवा, युवतियां, महिलाएं जाता और रेनकोट का प्रयोग वर्षा से भीगने से बचने के लिए करते हैं।


- इंदु शेखर त्रिपाठी



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