शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि व्यक्ति को विवेकशील, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बनाने की प्रक्रिया है। किंतु वर्तमान समय में शिक्षा अंकों, डिग्रियों और प्रतियोगिता की दौड़ में अपने मूल उद्देश्य से विमुख होती प्रतीत होती है। ऐसे में शिक्षा की दिशा, उसकी भूमिका और उससे जुड़े अंतर्विरोधों पर गंभीर विचार आवश्यक हो गया है।
पंक्तियाँ जो समय का सच कहती हैं
“खाकी खड़ी है, खादी बैठी है।
शिक्षा खड़ी है, अशिक्षा बैठी है।”
ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि समकालीन समाज का दर्पण हैं। इनमें वह विडंबना उभरकर आती है, जहाँ जिम्मेदारी निभाने वाली शक्तियाँ प्रतीक्षा में खड़ी हैं और निर्णय लेने वाली शक्तियाँ मौन साधे बैठी हैं।
खाकी और खादी: उत्तरदायित्व का असंतुलन
लोकतंत्र में खाकी अनुशासन, सुरक्षा और सेवा का प्रतीक है, जबकि खादी त्याग, नेतृत्व और जनकल्याण की भावना का प्रतिनिधित्व करती है। किंतु जब खाकी आदेशों की प्रतीक्षा में खड़ी रह जाए और खादी सत्ता के आसन पर निष्क्रिय बैठी रहे, तब शासन और जनता के बीच की दूरी बढ़ जाती है। निर्णयों का भार नीचे खड़े लोगों पर होता है, पर उत्तरदायित्व ऊपर बैठा रह जाता है।
शिक्षा बनाम अशिक्षा: एक गहरी विडंबना
शिक्षा आज भी समाज को दिशा देने के लिए खड़ी है- वह प्रश्न करती है, विवेक जगाती है और भविष्य का निर्माण करना चाहती है। परंतु अशिक्षा, जो केवल रटंत, डिग्रियों और संकीर्ण सोच तक सीमित है, व्यवस्था की कुर्सी पर बैठकर शासन कर रही है। परिणामस्वरूप ज्ञान का विस्तार तो हो रहा है, किंतु समझ और संवेदना का क्षरण निरंतर बढ़ रहा है।
प्रतिस्पर्धा की दौड़ और मूल्यों का पतन
आज की शिक्षा प्रणाली सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है। अंकों को सफलता का पैमाना बना दिया गया है, जबकि नैतिक मूल्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना हाशिए पर चले गए हैं। शिक्षक और विद्यार्थी- दोनों ही इस दबावग्रस्त व्यवस्था में अपनी रचनात्मकता खोते जा रहे हैं।
समाधान की दिशा: चेतना का पुनर्जागरण
समय की मांग है कि खादी कुर्सी से उठकर अपनी नैतिक और सामाजिक जवाबदेही निभाए तथा शिक्षा को उसका यथोचित और सम्मानजनक स्थान प्रदान किया जाए। जब शिक्षा बैठेगी और अशिक्षा खड़ी होगी, तभी समाज वास्तविक अर्थों में प्रगति करेगा। तब ये पंक्तियाँ व्यंग्य नहीं, बल्कि एक जाग्रत राष्ट्र की चेतना का उद्घोष बनेंगी।
अपने विचारों को विराम देते हुए बस इतना ही कहूँगी-
"जब कुर्सी से उठे उत्तरदायित्व का मान,
जब शिक्षा बने दीप, मिटे अज्ञान का घाम।
अंकों से ऊपर उठे मानवता का स्वर,
तब जागे राष्ट्र, बने सच का उजला घर।"
- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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