तुम पढ़ सकती हो,
पर आज़ाद नहीं हो,
अवैतनिक घरेलू कामों की बेड़ियों से,
जो कभी टूटें नहीं।
कोचिंग कर सकती हो,
सिलाई-कटाई सीख सकती हो,
पर घर के कामों से मुक्ति नहीं,
नौकरानी नहीं, बस सेवा की मशीन।
ट्यूशन पढ़ा सकती हो,
पैसे कमा सकती हो,
पर घर की चौखट पर,
मुक्ति की कोई डगर नहीं।
खेलों में भाग ले सकती हो,
डिग्री भी जीत सकती हो,
पर परिवार की सेवा से,
फुरसत कभी नहीं।
आत्मनिर्भर बन सकती हो,
पर एक बंदी बनी रहती हो,
जिसकी मंज़िल नहीं,
बस ‘विदा’ की दहलीज़।
विदा हो जाओ,
फिर भी पढ़ सकती हो,
कमाई कर सकती हो,
पर घर की सेवा से,
कभी छुटकारा नहीं।
बच्चे पालो,
दूध पिलाओ या बॉटल भरो,
तेल मालिश कोई और करे,
पर घरेलू कामों का बोझ,
दिल से ना उतरे कभी।
पुरुष?
वह कमाता है,
घर का काम नहीं करता,
सेवा नहीं करता,
फुरसत नहीं मांगता।
उसका काम है कमाना,
तुम्हारा काम है सेवा करना,
उसकी थकान समझो,
अपनी इच्छा भूल जाओ।
पर याद रखना-
कमाई के नाम पर वो आराम करे,
और तुम बंदी बनो,
घर की दीवारों के बीच,
जहाँ तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं।
यह है पितृसत्ता की दास्ताँ,
जहाँ महिला पढ़ती है, काम करती है,
पर आज़ाद नहीं होती,
बस सेवा में बंधी रहती है।
- प्रीती जायसवाल
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