*****
*****
नेता जी
बाहुबली की जीत हुई विद्वान चुनाव हारे हैं।
भारत की इस राजनीति में अचरज भरे नजारे हैं।
सत्यनिष्ठ ईमानदार प्रत्याशी मत ना पायेगा
जो बांटेगा नोट सही बिन मांगे वोट वह पाएगा।
नोट बांट कर जीत गए रहे कोई ना उनके सहारे रे
बाहुबली की जीत हुई विद्वान चुनाव हारे हैं।
बना नीतियां संसद में जनता पर लागू वे करते
अपराधी अब बने मंत्री सज्जन नमन उन्हें करते।
मुद्दे की जब बात करो चुभते तब शब्द तुम्हारे हैं
बाहुबली की जीत हुई विद्वान चुनाव हारे हैं।
रोजगार की बात करो या करो बात मानवता की
जीत गए अब बने विधायक ना समझी विवशता जनता की।
जाति के वोट से जीत गये न गये किसी के द्वारे हैं।
बाहुबली की जीत हुई विद्वान चुनाव हारे हैं।
जाति से ऊपर उठकर जब तुम्हें देश नजर आ जाएगा
पछतावे के सिवाय तुम्हारे पास ना कुछ रह जाएगा।
खुद को बदलो यारा तुम न सुनती तुम्हें सरकारें हैं।
बाहुबली की जीत हुई विद्वान चुनाव हारें हैं।
- करन सिंह 'करुण'
*****
संस्कारों की परिभाषा
संस्कार क्या होते हैं ?
कपड़े कैसे पहने जाएँ,
आवाज़ कितनी धीमी हो,
हँसना कितना सीमित हो,
और सपने ?
वो तो बस दूसरों के हिसाब से देखे जाएँ-
यही है न 'संस्कार' ?
लेकिन एक सवाल है-
इन संस्कारों की परिभाषा किसने लिखी ?
क्या उस माँ ने,
जिसने अपनी बेटी को
हर बार चुप रहना सिखाया,
या उस पिता ने,
जिसने उसे 'घर की इज़्ज़त' बनाकर
उसके हक़ छीन लिए ?
या फिर उन पुरुषों ने,
जो ख़ुद हर दायरे से बाहर जीते हैं
लेकिन महिलाओं को हर कदम पर
संस्कारों की लाठी से हाँकते हैं ?
क्यों संस्कार
सिर्फ़ लड़की के पहनावे से मापे जाते हैं?
क्यों नहीं लड़कों की आँखों की भूख पर
कोई 'संस्कार' लागू होता ?
क्यों खाना बनाना 'संस्कार' है,
पर रोज़ घर लौटते ही
गुस्सा निकालना 'थकान' ?
क्यों त्याग करना
बेटी का गुण माना गया,
पर बेटा अधिकार लेकर पैदा होता है ?
सच तो ये है-
संस्कारों की परिभाषा उन्हीं ने लिखी
जिन्हें महिलाओं की स्वतंत्रता से डर लगता है।
पर अब वक़्त आ गया है
कि हम अपनी परिभाषाएँ
ख़ुद लिखें-
जहाँ सम्मान हो, बराबरी हो,
और सबसे ज़रूरी-
चुनाव का अधिकार हो।
- प्रीती जायसवाल
*****
हार में छिपी हुई विजय-
पिता का दिव्य पराजय-वरदान!
जीवन के इस मर्म को
धीरे से समझना चाहिए-
कभी-कभी पिता को
अपने ही पुत्र से हार जाना चाहिए।
यह हार पराजय नहीं,
यह प्रेम का उत्सव है;
जहाँ पिता का अहं झुकता है,
वहाँ पुत्र का भविष्य विकसित है।
पिता जब पीछे हटता है,
तो आगे बढ़ता है उसका ही अंश;
उसकी आँखों में गढ़ी आशाएँ,
उसकी वाणी में पलता है वह संस्कार-संश।
पुत्र की हर विजय में
पिता का ही पसीना मुस्कुराता है;
उसके कदमों की आहट में
पिता का तप, त्याग, ज्ञान गूँज जाता है।
इसलिए पिता की हार में
छिपा कोई दुख नहीं होता-
यह तो वही दीप है
जो स्वयं पिघलकर भी
संसार को रोशन करता है।
और जब पुत्र ऊँचा उठता है,
तो पिता का हृदय और नम्र हो जाता है;
उसकी प्रसन्नता का सूर्योदय
उसी क्षण उग आता है।
क्योंकि सच तो यही है-
जहाँ पुत्र की प्रगति दिखती है,
वहीं पिता की सबसे बड़ी जीत छिपती है;
और इस दिव्य सत्य को जानकर
हर पिता मन ही मन कहता है-
“हाँ, मुझे अपने पुत्र से हारना चाहिए…
ताकि मेरी ही रगों का उजाला आगे बढ़ता जाए.”!
- नरेंद्र मंघनानी
*****
इंतजार
इंतजार है ज़ब कोई
अपनी खुशी से हमसे बात करें।
इंतजार है ज़ब कोई
समझें हम इतने बुरे भी नहीं है।
इंतजार है ज़ब कोई
समझें साथ खड़ा व्यक्ति
मानव नहीं महामानव है।
इंतजार है ज़ब कोई
समझें हम उनको जीवन का
हर मुकाम फतेह करते देखना चाहते हैं।
इंतजार है ज़ब कोई
समझें आध्यात्मिक लोग ऐसे ही
किसी के जीवन में नहीं चले आते।
इंतजार है ज़ब कोई
समझें कि मैं आया हूँ
उसके जीवन को एक दिशा देने।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
नई क्रांति की पुकार
गांधी की हुंकार, नमक का विद्रोह
आज भी गुंजे धरती पर।
गणतंत्र का सूरज चढ़ा 26 जनवरी को
संविधान की किताब खुली,
सपनों की उड़ान भरी।
आज भी जंजीर है अदृश्य
भ्रष्टाचार की काली छाया,
गरीबी की चीखें अनसुनी।
उठो युवा तिरंगे की लाली में डूबो
क्रांति डिजिटल गांवो से,
शहरों की गलियों तक,
वोट की ताकत बनाओ तलवार।
शिक्षा की मसाल जलाओ,
बेरोजगारी को भस्म करो,
महिलाओं की मुट्ठी में ताकत,
किसान की फ़सल हंसी से लहलहाए।
संघर्ष करो नया भारत रचो
गणतंत्र अमर हो जाए।
- अनुप्रिया
*****
नैनों में उसकी तस्वीर है,
आईने की सूरत क्या जानूँ।
उसकी बातें जन्नत सी,
जन्नत की हसरत क्या जानूँ।
उसकी चाहत रहमत सी,
रहमत की क़ीमत क्या जानूँ।
वो जो दिल में उजियारा है,
सूरज की ताबिश क्या जानूँ।
उसकी आँखों में दरिया है,
साहिल की राहत क्या जानूँ।
उसके रुख़्सार पे नूर है,
चाँद की ज़ीनत क्या जानूँ।
दिल का सारा जज़्बा वो,
बाक़ी मोहब्बत क्या जानूँ।
वो ही हक़ है, वो ही सच है,
बाक़ी हक़ीक़त क्या जानूँ।
आईने की सूरत क्या जानूँ।
उसकी बातें जन्नत सी,
जन्नत की हसरत क्या जानूँ।
उसकी चाहत रहमत सी,
रहमत की क़ीमत क्या जानूँ।
वो जो दिल में उजियारा है,
सूरज की ताबिश क्या जानूँ।
उसकी आँखों में दरिया है,
साहिल की राहत क्या जानूँ।
उसके रुख़्सार पे नूर है,
चाँद की ज़ीनत क्या जानूँ।
दिल का सारा जज़्बा वो,
बाक़ी मोहब्बत क्या जानूँ।
वो ही हक़ है, वो ही सच है,
बाक़ी हक़ीक़त क्या जानूँ।
- तौसीफ़ अहमद
*****
लोहड़ी
अलाव जलाकर गाते नाचते पूरी रात,
लोहड़ी का पर्व मनाया जाता संग हर्षोल्लास।
घर- घर पकते भांति-भांति व्यंजन पकवान,
बच्चों की टोलियां करतीं हर घर जाकर लोहड़ी के गान।
घर-घर जाकर गाते जब बच्चे नई लोहड़ी
पैसे, मूंगफली,गजक और तब मिलती रेवड़ी।
फूले नहीं समाते वो, चलते इतराते इठलाते,
जेबों में भर पैसे, मिठाइयां मस्ती में गुनगुनाते।
जगह-जगह, आंगनों में जलते बड़े-से अलाव,
एकत्र हो बच्चे-बूढ़े, प्रकट करते आपसी लगाव।
अग्नि में तिल गजक मूंगफली की आहुति सब देते,
फिर सबको ये प्रसाद स्वरूप हैं बांटे जाते।
सुंदरिए नी मुंदरिए लोहड़ी जब गाने लगता बच्चों का कोई कारवां,
दुल्हा भट्टी की कुर्बानी और उसकी बहादुरी की याद आ जाती दास्तां।
अग्नि देव को तिल, मूंगफली, गुड़ की आहुति से किया जाता प्रसन्न,
सूर्य देव का भी प्रकट किया जाता आभार,
यूं ही प्रदान करता रहे भरपूर अन्न।
ढेरों खुशियां लेकर आए लोहड़ी का पर्व प्रतिवर्ष,
सबके जीवन की नैया चलती रहे सहज सहर्ष।
नाचें गाएं ढोल की थापों पर मिलजुलकर सभी,
लोहड़ी के पर्व पर कसम खाएं, नशे को छुएंगे न कभी।
- लता कुमारी धीमान
*****
चेहरे पढ़ न सकें, सच्चाई कभी उजागर न हो
मुखौटे लगा कर रखते हैं असल में ऐसे लोग
मौका पाते ही कैसे?बदल जाते हैं ये लोग
फिरकपरस्ती लोगों का कब बदल जाए ईमान ?
हक़ीक़त ऐसे लोगों की तुम्हें बताने आया हूं
नज़रे इनायत के लिए तेरी महफ़िल में आया हूं...
थोड़ी सी पदवी मिल जाए,तो अकड़ जाते हैं लोग
काम को कैसे टाला जाए? नये बहाने बनाते हैं लोग
तीन चार चार चक्कर लगवा कर भी पेट भरता नही
असलियत क्या है इसके पीछे? कोई बताता ही नहीं
पोल खुल सके ऐसे लोगों की कहानी सुनाने आया हूं
नज़रे इनायत के लिए तेरी महफ़िल में आया हूं...
कैसे तरक्की करेगा देश और प्रदेश? विषय सोच का है
अक़्सर झूठ पर झूठ और सफ़ेद झूठ बोलते हैं लोग,
कौन एतबार करेगा ऐसे झूठे लोगों पर?आप ही बताओ
मसला हल न हो जाए फ़िर भी बहाने बना लेते हैं लोग,
अपने बड़प्पन का करते हैं दिखावा, ये बताने आया हूं
नज़रे इनायत के लिए तेरी महफ़िल में आया हूं...
- बाबू राम धीमान
*****
उठो, जागो और आगे बढो
उठो, जागो और आगे बढो
लक्ष्य हासिल को तुम लड़ो
हार मान, पीछे हटना नहीं
जीतने से पहले लौटना नहीं
संघर्ष कठिन हो भले
लाख मुसीबत को तुम झेले
लक्ष्य तुझे हासिल होगा ही
संघर्ष का फल मिलेगा ही
हारा वही जो लड़ा नही
जीता वही जो डरा नहीं
पूर्वजों से तू सीख ले लो
परिश्रम का तो भीख मांग लो
लक्ष्य हासिल हेतु जो संघर्ष है किया
देर सबेर उसने लक्ष्य हासिल किया
कठिन डगर, मुशिकल सफर
जिन्दगी का अहम हिस्सा मानकर
चल तू अपना मन बनाकर
रूको तुम, लक्ष्य हासिल कर
फिर देखना, जमाने का का रंग
लोग तुझे देख रह जायेगे दंग
वाहवाही का ताली बजेगा चारों ओर
तेरी सफलता का हर तरफ होगा शोर
लोग तुझे, आदर्श मानकर
खुद को खड़ा करेगे, तेरे जगह पर
इसीलिए तो चुन्नू कवि कहता है
शुरूआत तो खुद से करनी होती है
थोडी सी मन बनाकर चलना होगा
रूके हो तो आगे बढ़ना होगा
सोये हो तो जागना होगा
बैठे हो तो चलना होगा
जीतना है तो लड़ना होगा
बस लक्ष्य तुझे हासिल करना होगा।
- चुन्नू साहा
*****
जहाँ प्रश्न रुकते हैं,
वहीं जीवन बहता है!
जीवन की हर कथा का
अंत मधुर ही हो-
यह आवश्यक नहीं।
कुछ प्रसंग अधूरे रह जाते हैं,
कुछ उत्तर मौन में ही
विलीन हो जाते हैं।
हर बार “क्यों हुआ ?”
की गठरी उठाए चलना
यात्रा को भारी बना देता है।
कभी-कभी जीवन आगे बढ़ने का द्वार
तभी खोलता है, जब हम कुछ प्रश्न
उसी मोड़ पर रख आते हैं,
जहाँ वे जन्मे थे।
स्वीकार की शांति में
एक गहरी समझ छिपी होती है-
जो हुआ, उसे होने देना भी
एक प्रकार की प्रज्ञा है।
जब प्रश्न थमते हैं,
तब ही पथ खुलता है…
और जीवन, नए अर्थों के साथ
फिर से बहने लगता है।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
पहाड़ी गीत
सस्ते मुफता रे राश्णा
जो झोलियां पाईयां ।
ना खेतरें जवारियां,
ना फाटेंं खड़ोहडियां,
औणा जाणां छुटी गयाओ
भाईचारा मुकी गया।
पिपलें नी पौंदियां पींघां।
जिंदड़िये बदली गया...
बदलोई गया...
टपरु चकंधे मुकी गए,
कंकरीटा रि बणीयां मंजला मंजलां,
चिड़ियां नी करदी चींचीं चूं चूं,
कुकड़ू नी बोलदे कुकड़ूं कूं-कूं
काव नीं करदे कड़ांअ।
जिंदड़िये...
सारियां ईलां लौहरा गईयां,
तितरां री नी सुणहंदी तीतीरी तितरी-तितरी
गिदड़ां री नी सुणहंदी हू हू हूआ हूआ-हूआ
बचारे डंगरे फिरदे नमाणे।
जिंदड़िये...
खड्डां रा पाणी घरें पुजाया,
घराट घराटी मुकी गए।
अज्ज घरेंघरें चकियां लगीओ गईयां,
नमाणे खूह, नालू, बौड़ियां।
जिंदड़िये...
अंग्रेजिया जो अंगड़ू, पाईरा,
रिश्तयां रे पुट्ठे सिद्धे नाओं बणाईरे,
पहाड़ी बोलो सै गवार बणाईरा।
भुले राम रमैय्या प्रणाम।
जिंदड़िये...
गायब चुल्हा, चोटी, धोती,
मुनहणी,जनेऊ, पत्तेयां री पतलां
कजो कीयां करी पाणी औहतियां,
नाच गिद्धे सब छुटी गये
हुण डीजे पर लुडियां धमालां
जिंदड़िये...
- बृजलाल लखनपाल
*****
यादों की गठरी
खोली मैंने इक दिन
पुरानी यादों की गठरी
रखे थे जिसमें-
बड़े प्यार से सहेजे
कुछ किस्से-कहानियां
पन्नों में कैद अनकही बातें
और-
वक्त के साथ पीछे छूट चुके
तुम संग बिताये मधुर पल
कुछ सूखे गुलाब की पंखुड़ियाँ
जिनकी खुश्बू को महसूस कर
आज भी मेरा अंतर्मन महक उठा
तभी अचानक इस ख्याल से-
कहीं कोई हवा का झोंका
उड़ाकर न ले जाये
मेरी ये अनमोल स्मृतियाँ
मैंने झटपट फिर से समेट ली
यादों की गठरी
- गीता सरीन
*****
कविता के भाव
जीवनपथ के गलियारों में,
जो फांक रहे हैं सन्नाटे,
उनके हृदय स्पंदन में
कविता के भाव उभरते है।
फूल खिलाकर उपवन में
जो छांट रहें हैं कांटे,
उनकी झुलसाई चमड़ी को
घाव नहीं अखरते हैं।
एकांत कभी किसी मानस को
इतना मूक बना देता है,
पेट भले छोटा हो लेकिन
भूख बड़ी बना देता है।
अश्रु का काढ़ा पीकर के,
कुछ लोग पेट भी भरते हैं।
उनके हृदय स्पंदन में
कविता के भाव उभरते है।
जो विष पीने के आदि हैं,
उन्हें चाहत नहीं हलाहल की,
जो आज को जी भर जीते हैं,
उन्हें चिंता नहीं कभी कल की।
लेकिन कल भर की चिंता में,
सपनों की नींव जो धरते हैं,
उनके हृदय स्पंदन में,
कविता के भाव उभरते हैं।
- मंजू सागर
*****
अरिल्ल छंद
जीवन सुन्दर सरल बनाएं।
हिन्दी भाषा राष्ट्र बताएं।।
सत्य सनातन धर्म सिखाता।
भटक गये तो मार्ग दिखाता।।
हम सब हिन्दी दिवस मनाएं।
जन-जन को यह बात बताएं।।
क्या है हिन्दी बोध कराएं।
पढ़ें लिखों का मान बढ़ाए।।
दोहा रोला छंद सिखाता।
गीत गजल संगीत सुनाता।।
वेदों का सब सार बताता।
शब्दों का पहचान कराता।।
हिन्दी को हम पढ़ें पढ़ाएं।
हिन्द देश का मान बढ़ाएं।।
हिन्दी से है हिन्द हमारा।
संस्कारों से इसे सॅंवारा।।
- रिंकी सिंह
*****
चरित्र का कठघरा
जब स्त्री बोलती है,
तो शब्द नहीं,
परंपराएँ असहज होती हैं।
तब उसके विचार नहीं,
उसका चरित्र कठघरे में
जब स्त्री बोलती है,
तो शब्द नहीं,
परंपराएँ असहज होती हैं।
तब उसके विचार नहीं,
उसका चरित्र कठघरे में
खड़ा किया जाता है।
क्योंकि समाज जानता है
विचार से हार संभव है,
पर चरित्र पर वार
सबसे आसान हथियार है।
पर स्त्री मुस्कराती है,
और आगे बढ़ जाती है
क्योंकि जो चरित्र की चोट सह ले,
वह विचार में अजेय हो जाती है।
अब वह स्पष्टीकरण नहीं देती,
न प्रमाणों में खुद को तोलती है।
क्योंकि वह जान चुकी है
सच को सफ़ाई की नहीं,
साहस की ज़रूरत होती है।
क्योंकि समाज जानता है
विचार से हार संभव है,
पर चरित्र पर वार
सबसे आसान हथियार है।
पर स्त्री मुस्कराती है,
और आगे बढ़ जाती है
क्योंकि जो चरित्र की चोट सह ले,
वह विचार में अजेय हो जाती है।
अब वह स्पष्टीकरण नहीं देती,
न प्रमाणों में खुद को तोलती है।
क्योंकि वह जान चुकी है
सच को सफ़ाई की नहीं,
साहस की ज़रूरत होती है।
- डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"
*****
औरत का श्रृंगार
औरत का श्रृंगार कंगन नहीं,
जो टूटे तो बिखर जाए,
औरत का श्रृंगार वो मुस्कान है,
जो पीड़ा में भी दमक जाए।
सिंदूर नहीं उसकी पहचान,
न बिंदी में उसका मान,
उसकी आँखों की चमक में
बसता है आत्मसम्मान।
मेंहदी रचे हाथों से अधिक
उसके कर्मों की रेखाएँ बोलती हैं,
हर मुश्किल में भी जो
हिम्मत की कहानी तोलती हैं।
चूड़ियाँ खनकें या न खनकें,
उसकी आवाज़ गूंजती है,
अनकही पीड़ा, अधूरे सपने
शब्द बनकर बहती है।
घूँघट हो या खुले विचार,
हर रूप में वह संपूर्ण है,
संस्कारों की जड़ में बसी,
फिर भी सोच में स्वतंत्र है।
उसका सबसे सुंदर गहना
उसकी आत्मा की रोशनी है,
जो घर, समाज, और दुनिया को
हर पल नई दिशा देती है।
औरत सजे तो विचारों से,
सपनों से, स्वाभिमान से,
तभी उसका श्रृंगार बनता है
सम्मान, समानता और पहचान से।
औरत का श्रृंगार कंगन नहीं,
जो टूटे तो बिखर जाए,
औरत का श्रृंगार वो मुस्कान है,
जो पीड़ा में भी दमक जाए।
सिंदूर नहीं उसकी पहचान,
न बिंदी में उसका मान,
उसकी आँखों की चमक में
बसता है आत्मसम्मान।
मेंहदी रचे हाथों से अधिक
उसके कर्मों की रेखाएँ बोलती हैं,
हर मुश्किल में भी जो
हिम्मत की कहानी तोलती हैं।
चूड़ियाँ खनकें या न खनकें,
उसकी आवाज़ गूंजती है,
अनकही पीड़ा, अधूरे सपने
शब्द बनकर बहती है।
घूँघट हो या खुले विचार,
हर रूप में वह संपूर्ण है,
संस्कारों की जड़ में बसी,
फिर भी सोच में स्वतंत्र है।
उसका सबसे सुंदर गहना
उसकी आत्मा की रोशनी है,
जो घर, समाज, और दुनिया को
हर पल नई दिशा देती है।
औरत सजे तो विचारों से,
सपनों से, स्वाभिमान से,
तभी उसका श्रृंगार बनता है
सम्मान, समानता और पहचान से।
- रेखा चंदेल
*****
















No comments:
Post a Comment